शनिवार, नवंबर 11, 2006

मध्यान्हचर्चा दिनाकं 11-11-2006

संजय के इंतजार में धृतराष्ट्र थोड़े बेचैन हो रहे थे. वे आज बांग्ला नजाकत वाली हिन्दी में चर्चा सुन प्रसन्न दिख रहे है. संजय ने कक्ष में प्रवेश किया तो उनके हाथ में लेपटोप के साथ-साथ एक हाथ में कोफि का मग भी था.
संजय : आपकी कोफि महाराज.
धृतराष्ट्र : धन्यवाद संजय. आज चिट्ठाचर्चा में नया फ्लेवर था. अच्छा लगा. अब तुम अपनी सुनाओ.
संजय : जी महाराज. लगता है एक दंगल सृजन-शिल्पी के कक्ष में पानी को लेकर होने वाला है, संजय बेंगाणी की टिप्पणी पर कुछ बखेड़ा हुआ है.
धृतराष्ट्र : इन दो तीन दिनो से यही सब हो रहा है, किसी और दिशा में देख कर बताओ.
संजय : महाराज यहाँ एक घायल योद्धा कवि मित्र दर्द से कराह रहे है तथा दिवाने हुए जा रहे है. इधर समीरलालजी अपने ऑफिस के अनुभव बांट रहे है, तथा अब तक खुद कैसे प्रमोशन पाते रहे है इसका राज भी बता रहे है. समझदार बन्धू फटाफट ज्ञानार्जन कर लें.
धृतराष्ट्र : कहीं तुम भी तो कुछ सीख सीखा कर नहीं आए हो ना?
संजय : नहीं महाराज मैं उडनखटोले वालों से दूर ही रहता हूँ. आप बस मेरे प्रमोशन का ध्यान रखना.
धृतराष्ट्र : देखेंगे, अभी तो आगे बढ़ो.
संजय : आगे महाराज गोपालपुरीयाजी मंथरा का महीमा गान कर रहे है. बेचारी ने हजारों सालो से बुरी भली सुनी है, उसे थोड़ी ‘हिलिंग टच’ मिल जाएगी.
और यह देखिये गुप्ताजी काव्यालय में स्वीकार रहे हैं की मत मारी गई जो प्रेम किया.
धृतराष्ट्र : कोई नई बात नहीं, सभी भुगतभोगी है.
संजय : और महाराज एक नए योद्धा मैदान में उतरे है, सुदूर असम से. मनोज सेखानी. अपनी मौज में है, आशा है लम्बी पारी खेलेंगे.
धृतराष्ट्र : हूँ..... हम उनका स्वागत करते है.
संजय : महाराज अब लोग-आउट होने की अनुमति दें.

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