शुक्रवार, नवंबर 24, 2006

अपने सपनों को रखिये, अपनी मुठ्ठी में भरके

जगजीत-गुलज़ार
जगजीत-गुलज़ार

आज वैसे तो चर्चा करने की अतुल का बारी है। लेकिन वो कल ही हमारे हिस्से की चर्चा छू के निकल लिये लिहाजा जुमे की नमाज हमें पढ़नी पड़ेगी। हम खुशी-खुशी इसके लिये अपना माउस और की बोर्ड पोछ के बैठ गये हैं। काफी के मग पर चूंकि संजय का अकेला कब्जा है लिहाजा सबेरे-सबेरे चाय की चुस्की लेते हुये बतियाना शुरू करते हैं।

कल पंकज ने जब गुजराती ब्लाग चर्चा की तो कुछ लोगों के बड़े बढ़िया कमेंट आये। एक सवाल यह भी कि-"आप इतना लंबा लिखते कैसे हैं?" पंकज ने जो बताया वह चर्चा में देखें लेकिन यह सच है कि उनके लिखने से गुजराती ब्लाग जगह का अच्छा परिचय मिलता रहता है। संजय दोपहर की चिट्ठाचर्चा लिखते हैं उसमें उनका हास्य भाव खिलकर निखरता है। दोपहर चर्चा उनके स्वास्थ्य के लिये मुफ़ीद टानिक है। गुजराती ब्लाग चर्चा को पढ़कर लगता है कि भारत की दूसरी भाषाऒं मराठी, बंगाली ब्लाग की चर्चा भी कोई साथी कर सकें, चाहे हफ्ते में एक ही दिन, तो कितना अच्छा हो। नागपुर वासी, दिल से अध्यापकतुषार जोशी भी मराठी चिट्ठों की चर्चा के प्रस्ताव पर विचार करें।

आज जब हम यह लिख रहे हैं तो दोहरे वदन वाले, कुंडलिया किंग समीरलाल सुडोकु खेलना छोड़कर खुशी में दोहरे हो रहे हैं क्योंकि उनको भारत की दोहरी नागरिकता मिल गयी है। इस सम्बंध में उनकी तमाम योजनायें हैं जो वे कह रहे हैं कि हम अभी नहीं, नहा-धोकर बतायेंगे। तो जब तक वे नहा धोकर बबुआ बनकर आते हैं तब तक कुछ चिट्ठाचर्चा हो जाये।

शुरुआत राजगौरव की शेरोशायरी से। शेरोशायरी के शौकीन राजगौरव अपने दिन की शुरुआत एक बेहतरीन शेर से करते हैं। कल का दिन शुरू किया उन्होंने मुकेश के गाये गीत की याद करके-
मै किसी का नहीं, कोई मेरा नहीं..
इस जहां मे कहीं भी, बसेरा नहीं..
मेरे दिन का कहीं भी, अंधेरा नहीं..
मेरी छांव का है सवेरा नहीं..
हाय, भूला हुआ एक फ़साना हूं, मैं..
हां दीवाना हूं मैं.. हां दीवाना हूं मैं..


मुकेश के याद ताजा करके आगे बढ़े तो देखा मनीश के ब्लाग पर जगजीत-गुलजार की बातें चल रही थीं
:-
नज़र उठाओ ज़रा तुम तो क़ायनात चले,
है इन्तज़ार कि आँखों से “कोई बात चले”

तुम्हारी मर्ज़ी बिना वक़्त भी अपाहिज है
न दिन खिसकता है आगे, न आगे रात चले


गुलजार की लिखी त्रिवेणियों का जिक्र कुछ दिन पहले समीरजी ने किया था। इस एलबम में वे कुछ त्रिवेणियां भी शामिल हैं :-

तेरी सूरत जो भरी रहती है आँखों में सदा
अजनबी चेहरे भी पहचाने से लगते हैं मुझे

तेरे रिश्तों में तो दुनिया ही पिरो ली मैने


कुछ दिन पहले हमारे एक कलकतिया-कुलीग ने फोनवार्ता के दौरान बताया कि प्रसिद्ध अंग्रेजी दैनिक टेलीग्राफ में मुन्ने के बापू और मुन्ने की मां के ब्लाग का जिक्र हुआ था। वह विवरण तो हम न देख पाये लेकिन मुन्ने की मां ने हरिवंशरायबच्चन जी की रूस यात्रा का जो जिक्र किया वह हम आपको बमार्फत नारद जी बता दे रहे हैं। मुन्ने की मां ने भी रूस अपनी आंखों से देखा और यह आश्चर्य हुआ उनको कि वहां सब डरे हुये से लोग दिखे, कोई हंसता हुआ नूरानी चेहरा नहीं दिखा। इसपर मुझे 'नंदनजी' की गजल के ये शेर याद आये:-
वो जो दिख रही है किस्ती,इसी झील से गयी है,
पानी में आग क्या है, उसे कुछ पता नहीं है।

वही पेड़, साख, पत्ते, वही गुल वही परिंदे,
एक हवा सी चल गयी है कोई बोलता नहीं है।

रत्नाजी के लेखन की पठनीयता गजब की है। उनका घर, पति, बच्चे, परिवार उनके लिये वह धुरी है जिसके चारो तरफ घूमकर वे सारी दुनिया की परिक्रमा कर लेती हैं। आज मोबाइल चर्चा के बहाने अपने कष्ट का बयान करते हुये बात शुरू करती हैं:-
हम सामने बैठे होते और पतिदेव उससे गाल सटा कर, मुस्काते बतियाते तो हमारे सीने पर हज़ारों सांप लोट जाते। मौके-बेमौके उसके अंग-प्रत्यंग टटोलना, उसके चेहरे की इबारत पढ़ना और उसकी हर प्रतिक्रया को आंकना-जांचना, जब हद से ज्यादा बढ़ने लगा तो हमारे सब्र का सोत्र सूख गया।


मुआ मोबाइल
मुआ मोबाइल

इसके बाद नैन लड़ि जैहें तो मनवा मां कसक हुइवै करी की जगह की बात जैसे को तैसा तक पहुंच गयी और उनके हाथ में भी एक मोबाइल खेलने लगा और वातावरण में गूंजने लगा:-
तुम न जाने किस जहाँ में खो गए–, आजा-आजा, मैं हूँ प्यार तेरा–, हम-तुम इक कमरे में बंद हो और मोबाइल गुम जाए।


जिस मोबाइल के माध्यम से रत्नाकी के यहां इजहारे मोहब्बत और खोना-डूबना हो रहा है उसी की मदद से हवा में उड़ता एक परिंदा एअरटेल वालों को चूना लगाने के लिये लोगों को लामबंद कर रहा था। और इसी बीच नितिन हिंदुस्तानी को तमाम धोखे दिख गये। क्या हैं वे धोखे ये आप खुद जानिये उनके ब्लाग पर। बड़े धोखे हैं इस ब्लाग पर।


इन धोखों को देखते-देखते आप कहीं दुनिया की कुंजी गूगल को न देखना भूल जायें जिसे आपको खासतौर पर दिखा रहे हैं राजेश बुले।

तुषार जोशी ने मराठी के चर्चित कवि संदीप खरे की कविता अनुवाद करके पेश की है:-
वक्त हाथ से निकला, पता चलता रह रह के
अपने सपनों को रखिये, अपनी मुठ्ठी में भरके
मुठ्ठी खुलने से पहले, मन जाने को करता है
लेकिन गाडी का पहिया, घुमता चला जाता है
ये बड़ा कठिन होता है...


उधर बालेंदु शर्मा वाह मीडिया में पंजाब केशरी के कैप्शन के बारे में बता रहे हैं। अब यह कल्पना की उड़ान है या होंठों की भाषा बांचने का हुनर, यह कौन बताये!

डा.टंडन के ब्लाग पर आप पढ़िये डा किशोर शाह, गायनकालोजिसट मजेदार संस्मरण-वह कौन थी। यह संस्मरण पूरा का पूरा एक साथ पढ़ने वाला है।

जी के अवधिया आज बता रहे हैं पूतना वध की कहानी और जीतेंन्द्र दिखा रहे हैं एक और जुगाड़

उधर अनूप भार्गव एक खूबसूरत फिल्म डोर के बारे में बता रहे हैं जिसको पढ़ते ही कई लोगों के दिल मचल उठे फिल्म की डोर पकड़कर गुलपनाग को देखने के लिये। आप भी देखिये न कोई टिकट तो लगा नहीं यहां। यह अनूप भार्गव जी की पहली फिल्म आलोचना थी सो ये पूछ रहे हैं कैसा रहा उनका शुरुआती ओवर! बताया जाय भाई! नामराशि होने के नाते हम तो बिना पढ़े-देखे वाह-वाह करने के लिये मजबूर हैं।

अनुराग मिश्र आज "धर्म, भगवान, धर्मांतरण, मैं और आप"
पर विस्तार से चर्चा करते हैं:-
धर्म के नाम पर रोटी सेकने वालों की मौज हो गई। इतिहास गवाह है कि बड़े बड़े धार्मिक संस्थान भ्रष्टाचार के गढ़ रहे हैं। धर्म डर दिखाने का एक अच्छा माध्यम भी है, भेंड़चाल से चलने वालों लोगों को चलाने का एक बढ़िया माध्यम भी मिल गया। धर्म को नैतिक आचरण परिभाषित करने का भी जरिआ बना दिआ गया। जो हो गया, सो हो गया, लेकिन सैकड़ों, हजारों साल पहले स्थापित, परिभाषित किए गए नियमों से आज भी समाज को हाँकने का प्रयास किया जाता है। समय के साथ समाज का नियम और आचरण भी बदलते हैं, लेकिन धर्म के तथाकथित ठेकेदार आज भी चाहते हैं कि दुनिया पुराने नियमों के अनुसार आचरण करे और धर्माधिकारियों और भगवान से डरे। जो अपने नियम बनाए और आधुनिक विचारों से चले वो नास्तिक, भ्रष्टाचारी और ना जाने क्या क्या।


इसके बाद वे धर्मान्तण के गोरखधंधे की बात बताते हैं:-
जिस तरह धर्म एक गोरख़धंधा है, और भ्रष्टाचार करने वालों के लिए एक अच्छा माध्यम है, और उसी तरह से धर्मांतरण भी एक गोरख़धंधा है। आपकी वफादारी "एक तरह के भगवान" से "दूसरे तरह के भगवान" में बदलने की कोशिश की जाती है। काफी पैसा भी इसमें बनता है, बड़े बड़े दान मिलते हैं, और समाजसुधार का ढोंग भी होता है।

आज की टिप्पणी/प्रति टिप्पणी:-


1.टिप्पणी:
How do you get time to write so much ? Really great !

सुरेश जैनी पंकज की गुजराती चिट्ठाचर्चा पर
प्रति टिप्पणी:वैसे तो हम किसी को बताते नहीं लेकिन आप पहली बार पूछ रहे हैं तो बता देते हैं। जब मैं, मेरा की बोर्ड और माउस आपस में बाते करते हैं तो चिट्ठे अपने आप लंबे लिख जाते हैं।
2.टिप्पणी
अनूप के लेख हर बार पढ़ता हूँ, कभी आनलाउन, अधिक लंबे हो तो आफलाईन, पर पढ़ता हर बार इस उम्मीद से हूँ कि कभी तो किसी चिट्ठे पर टिप्पणी करने का साहस संजो पाउंगा पर फिर पोस्ट मगज से छ सात फुट उपर निकल जाती है और मन मसोस कर रह जाना पड़ता है। खैर, प्रयास जारी हैं!

देबाशीष: समीरलाल की चर्चा पर
प्रतिटिप्पणी: ठीक है भैये अब जल्दी ही मुथैया मुरलीधरन के 'दूसरा' की तरह, मगज से छ सात फुट उपर निकल जाने वाले बाउंसर, की जगह जमीन पर घिसटने वाली,'सुर्रा' गेंदबाजी की रियाज शुरू करते हैं। अब ये न पूछना कि सुर्रा क्या होता है! ये केवल जीतेंन्दर और अतुल ही नहीं और तमाम लोग भी जानते हैं।

3.टिप्पणी:गुज्जु काका सही मिलें हैं आपको-लगे रहो, बढ़ियां जोड़ी जमीं हैं. थोड़ा सम्भालना उनको, हल्के से फिसलू नजर आते हैं.:)
-वैसे गुजराती चिट्ठों की चर्चा के उतकृष्ट कार्य के लिये आप बधाई के पात्र हैं.
समीरलाल पंकज की गुजराती चिट्ठाचर्चा पर
प्रति टिप्प्णी: तारीफ के शुक्रिया। फिसलने के लिये तो वही गाना -आज रपट जायें तो हमें न बचइयो...!

आज की फोटो

:-
आज की फोटो राजेश के ब्लाग से गूगल की चाबी

दुनिया की कुंजी गूगल
दुनिया की कुंजी गूगल

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7 टिप्‍पणियां:

  1. आपका प्रतिटिप्पणी वाला फंडा बडा मजेदार लगा।

    चिट्ठाचर्चा में नित नए प्रयोग हो रहे हैं जो इसकी उपयोगिता पर मनोरंजन की चासनी लगा रहे हैं।

    वाह

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  2. प्रथा है कुछ भी लिखने से पहले लिखने की," बहुत ही सुन्दर चर्चा रही, बहुत खुब".
    अब-
    जब एक ही काम अलग अलग लोग करेंगे तो उसमें नवीनता आएगी और वह रोचक हो जाएगा. चिट्ठाचर्चा के साथ भी वही हो रहा है.

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  3. चिट्ठाचर्चा का बहुत ही बढिया प्रस्तुतीकरण्
    आज् का चिट्ठाचर्चा गुलज़ार साब के नाम्

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  4. ये प्रति टिप्पणी वाला अंदाज जमा. इसे जारी रखा जाये और हमें भी इसका अनुसरण करने के लिये अपनी स्विकृति दें. :)
    बहुत उम्दा!!

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  5. तारीफ़ के लिये हम सबका शर्माते हुये शुक्रिया अदा करते हैं और समीरलाल जी तथा अन्य 'स्टाइअल टोपोन्मुख' लोगों से यही कहना चाहते हैं कि हमारा लिखे हुये का जैसे मन चाहे वैसे उपयोग करने के लिये सब लोग स्वतंत्र हैं.सब कुछ खुला-खुला है.

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  6. >> नागपुर वासी, दिल से अध्यापकतुषार जोशी भी
    >> मराठी चिट्ठों की चर्चा के प्रस्ताव पर विचार करें।

    चिठ्ठा चर्चा के हम नितमित पाठक बन गए हैं। आज की चर्चा में मुझे मराठी चिठ्ठों की चर्चा का प्रस्ताव पढ़कर मन प्रसन्न हो गया। मुझे क्या करना होगा ये कृपया कोई बताए फिर मैं भी मराठी चिठ्ठों की चर्चा लेकर हाज़िर हो जाउंगा।

    (आनंदित) तुषार जोशी, नागपुर

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