मंगलवार, नवंबर 07, 2006

मध्यान्हचर्चा दिनाकं 7-11-2006

धृतराष्ट्र निरंतर के नए अंक में खोये हुए थे. टी-ब्रेक का यह सदउपयोग था. कोफि की चुस्कीयाँ भर रहे थे की संजय ने कदम रखा. धृतराष्ट्र ने शिकायत की.
धृतराष्ट्र : अंतराल के बाद दिखाई दे रहे हो. निरंतर का नया अंक देखा?
संजय : महाराज, देखा भी और पढ़ा भी...
धृतराष्ट्र : आज का हाल सुनाओगे या युं ही टरका दोगे?
संजय : महाराज नारदजी के करतालो की आवाज सुनाई देने लगी है, और मैं देख रहा हूँ देवीरमा इसबार कहानी का अनुभुती कलश लिए मैदान में है.
धृतराष्ट्र : कैसी कहानी संजय?
संजय : महाराज यह एक बालिका स्वयंप्रभा की कथा है, जो सात वर्ष की अल्पायु में अपनी माँ के लिए अपशब्द सुन जलभून जाती है तथा आगे चल कर कलेक्टर बनती है.
धृतराष्ट्र : एक और कलश लिए कौन योद्धा दिख रहा है?
संजय : ये राजेशजी है, जो गीत कलश लिए खड़े हैं. परतुं मानचित्र नहीं पढ़ पाने के कारण कल्पनाओं में बसी प्रियतमा से नहीं मिल पा रहे है.
इधर एक कवि बेजी शब्दो की कट्पुतलियाँ नचाते हुए पतझड़ का वर्णन कर रहे हैं, पर साथमें दुआओं का घालमेल भी है.
धृतराष्ट्र : और यह मरियल सा योद्धा काहे छटपटा रहा है?
संजय : ये जोगलिखी है, महाराज. इनका कहना है गुरूर वाले ओस्ट्रेलियाई क्रिकेटर जब तक शिष्टाचार नहीं सिख जाते उनके साथ खेलना बन्द कर दो.
धृतराष्ट्र : क्या? अपन तो पैसे के लिए हार जाते है और ये स्वाभिमान की बकवास कर रहा है. आगे बढ़ो.
संजय : आगे महाराज तरकशधारी पंकज दो-दो साक्षात्कार लिए राह देख रहे है, वहीं योद्धा जितेन्द्र ने एक तस्वीर सज्जा रखी है जिसे दर्पण में दिखा रहे है.
अब महाराज मैं तो चला वृन्दावन उद्यान का आनन्द लेने, आप निरंतर का रसास्वादन करें.

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6 टिप्‍पणियां:

  1. जानती हूँ बेजी नाम थोड़ा अजीब है....माँ ने प्यार से रखा सो बदला नहीं.....कवी तो नहीं हूँ....चाहो तो कवयित्री बुला सकते हो.....वैसे बेजी कहलाने में ही मुझे खुशी होगी।

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  2. बेजीजी आपका नाम सचमुच सुन्दर है, इसलिए बदलने का कोई प्रश्न ही नहीं है. बस कवि या कवियत्रि का संशय था. वह आपने दुर कर दिया है. इसके आपसे क्षमा चाहता हूँ, आगे से ध्यान में रखुंगा.

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  3. धृतराष्ट्र : अंतराल के बाद दिखाई दे रहे हो.

    संजय भैया , ये धृतराष्ट्र महाभारत वाले हैं या आपने संजय लीला भंसाली के देवदास की तरह नया महाभारत रचने की ठानी है?

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  4. नाम तुमने मुझे इक नया दे दिया
    कौन हूँ मैं ये अब मैं नहीं जानता
    आईने का कोई अक्स बतलायेगा
    असलियत क्या मेरी? मैं नहीं मानता
    मेरे चेहरे पे अनगिन मुखौटे चढ़े
    वक्त के साथ जिनको बदलता रहा
    मैने भ्रम को हकीकत ही माना सदा
    इसलिये मैं स्वयं खुद को छलता रहा

    नाम तो तुमने मुझको दिया है नया
    किन्तु सूरत रही है वही की वही
    तुमने संशय में डला है संजय मुझे
    कौन सा है गलत कौन सा है सही

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  5. मौज मजे लेते हुये सबसे ज्यादा सटीक बात कह जाने वाले चर्चाकार दोपहरिया चर्चा वाले हो रहे हैं. बहुत खूब.

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  6. वाह वाह संजय भाई,
    हमे आपकी ये चर्चा बहुत पसंद आई.

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