सोमवार, नवंबर 20, 2006

हरियाणवी मखौल एक मिनट सैं....


भई, मैं कोई मखौल नहीं कर रहा. आज हमारे अजीज चिट्ठाकार राम चंद्र मिश्र जी का जन्म दिन है. आइए, सबसे पहले उन्हें जन्मदिन की बधाईयाँ दें. चिट्ठाचर्चा की ओर से तथा समस्त चिट्ठाकारों की ओर से उन्हें जन्मदिन की हार्दिक बधाईयाँ.

शनिवार को जीतू की धमकी का क्या असर हुआ कि रविवार को तो समझो चिट्ठों की बहार आ गई. हर चिट्ठा एक से बढ़कर एक, ई-पंडित के हरियाणवी मखौल की तरह!

बहरहाल, दो मिनट का इंतजार करने के बजाए मैं ई-पंडित के चिट्ठे से फूट लिया और अपने कुछ अहसासों को टटोलने लगा. कुछ दर्द भरे से थे ये अहसास. जब आप बहुत सारा हँस लेते हैं तो फिर आँसुओं भरे अहसास तो आते ही हैं-

आँसुओं का रोक पाना कितना मुश्किल हो गया

मुस्करहट लब पे लाना कितना मुश्किल हो गया.१

बेखुदी में छुप गई मेरी खुदी कुछ इस तरह

ख़ुद ही ख़ुद को ढूंढ पाना कितना मुश्किल हो गया.२

जीत कर हारे कभी, तो हार कर जीते कभी

बाज़ियों से बाज़ आना कितना मुश्किल हो गया.३

बिजलियूँ का बन गया है वो निशाना आज कल

आशियाँ अपना बचाना कितना मुश्किल हो गया.४

हो गया है दिल धुआँ सा कुछ नज़र आता नहीं,

धुंध के उस पार जाना कितना मुश्किल हो गया.५

यूँ झुकाया अपने क़दमों पर ज़माने ने मुझे

बंदगी में सर झुकना कितना मुश्किल हो गया.६

साथ देवी आपके मुश्किल भी कुछ मुश्किल न थी

आपके बिन मन लगाना कितना मुश्किल हो गया.७

अपने आँसुओं को रोकने की नाकाम कोशिश करता हुआ दूसरे चिट्ठे पर डबडबाती निगाहें फिराईं तो दिल को कुछ सुकून सा मिला. नितिन खुशखबरी बता रहे थे हिन्दी के नए, सरकारी सर्च इंजिन की क्षमताओं के बारे में-

"...चलो देर से ही भारत सरकार को आखिर इंटरनेट पर हिन्दी में खोज करने वालों की समस्या का ख्याल आ ही गया. मिनिस्ट्री ऑफ कम्युनिकेशन एंड इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी सीडेक के साथ मिलकर भारत सरकार 'सेतु' नाम से एक खोज इंजन बनाने जा रही हैं. जिसमें अंग्रेजी में मांगे जाने वाले किसी भी विषय को स्वत: ही हिन्दी में अनुवाद कर सभी प्रकार की सुचनाएं आसानी से इंटरनेट उपयोगकर्ता तक पहुंचाई जा सकेगी।..."

परंतु जब मैंने इस चिट्ठे पर रमण की यह टिप्पणी पढ़ी तो मेरी खुशी काफ़ूर हो गई :

"....खबर तो अच्छी है, पर भारत सरकार से ज़्यादा उम्मीद न ही रखें तो अच्छा है। सरकारी साइटों और सॉफ्टवेयरों का हाल देखें तो काम अधकचरा ही दिखता है। हिन्दी इंटरनेट का उद्धार नेट-नागरिकों द्वारा ही संभव है सरकारों द्वारा नहीं।..."

तकनीकी विशेषज्ञ नितिन इस चिट्ठे से कवि भी बन गए! संभवतः यह उनकी प्रथम कविता है-

बैठा मैं आज लेकर सवेरे जब अख़बार

बन रहा है हिन्दी खोजी इंजन मिला ये समाचार

प्रसन्न हो गया मन जब सोचा ये

टिप्पणी पर ही निर्भर नहीं होगी हमारी प्रसिद्धि

हमें भी खोजेंगे खुद हमारे पाठकगण

हमारा चिट्ठा देखेगा अब पूरा ये संसार

हिन्दी खोजी 'सेतु' बनाने जा रही है हमारी सरकार.

सरकारी-असरकारी सेतु से बाहर निकल कर मैं आगे विचरने चला तो अपने आप को सृजन शिल्पी के हमेशा की तरह विचारणीय चिट्ठे पर पाया. विचारोत्तेजक लेख में सृजन शिल्पी मध्य वर्ग की क्रांतिकारी भूमिका के बारे में कुछ यूं बता रहे हैं-

"...उन्नीसवीं शताब्दी में धार्मिक सुधार आंदोलनों की मध्यवर्गीय प्रगतिशील विचारधारा के विकास में सकारात्मक भूमिका रही थी, लेकिन आज जिस तरीके से स्वघोषित गुरुओं और संतों की फौज आधुनिक प्रचार माध्यमों की सहायता से कर्म फल और पूर्वजन्म के सिद्धांतों में विश्वास करने का उपदेश देने में दिन-रात जुटी हुई है, उसने भी आम मध्य वर्ग को अपनी दशा सुधारने के लिए परिवर्तनकारी संघर्ष करने के मार्ग से विमुख करने का काम किया है।..."

साधुसंतों के पंडालों में जनता की अथाह भीड़ देखकर मैं स्वयं बहुत व्यथित होता हूँ. सृजन शिल्पी के इस चिट्ठे को पढ़कर घंटों व्यथित होता रहा. बहुत देर के बाद दूसरे चिट्ठे पर निगाह उठ पाई.

और, जो निगाह उठी तो अपने आप को प्रेम के चक्कर में पाया. परंतु यहाँ प्रेम का फंडा नया है गुरु. और क्या वाकई नया फंडा है. मुझे तो सचमुच बढ़िया लगा. मैं भी भुक्तभोगी हूं. नए लोगों से इल्तिजा है कि इस नए, असली फंडे को ही आजमाएँ -

"...प्रेम के कारण मरे सब

तुमसे यह फरियाद है।

प्रेम ही करना है यदि तो

प्रेम भोजन से करो।..."

प्रेम के फंडे से निकलना किसी के लिए भी मुश्किल होता है. यह नया फंडा तो ऐसा था कि तमाम दिन रसगुल्ले-रसमलाई के सपने आते रहे. बड़ी मुश्किलों से पीछा छुड़ाया तो आगे राग दरबारी का छटवां दरबार बाबू रामधीन भीखमखेड़वी का मजमा लगा पाया-

"...रिक्शे पर अपनी दोनों जाँघो पर हाथों की मुट्ठियाँ जमाये हुए बद्री पहलवान बैठे थे। रिक्शे पर उनके पैरों के पास एक सन्दूक रखा हुआ था। दोनो पैर सन्दूक के सिरों पर जमाकर स्थापित कर दिये गये थे। इस तरह पैर टूटकर रिक्शे के नीचे भले ही गिर जाएं, सन्दूक के नीचे गिरने का कोई खतरा न था।..."

मजमे का पहला हल्ला ही जब इतना शोरगुल वाला है तो आगे आप कल्पना कर सकते हैं कि पूरा आख्यान कैसा होगा. इसीलिए तो रागदरबारी, रागदरबारी है!

मेरा रिक्शा थोड़ा आगे बढ़ा तो मैं सोचने लगा क्या भूलूं क्या याद करूं. सामने अमिताभ बच्चन का पोस्टर लगा था दशद्वार से सोपान तक. अमिताभी, जंजीरी, धांसू डायलॉग चल रहे थे जिसकी हर पंक्तियों से शोले निकल रहे थे-

"...'कलकत्ता प्रवास में अमिताभ जी एक व्यवहार मुझे बहुत पसंद आया। एक शाम को उन्होंने याद कर-करके बर्ड और ब्‍लैकर्स के अपने पूर्व सहयोगियों को चाय पर आमंत्रित किया और एक-एक से ऐसे मिले जैसे अब भी उनके बीच ही काम कर रहे हों। वे लोग भी अमिताभ की इस भंगिमा से बहुत प्रसन्न हुए। कई तो अपने बच्चों को साथ लाए जो अमिताभ के फैन हो गए थे और जिनकी आँखें यह विश्वास न कर पाती थीं कि यही व्यक्ति उनके पापा या डैडी के साथ बरसों काम कर चुका है। कभी उनके दफ्तर के पुराने चपरासी आदि भी आते तो वे उनको बुला लेते, खुशी से मिलते; और वे तो अपना भाग्य सराहते विदा लेते। अमिताभ की इस मानवीयता ने उनके कलाकार को कितना उठाया है शायद स्वयं उन्हें भी अभी इसका अंदाजा नहीं है।'..."

इसीलिए तो अमिताभ, अमिताभ हैं. किंग खान हैं तो अमिताभ शहंशाह हैं!

लो, मैं भी डॉयलॉग बाजी करने लगा. पंरतु सामने जब यमराज जी पृथ्वी पर दिख गए तो मेरा मुँह सूख गया और बोलती बंद हो गई.

"...आज प्रथ्वीलोक पर

राम और श्याम की बजाय

यमराज रह्ते है

अपने कारखाने को

चौबीसों घन्टे खुला रख,

प्रतिस्पर्र्धात्मक

उपलब्धियां देने के लिये।

चौबीसो घन्टे, हर पारी में

कारखाने में

बेरोक-टोक, काम चल रहा है।..."

बमुश्किल मैं अपने आप को संभाल पाया और खुदा को खोजने के लिए आगे अगले चिट्ठे को देखने की हिम्मत जुटा पाया. परंतु खुदा जाने कहाँ पर था!

"...इधर खोजा उधर खोजा खुदा जाने कहां पर था

वो धरती पर कहाँ मिलता मुझे जो आसमाँ पर था.१..."

खुदा को खोजते खोजते मैं थक गया और भूख लग आई. भूखे को लज़ीज़ पुलाव मिल गया. 6 साल के रासायनिक अनुभव से तैयार रासायनिक खाद्य पदार्थ को खाने का अनुभव अतीव असीम अनंत आनंददायी था. आप भी निमंत्रित हैं:

आपने खा लिया स्वादिष्ट व्यंजन? क्यों खाया? आप दोषी हैं. क्यों? यह मैं नहीं, अमित बता रहे हैं.

अपना दोष स्वीकार कर मैं आगे चिट्ठा बांचने गया तो पाया कि फुरसतिया जी सबको अखिलेश की आत्मकथा पढ़ा रहे हैं. पढ़कर लगा, यह तो मेरी अपनी आत्मकथा है! और क्यों न लगे-

"...प्रारम्भ जैसे भी हुआ, लेकिन लेखन कर्म अपना लेने के बाद, वह मुझे हमेशा एक श्रेष्ठ तथा सार्थक गतिविधि महसूस हुआ। बुरे वक्त में, दुर्दिन में, घोर हताशा और घनघोर अंधेरी मन:स्थिति में भी अपने चयन को लेकर मुझे कोई पछ्तावा नहीं हुआ। यह भी कभी नहीं लगा कि मैं कुछ और क्यों नहीं हुआ। मैं समाज के अन्य कार्यक्षेत्रों को साहित्य से नीचे नहीं ठहरा रहा हूं। बल्कि यह कहने की विनम्र कोशिश कर रहा हूं कि साहित्य सृजन किसी भी दशा में कम महत्वपूर्ण या घटिया कार्य नहीं है।..."

मैं ढूंढने लगा कि घटिया कार्य क्या होता है? क्या होता है घटिया कार्य? मुझे नहीं मिल पाया. मेरी तरह मेरे कवि मित्र भी कुछ न कुछ ढूंढ रहे हैं -

"...ढ़ुंढ़ती है ये नज़रें हर पल जिसे

याद करता है दिल हर पल जिसे

भूला पाना उसे यूँ आसां तो नहीं॰॰॰..."

मेरी तलाश जारी है. अगले सोमवार को बताऊंगा कि हिसाब क्या रहा.

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5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर चित्रण किए हो सारे चिट्ठों का। मजा आइ गवा।

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  2. बहुत अच्छी रही आपकी रिक्शा-सैर.

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  3. बेहतरीन चर्चा के लिये बधाई. व्यंजल कहाँ है??

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  4. ये चिठ्ठा चर्चा पढकर क्या कहें ऐसा लग रहा है की अपना भी एक हिंदी चिठ्ठा शुरू करें। मैं कई दिनों से इस चिठ्ठा चर्चा का नियमित पाठक हूँ। आपको अनेकों बधाईयाँ ये स्तंभशुरु करने के लिये और मेरे जैसे पाठकों के मन में चिठ्ठा लिखने की प्रेरणा भरने केलिये।

    अब ना खुदको रोक पाएंगे हम
    चिठ्ठा अपना नी लेके आयेंगे हम
    कई दिनों से सिर्फ पढ रहे थे मगर
    कुछ अपनी भी अब लिख जाएंगे हम

    तुषार जोशी, नागपूर

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  5. हम बहुत देर से आज रात को अभी सवा ग्यारह बजे इसे देख पाये और जितना देर से देखा उसी हिसाब से बहुत देर तक खुश हुये पढ़कर. इतना अच्छा लगा यह चिट्ठाचर्चा!

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