बुधवार, जनवरी 10, 2007

सर्दी-समीर का शतकीय एहसास

और मजाक-मजाक में समीरलाल जी का पोस्ट सैकड़ा पूरा! कल समीरलालजी बोले, भैये अब हम कहीं के न रहे! हमने कहा-क्या हुआ महाराज! बोले- हमारा भी लिखत-पढ़त का सैंकड़ा पूरा हो गया। इसके बाद की कथा आप सुनो ध्यान लगाकर:-
हमने कहा- बधाई!
बोले धन्यवाद लेकिन सुनो मेरे भाई
आज तो हम चिट्ठाचर्चा लिख न पायेंगे
हम तो आज केवल अपना बल्ला घुमायें
शरमायेंगे, मुस्कायें और झुक-झुक जायेंगे
आप सबका धन्यवाद- कहने से उबर नहीं पायेंगे।
इस लिये भैये सैकड़े की जरा ताली बजवा दो
पहला शतक बना है इसे कुछ यादगार बनवा दो।


इसके बाद बहुत हमने कहा भी कि अरे ये तो सूचना है आपै बता दो। वे बोले नहीं -हमें शरम आती है। हमने कहा -इसमें
शरमाने की क्या बात? जो काम करने में नहीं शरमाये उसे कहने में कैसी लाज! बोले -पता नहीं अपनी पोस्ट का सैकड़ा पहली बार पूरा किया है न सो मन में कुछ-कुछ सा हो रहा है। और फिर लोग क्या कहेंगे! अभी उभरे और अभी सैकड़ा पूरा कर लिया! इसलिये आप ही बता दो न सबको। हमें तो बस बल्ला लहराने दो आज! हम कहे अच्छा! जो आज्ञा!

तो समीरलालजी की सौंवी पोस्ट की कहानी उन्हीं की जुबानी सुने:-
१०० पोस्टों में न जाने कितने अलंकरण मिले, जैसे, अगर पीछे से शुरु करें तो, तरकश सम्मान जो अभी मिला, गुरुदेव, कुंडली किंग, लाला जी, द्रोंणाचार्य, स्वामी समीरानन्द (स्वयंभू), महाराज, प्रभु और भी बहुत सारे...बाकी तो और भी अलंकरण हैं जो इस वक्त गैरजरुरी से हो गये हैं- सभी ने स्नेहवश कुछ न कुछ तो दे ही डाला..अच्छा या बुरा, वो तराजू मेरे पास नहीं है, एक ही पलड़ा है, अच्छा :) .


इसके साथ ही समीरलालजी ने अपने चार्टेड एकाउन्टेंट होने का मुजाहिरा करते हुये अपने ब्लाग पर आवा-जाही का हिसाब पेश किया। पिछले साल की बैलेंस सीट पेश करते हुये अगले साल की लेखन योजना पेश की जिसे अस्वीकार करते हुये सागर चंद्र नाहर ने उत्पादन बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया है।

समीरलाल जी सैकड़ा पूरा करने के पहले चुनाव भी लड़ रहे थे। चुनाव के हालात का जायजा लेते हुये रचनाबजाज जी सब पर
निगाह रखे हुये थीं और सब लोगों की कारगुजारी देख रहीं थीं। अपनी पोस्ट में इसका विवरण पेश करते हुये रचनाजी कहती हैं:-
गाँव मे खेला जाने वाला था वोट माँगने का खेला,
सारे गाँव मे था लोगों का रेला ही रेला,
मानों गाँव मे लगा था बडा सा मेला,
हर तरफ भीड थी, झमेला ही झमेला!

इसके बाद का अनुभव भी जनता को पता है:-
पागल हो क्या? हमारी हालत तो वैसी ही रहेगी!
बदलनी ही है तो इन्ही की बदलेगी!!
ये भला हमे क्या देंगे?
उलटे हमसे वोट ले लेंगे!
ज्यादा से ज्यादा एक सडक बनवाएँगे,
और उसके नाम पर सालों तक वोट हथियाएँगे!

यह सच बयान करने के बाद रचनाजी ने ताजे-ताजे चुनाव जीते हुये समीरलाल को बधाई दे दी:-
जनता मुझको कुर्सी दे दे , मै नेता बन जाऊँगा,
अपनों को बाँटूंगा दौलत, मै भी धनी हो जाऊँगा!

काम-धाम कुछ नही करूँगा, मौज-मजे और ऐश करूँगा,
एक मुझे तू माईक ला दे, भाषण खूब सुनाऊँगा!
जनता मुझको—

काम-धाम न करने और मौज-मजे ऐश करने वाली बात एकदम सही कही रचनाजी ने। देखो हमें लगा दिया आज और खुद ऐश कर रहे हैं। इसीलिये कहा गया है कि कवि भविष्यद्र्ष्टा होता है।

इस सब चुनाव चर्चा शतकीय पारी से दूर जीतेंद्र अपना पुराना सेल्स मैनेजरी का धन्धा फिर शुरु कर दिये और न जाने क्या-क्या अगड़म बगड़म बेचने में लगे रहे। पहले तो हम समझे कि बबुआ कह रहा है-मेरा पन्ना बिकाऊ है। हम बोली लगाने वाले थे लेकिन जेब में कौड़ी न होने से ध्यान से देखा तो पता चला कि ये कुछ और बेच रहे हैं। क्या बेंचते हैं ये देखें:-
क्या कहा? ड्राक्यूला का महल पसन्द नही आया? चलो कोई बात नही, आप एक देश खरीद सकते है, देश? हाँ भाई हाँ। बिकवानी प्रापर्टीज मे देश भी बिकता है नी। बोलो लेगा? एक देश बिकाऊ है, पूरा का पूरा। सच्ची।


इस खरीद बिक्री पर निगाह रखते हुये जगदीश भाटिया जी अपने समाज को आईना दिखाते हुये समाज की आर्थिक उपलब्धि का एक नजारा पेश करते हैं:-
देश में इस समय प्रति 1000 आबादी पर 18 कम्यूटर हैं।
देश में इस समय (अक्तूबर 2006 तक) 13.6 करोड़ मोबाईल, 11.2 करोड़ टीवी, 3.7 करोड़ इंटरनेट प्रयोक्ता, 6.8 करोड़ केबल कनेक्शन हैं।
देश में इस साल अप्रेल से नवंबर तक 53 लाख दोपहिया तथा 4.6 लाख कारें बिकीं।
इतने अच्छे अच्छे आंकड़े देख कर हो सकता है कि आप की आंखें खुशी से चमक उठी हों मगर यह केवल एक तरफ की सच्चाई है।


लेकिन जगदीश भाटियाजी तस्वीर का दूसरा पहलू भी दिखाते हैं जहां:-
कितने लोग साफ पानी, स्वास्थय सुविधाओं तथा शिक्षा से अभी भी वंचित हैं क्योंकि इतना कुछ होने के बावजूद देश में 35 % लोग केवल 45 रु प्रति दिन की कमाई पर जीते हैं तथा अन्य 45 % केवल 45 रु से 90 रु की दिहाड़ी पर।


विदेशी पूंजी से विकास का अन्धविश्वास सीरीज की पांचवीं पोस्ट में अफलातूनजी बताते हैं:-
बहुराष्ट्रीय पूंजी के जरिए पूरी दुनिया अमरीका की सेवा में लगी है। कहीं से उनके लिए पेट्रोल आ रहा है,कहीं से इस्पात-एल्यूमिनियम-तांबा ।कहीं से मांस,कहीं से केला,कहीं से कपड़ा,कहीं से जूता,कहीं से चाय-काफी,कहीं से शक्कर,कहीं से कालीन,कहीं से आभूषण,कहीं से डॊक्टर,कहीं से इन्जीनियर उनके लिए आ रहे हैं। अमरीकियों का जीवन-स्तर सबसे ऊपर इसी तरीके से बनाये रखा गया है ।यह तथ्य भी बहुत कम प्रचारित होता है संयुक्त राज्य अमरीका का विदेश व्यापार का घटा दुनिया में सबसे ज्यादा है ( अर्थात वह निर्यात कम करता है,आयात काफ़ी ज्यादा करता है) और उस पर विदेशी कर्ज भी दुनिया में सबसे ज्यादा है। भारत सहित गरीब देशों की सरकारों को उपदेश देने वाला अमरीका स्वयं जबरदस्त ढंग से ‘ ऋणम कृत्वा,घृतम पिबेत’ के दर्शन पर चल रहा है ।

उन्मुक्तजी ने गेहूं और हल्दी का लफड़ा: पेटेंट पौधों की किस्में एवं जैविक भिन्नता बताते हुये जानकारी दी कि:-
इस (हल्दी)पर कई तरह के पेटेंट मिल चुके हैं। इस पर एक पेटेंट, घाव भरने के लिए भी था। यह मार्च 1995में में दिया गया था। यह मिस्सीसिप्पी विश्वविद्यालय में दो भारतीयों को दिया गया। हमने पूर्व कला के आधार पर इस पेटेंट को चुनौती देते हुए यू.एस.पी.टी.ओ. के यहां एक आपत्ति दाखिल की। इस आपत्ति को स्वीकार कर लिया गया और यह पेटैंट रद्द कर दिया गया है।

प्रियंकर जी अपनी कविताऒं के साथ-साथ दूसरे कवियों की भी अच्छी कविताऒं से भी हमें परिचित कराते रहते हैं। इसीक्रम में आज वे कुंवर नारायणजी की कविता पढ़वा रहे हैं:-
जिस समय में
सब कुछ
इतनी तेजी से बदल रहा है

वही समय
मेरी प्रतीक्षा में
न जाने कब से
ठहरा हुआ है !

उसकी इस विनम्रता से
काल के प्रति मेरा सम्मान-भाव
कुछ अधिक
गहरा हुआ है ।

हिंदी युग्म में राजीव रंजन प्रसाद अपनी कविता में कहते हैं:-
ये उजले सवरे उन्हें ही मिलेंगे
जो आंखों को मन की खोला करेंगे
यादों की पट्टी पलक से हटाओ
कसक के सभी द्वार खोलो
खुली स्वास लो तुम
अपने ही में गुम
न रह कर उठो तुम

महाभारत में अर्जुन को उर्वशी ने श्राप दे दिया। रचनाकार में पढ़िये रविरतलामी जी की मार्फत संजय विद्रोही जी की कहानी- हैप्पी न्यू ईयर।
रंजन भाटिया और गिरीन्द्र नाथ झा की पोस्टे हमारे यहां खुल नहीं पायीं। इन पर और इसके आगे की पोस्टों पर कल भाई समीरलाल जी चर्चा करेंगे। वे आजकल धुआंधार मूड में हैं। हों भी काहे न नया-नया सैकड़ा जो बनाया है!

चलते-चलते: कल की बात तो कल देखी जायेगी। आज सर्दी बहुत है। आप अपने बचाव के लिये अभिव्यक्ति में छपा ब्लागर साथी डा. भावना कुंवर का आलेख जरूर पढ़ लीजिये-सर्दियों में सर्दी!

आज की टिप्पणी:-


1.हे शतकवीर,

आगे बढो, मंजिले तो अभी और भी हैं

और रूकना जिसकी नियती नहीं,
वो, हर मंजिल पर पहुँच कर,
वहीं से शुरू करेगा सफर,

क्योंकि न तो इस जमीं का छोर है,
ना ही विचारों का,
हजारों हमसफर खडे हैं राह में,
राही बस बढता जा।

लालाजी, आप तो अभी शतक के वर्ल्ड रिकोर्ड बनाओगे... आमीन।
पंकज बेंगाणी


2.अनूपजी,

कृष्ण की तरह बापू के भी कई रूप हैं - अहिंसावादी, कुशलनेता (सच्चे अर्थों में), विचारक, क्रांतिकारी, आदर्शवादी, कर्मठ, असाधारण व्यक्तित्व के साधारण इंसान…
कुछ और रूप में भी देखा जाता है बापू हो - मुस्लिम परस्त, विभाजन के कारण, हिन्दुत्व विरोधी, जिद्दी, अड़ियल…
अपनी व्यक्तिगत विचारधारा के अनुरूप, बापू की जो छवि हमें भायी उसे हमने अपने मन में स्थापित कर लिया. कुछ ने आरती उतारी तो कुछ ने जूतों का हार पहनाया.
आपकी पीड़ा मैं महसूस कर सकता हूँ, पर शायद यह पीड़ा भी उसी प्रजातंत्र का एक हिस्सा है जो बापू हमें देना चाहते थे.
मुझे बस एक बात बताइये, बापू के संबन्ध में करी गयीं तमाम सकारात्मक या नकारात्मक अभिव्यक्तियों के बावजूद, क्या आपके विचारों में बापू के प्रति कोई बदलाव आया या आपके ह्रदय में उनके लिये जो स्थान था, क्या वह बदला?
जो स्थान ‘महात्मा’ ने अपने तप-तपस्या से प्राप्त किया है, उस स्थान से उन्हें डिगा देना, हिला देना या हटा देना हमारे जैसे साधारण व्यक्तियों की सीमा से परे है.
रही बात छींटा कसी की, तो वह तो होती रहेगी और होती भी रहनी चाहिये - क्योंकि उससे बापू में हमारे विश्वास और आस्था को और भी बल मिलता है.

अनुराग श्रीवास्तव

आज की फोटो:-


कल की कार भिड़ंत फोटो में समीरलाल जी पता नहीं क्या देख-समझ रहे थे हम अभी तक न समझ पाये। बहरहाल आप आज देखो सुनील दीपकजी के छाया चित्रकार से चीनी सर्कस के नजारे

चीनी सर्कस

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1 टिप्पणी:

  1. चर्चा बहुते बेहतरीन रही. बधाई.

    आगे समाचार, कि हम कल के चित्र में क्या देख रहे थे, दरासल चित्र का शिर्षक देखें:

    विजय खुमारी ऐसा भी करवा जाती है
    ध्यान कहीं होता है,राहें कहीं और ही ले जाती हैं

    ---बस इसीलिये खो गये.. :)

    अब तो समझ गये होंगे. :)

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