सोमवार, जनवरी 15, 2007

हिन्दी वार्तालाप कक्षा की आधी अधूरी कहानी

हिन्दी वार्तालाप कक्षा में अथ श्री परशुराम की कथा कुछ यूं सुनी सुनाई गई:

एक बार की बात है कि चिट्ठा चर्चा में एक बेहूदा मजाक हुआ. तो झुलसाने वाला श्याम सूर्य इस भौतिक जगत और मानव के लिए मकर संक्रान्ति पर्व लेकर आया.

गुरु का फलसफा और मंथरा उवाच कुछ ऐसा है कि वे तुझ से ही कहेंगे घर के सामानों का हिसाब रखने की कोशिश करके तो देख.

किस्से पतंगबाजी के सुनाने में गुरु के गुरु मणिरत्नम ने रंग भरे परंतु उनकी मात्रा की गल्तियाँ कम कैसे करें. परपीड़ा की तिथियाँ याद रखें या मटमैला बचपन की? मुसलिम नफ़रत की जमीन पर खड़े संगठन और मेरे अनुभव तो ऐसे हैं जैसे किसी श्याम विवर द्वारा एक तारे को चीरना. परंतु अभी इस शहर में उर्दू का एक अख़बार जिंदा है तब तो मैं जिंदा रहूंगा...

आज का चिंतन है गुठलियाँ हमेशा फेंकी नहीं जातीं क्यों कि हट सकती है करों में छूट और कभी-कभी कैसेट टेप से एमपी3 जुगाड़ हो जाता है.

सब्जी में नमक ज्यादा हो गया है या खांसी या गले में ख़राश हो तो इलाज ये है मोहे मोहे तू रंग दे बसंती और दे दे धन्यवाद.

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चित्र दिल के दरमियाँ से

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3 टिप्‍पणियां:

  1. एक दिन देर से आये मगर आये सही कहानी लेकर....सही लिखे हो, अब हमारे राकेश भाई क्या लिखेंगे, खैर, कल की उनसे लिखवाने की पूरी कोशिश की जायेगी, वरना एक गीतमाला रह जायेगी.. :)

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  2. समीर भाई,
    आमतौर पर रविवार की चिट्ठियों की चर्चा सोमवार सुबह करता हूँ. आज सुबह व्यस्त होने के कारण रात्रि 10 बजे के आसपास चर्चा हो पाई. परंतु शायद कनाडा में तब तक दूसरा दिन चालू हो गया था...

    कोई बात नहीं, कुछ समय की बात है, फिर तो हर दस मिनट में सौ चिट्ठे छपा करेंगे - फिर चर्चा के लिए कोई कमी नहीं रहेगी.

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  3. रवि जी, उल्टा कह गए। पश्चिम वाले पीछे हैं। जब आप सोमवार का दिन खत्म कर के चर्चा लिख रहे थे तो समीर जी की अभी दोपहर भी नहीं हुई थी।

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