बुधवार, नवंबर 01, 2006

अक्ल बड़ी या भैंस...

चिट्ठे टोटल चार थे, जब कवि राकेश जी सुनवाय
चिट्ठों की बारात लगी जब लिखन लगे कविराय
लिखन लगे कविराय कि वो दुल्हे राजा से लगते
शाम को करनी चर्चा, लेकिन दुपहर से सजते
कहे समीर कवि कि आज लेख आये हैं कित्ते,
बिना गिने ही लिख दूँगा, चिट्ठे चर्चा पर चिट्ठे.

--समीर लाल 'समीर'


आज तो चिट्ठाकारों का उत्साह देखते ही बनता था, ऐसी बहार आई कि बस पूछिये ही मत. बस सभी जैसे कुछ न कुछ कह गुजर जाना चाहते थे. वाह भई, ऐसी ही बहार छाई रहे तो वह दिन दूर नहीं जब हिन्दी चिट्ठाकारी का परचम नेट जगत में बहुत ऊँचा लहरेगा.

आज सरदार पटेल का जन्म दिवस है। इस अवसर पर तरकश पर संजय भाई अपना आलेख लेकर आये तो वहीं तरकश पर शुऐब भाई बिमारी से क्यूँ परहेज का मंत्र बता रहे हैं और पंकज भाई मंत्र पर मिडिया मंत्र फूँक रहे हैं महिला और विज्ञापन

यूँ तो ये तीनों योद्धा सिर्फ तरकश तक ही नहीं सीमित रहे और इसके बाद लिखने बैठ गये अपने अपने चिट्ठे. लिखते लिखते पंकज भाई ने अपनी मसखरी भरी घटना के परिणाम स्वरुप बोध प्राप्ति की, शुऐब भाई नेखुदा सिरीज में खुदा को बोध प्राप्ति कराई और संजय भाई के आलेख टीका टिप्पणी से स्वतः ही सागर भाई को बोध ज्ञान हो गया और वो सोचने को मजबूर हुये कि कहीं वो बहुत महान साहित्यकार तो नहीं हो गये जिसकी किसी पोस्ट की कोई आलोचना कर ही नहीं सकता.

जीतू भाई को नारद से कुछ राहत मिली तो वो भी तीन तीन पोस्ट लिये हाजिर हो गये; देर है अंधेर नहीं के माध्यम से प्रियदर्शन मट्टू केस मे हुये फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुये बड़ा गंभीर सवाल लेकर आये:

लेकिन ऐसे ही कितने फैसले है, जो अभी भी निर्णय की राह देख रहे है। क्या हम उन्हे भी समूचित न्याय दिला पाएंगे? क्या गारंटी है कि संतोष सिंह की फाँसी की माफ करने के समर्थन मे कोई राजनीतिक पार्टी नही उतरेगी?


फिर तुरंत ही लोगों के सिरियस होते मूड को भांप कर लगे सबका मूड हल्का करने और देशी यू ट्यूब के बारे में बताने लगे और गांधीगीरी पर उसका विडियो भी दिखा गये. बस सबका मूड ठीक देखकर जीतू भाई को मजा आ गया और ऐसा मजा आ गया कि गुगल मेल के लिये उपयुक्त ग्रीजमंकी की एक स्क्रिप्ट को समर्पित पूरी पोस्ट का नाम ही दे दिये वाह मजा आ गया. है तो बड़े काम की चीज और इस जुगाड़ को बताने के लिये जीतू भाई बधाई के पात्र हैं.

चैन्नई में राजेश भाई इंद्र देवता के कहर से परेशान हैं तो तरुण भाई पतझड़ के रंग तस्वीर के माध्यम से परोस रहे हैं. कुछ सच्चे मोती मौसमानुसार लाये कातिल शिफाई और कमाल जलालाबादी की गज़लें. इस पर हमारे डॉक्टर साहब को मटर गश्ती सूझी और वो ले आये फन्नी विडियो मै ऐसा क्यूँ हूँ. अब हम क्या बतायें. :) मटरगश्ती पूरी हुई तो डॉक्टर साहब चले अपनी होम्योपेथिक पर और कुछ साफ्टवेयर वगैरह के बारे में. हमें तो खैर न समझ में आना था, न ही समझ में आया मगर समझदारों की टिप्पणियां देखकर अंदाज लगाया कि कोई सालिड चीज बतायें हैं डॉक्टर साहब और कुछ हिन्दी में समझाकर बड़ा उपकार टाईप का कर डाले हैं तो हम यहीं बधाई दे डालते है उपकार की बधाई. बाकी तो आप लोग समझदार हैं जा कर देख आयें.

इसी तर्ज पर जब सुखसागर जी दिति का गर्भधारण की बात करने लगे तो हमारे शुऐब भाई घूम गये और टिप्पणी छोड़ आये:

मैं क्षमा चाहता हूं - आपका पूरा लेख पढा मगर ज़रा भी समझ ना आया - पहले तो मेरी हिन्दी शुद्द नही और ऊपर से कम अकल :(

फुरसतिया जी हिंदीगीरी करते वाक्यों का प्रयोग करते नजर आये, हमें तो खुब लपेटे और हमार ध्यान पढ़ते पढ़ते भटक गया तो बालक को टिप्पणी में समझाने लगे मगर बाद में हमारा ध्यान इस और आकर्षित किया गया कि यह बेटे के नहीं पिता जी के उदगार तब जा कर सब नार्मल हुआ क्योंकि पिता जी की इस चिकाई के हम आदी हो गये हैं :)

ये कुछ वाक्य प्रयोग हमने अपनी हिंदी की जानकारी देखने के लिये किये। अब मेरा बच्चा तो अभी अपने काम में जुटा है और उसको यह सब दिखाना ऐसा ही है जैसे कि समीरलाल जी अपनी कुंडलियां गिरिराज जोशी को दिखायें। अब आप ही देख लें कि ये वाक्य प्रयोग ठीक हैं कि नहीं! कुछ सुधार की गुंजाइश हो तो बतायें। मौका मिले तो आप भी कुछ वाक्य प्रयोग कर डालें।


आप हिन्दी ज्ञानवर्धन के लिये इस लेख को पूरा पढ़ें, हर लाईन में मजा आयेगा और ज्ञानी आप बोनस में हो जायेंगे.

अभिषेक भाई अपनी घुमक्कड़ी का किस्सा सुनाते सुनाते और तस्वीर दिखाते दिखाते गीत सुनाने लगे अपनी आवाज में. बंदे की आवाज में दम है और संगीत का भविष्य उज्जवल, जरुर सुनें.


मिडिया युग पर जानिये कि कैसे विज्ञापन के बीच मे टी वी में खबरें पिस रहीं हैं, है तो चिंता का विषय मगर चैनल तो खोली इसी लिये थी. फिर सुनिये नितिन भाई के इंद्रधनुषी सकारत्मक विचार कि कैसे उन्हें थोड़ी सी उम्मीद है कि शायद क्लिक चल जाये और भारत की क्रिकेट की टीम विश्व कप में जीत जाये. अब इस पर प्रतीक भाई से रहा नही गया और टिप्पणी मे कह उठे:

किसी रेस में धीरे दौड़ने वाला घोड़ा तो अचानक तेज़ दौड़ सकता है, लेकिन गधे से यह उम्मीद करना बेमानी है। क्रिकेट की इस दौड़ में ऑस्ट्रेलिया घोड़ा है, लेकिन गुरू ग्रेग ने टीम इंडिया की हालत गधे जैसी कर दी है।

प्रत्यक्षा जी लेकर आईं अपने भतीजे दिव्यांश की मधुमख्खी बनी प्यारी सी तस्वीर और साथ ही अपनी उतनी ही प्यारी कविता.

ओ मधुमक्खी
कितने फूल देखे
कितनी वादियाँ घूमे

आओ अब सुस्ता लो
बैठो कुछ पल
और हँसो.........


लाल्टू जी अपने चिट्ठे की सालगिरह मना रहे हैं और पिछला लेखा जोखा खोल कर बैठे हैं. लोग दरवाजे जा जा कर बधाई दे रहे हैं और हम दिन महिने गिन रहे हैं कि कब हम सालगिरह मायेंगे और लोग बधाईयां देने आयेंगे. :)

समर आफ ६९ का हिन्दी रुपांतरण पढ़ें हितेन्द्र बाबू के साथ तिरछी नज़रिया पर. बेहतरीन है, मजा आयेगा.

रमण भाई ने डे लाईट सेविंग्स के विषय में कई रोचक तथ्य और जानकारी देकर हमेशा की तरह बढ़ियां ज्ञानवर्धन किया, साधुवाद.

अमित भाई इस दुनिया को अपनी नजर से देखते हुये अक्ल बड़ी या भैंस के द्वारा एक नहीं दो दो अधिकारियों के निलंबन की मांग उठा रहे हैं:

इन दोनों समझदार अधिकारियों को तो तुरंत निलंबित कर देना चाहिए। यदि ऐसे अक्ल वाले लोग रहेंगे तो बहुत खतरा है। हमारे प्रशासन तंत्र में दो तरह के साँप हैं। एक वे हैं सुस्त हैं, आलसियों और पुराने फ़र्नीचर की तरह पड़े रहते है और कुछ नहीं करते, इनको अंग्रेज़ी में fixtures कहा जाता है। और साँपों की दूसरी जाती से यकीनन ये दोनों महानुभाव हैं जो बहुत ज़्यादा अक्ल रखते हैं।


बात तो पते की है, मगर ऐसी घटनाओं में इतना इज़ाफा होता जा रहा है कि हर रोज एक न एक निलंबन की आवश्यक्ता है तब जा कर थोड़ा सा सुधार आयेगा.

क्षितिज जी जर्मनी के इतिहास और वर्तमान को लेकर परेशान हो रहे हैं और वहां विरेन्द्र भाई साहब कुछ तारा समूह वगैरह पर बता रहे हैं, आप खुद ही जाकर समझ लो, हम तो सुखसागर पर शुऐब वाली टिप्पणी को अपना मान उसी से चिपके हैं. :)

राकेश खंडेलवाल जी पहले तो बड़ा सिरियस, अति सुंदर प्रवासी गीत सुनाये, अब ये ऐसा बन पड़ा कि हमारे अनूप भार्गव जी कह उठे:

वाह राकेश जी !
प्रवासी पीड़ा पर अब तक के पढे सर्वश्रेष्ठ गीतों में से एक ..
बधाई


फिर अचानक तस्वीरमयी प्रविष्टी कम्प्यूटर कविता लेकर चले आये. मै कोशिश मे लगा हूँ जानने की कि हास्य रस की है कि वीर रस की, पता चले तो यहां टिप्पणी के माध्यम से हमारा ज्ञानवर्धन जरुर करें. :) आजकल सिरियस करके हंसाने का प्रचलन सा चल पड़ा दिखता है, जो कि बड़ी स्वस्थ परंपरा है, नहीं तो रात तो रोते ही बीते. :)

आगे उन्मुक्त जी कहने लगे कि मां को दिल की बात कैसे पता चले और अनुराग मिश्रा ने जहीर और उनके इश्क की चर्चा लेकर आ गये. और हां, हिन्दी पाड कास्ट पर जाये और आज उनके द्वारा दी गई अनेंकों पोस्ट इत्मिनान से देखें.

खैर, आज के लिये अब बस करता हूँ. कोशिश की कि सब कवर कर लूँ मगर अब कोई छूट गया हो तो बताना, कल कवर कर लिया जायेगा, बस देखते रहिये चिट्ठा चर्चा.


आज की टिप्पणियां:

राकेश खंडेलवाल प्रत्यक्षा पर:

क्योंकि पुष्प का आमंत्रण ही सुन्दरता को रहा निखार
तभी हुआ है मधु से पूरित चंचल बचपन का संसार
जो अबोध हैं वही बोध का अर्थ सत्य समझाते आये
सौम्य शिवम भर कर नयनों में फिर सुन्दरता रही निहार

रत्ना जी फुरसतिया पर:

जितने मुहावरे पढ़े थे सबका प्रयोग ऊपर हो चुका है सो सोचती हूँ- ‘भई वाह’ कह कर ही आपको इतने अच्छे लेख केलिए बधाई दे दूँ। ईश्वर करे आप ऐसे ही वाह-वाही लूटतें रहे और सबको चने के झाड़ पर चढ़ा कर उनकी टांग खींचते रहे। कलम तोड़ कर ऱखने में आप नया कीर्तिमान बनाएँ। आपकी ख्याति का सूरज सदा चमकता रहे।


आज का चित्र:

प्रत्यक्षा से:




दिल मांगे मोर से: सरस्वती का उदगम



Post Comment

Post Comment

5 टिप्‍पणियां:

  1. हमारा तो यही कहना है कि ३० से अधिक चिट्ठों को इतनी खूबसूरती से पेश करने का आपने काबिले तारीफ़ अंदाज में किया है.अगर खुदा कहीं है तो वो देखे और आपकी मेहनत का इनाम आपको दे.

    उत्तर देंहटाएं
  2. मेहनत का इनाम होती यह टिप्पणी, पर ह आपको इनाम देने लायक है नहीं. इसे उपहार समझ स्वीकार करें.

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाकई, चिट्ठे बाँचना कौनो मजाक का काम नहीं है, बढ़िया काम करने पर समीर जी को बधाई। हमार दुआ है कि उनकी उड़नतश्तरी का तेल कभी समाप्त ना हो। :)

    उत्तर देंहटाएं
  4. चिट्ठे वाले सभी जानते आप बड़ी हैं अक्लों वाले
    इसीलिये तो सब ने अपने तरकस में से तीर निकाले
    लिये कामना, चर्चा करके आप उन्हें भी ऊंचा कर दें
    क्योंकि और चर्चाकारों से, इतने जाते नहीं संभाले

    और जहां तक बात काव्य के रस की है तो इतना सुन लें
    जिस रस में भी चाहें इसको पढ़ें और चाहें ज्यों गुन लें
    बीबी ने हमको मारा यह रोकर पढ़ें, करुण रस होता
    चिल्ला कर यदि पढ़ें, वीर रस होता, फिर वैसी ही धुन लें

    उत्तर देंहटाएं
  5. आप सबका प्रोत्साहन के लिये धन्यवाद.

    अमित भाई, अगर ऐसे ही आप उत्साहवर्धन करते रहे तो यकिन मानें उड़न तश्तरी का तेल कभी भी समाप्त नहीं होगा. :)

    बहुत शुक्रिया.

    उत्तर देंहटाएं

चिट्ठा चर्चा हिन्दी चिट्ठामंडल का अपना मंच है। कृपया अपनी प्रतिक्रिया देते समय इसका मान रखें। असभ्य भाषा व व्यक्तिगत आक्षेप करने वाली टिप्पणियाँ हटा दी जायेंगी।

नोट- चर्चा में अक्सर स्पैम टिप्पणियों की अधिकता से मोडरेशन लगाया जा सकता है और टिपण्णी प्रकशित होने में विलम्ब भी हो सकता है।

Google Analytics Alternative