मंगलवार, सितंबर 26, 2006

खुद ही तकदीर बनानी होगी...

खुद ही तकदीर बनानी होगी

खुद ही तकदीर बनानी होगी. सच है. अपनी तकदीर तो हमें खुद ही बनानी होगी. आप अपनी तकदीर नहीं बनाएंगे तो और कौन बनाएगा? शायद ईश्वर भी नहीं. अनुभूति कलश में रमा द्विवेदी लिखती हैं -

खुद ही तुम्हें अपनी,
तस्वीर बनानी होगी।
खुद ही तुम्हें अपनी,
तकदीर बनानी होगी॥

न रहना इस भ्रम में,
कोई साथ देगा तुम्हें।
साथ तो देगा नहीं,
हरदम मात देगा तुम्हें॥

भारतीय सिनेमा में शंकर जयकिशन के बारे में कुछ चर्चा की जा रही है. हिन्दू जागरण पर बुश पर बढ़ते दबाव के बारे में विस्तृत चर्चा की गई है. उन्मुक्त वंदेमातरम के इतिहास पर शोध करने लगे हैं. उनका ताजा आलेख वंदेमातरम् और कानूनी मुद्दों के बारे में है, और शोध परक है.

भावनाएँ में इस दफ़ा बम युक्त भावनाएँ हैं -

मरते सपने, मरते अपने और मरती किलकारी है ।
नये समय की नयी समस्या विपदा यह अति भारी है ।

फ़ुरसतिया की कलम पुरानी डायरी के पन्नों को पलटते हुए चली . उन्हें मलाल है कि महज दो साल की ब्लॉग गिरी से ही जब उन्हें महाब्लॉगर की पदवी मिल गई तो पंद्रह साल पुरानी लिखी रचनाओं में आखिर क्या कमी रह गई थी?

चाह गयी चिंता मिटी,मनुआ बेपरवाह,
जिनको कछू न चाहिये सोई शाहंशाह।

आगे वे बढ़िया सूफ़ियाना गोठियाते हैं -

चाहत को बरकरार रखने में बहुत मेहनत करनी पड़ती है।

सचमुच. चिट्ठा चर्चा लिखने की चाहत को बरकरार रखने में भी बहुत मेहनत करनी पड़ती है. अगर आप चाहते हैं कि आप भी चिट्ठा चर्चा लिख सकते हैं तो आपका इस मंडली में स्वागत है. सार्वजनिक एक टिप्पणी दे मारिए, या फिर सार्वजनिक कहने में शरमाते हैं तो फिर ईमेलवा दे मारिए मुझे या अनूप को या इस दल में जुड़े किसी को भी. वैसे, अगर यह खयाल आता है कि आपका खुद का या किसी का खास चिट्ठा यहाँ चर्चा में आने से रह गया तो फिर आपके लिए यह एक सही मौका है उस चिट्ठे को न्याय दिलाने का. आप भी लिखिए चिट्ठा चर्चा. स्वागत है आपका.

बहरहाल, आगे चर्चा करते हैं. संजय बेंगाणी (सही उच्चारण लिखा है न?) ने तरकश में जैन धर्म के एक अति विचित्र रस्म के बारे में लिखा है. संथारा - एक तरह की इच्छा मृत्यु है जिसमें धर्म का सहारा लेकर व्यक्ति अन्न जल त्याग कर मृत्यु का वरण करता है. मृत्यु अकाट्य है. परंतु इसे वरण करना? चलिए, संजय यही तो चाहते हैं - आप इस विषय पर अपने-अपने तर्क और विचार रखें.
संथारे तथा आत्महत्या में अंतर:

"आत्महत्या करने के पीछे मन में द्वेष का भाव होता हैं या फिर घोर निराशा। ऐसा हो सकता हैं अवसर मिलने पर व्यक्ति आत्महत्या का इरादा त्याग दे तथा अपने कृत्य पर पछतावा भी हो। जबकि संथारे में तत्काल मृत्यु नहीं होती यानी सोचने समझने तथा अपने उठाए कदम पर पुनर्विचार करने का पर्याप्त समय होता है। संथारे में जीवन से निराशा तथा किसी भी प्रकार के द्वेष का कोई स्थान नहीं होता। इसलिए इसे आत्महत्या से अलग माना जाना चाहिए। संथारा की तुलना सति प्रथा से करना भी गलत हैं, संथारा लेना हिन्दू धर्म के समाधि ले कर मृत्यु को प्राप्त होने जैसा है। शिवाजी महाराज के गुरूजी ने तथा रामदेव पीर ने समाधि ली थी। सीताजी ने भी समाधि ली थी।

मेरा निजि मत हैं की धर्म में दखल न मानते हुए इस विषय पर व्यापक चर्चा होनी चाहिए। अगर हम चाहते हैं की सभी का जीवन सुखद हो तो हमें सभी के लिए सुखद मृत्यु की कामना भी करनी चाहिए।


(मेरी परदादीजी ने भी संथारा लिया था, मेरे पिताजी की मौसीजी ने भी संथारा लिया था. और जो विमलादेवी चर्चा में हैं वे भी मेरी दूर की रिश्तेदार हैं.)"

वहीं तरकश में संजय नवरात्रि पर्व के बारे में बताते हैं - खासकर गुजरातियों के बारे में -

"हालाकि अब शहरों मे गरबो का व्यवसायीकरण हो गया है। आयोजक बङे पैमाने पर पार्टीप्लोट तथा क्लबों में गरबो का आयोजन करते है, इनमें हिस्सा लेने के लिए महंगी टिकीटे खरीदनी पड़ती हैं पर जिस प्रोफेशनल तरीके से आयोजन होता हैं, पैसे वसूल हो जाते हैं। यह बात और हैं की इनमे परंपरागत गरबो का मुल स्वरूप ही गायब सा हो गया है। फिर भी शुरूआत दुर्गा की आरती से ही होती है बाद में गरबे शुरु होते है जिसका स्थान जल्दी ही डांडीया ले लेते है. नवरात्रि एक ऐसा त्योंहार है जिसमे युवावर्ग सबसे ज्यादा उत्साह के साथ हिस्सा लेता है. न रोक न टोक, बस पुरी रात नाचो गाओ।. ऐसे मे प्रेमी पंखीओ को उड़ने के लिए मुक्त आकाश मिल जाता है। गुजराती समाज में खुलापन है इस लिये नैतिकतावादीयों की चिल्लापो नही सुनायी देती। आपको आश्चर्य होगा देर रात तक अकेली लङकीयां बेखोफ सड़को पर घूमती नजर आयेगी पर छेड़छाड़ जैसी कोई घटना नही होती।"

इस चर्चे का चित्र - सुनील के कैमरे से - इल्हा का किला

मित्रों, इस चिट्ठा चर्चा को रात्रि 12.59 पर लिखा जा रहा है जबकि निद्रा देवी पलकों पर आसन जमाने को तत्पर है. रेडियो पर मोर गिरधारी नजरिया गीत बज रहा है - भोजपुरी गीत. और आगे मुझे समझ नहीं आ रहा है. इसीलिए व्यंज़ल का डोज़ अगले हफ़्ते. और, अगर चर्चे में आपके चिट्ठे छूट गए हों तो माफ़ी चाहता हूँ, और उम्मीद करता हूँ कि अगले चिट्ठाचर्चाकार उन्हें अवश्य शामिल करेंगे. वैसे, आपके लिए भी निमंत्रण तो मैं पहले ही दे चुका हूँ :)

इस दफ़ा की टिप्पणी - संजय (क्या बात है संजय, तीन दफ़ा अवतरित हो गए?) को ईर्ष्या हो रही है -

सुनील के चिट्ठे छायाचित्रकार पर -

आपके भाग्य से ईर्ष्या होने लगी हैं, आप सारा जहाँ घूम सके हैं और ऐसे अद्भुत नजारे कैमरे में कैद कर सके हैं.

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1 टिप्पणी:

  1. खुद ही तकदीर बनानी होगी
    अपनी तकरीर सुनानी होगी---

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