बुधवार, नवंबर 08, 2006

गुरुर बोलता है

ढाक के तीन पात पर संजय बेंगाणी जी पर असम में हुये बम विस्फोटों से चिंतत हो पूरा उल्फा वृतांत कह गये. उसी से प्रभावित मेरी कुछ पंक्तियां देखें:

नजर पड़ती है धरती पर, वहाँ तारे भी रोते हैं
असर है खौफ का ऐसा खुली आँखों ही सोते हैं.
सजगता जब तलक होगी, जरा हम चैन पा लेंगे
अधिकतर चूक के किस्से, बड़े शहरों में होते हैं.

--समीर लाल 'समीर'


तो आज का काम कुंण्डली की जगह इसी रचना से चला दिया जाये तो ही ठीक रहेगा. अगली बारी दो दो सुना देंगे. :)


चलिये, अब देखें, इधर उधर, दायें बायें और उपर नीचे, चिट्ठा जगत का हाल चाल.

तरकश पर खुशी की पाड कास्ट: इसमें है साक्षात्कार श्रीमती अतुला आहूजा से, जो कि रिडिंग रेनबो नामक व्यवसायिक संस्था चलाती है और बच्चों में किताबें पढ़ने की ललक कैसे विकसीत करें, इस बारे में बता रहीं हैं. १५ मिनट का यह साक्षात्कार बहुत सी गहरी बातों पर प्रकाश डालता है. जरुर सुनियेगा.

और साथ ही तरकश पर देखें, श्री मृगेश शाह से अफलातुन देसाई की बातचीत. मृगेश शाह गुजराती वेबसाइट "रीडगुजराती.कॉम" के संपादक हैं।औसतन ६००-७०० लोग रोज इस स्थल पर पहुंचते हैं.'पुस्तक परिचय' और 'साहित्य विभाग' नामक दो चिट्ठे मूल स्थल से जुडे हैं.'साहित्य-विभाग' ३,०००,०० लोग देख चुके हैं.मृगेश मानते हैं कि प्रतिष्ठित साहित्यकारों की रचनाओं तथा गुजराती प्रेमियों की व्यक्तिगत चर्चा की कारण इतनी पाठक संख्या हो सकी है.'रीड गुजराती' के बारे में लगभग सभी गुजराती अखबारों और लोकप्रिय पत्रिकाओं में लेख छपे हैं.

उर्जस्विता - रमा द्विवेदी जी आज अपनी कविताओं से हट कर कहानी पेश कर रही हैं:


गांव में बालिकाओं के लिए एक छोटी सी पाठशाला थी। एक बाईजी पढाती थी जो पढाती कम मारती-डांटती ज्यादा थी। इनकी भी बडी अजीब कहानी थी। सफेद साडी में लिपटी कंचन काया और युवावस्था का तेज मुख पर दमकता था।वे देखने में त्याग की सजीव मूर्ति लगती थी।वे बाल विधवा थी।जन्म से ही एक-नेत्रा थीं। पिता-भाई के सुख से वंचित थीं।घर में केवल विधवा मां थी। जीवन की गाडी चलाने के लिए ही नौकरी करती थीं। हर रोज पांच मील पैदल चलकर आती जाती थी। पढी लिखी ज्यादा नहीं थीं लेकिन पता नहीं नौकरी कैसे मिल गई थी।


महाशक्ति परमेंद्र बाबू खास फरमाईश पर पेश कर रहे हैं टेनिस चर्चा: सोनी एरेक्सन चैम्पियनशीप टेनिस की महिला महाशक्तियों की ढ़ेरों तस्विरों के साथ उनके इनाम और मैचों के विस्तृत आंकड़ें. अगर आप ध्यान से नहीं पढ़ेंगे तो हम नहीं जानते कि आप क्या सोचें कि इतनी लड़कियों की फोटो बंदा क्यों लगा कर बैठा है. मगर भई, बड़ी मेहनत से आंकड़े और तस्वीरें जुटाई हैं तो थोड़ा ध्यान से देखें और पढ़े उनके मन के उदगार:

वैसे कम्‍प्‍यूटर पर भी बैठने की इच्‍छा नही हो रही है, पर यह लेख पूरा करना था, और इसमे प्रतीक जी के लिये ईनाम का वादा भी किया था सो इस लिये यह और महत्‍वपूर्ण हो गया है। यह मेरे लिये अलग काम है इसमे मैने लगभग 100 अधिक टेनिस साइटो से जानकारी का प्रयोग किया है तथा चित्र को को भी लिया है मै इन सभी साइट मालिको का भी आभार व्‍यक्‍त करता हूं। अब आप इस लेख का मजा ले।

अमित बाबू ने अपना सफर जारी रखते हुये हमेशा की तरह फिर दुनिया को अपनी नजर से दिखाने के लिये लायें हैं एक से एक दिलकश नज़ारों की तस्वीरें. वाह, मजा आ गया हमें तो देख कर. आप भी देखें.

निरंतर का नया अंक देखा, अतुल जी के दहकते अंदाज मे एक दहकते शहर की दास्तान: सेन्ट्रालिया और फिर मोक्ष की दुकान बंद है, गोविंद उपाध्याय एवं धारावाहिक लाल परी का अगला भाग २ और अनूप शुक्ला की पेशकश हिन्दी समानान्तर कोष : एक विराट प्रयास. यह प्रयास है अरविन्द कुमार और श्रीमती कुसुम कुमार का.

२० वर्षों के अनथक प्रयासों और समर्पण से अंततः समांतर कोश का निर्माण संभव हुआ और स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रकाशित हुआ. इस महती कार्य को निरंतर का नमन.

हम सभी हिन्दी प्रेमी ब्लागरों का भी हार्दिक नमन इस महान कार्य के लिये.
साथ ही हम निरंतर के लिये पूरे संपादक मंडल को नमन करते हैं इतने बेहतरीन प्रयास के लिये.

आज फुरसतिया जी लेकर आये हैं राग दरबारी जैसी कालजयी उपन्यास के रचियता श्री श्रीलाल शुक्ल जी अपनी मुलाकात का ब्यौरा और साथ ही उनसे प्राप्त इस पुस्तक के कुछ अंशों को नेट पर लाने के अनुमती से उत्साहित हो इसके टाईपिंग यज्ञ का ब्यौरा:

हमारे यह पूछने पर कि रागदरबारी के लिये मसाला कहां से, कैसे मिला श्रीलाल जी ने बताया कि जो देखा था वही मसाला बना। अलग-अलग समय के अनुभवों को इकट्ठा करके इसे लिखा गया। इसको प्रकाशन के पहले पांच बार संवारा-सुधारा गया। इसे लिखने के समय श्रीलालजी की नियुक्ति बुंदेलखंड के पिछ्ड़े इलाकों में रही। कुछ हिस्से तो वीराने में जीप खड़ी करके लिखे गये।


आलोक बख्शी जी ने अपना नया ब्लाग शुरु किया है गपशप, इस वादे के साथ कि ब्लाग लिखने की प्रेरणा बरकरार रखेंगे. अभी उनके दरवाजे द्वारचार का स्वागत गान चल रहा है, हालांकि कोई गपशप नहीं हुई है.

राकेश खंडेलवाल जी कल्पना के किसी मोड़ पर गाते पाये गये:

रोज पगडंडियों पर नजर को रखे
वावली आस बैठी हुई द्वार पर
पल कोई एक यायावरी भूल से
ले के संदेस आ जाये इस राह पर
तो अनिश्चय के कोहरे छँटें जो घिरे
धुन्ध असमंजसों की हवा में घुले
कल्पना से निकल आओ तुम इस तरफ़
और संबंध के कुछ बनें सिलसिले


और रचना जी बिना कुछ कहने को हुये ही बड़ा सुन्दर सा लिख गईं:

और फिर मेरी समझ से चिट्ठाकार होने की मायने ही ये हैं कि आप इस बात को लेकर भी बहुत कुछ कह सकते हैं कि कहने को कुछ नही है!!
अपने छोटे से सफर को लेकर जो बिखरे-बिखरे से विचार हैं, वो ही लिख रही हूँ.

“रफ्तारों का नाम सफर है,
धूप से तपती एक डगर है.
थक कर बैठें पेड के नीचे,
सूकून पा लें आँखें मीचें.
अब वो प्यारे पेड कहाँ हैं?
पतरों वाले ‘शेड’ यहाँ हैं!!


एक से एक बात कही गयी है, जरुर पढ़ें.

शुएब भाई अपनी अलबेली अदा में फिर खुदा से पंगा लेते नज़र आये, अबकी बार सद्दाम कांड़ में खुदा को घसीटा जा रहा है.

इसी दौरान ईराक से खुदा को फोन आने शुरू होएः अगर आप वाकई खुदा हैं तो कृपया अली की मज़ार को सौदी अरब मे शिफ्त करदें बडी मेहरबानी आपकी, यहां हम सुन्नी-शिया आपस मे एक दूसरे के लिए खून के प्यासे हैं। खुदा ने दिलासा दियाः जब वो ईराक आए तो एक साथ मिल बैठ कर मसला हल कर लेंगे। क्या खाख हल करेंगे? सेकडों वर्ष गुज़र चुके आज तक ये मसला हल नही हुआ कि कौन खुदा की औलाद है हद तो ये है कि खुदा खुद नही जानता कि वो किस का पैदा किया है?


प्रियंकर जी शुएब की बात टिप्पणी में आगे बढ़ाते है:

शुएब भाई !
एक खुदा को दुनिया से भेजने की बहुत जल्दी थी दूसरे खुदा को . दूसरे को अपनी खुदाई जो बचानी थी .पर उसे भी एक दिन ऐसे ही जाना होगा दोनो हाथ पसार कर . यह अहसास अगर पहले से हो जाए तो शायद आदमी खुदा बनने से डरे.


और हमारे संजय भाई, जोगलिखी पर इराक पर अपनी कामनायें व्यक्त कर रहे हैं.


कविराज गिरिराज जोशी जी अपनी शेरों की श्रॄंखला में भाग ३ ले कर आये बांसुरी बजाते हुये. ५-५ का सेट बना कर पेश कर रहे हैं, और १०० से ज्यादा शेरों का जुगाड़ का उनके पास पहले से है, तो २० श्रृंखलाओं का फंडा तो कम से कम है ही अगर वो और न लिखें तब भी. और वो अभी भी लिखते जा रहे हैं ऐसा पता लगा है.

एक समय सुना चुटकुला याद आ रहा है:

"एक मरियल से आदमी की पत्नी बडी मोटी थीं, रात में सोते समय पत्नी जी का एक पांव पति पर आ गया. पति ने धीरे से पत्नी को जगाया और पूछा: 'डार्लिंग, तुम क्या सोचती हो कि जब मौत आये, तब आदमी तुरंत मर जाये कि कराह कराह कर, धीरे धीरे'. पत्नी ने तपाक से कहा: 'तुरंत', पति महोदय कहने लगे, तब तुम अपना दूसरा पैर भी मेरे उपर रख दो."

एक साथ ही काहे नहीं छाप देते हो कविराज भाई, आप धीरे धीरे पेश करें, उसकी जगह हम ही धीरे धीरे पढ़ ही लेंगे. :) मजाक कर रहा हूँ, बुरा न मानना, आजकल बुरा मानने का फैशन चला हुआ है. आपकी जैसी इच्छा हो, वैसे छापें.

बाकी गज़ल के शौकिनों के लिये तरह तरह की बाहुदरशाह जफ़र से लेकर जावेद अख्तर तक की गज़लें पेश कर रहे हैं, बिना शीर्षक के कैलाश जी, उन्हीं गजलों की एकाध लाईन या गज़लकार का नाम ही शिर्षक में चेंप देंगे तो भी चलेगा, कम से कम क्लिक करने को एक जगह तो मिल ही जायेगी.

एक और नज़रिया पर क्षितिज भाई का नजरिया देखें, हेरी पॉटर के जे के रोलिंग के विषय में. और सुनें मोबाईल की कलयुगी गाथा भुवनेश के बेबाक अंदाज में. वाकई, भुवनेश का अंदाज निराला है और वो बधाई के पात्र हैं:

लोगों के मोबाइल संबंधी ज्ञान का विस्तार करने के लिए जगह-जगह विश्वविद्यालय खोले गये परंतु सरकार को बाद में वे विश्वविद्यालय बंद कर देने पड़े क्योंकि लोग बिना वहां जाए ही अखबारों, टेलिविजन और सामूहिक चर्चा (ग्रुप डिस्कसन) के द्वारा साक्षर होने लगे। देश का मानव संसाधन विनाश मंत्रालय अपने देश के नागरिकों की इस उपलब्धि से अभिभूत था और उसने भी साक्षरता का प्रतिशत बढ़ाने हेतु वित्त मंत्री से मोबाइल पर टैक्स कम करने की सिफ़ारिश कर दी।


रमण कौल जी ने अमरीका में हो रहे चुनाव पर बहुत ही ज्ञानवर्धक जानकारी पेश की:

यहाँ के चुनावों की खासियत यह है कि हर साल चुनाव दिवस पर यहाँ चुनाव होते हैं। और चुनाव दिवस रहता है नवंबर के पहले सोमवार से अगला दिन — यानी इस बार 7 नवंबर को। यह दिन 2 नवंबर से ले कर 8 नवंबर वाले सप्ताह में आने वाले मंगलवार को पड़ता है।

चलते चलते सागर नाहर साहब हमारे बताये भविष्य से डरे हुये अपना भविष्यफल देखने साफ्टवेयर ले आये और फिर उसमें भी उलझ गये हैं. अरे भइये, हम तो आपको आपके चिट्ठे का भविष्य बताये थे, न कि आपका. काहे इतना परेशान हो उठे. यह देखें कैसे उलझे हमारे सीधे सादे सागर भाई:

सामान्य स्वभाव:
शनि ग्रह के कारण ये मितव्ययी, गर्वशील और विचारवान और व्यवहारिक होते हैं। वे अत्यन्त सहनशील, धीरजवान तथा नियमित स्वभाव वाले होते हैं आलसीपन से ये घृणा करते हैं , किसी भी कार्य को आरम्भ करने में विलंब कर सकते हैं।
समझ में नहीं आय़ा कि जब मैं आलसीपन से घृणा करता हूँ तो किसी भी कार्य को आरम्भ करने में विलंब कैसे कर सकता हूँ।


चलो, कभी मौका लगा तो आपकी कुण्डली भी देखी जायेगी. हां, वो साफ्टवेयर फैंक दें. :)

मुझे लगता है बस आज के लिये इतना ही, काफी लम्बा हो गयी चर्चा. अब जाते जाते नाश्ता कर लिजिये प्रत्यक्षा जी के साथ, बड़े लज़ीज पकवान बनें हैं, क्म से कम देख कर तो ऐसा ही लगता है.

बस कल फिर नयी चर्चा, पढ़ते रहिये चिट्ठा चर्चा.


आज की टिप्पणी:

प्रतीक पांडे, जोगलिखी पर:

इस देश की विडम्बना यही है कि राजनेता दूरदर्शी नहीं हैं, स्वार्थ और लोलुपता में गले तक डूबे हुए हैं। हमारे पास किसी भी समस्या को हल करने के लिए कोई कारगर नीति नहीं है; न कश्मीर के लिए, न पूर्वोत्तर के लिए और न ही नक्सलियों के लिए।
वैसे, मैं यह जानना चाहता हूँ कि उल्फ़ा की मांग क्या है? कृपया इस विषय पर कुछ प्रकाश डालें।


अतुल अरोरा जोगलिखी पर:

संजय भाई
एक निवेदन है। आइंदा से ऐसे लेख पर संबद्ध समाचार की कड़ी भी दे दिया करिये। कभी कभी खबर आसानी से मिल जाती है पर कभी कभी मालुम ही नही होता कि बात किस खबर को लेकर है? ऐसा कई प्रतिष्ठित अखबार भी करते हैं जैसे ” राज्यसभा में फलाने के बयान को लेकर बवाल″ अब यह तो विस्तार से लिखा होगा कि किसने विरोध मे चप्पल चलाई किसने धरना दिया किसने माफी मांगी पर ससुरा बयान क्या था वह कही नही लिखा होगा।


अनूप शुक्ला प्रत्यक्षा पर:

किसी दूसरे (?)की मेज पर लगा नास्ता देखकर फोटो खींचना तो ठीक है समझ में आता है लेकिन मुंह में पानी और लालच करना घोर पाप है. ऐसा ही बनाना सीखकर तब आनंद उठाओ. वैसे भी जो नास्ता खाये जाने ज्यादा फोटो खिचाने लायक हो उसके बनाने वाले कुछ दिन और ट्रेनिंग लेनी चाहिये.है कि नहीं!

राकेश खंडेलवाल जी नये नाम राजेश जी की प्राप्ति पर संजय भाई की चिट्ठा चर्चा पर:

नाम तुमने मुझे इक नया दे दिया
कौन हूँ मैं ये अब मैं नहीं जानता
आईने का कोई अक्स बतलायेगा
असलियत क्या मेरी? मैं नहीं मानता
मेरे चेहरे पे अनगिन मुखौटे चढ़े
वक्त के साथ जिनको बदलता रहा
मैने भ्रम को हकीकत ही माना सदा
इसलिये मैं स्वयं खुद को छलता रहा

नाम तो तुमने मुझको दिया है नया
किन्तु सूरत रही है वही की वही
तुमने संशय में डला है संजय मुझे
कौन सा है गलत कौन सा है सही

आज का चित्र:

अमित जी के द्वारा प्रस्तुत सभी खुबसुरत चित्रों में से एक को चुनना मुश्किल था, फिर भी अपनी पसंद से एक निकाल लिया:


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2 टिप्‍पणियां:

  1. महेन्द्र सिंह बेदी का एक शेर है

    हुआ जो तीरे नजर नीम कश तो क्या हासिल
    मजा तो तब है जो सीने के आर पार चले

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  2. गलत नाम लिखने के लिए राकेशजी से क्षमा चाहता हूँ.
    और आज की चर्चा मजेदार रही. जलेबी की जगह पेड़े से काम चला लिया है.

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