मंगलवार, नवंबर 21, 2006

गोविंदा, सलमू और अक्की को चुनौती देने आया मेंबले !

शराफत अलीः मिर्जा साहेब अरे ओ मिर्जा साहेब!
मिर्जाः अमाँ क्या हो गया , काहे गले की गली को तकलीफ दे रहे हो?
शराफत अलीः अमाँ सुना क्या, अपने सलमू , अक्की और चींची के दिन लद गये।
मिर्जाः ये कौन लोग हैं भई, छुट्टन के भतीजे हैं क्या?
शराफत अलीः अमाँ नही, बॉलीवुड के कमर मचकाऊ हीरो है , अक्षय सलमान और गोविंदा। इनकी छुट्टी करने आ गया है मेंबले
मिर्जाः ये कौन है भाई, अजब नाम है। किस हीरो हिरोईन के लख्तेजिगर हैं ये मेंबले मियाँ?
शराफत अलीः ये कौन्हो हीरो हिरोईन के लरिका नही, ई तो पेंग्विन है , ज्यादा जानकारी सुनो रोजनामचा पर।
मिर्जाः अरे हम तो समझे कि अनिल कपूर या ऋषि कपूर का लौंडा आ गया पिक्चर में।
शराफत अलीः अमाँ तुम तो समझ गये पर एक बात समझ नही आती, ये सारे के सारे बुजुर्ग,समझदार और शरीफ समझे जाने वाले वरिष्ठ ब्लागरो को क्या हो गया है?
मिर्जाः क्या , ये सब छोटो के झगड़े सुलझाते सुलझाते खुद लड़ पड़े?
शराफत अलीः नही, लड़े तो नही, पर पिट जरूर जायेंगे किसी दिन घर में। पहले एक गुलबदन के चर्चे आम हुये थे अब माशूका पटाने के एक सौ एक नुस्खे आनलाईन हुई गये।
मिर्जाः अँदर की बात बतायें, चौधरी जी जवानी के दिनो में जिन किताबी नुस्खों से जू.. आई मीन धोखाखाये उससे नयी जवान नस्ल को बचाना चाहते हैं। अमाँ मुलायम सिंह को इन्हे देना चाहिये था हिंदी सम्मान।
शराफत अलीः सही बात है, शोभा नही देता ब्लागजगत बिन जीतू के जैसे अहिर बिना घोठा के और बाभन बिना लोटा के !
ससुराल बिना साली के, पटौनी बिना नाली के,
रात बिना तारा के, पायजामा बिना नारा के,
क्षत्रिय बिना शान के, बनिया बिना दुकान के,
अहिर बिना घोठा के, बाभन बिना लोटा के ।।..
शोभा नहीं देता...

मिर्जाःखैर मियाँ इस इश्कबाजी के बीच अवधिया जी पूरी तल्लीनता से पुराण सुना रहे हैं।
शराफत अलीः कोला जंग देख रहे हो मियाँ?
उदारीकरण के आर्थिक दर्शन में मजदूरों की छंटनी औद्योगिक सक्षमता की अनिवार्य शर्त है

मिर्जाः देख रहा हूँ, सुन रहा हूँ। अपना यह मानना है कि ऊपर वाले खुदा ने हर इंसान को दिये दो हाथ कि बंदे इन हाथो से अपने पास की जमीन खोद और निकला ले अपने हिस्से की दो रोटी, खींच ले अपने हिस्से का पानी। लेकिन इन कोला कंपनियो ने पैसे के बल पर गरीबो के हिस्से का पानी खींच लिया, अब जमीन से जितना खींचोगे उतना वापस दोगे नही तो सूखा पड़ेगा कि नही? अगर मजलूम के हिस्से की रोटी छीन छीन कर उसको उसकी बेबसी पर चिढ़ाते जाओगे तो एक दिन उसके हाथ से पत्थर छूट कर सीधे तुम्हारी कार का शीशा तोड़ेगा , वह इसे क्रांति बोलेगा और तुम इसे नक्सलवाद!
शराफत अलीः अरे मियाँ , तुम यहाँ किस्सेबाजी करने आये हो कि खुद ही फलसफा झाड़ने लगे?

मिर्जाः अब क्या कहे जिसे देखो गाँधी के पीछे पड़ गया है। पहले गाँधीगिरी की बखिया उधेड़ी गयी थी अब प्रतीक बाबू भी उसी सुर में सुर मिला लिये है।
हालाँकि गांधीवाद बिल्कुल ही बेकार हो, ऐसा नहीं है। लेकिन उसका दायरा बहुत सीमित है और व्यापक तौर पर उसका प्रयोग करना ठीक उसी तरह मूर्खतापूर्ण होगा, जिस तरह सब्ज़ी काटने के चाकू का इस्तेमाल युद्धक्षेत्र में करना। हिन्दू धर्म के गीता में प्रतिपादित सिद्धान्त हर देश-काल में कार्य रूप में परिणत किए जा सकते हैं और गांधीगिरी की तरह सीमित नहीं है।

शराफत अलीःयह रतलाम के बताशे कब्रिस्तान के बाहर क्यो मिलते हैं?
मिर्जाः बात ये है कि परसो जीतू यहाँ कोई फोटू न देख कर अबे तबे करने लगे। उससे घबरा के रतलामी जी ने चाट वाले को दो झापड़ रसीद किये और कहा कि चल कब्रिस्तान के बाहर खड़ा हो और खींच ली उसकी फोटू। अब सिचुऐशन बनाने को मीडिया वाले जो कुछ करते है उससे रवि भईया को भी इंस्पीरेशन मिली होगी कि नही?
शराफत अली:शराफत का जमाना ही नही रहा। सारे लगुए भगुओं की बन आयी है।
खाकी चड्ढी वालों की एक विशेषता है कि जब तब इनके फ़ैशन शो आयोजित होते हैं जिनमें कार्यकर्ताओं को रैंप की तरह सड़क पर कैटवाक करना होता है।

मिर्जाः जैसे फील गुड का गुब्बारा पिचका वैसे इनका भी पिचकेगा तब पता चल जायेगा कि पब्लिक के कंटाप में आवाज नही होती।
शराफत अली: अमा छोड़ो मिर्जा तुम भी कहाँ पालिटिक्स ले बैठे। चलो अब सभी चिठ्ठाकारो के लिये ताली बजाते हैं जिन्होने इतने दिल से चिठ्ठे लिखे।


आज की फोटू सीधे रतलाम से!

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3 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर । अति सुंदर । चिट्ठों को बहुत ही रोचकता और आकर्षकता के साथ एक सूत्र में बाधा है आपने ।

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  2. मिर्जा और शराफत अली-दोनों बेहतरीन काम कर रहे हैं. लगे रहें.

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