शनिवार, जनवरी 20, 2007

वेब पत्रकारिता का भविष्य उज्ज्वल...

अभी कुछ दिनों पहले अपने फ़ुरसतियाजी बता रहे थे कि “तख्ती पुराण” क्या है? यदि आपको इसके बारे में जानकारी नहीं है तो ले लिजियेगा वरना आज की यह चर्चा आपके सामने से बिलकुल वैसे ही... (मान्यजी का आगमन)

कविराजजी....कविराजजी
अरे मान्यजी आप कहिये क्या हुआ?
मान्यवर! आप अपनी महापुराण सुनाने के चक्कर में कही हमारी तन्हाई को नज़र अंदाज मत कर दीजियेगा, संजय भाई भी भूल गये थे।
अरे नहीं नहीं मान्यजी आप निश्चिंत रहें, हम आपको शिकायत का मौका नहीं देंगे।

हाँ तो हम कह रहे थे कि वरना आज की यह चर्चा आपके सामने से बिलकुल वैसे ही निकलेगी जैसे भारतीय बल्लेबाजो के सामने से होती हुई गेंद विकटों पर जा लगती है। उनकी इसी पोस्ट का समर्थन करते हुए मैं कहता हूँ कि लोग आजकल ऐसे गपशप पेटिका (चैट बॉक्स) में आ धमकते है जैसे सार्वजनिक मूत्रालय में। ना तो अनाड़ियों की तरह ही खट-खट करते हैं और ना ही सभ्य महापुरूषों की तरह “May I come in..” जैसे श्लोंको का उच्चारण करते हैं। खैर मेरे को इस पचड़े में पड़के क्या करना हैं? अरे नहीं, करना है। आज मैं भी... (खट-खट)

कौन है?
अरे मैं हूँ, मनिष वन्देमातरम!!! तुम्हारा कवि-मित्र, पहचाना?
ओह!!! मनिष आप हैं क्या, आईये चाय पीजिये।
अरे नहीं, मैं तो यूँही चला आया था, कहीं आप बाद में आप यह तो ना कहो कि फिर तुम नहीं आयी। चलती हूँ।
हम सचेत हुए कि यह मनिषजी ने लिंग परिवर्तन कब करवा लिया तो देखा कि मनिषजी नहीं थे, उनकी याद आयी थी।


खैर, वापस मुद्दे पर आते हैं। तो मैं कह रहा था कि आज मैं भी तो इसका शिकार हुआ हूँ भाई। फ़ुरसतियाजी आ धमके अचानक, बोले, “देबुदा व्यस्त है आज फिर से चर्चा करो”। हमने शरमाते हुए, संकोच करते हुए पुछा “ऐसा क्यों श्रीमान?”। हमारा यह पुछना था कि प्रवचन चालू, हमने बीच-बीच में समझाना चाहा कि आप पोस्ट लिख दीजिये हम वहीं पर पढ़ लेंगे मगर फिर...

मेरे दो नयन, मेरे दो नयन
कौन है? सभी के ही नयन दो ही होते हैं।
मैं हूँ रंजू, और मैं अपने नयनों की नहीं अपनी नई कविता की बात कर रही हूँ। चर्चा कीजियेगा, नमस्कार!!!
जी जरूर, जरूर, नमस्कार!!!

...यकायक हमें गुरूदेव कि बात “फ़ुरसतिया जब बोलते हैं तब मात्र बोलते हैं इसलिए मात्र सुनना, व्यवधान डालने की कोशिश की तो अपनी अगली पोस्ट में सर्वनाश कर देंगे उनका गुस्सा “बुश” से भी ज्यादा ख़तरनाक है।” याद आ गई तो हमने समझाना छोड़ समझना ही उचित समझा...


भेदभाव, हूँउउउउउ
कौन हैं महाशय? और हमने कहाँ किसके साथ भेदभाव किया है?
अरे मैं हूँ कौल, और मैं भी अपनी पोस्ट के बारे में बता रहा था, चर्चा करनी है तो करो वरना अपन खुद कर लेगा।
जी करता हूँ श्रीमान!!!
...और हम नायालक मन को शांत कर मात्र उनके प्रवचनों मे ध्यान लगाने लगे। उन्होनें ज्ञान वर्षा करनी जारी रखी...


कविराजज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज, कविराजज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज
कौन?
मैं हूँ सागर, पता चला कि फ़ुरसतिया ने तुमको फ़ुरसत में देखकर फ़ुसलाया है और किसी और की टोपी तेरे सर पर रख दी है।
नहीं नहीं सागर भाई, कैसी बात कर रहे हो भाईसा, वो चिट्ठाजगत के पितामह ना सही चचामह तो है ही ना..
हाँ, हाँ, पसीना पौछ लो, लगता है पहली बार मेहनत करनी पड़ रही है।
जी शुक्रिया!!!
और यह लो, हमसे तुम्हारा दर्द देखा नहीं गया तो कुछ चर्चा टाईप करके लाया हूँ जोड़ दीजियेगा -


गिरिन्द्र नाथ जी सुना रहें है कन्हैयालाल नंदन जी की ग़ज़लें और वहीं पर टिप्पणी में फ़ुरसतियाजी कुछ अपने लिंक मुफ़्त में बांट रहे हैं। अनुराग मिश्राजी अक्षरग्राम चौपाल पर चढ़कर भौंपू बजा-बजा कर कह रहें है – “मैं वर्जीनीया टेक में भारतीय रेडियो कार्यक्रम पुनः शुरू कर रहा हूँ, हिन्दुस्तान में इसे शनिवार रात के ग्यारह बजे इन्टरनेट पर सुना जा सकेगा।”

अच्छा! और यह प्रभू नारद के खिलाफ नोटिस लिये कौन खड़े हैं?


कविराज बीच में मत टोका करो, वरना मैं तुम्हारी मदद करने से सन्यास की घोषणा कर
दूँगा, अब आगे जोड़िये कि रविन्द्रनाथ जी भारतीय ने भारतीयता का परिचय देते हुए
जबरदस्ती पाठकों को खींचने की कोशिश की मगर फिर भारतीय होनें के नाते क्षमा भी मांग ली। मोहल्ले वाले अविनाशजी “शमीम तारिक़जी” का आलेख “ज़बां बिगड़ी तो
बिगड़ी थी
” पढ़वा रहें थे तो रतलामी जी बोले – “स्माल ब्रदर पर कोई बवाल नहीं” सो “यू नीड नो एक्शन मैन!” और लगे व्यंज़ल सुनाने -


मेरा दिमाग मुझसे रुठिया गया है
और नहीं तो जरूर सठिया गया है

सोचता बैठा रहा था मैं तमाम उम्र
अब तो जोड़-जोड़ गठिया गया है

जैसे कभी आपने नालायक मन की बात की थी वैसे ही तपस जी अचेतन मन के बारे में बता रहें है और भाटियाजी अपने बचपन में लौटते हुए बालमन की कल्पनाओं के बारे में बता रहे हैं “मानव, बुब्बू और टिम्मी” के जरिये। बीबीसी से आभार अफ़लातूनजी बता रहें है कि वेब पत्रकारिता का भविष्य उज्ज्वल है तो मन गुरू के बाद अब बुध की स्थिति बतला रहा है, क्षितिज जी लेकर आये हैं कुरिल की तबाही के दिल दहला देने वाले दृश्य तो भुवनेशजी अन्तर्जाल पर हिन्दी की समृद्धि के लिए एक अपील कर रहे हैं। प्रियदर्शन जी “एक करिश्में की उम्र” में बाला साहेब ठाकरे के बारे में बतला रहे है तो रामचन्द्र मिश्रजी प्रकृति की सुन्दरता दिखला रहे हैं। सुखसागर में जटासुर का वध हो गया है और उन्मुक्तजी बतला रहे है कि अब ओपेन कोर्सवेर आ गया है, अपने आलेख “ओपेन सोर्स से ओपेन कोर्सवेर तक” में। आपके गुरूदेव...

बस बहुत हो गया सागर भाई, अरे जब सबकुछ आप टंकित कर लाये हैं तो आप ही छाप दीजिये ना, हमें क्यों फ़सा रहे हो बीच में... (सागर भाईसा गुस्सा होकर चले गये)

हाँ तो हम बतला रहे थे कि फ़ुरसतियाजी ने ज्ञान वर्षा करनी जारी रखी और ग्रहण करते रहे।

“जिस प्रकार अर्जुन ने नहीं देखा कि सामने कौन हैं वैसे ही तुम मत देखो, अपने गुरू जी को निपटा दो, अपनी सफ़ाई दिये हैं वो, बहुत ही लचर बहाने लेकर आये हैं, घबराओ मत यह परीक्षा की घड़ी है, जीत हमेशा ही सत्य की हुई है, ख़ुलकर निपटा दो आज और यही हमारा आदेश भी है”

यह कहकर फ़ुरसतियाजी अंतर्ध्यान हो गये और हमारी समझ में आने लगा कि गुरूदेव क्यों बार-बार कहते हैं कि हम चुप हैं, हम कुछ नहीं कहेंगे... अब हम भी चुप ही रहेंगे कुछ नहीं कहेंगे।

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4 टिप्‍पणियां:

  1. चर्चा फिर एक और नया तरीका. बहुत खुब लगे रहो.
    इसबार मध्यान्ह पहले हुई है.

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  2. बहुत बढ़िया, गिरिराज...लगे रहो, सही रस्ते जा रहे हो बिना बोले..ऐसे चुप से तो अच्छा है कुछ बोल ही दो.

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  3. गीरीराज बाबू मेरा नाम यदि अपने एक बार और रविन्द्र लिखा, तो मा कसम आप भी ऐसे ही गीरीराज बने रहेंगे

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  4. हम इसीलिये आपको लिखने के लिये कहे कि समीरजी कह रहे थे कि चेला तारीफ़ करे तब बात है!

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