मंगलवार, जनवरी 30, 2007

मध्यान्हचर्चा दिनांक : 30-01-2007

संजय लैपटॉप पर चिट्ठा-दंगल का हाल देख रहे थे तो दुसरी ओर धृतराष्ट्र भी अपनी कोफी क आनन्द लेते हुए चर्चा के शुरू होने कि प्रतीक्षा कर रहे थे.

धृतराष्ट्र : बताओ संजय, क्या दिख रहा है? सब कुछ शांत है या एक दूसरे से उलझे पड़े है?

संजय : सभी लिखने में व्यस्त लग रहे है, हाँ इन दिनो गाँधी पर ज्यादा लिखा गया तथा आसार है की अभी यह क्रम जारी रहेगा.

धृतराष्ट्र : ठीक है. फिलहाल कौन-क्या-कहाँ-कैसा लिख रहा है?

संजय : दिवंगत कमलेश्वरजी पर घड़ीयाली आँसू बहाए जाने की पेज-थ्री खबर दे रहे हैं, अभिषेकजी.

वहीं नेताओ की भूल से विभाजन के शिकार अनाम शहीदो पर आँसू बहने के लिए कह रहे है, जोगलिखी.

अनूप भार्गवजी भी दुःखी हैं, दो राजनैतिक दलों के बीच राजघाट पर झगड़ा हुआ तो लगा गाँधीजी की दुसरी हत्या की जा रही है.

धृतराष्ट्र : गाँधी के नाम को जितना भूना सको भूना लो. गाँधी नाम की माया है...

संजय : इसे ही कहते है हरि से बड़ा हरि नाम. यह कहना है समीरलालजी का.

धृतराष्ट्र : सभी ओर हाय-हाय मची हुई है या कोई प्रेम की बात भी कर रहा है. कवियों को देखो. आदमी प्रेम में कवि होता है या फिर कवि ही प्रेम के गीत गाता है.

संजय : कवियों से पहले, जो कह ना सके वह सुनीलजी बता रहे है, प्रेम की परिभाषा. एक सुन्दर चित्रकारी जिसे अश्लील समझा गया था, उसमें दरअसल प्रेम का दर्शन छुपा हुआ है.

वहीं लगता है, सुरेशजी प्रेम की शुरुआत प्रेमपत्र से करना चाहते है. सुनिये उनसे प्रेमपत्र की परिभाषा.

प्रेम-पत्र की बात सुन अनुभवी नज़ीर अकबराबादी भी कह उठे क्या दिन थे यारों.

मगर सावधान कवि जहाँ पिता के रूपांतरण को देख सकते हैं वहीं कवि आपको अवसादग्रस्त भी कर सकते है.

धृतराष्ट्र : यह अवसाद हमें घेर लेगा, यहाँ से आगे बड़ो.

संजय : जी, महाराज. आप लिनेक्स बनाम वीस्टा एवं मैकिन्टॉश की तुलना देखते हुए हरी धनिया ताजी रखने का नुस्खा देखें.

मैं होता हूँ लोग-आउट.

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1 टिप्पणी:

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