शुक्रवार, सितंबर 15, 2006

गुमशुदा की तलाश का विज्ञापन

बहुत पहले कुछ ऐसा विज्ञापन देखने को मिलता था

प्रिय बेटा मुन्नु , जल्द घर आ जाओ, सब व्याकुल है, कोई तुम्हे कुछ न कहेगा।
तलाश हैः सफेद रंग के, लंबे तड़ंगे बालक की , भूरी कमीज पहने घर से निकला है, पहुँचाने वाले को ढाई हजार रूपये इनाम।
कुछ ऐसा ही माहौल ब्लागजगत में है, हर प्रमुख ब्लागर के चैट आईकन में, परिच्रचा में, ब्लाग प्रविष्टियों में देखने को मिलता है कि
  • नारद जल्द वापस आयेगा।
  • नारद जल्द लौटेगा।
  • नारद कुछ समय के लिये गायब।
  • अगर आप नारद को चाहते हैं तो अपना अमूल्य समर्थन दीजिये।

हम सोच रहे हैं कि अनूप भार्गव जो मुलायम सिंह से पुरस्कार लेने लखनऊ गये हैं कहीं अति उत्साह में उन्हे कोई ब्लाग न दिखा दें। बेचारे मुलायम यही समझेंगे कि मिशनरी वालो का दौरा अब ब्लागियों को पड़ गया है जो सरेआम स्वर्ग से नारद जी को बुलाने में जुटे हैं। अतः यह स्पष्ट कर दिया जाये कि नारद हम चिठ्ठाकारो का प्रिय जालस्थल है, इसकी लोकप्रियता का अँदाजा इसी से लग सकता है कि लोग दिलखोलकर सहयोग कर रहे हैं। यह सब देख कर बहुत खुशी होती है, कसम से।


खैर नारदाव्हान के मध्य चर्चा शुरू करते हैं। हिंदी दिवस पर अग्रगण्य लेखक समीर बाबू का लेख याद दिला गया ठेलुआ महाराज के लेख इनविटेशन - आइये, अपनी नेशनल लैंगुएज को रिच बनाये की।

उनकी बात सुन कर मुँह का जायका बिल्कुल वैसा ही हो गया जैसा कि यहां के समोसे पर केचअप डाल कर खाने पर हो जाता है और हम भी मजबूरीवश समोसा खा लेते हैं.

समीर बाबू के अँदाजे बयाँ से मुझे लग रहा है कि फुरसतिया जी और सुनील दीपक जी के के बाद यह तीसरे सर्वाधिक लोकप्रिय ब्लागर बन चुके हैं।

भारतीय सिनेमा नाम का यह ब्लाग भी देखिये जो फिल्म इतिहास के मोती चुन चुन कर ला रहा है हमारे बीच।


हमारा देश सठीयाने को हैं, अमुमन इस उम्र तक आते आते जबान लड़खड़ाने लगती हैं. और एक हमारा देश हैं अभी तक अपनी भाषा ठीक से बोलना भी नहीं सीख पाया हैं.

यह पीड़ा है सँजय भईया की।

सुनील दीपक जी दिल की बात बोल गये

आज के युद्ध, बम और आतंकवाद के वातावरण में मेरे विचार में भारत के विचारक और दर्शनशास्त्री दुनिया को विभिन्न धर्मों के आपसी सम्मान और समन्वय से साथ रहने का संदेश दे सकते हैं. बहुत दुनिया देखी है पर भारत जैसा विभिन्न धर्मों के साथ रहने का तरीका किसी अन्य जगह मिलना कठिन है.



पर सुनील जी, त्रिशूल लहराते बजरंगियो और फतवे बिखेरते कठमुल्लो से कब तक बची रहेगी हमारी सहिष्णुता की छवि?

उन्मुक्त जी से जानिये कि किस तरह हरिवंश राय बच्चन जी अँग्रेजी की भावशून्यता बखान चुके हैं

'अंग्रेजी बिना लेशमात्र कृतज्ञता अनुभव किए ‘थैंक यू’ कह सकती है। जब यह ‘सारी’ कहती है तब अफसोस इसे शायद ही कहीं छूता हो। ‘आई ऐम ऐफ्रेड’ से इसका तात्‍पर्य बिलकुल यह नहीं होता कि यह जरा भी डरी है; और इसकी उक्ति, ‘एक्‍सक्यूज मी’ (यानी मुझे क्षमा करें) आपके गालों पर थप्‍पड़ लगाने की भूमिका भी हो सकती है।


सबके ब्लाग की कारें दौड़ रही हैं हिंदी दिवस की लेन में, लेकिन निधि जी ने अभी शिक्षक दिवस का लैप पूरा करना रह गया था ।

मीडिया की खिंचाई का कोई मौका नही छोड़ते बालेंदु भाई ।


क्या बात कही है विनय भाई ने
प्राकृतिक भाषाएँ एक दिन में जन्म नहीं लेतीं, इसलिये उनके जन्म-दिवस नहीं होते. यही कारण है कि आपने कभी फ़्रांसीसी दिवस या अँगरेज़ी दिवस नहीं सुने होंगे. ऐसे देशों में भी जहाँ माँ-बाप-भाई-बहन-पत्नी-चाचा-ताउओं के लिए भी दिन तय होते हैं, किसी भाषा का कोई ख़ास सरकारी या ग़ैरसरकारी दिन नहीं होता. फिर हमें ये क्या सूझी?

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3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत साधुवाद और धन्यवाद, हौसला अफजाई के लिये.

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  2. समिक्षा तो आपभी खुब कर लेते हो, थोड़ासा गुदगुदाने वाला मसाला भी डाल दें तो जायका और बढ़ जाएगा.

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  3. अनूप भाई, सभी चिट्ठाकारों का प्रोत्साहन करके एवं उनके चिट्ठो् का प्रचार-प्रसार करके महान कार्य कर रहे हैं आप| कोटिशः धन्यवाद|

    जी.के. अवधिया

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