शुक्रवार, जनवरी 19, 2007

मध्यान्हचर्चा दिनांक : 19-01-2007

धृतराष्ट्र कक्ष में कोफी का आनन्द ले रहे थे. मध्यान्हचर्चा का क्रम टूटा हुआ था, आजभी संजय के आने की उम्मीद उन्हे कम ही थी, इसलिए टी-टाइम में अक्षरग्राम के नए अवतार का अवलोकन कर रहे थे. तभी संजय ने कक्ष में कदम रखा. बगल में लैपटोप दबाए हुए थे.

धृतराष्ट्र: आइये..आइये. कहाँ अटके हुए थे?
संजय : महाराज मित्र के विवाह समारोह में गया हुआ था, छुट्टी के लिए आवेदनपत्र भी दिया था.
धृतराष्ट्र : ठीक है, अब देखो कौन क्या लिख रहा है? लिख भी रहे हैं या शिल्पा शेट्टी के पक्ष में नारे लगाने में ही व्यस्त है.
संजय : नारे तो नहीं लगा रहे है, हाँ इस प्रकरण पर लिख जरूर रहे हैं. हालाकी शिल्पा के अलवा जगमें और भी हैं आँसू. खैर सबका हाल बताने से पहले यह हिन्दी का ब्राउज़र उतार लेता हूँ, भाट्टीयाजी ने कड़ी दी है. कहीं ऐसा न हो अंग्रेजी वाला प्रयोग करने पर शिरॉक बिगड़ जाए की ज़बां बिगड़ी तो बिगड़ी...

धृतराष्ट्र : हाँ, यह फ्रांसिसी थोड़े-से ज्यादा स्वभाषा-प्रेमी होते है.
संजय : महाराज, बात भाषा की ही नहीं लिपि की भी हो रही है. अंतर्मन को लगता है की इंडिया के रोम-रोम में रोम रम गया है! क्या हिन्दी रोमनागरी में लिखी जाएगी.
लेकिन निराश होने की आवश्यकता नहीं है. वर्जीनीया टेक में भारतीय रेडीयो कार्यक्रम फिर से शुरू हो गए है.

धृतराष्ट्र : ठीक है सुन लेंगे भाई. अब आगे देखो.
संजय : आगे अफ्लातुनजी शैशवकाल के संस्मरण सुनाते हुए आक्रमण के भारतीय प्रतिकार यानी अंहिसक प्रतिकार की बात कर रहे है. तो युद्ध के देवता के बारे में बता रहे हैं आशीष.
इधर दिल्ली विश्वविद्धालय की एक खासियत की वजह से गिरिन्द्रनाथ जी को एक प्ले देखने का मौका मिला है.

धृतराष्ट्र कोफी की आखरी चुस्कियाँ का आनन्द ले रहे थे.
संजय : महाराज, अब आप आँवले के आचार के साथ दैनिक जुगाड़ो का आनन्द लें. मैं करता हूँ ‘सत्रांत’. लोग-आउट कहूँगा तो शिरोन नाराज हो सकते है.

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1 टिप्पणी:

  1. स्वागत है छुट्टी से वापसी पर. अब लगातार चालू हो जायें फिर.

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