बुधवार, जनवरी 24, 2007

मध्यान्हचर्चा दिनांक : 24-01-2007

संजय मुँह लटकाए लैपटॉप की स्क्रीन को ताक रहे थे. धृतराष्ट्र संजय को घूर रहे थे. तभी चपरासी संजय के आगे काफी का मग रख कर चला गया.

धृतराष्ट्र : क्या बात है? मुँह क्यों लटका रखा है?

संजय : समझमें नहीं आ रहा, जब मैने कहा ‘टीप’ दो तो सबने दुत्कार दिया था और अब जब उड़नतश्तरी अपनी सुनी मांग दिखा रही है, तो सब सिंदूर लिए दौड़े आ रहे है?

धृतराष्ट्र : हा हा हा, मैने उस दिन भी कहा था आज भी कहता हूँ, तुम्हारा काम चर्चा करना है, बस. वो कृष्ण ने कहा ही है की...

संजय : जाने दें महाराज, कृष्ण ने बहुत कुछ कहा है... यह कृष्ण का प्रताप है. ऐसा ही प्रताप सुखसागर भी बता रहे है.

धृतराष्ट्र : ठीक हैं संजय, अब बाकी का हाल भी सुना दो, देखो कौन क्या लिख रहा है?

संजय : जी महाराज. अंतरिक्ष में सोम्ब्रेरो आकाशगंगा दिखाई दे रही है. जिसे भगवान की अंगूठी भी कहा गया है.

धृतराष्ट्र : और यह लोगो का हजूम क्यों जमा है?

संजय : कुछ जुगाडे वितरित कि जा रही है. एक स्थान पर दैनिक जुगाड़ दे रहे हैं, जितुभाई तो डेस्कटोप से सीधे चिट्ठे पढ़ने का जुगड़ बता रहें है, मीणाजी.

लोगो को एकत्र कर अपनी ‘बुक-सेल्फ’ देखा रहें है जितेन्द्रजी.

धृतराष्ट्र : यह नाराज कौन हो रहा है?

संजय : बेंगाणी बन्धू है महाराज. संजय शाहरूख द्वारा क्लिष्ट हिन्दी का मजाक बनाए जाने से नाराज है तो, पंकज भारतीय विपक्षी नेताओं के रवैये से.

धृतराष्ट्र : इन्हे यहीं छोड़ो, कवियों का हाल देखो.

संजय : महाराज, गीतकार कैसे कविता लिखता है, पता नहीं जब उनसे कुछ कहा न गया, कुछ लिखा न गया, वाणी चुप हो रही, शब्द हो गए अजनबी. फिर भी आगे देखता हूँ शायद और भी हो.

आहा! आगे रजनीगन्धा से महके हाईकु लेकर आयी हैं रजनीजी. यह देख अनुपमा चौहान ने कहा यात्रा से पूर्व,अधरों से उसके अंतिम क्षण,अंतिम शब्द "प्रियवर" ही निकला मकबरा हूँ मैं... इसबात पर सीमाजी भी प्रसन्न हो कर शब्दो के जाल बुनने लगी. और रचनाजी हैरान परेशान हो कह उठी उफ्फ! ये कहाँ आ गये हम!!

महाराज अब आप रोमन सर्कस देखिये और मैं होता हूँ लोग-आउट.

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6 टिप्‍पणियां:

  1. काहे मुँह लटकाते हो संजय भाई, कोई टिप्पणी ना करें तो खुद ही कर लिया करें, कम से माँग सूनी रहने से तो अच्छा है कि खुद ही भर ली जाये :)

    वैसे मैं तो हूँ ही ... ;)

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  2. पता नही कि मेरे ब्लोग कि अदिति और महाशक्ति कि सुचन बहुत देर से आती है! और इस कारण इसकी चर्चा भि नही हो पाती है!

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  3. सागर चन्द नाहरजनवरी 24, 2007 7:24 pm

    प्रमेन्द्र जी जैसा चर्चाकार ने उपर लिखा है कि ...वो कृष्ण ने कहा ही है कि...
    बस आप लिखते रहिये चर्चा तो करते ही हैं कभी कभार छूट जाती है।

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  4. महाशक्तिजी,
    जहाँ तक हो सभी चिट्ठे शामिल करने का पक्षधर रहा हूँ. पता नहीं हर बार आपके साथ ही अन्याय कैसे हो जाता है.
    अगली बार विशेष ध्यान रखुंगा.

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  5. अरे, हमने अपनी आवाज नहीं उठाई बल्कि सारे चिठ्ठा चर्चा दल की आवाज उठाई थी और उसमें सबसे सक्रिय तो आप ही हैं, तो झंडा आपका ही कहलाया बाकि तो हफ्ते में एक दिन फूल हैं, महके तो महके नहीं तो नहीं भी. :)

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  6. अरे ये तो संजय भाई का सहारा है नही तो कई चिट्ठों का तो पता ही नही चलता। संजय भाई आप मध्यान्ह चर्चा करते हो तो जान मे जान आ जाती है।

    नियम याद है ना: कमेन्ट दो, चर्चा लो।

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