शनिवार, नवंबर 11, 2006

आत्माचोलना का भ्राम फौयलाकॉर राक्खौ

बोंधुगोन नोमोश्कार! ओनेक दिन थेके अनूपदा बोल के राखा था की शोनिवार का चिट्ठा चोर्चा तूम लिखेगा बोलके। पोहले तो घोर में नेट नाई, फिर शोमय नाई, और अब जब बकरा का माँ ही झियादा देर तक खोएर माना नाई शाकता तो शाला बकरा का बाबा क्या मानायेगा! तो हामार प्रोथोम पोश्ट थोड़ा कोष्टो कोरके पढ़िये, जो कूछ भी लीखा।

शॉर्वोप्रोथोम तो दृष्टि पोड़ा पोंकोज का लेखा पॉर, मंतव्य ठीक बूझा नाई! किंतू उनका हिश्टोरीकॉल कोथा शुनकर हाम थोड़ा हिश्टिरीकॉल जोरूर होने लागा होये। लड़का का बिकाल छॉटा शोमाय माथा में शाब उलटो पालटा बीचार आने लोगता है। लीखा कि कोई मास लीडर नाई देश में, आमार बीचार होये कि जॉब कोई "खास लीडर" ही नाई है तो "मास लीडर" कौन बान पायेगा बाबा! मानमोहन शींह प्राईम मीनीश्टॉर जैशा दिखता नाई, उड़ी बाबा तो क्या अर्जून रामपाल बा ओन्नौ कोनो हीरो टाईप किसी को खोजकार प्रोधानमोंत्री बानाना पोड़ेगा क्या? की मुश्कील!

पोंकोज झोरा जे भी देखना कि तोमारा छोये बोजे का हिश्टिरीया के पोयले तुम कोहीं डायेट कोक तो नाई पीता होये। अनूराग एकठो ईंग्रेजी ईमेल फारवार्ड को पूरा प्रोकाशित किया है जिशमें बोलता हाय कि डायेट कोला में जो आर्टीफीशल चीनी घोला रोयेता होये ओटा खूब खाराब। मुझे तो समझ नाई आता ये शब, क्या खाराब क्या भालो, जीतना एसिड हाम हमारा पेट में लेखर आराम से घूमता हाय ओ बाहार आ जाये तो चामड़ा जोला दे। कौन शा चीज कीधॉर ठौक होता है किधोर खाराब यह मानूष शब जान लेता तो ना दुनिया में डाक्तार का दरकार होता ना अशूद का।

उन्मुक्तो काफी दिनो शे रिचर्ड फिलिप्स फाइनमेन के उपर लीखा होये। हामारे शोमाज में कॉम्पीटीशन के चॉक्कोर में बाच्चा लोगों का बाचपना शब चला जा रहा होये, बुधिया बेचारा अपने माँ बाबा का आकाँखा पूरा कोरने के चक्कर में दौड़ा जा रहा है, पेपर लीखता है, बाह क्या दौड़ता है, ऐसा कोई बाच्चा नाई दौड़ शाकता।" ओई आशल बात है, "कोई बाच्चा ऐशा नाई दौड़ शाकता" ए शामझो। उशको बाच्चा ही रहने दो, उसके काँध पर बांदूक राखकार आपना मोनोकामना पूरा कोरने का कोशीश मोत करो। कुछ वैसा ही बीचार इधोर खूब भालो लीखा होयेः
  • बहुत ज्यादा पढ़ना; या
  • किताबी कीड़ा बना रहना; या
  • अपने उम्र से ज्यादा पढ़ाई करना,
  • ठीक नहीं।
    श्रीजॉन शिल्पी का ब्लॉग का हैडर का छॉबी खूबी शूंदॉर। खूब शीड़ियास बिशॉय पार लीखा है, फ्री मार्केट ईकॉनामी। वैश्विक बाजार का बात आने पॉर हामारे देश में शाब स्वदेशी का बात करने लगता होये पर शच्चाई ये है कि ना तो शरकार और ना ही ऐशा लेख लीखने वाले किशी के पास ही कोनो पाक्का योझना हाय। शिल्पी ने जे भालो लीखा
    सोवियत संघ के पतन और चीन की समाजवादी व्यवस्था के बाजारवादी अनुकूलता में ढल जाने के बाद अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में पूँजीवाद की राह के रोड़े समाप्त हो गए। तीसरी दुनिया के सामने कोई और विकल्प ही नहीं रहा। भारतीय राजनीतिक पटल में दिखायी दे रही विकल्पहीनता का मौजूदा दौर भी इसी की उपज है। सत्ता की राजनीति का अब यह स्थापित दर्शन बन गया है कि आम जनता के हितों के मुद्दे चुनाव में उठाकर सत्ता हासिल करो और सत्ता में आते ही वे सारे कृत्य करो जो आम जनता के हितों के खिलाफ हो, लेकिन यह सावधानी जरूर बरतो कि बीच-बीच में आम जनता और गरीबी की बातें भी करते रहो, यानी आत्मालोचन का भ्रम भी फैलाए रखो।
    प्रियो रॉंजोंन पत्नी पर हिंसाबृत्ती के खीलाफ बोने नोये काणून पर हाश्शौ लेख लीखा है। पोती पोत्नी और वो में जे "वो" कौन हाय जे अब काफी कीलीयार हुआ। प्रियोंकोर दा का भी जे पोस्ट पोढ़कर शोचा था कुछ लिखुं किंतू कूछ शोच नाई पाया। किंतू लाल्टू दा का लेख पॉढ़ कर शोचने को माजबूर हुआ, ये अंशो पढ़िये किंतू पूरा लेख ओबोशौ पढ़िये
    वाघा पोस्ट पर...बीसेक साल पहले गया था तो हैरान था कि समारोह के दौरान तो सिर से ऊपर पैर उठाकर एक दूसरे की ओर आँखें तरेर कर देखने का अद्भुत पागलपन दोनों ओर के सिपाहियों ने दिखलाया ही, साथ में समारोह के बाद जब दोनों ओर से लोग दौड़े आए और एक दूसरे की ओर बंद गेट्स की सलाख़ों के बीच में से यूँ देखा जैसे कि इंसान नहीं किसी विचित्र जानवर को देख रहे हों।...पूरे माहौल में लगातार घनी हो रही शाम में बिगुल की ध्वनि के साथ झंडों का उतरना शायद एकमात्र मोहक बात थी, पर स्मृति में वह रहती नहीं।
    बाकी चोर्चा फीड़ काभी! पोढ़ते राहिये।

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    11 टिप्‍पणियां:

    1. यार ये सही मे बांग्ला भाषा है कि वही बंगला है जो हम पुराने कानपुर मे बंगाली मोहाल मे सुनते थे, बड़ी मीठी लगती थी और सबसे बढ़कर समझ मे भी आ जाती है। जीतू भाई खुलासा करो जरा।

      लगे रहो देबु भाई, सही जा रहे हो।

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    2. बहुत बढ़ियां, एक और नया अंदाज, वाह.

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    3. बड़ी खुशी हुयी कि देबाशीष भे आ गये मैदान में.
      भाषा देखकर यह खुशी हो रही हो रही है कि चिट्ठचर्चा पूरे हिंदुस्तान की जवान बन रहा है. अब शनिवार की जिम्मेदारी से मुक्ति का अहसास भी बड़ा सुकूनदेह है.

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    4. उडी बाबा,

      दादा एटा की रे? खूब भालो!!

      और मुझको तो नया बंगाली किस्म का नाम भी दे दिया.. पोंकोज..

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    5. अरे बाबा रे बाबा, ई के लेखा आशी तुमी. आमी तो बिझते पारे ना, खुब कोष्टो कोरी पोडछीलो.
      भई बांग्ला इतनी ही आती है, अब चिट्ठाचर्चा के माध्यम से थोड़ी बहुत और सिख जाएंगे.
      देबु दा मजा आया, हालाकि पढ़ने की गति थोड़ी कम हो गई, पर बहुत अच्छे. अगले सप्ताह का इंतजार रहेगा.

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    6. 'पूरे हिंदुस्तान की जवान बन रहा है'- देबाशीष के बूझते पारलाम,अनूप के बोझा मुश्कील.

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    7. नए अंदाज की लुभाती गुदगुदाती चर्चा के लिए धन्यवाद. उम्मीद है शनिवारी क्रम टूटेगा नहीं...

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    8. "आप शोभी का अनेकानेक धोन्नोबाद". वैसे यकीन मानिये एक प्रोबाशी बांगाली के लिये ऐसे लिखना काफी कठोन काम रहा। खुशी हुई की पाठकों को अच्छा लगा।

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    9. खूब भालो!!आमी बँगला जानी ना!!थके थके शीकी जाबो!

      मेरी दीदी जब आसनसोल मे थी तब कभी ये वाक्य सुने थे.आज की चर्चा मे बँगाली देख कर फिर याद आ गये.चर्चा का एक अलग रंग अच्छा है.

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    10. देबाशीष दा, आपनार लेखा पोढ़के तो होशते-होशते आमार माथाय घूरने लोगा।

      ओति शुन्दोर !

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