गुरुवार, जनवरी 04, 2007

रास्ते रौशन हुए…हर कदम मंज़िल लगे

नये साल की पहली चिट्ठाचर्चा शुरू करने से पहले यह जानकारी कि प्रसिद्ध नेट साहित्यिक, कला पत्रिका अभिव्यक्ति जो कि पहले शुषा फांट में प्रकाशित होती थी इस साल की शुरुआत से यूनीकोड फ़ांट में प्रकाशित होने लगी है। इस उपलब्धि के अभिव्यक्ति की पूरी टीम बधाई की पात्र है।

दूसरी जानकारी के रूप में ज्ञानपीठ प्रकाशन की पत्रिका नया ज्ञानोदय के जनवरी,२००७ अंक में हिंदी वेब पत्रिका हिंदी नेस्ट संपादिका और कथालेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ का ब्लागिंग के बारे में एक लेख छपा है- इंटरनेट ब्लाग्स बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता। । हिंदी के ब्लाग्स का जिक्र करते हुये मनीषा जी लिखती हैं:-
आप जब हिंदी ब्लाग्स की इस मजेदार मगर अटपटी दुनिया में प्रवेश करते हैं तो ब्लागर्स के सेन्स आफ ह्यूमर के कायल हुये बिना नहीं रह सकते। नहीं..नहीं यह महज निठल्ले दिमागों का 'टाइम पास' नहीं, यहां बड़े-बड़े विचारक दिमाग भी मिलेंगे जिनके वैचारिक ज्ञान की गहराई का पता आप उनके नामों से ही लगा सकते हैं मसलन-'विमर्श', 'ठेले पे हिमालय', 'मसिजीवी',' खाली-पीली', 'अबे कस्बाई मन', 'आऒ संस्क्रत सीखें', 'कटिंग चाय', 'की-बोर्ड के सिपाही', 'चिंतन', 'जलते हुये मुद्धे','दिल की बात दिल से', 'निठल्ला चिंतन', 'पाठक साहित्य', 'जुगाड़ी लिंक',' फुरसतिया'वगैरह!

हिंदी ब्लाग्स के लिये मजेदार मगर अटपटा संबोधन मुझे कुछ अटपटा सा लगा। अपने लेख के अंत में मनीषाजी लिखती हैं:-
यह ऐसा अथाह पिटारा है जिसमें आपको अपने स्तर का, अपने काम का सामान खुद ढूंढना है, लेकिन मैं इतना आगाह जरूर करूंगी कि इस सामान को खोजते हुये आपको अपने स्तर से बेहतर या आपने अनुभवों को आश्चर्यजनक विस्तार देने वाला सामान भी मिल जाये तो मुझे धन्यवाद जरूर कहियेगा।


इस लेख में हिंदी ब्लागिंग से संबंधित जानकारी अपर्याप्त है लेकिन फिर भी कुछ जानकारी है। मेरा सुझाव और अनुरोध है कि नया ज्ञानोदय के संपादक को पत्र लिख कर इस बारे में अपने विचार व्यक्त करें ताकि लोगों को पता चल सके कि हिंदी ब्लाग क्या है!

आज ही दैनिक भाष्कर में तरकश द्वारा आयोजित नवोदित चिट्ठाकर को सम्मानित करने का समाचार प्रकाशित हुआ है। समाचार गुजराती में हैं लेकिन बेंगाणी बंधुओं के चेहरे की मुस्कान समझने के लिये किसी भाषा की दरकार नहीं है। उनसे अनुरोध है कि इस समाचार को हिंदी में अपने ब्लाग पर या तरकश में या चिट्ठाचर्चा में प्रकाशित करें।

इतनी इधर-उधर की बातें करने के बाद अब काम की बातें और चिट्ठाचर्चा शुरू करते हैं।

हिंदी के २००६ के उभरते हुये चिट्ठाकार के लिये वोटिंग शुरू हो गयी। कल कुछ तकनीकी गड़बड़ी हो गयी थी लेकिन फिर अब यह ठीक हो गया है। आपसे अनुरोध है कि अधिक से अधिक संख्या में वोट करें। हिंदी के मुकाबले गुजराती ब्लाग के लिये वोटिंग में काफ़ी उत्साह है। हिंदी में कल तक कुल २५ वोट पड़े थे जबकि गुजराती का आंकड़ा ७५ को पार कर गया था।

हालांकि चुनाव प्रचार का समय निकल गया है लेकिन समीरलाल जी बिना चुनावी प्रतिबंधों का ख्याल किये अभी भी अपना प्रचार कर रहे हैं। आज उन्होंने स्वामी समीरानन्द का चोला ओढ़कर अपना प्रचार किया। उनके प्रवचन सुनकर अनायास कबीरदास याद आ रहे थे- ढाड़ी बढ़ाये जोगी बन गइले बकरा!अपने प्रचार-प्रवचन में स्वामी समीरानन्द ने संसार की सभी समस्यायों का हल दिया है। पूरी पोस्ट पढ़ें तभी मामला समझ में आयेगा। लेकिन नीरज रोहिल्ला की तारीफ़ी कुंडलिया आप इधरिच बांच लो:-
तरकश के घाट पर लगी चिट्ठाकारों की भीड,
समीरानन्द प्रवचन करें दुश्मन का बल क्षीण |
दुश्मन का बल क्षीण के अब तो सभी मौज मनावें,
ईस्वामी दस्तक उन्मुक्त आईना सब मिल गाना गावें |
कहे नीरज कविराय के भैया धन्य भाग्य हमारे,
ग्यान बांटने भक्तजनों को समीरानन्दजी पधारे |
जब इधर ये इनामी कार्यवाही हो रही थी तो उधर स्वामीजी अपना उदासीनता पुरस्कार बांट रहे थे:-
पश्विमीकरण के चलते इस परंपरागत भारतीय विरासत पर, हमारी उदासीनता पर, आक्रमण होते रहे हैं. उदासीनता पर नाक भौं सिकोडने वाले पश्चिम-वालों की सोच है की बुराई की सफ़लता के लिए भले आदमी की उदासीनता के अलावा और क्या चाहिए? जैसा की जॉर्ज बर्नार्ड शॉ का एक प्रसिद्ध कथन है - “उदासीनता अमानवीयता का अत्तर[निचोड/सत्व] है!” या खलील जिब्रान नें कहा है की “लालसा आधा जीवन है निर्लिप्तता आधी मृत्यु” इस तरह के कथन हमारी संस्कृति पर परोक्ष प्रहार करते हैं - चूंकी हमारी संस्कृति में निर्लिप्तता ही आकांक्षा का एंटी-डाट है!

आपने भी नोट किय होगा की ये मूरख लोग तकनीकी तौर पे भले ही आगे हों दर्शन में हमसे कितने पीछे हैं! भक्तिधारा के उदासीनों से हम मालवावासी कितना सीखे हैं. हमारे मालवा में एक से एक कैच-फ़्रेज़ बोले तो पापुलर तकियाकलाम हैं - “आपणें कईं करणों?”, “अब क्याआ करो सा’ब” से लेकर “सब चल्ताए बाबा” तक में निर्लिप्तता की महिमा फैली है!
स्वामीजी ने बिना किसी वोटिंग की आवश्यकता महसूस किये ये इनाम भारतीय पुलिस बल को सौंप दिया।

अमित ने अपना नया वर्ष पहाड़ पर मनाया और वहां भद्रता की मिशाल पेश की:-
भद्र पुरुष होने के कारण हमने कमरा लड़कियों को दे दिया और स्वयं टिन-लकड़ी की कुटिया में रात्रि गुजारने का निर्णय लिया। भूख बहुत लगी थी सभी को इसलिए नाश्ता मंगवाया गया और आग का प्रबंध करने को कहा गया। थोड़ी देर में आग का प्रबन्ध हो गया और उसके पास ही कुर्सियाँ रख दी गई तो हम सब आग को घेर बैठ गए और सर्दी में गर्मी का आनंद लेने लगे।
ये किस्सा तो आगे चलेगा अभी लेकिन जब वो पहाड़ से नीचे आये तो गर्मी तो बरकरार थी साथ में तेवर भी गर्मा गये और उनको मिली दिव्याभ की मेल जिस पर उनका पारा वहीं लैंसडाउन पहुंच गया और उन्होंने यह पोस्ट लिखी।

पहली बार जो मेल उनको सबको लिखनी थी वह गलती से दिव्याभ को भेज गये इस बार गलती की भरपाई करते हुये जो मेल दिव्याभ के लिये थी वह सबको लिखकर हिसाब बराबर कर दिया। जब दिव्याभ ने मेल लिखने को मना किया था तो सबको लिखने के अलावा और कोई चारा भी नहीं था। इसमें श्रीषजी को आश्चर्य हुआ कि पिछ्ले तीन के हिंदी चिट्ठाकारी के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ। जानकारी के लिये बता दें कि कहा-सुनी की इससे बड़ी ऊंचाइयां हिंदी ब्लागिंग में पहले भी छुई गयीं लेकिन सार्वजनिक नहीं हुईं। यह और भी जानकारी ले लें कि जिन लोगों की कुस्तियां हुईं आज उनके संबंध ज्यादा प्रगाड़ हैं,ज्यादा अधिकार भाव से वे एक दूसरे से लड़ते हैं लेकिन घाघ इतने हैं कि बताते नहीं कि क्या हुआ उनके बीच!हम तो केवल बशीर बद्र को याद कर सकते हैं:-
दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,
फिर कभी जब दोस्त बन जायें तो शर्मिंदा न हों।


इस सब दोस्ताना कहा-सुनी से दूर मनीश अपने चांद-चांदनी अभियान में लगे रहे और प्रस्तावित २५ पोस्टों में से तीसरी पोस्ट लिखी:-
जिंदगी में आये तुम चाहतों के रस्ते
काश ये रस्ते सनम कट जाए हँसते-हँसते
सोने दिलदारा तेरे प्यार तो मैं वारियां
मेरिया दुआवां तैनू लग जाण सारियां
चाँद हो तुम ,चाँदनी से भीगा जाए मन

उन्मुक्त जी ने जहां जानकारी देते हुये भविष्यवाणी की कि २००७ ओपेन सोर्स के नाम रहेगा वहीं मनीषा ने घर के पास उपलब्ध इंसाफ़ के बारे में बताया।इसके बाद जापान से म्त्सु नये साल की शुभकामनायें दे रहे हैं और प्रतीक दिखा रहे कुछ सेक्सी सीन! लेकिन इस सब खुशनुमा अहसासों से अलग सुनील बता रहे हैं विदेशी पूंजी से विकास के अंधविश्वास के बारे में:-
ठीक इसी समय देश के कई हिस्सों में किसानों की आत्महत्याएं भी शुरू हो गयी थीं । खेती एक गहरे संकट में फंस चुकी थी , जिसके लिए स्वयं भूमंडलीकरण की नीतियाँ जिम्मेदार थीं । विश्व बैंक के निर्देश पर खाद , बीज , पानी , डीजल , बिजली आदि की कीमतें लगातार बढ़ाई जा रही हैं । विश्व व्यापार संगठन की नई खुली व्यवस्था के तहत खुले आयात के कारण किसानों की उपज के दाम या तो गिर रहे हैं या पर्याप्त नहीं बढ़ रहे हैं । किसानों पर भारी कर्जा हो गया है । देशी - विदेशी टेलीफोन कंपनियों को ५००० करोड़ रुपये की राहत देने वाली सरकार को यह ख्याल नहीं आया कि किसानों का करजा माफ कर दें या खाद - डीजल - बिजली सस्ता कर दें या समर्थन - मूल्य पर्याप्त बढ़ा दें ।


नीरज ने बहुत दिन बाद कुछ पोस्ट किया और जो किया वह गजब का है। आप भी देखें:-
बादलो, पानी ही प्यासों के लिए रखना तुम
तुम न लोगों को डराने को बिजलियाँ रखना

बोलो मीठा ही मगर, वक़्त ज़रूरत के लिए
अपने इस लहजे में थोड़ी सी तल्ख़ियाँ रखना

मशविरा है, ये, शहीदों का नौजवानों को
देश के वास्ते अपनी जवानियाँ रखना

ये सियासत की ज़रूरत है कुर्सियों के लिए
हरेक शहर में कुछ गंदी बस्तियाँ रखना

शशि सिंह आजकल सपनों के शहर में हक़ीकत से जद्दोजहद कर रहे हैं और मिश्री की डली से गुजारा कर रहे हैं लेकिन राकेश खंडेलवाल जी अपने गीतकलश छलकाते हुये कहते हैं:-
लहराई वादी में यादों की चूनर धानी
नदिया लगी उछलने तट पर होकर दीवानी
सुर से बँधी पपीहे के बौराई अमराई
हुए वावले गुलमोहर अब करते मनमानी

महाभारत में पांडवों को वन भेज दिया अवधियाजी ने! लेकिन
रंजू जी की कलम से जिंदगी अब भी दिल्लगी कर रही है:-
यह ज़िंदगी भी अजब दिल्लगी कर जाती है
ले के लबों से हँसी पलको को नम कर जाती है

लहरें भी भला कब हुई हैं किसी साहिल की
छू कर इसको फिर समुंद्र में उतर जाती है


तुषार जोशी मराठी चिट्ठाचर्चा से कतरा से रहे हैं। लिख नहीं रहे हैं। कारण खोजने पर पता चला कि वे नये साल की आरती उतारने में लगे हैं:-
जैसे घुँघेरू वाली पायल,
या हो जाये कोई क़ायल,
जैसे शेरनी हो घायल,
या कि 'मम्मी जी' का आँचल।
शायद ऐसा लगे वो नया साल।।

जैसे कामगार का पसीना,
बिन श्रृंगार के हसीना,
कोई चुटकुला कमीना,
या फिर मार्च का महीना।
शायद ऐसा लगे वो नया साल।।


चर्चा की शुरुआत जिस कविता से करनी चाहिये वह सबसे अंत में। बेजीजी नये साल के मौके पर ही लिखती हैं:-
रोशनी में प्यार की,
गम के साये घट गये…
रास्ते रौशन हुए…
हर कदम मंज़िल लगे...

सूचना:अतुल कुछ व्यक्तिगत व्यस्तताऒं के चलते फिलहाल चिट्ठाचर्चा नहीं कर पा रहे हैं। यदि किसी साथी से हो सके तो सूचित करें ताकि उनके लिये आमंत्रण भेजे जा सकें।

आज की टिप्पणियां:-


१.अमित भाई, मुझे समझ नहीं आ रहा कि क्या टिप्पणी करुँ। मैं नहीं जानता कि उपरोक्त मामला क्या था। पर ‘बेवकूफ’, ‘नकारे’ जैसे निकृष्ट शब्दों का प्रयोग किसी भी सूरत में जायज नहीं। हिन्दी चिट्ठाकारी के पिछले तीन साल के इतिहास में कहीं भी ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं मिलता। मेरा तो मानना है कि हर प्रकार का विरोध भी सभ्यतापूर्ण ढंग से ही किया जाना चाहिए।

मैं उपरोक्त संदर्भ-ईमेल पढ़कर दंग रह गया और मुझे काफी देर तक विश्वास ही न हुआ। मैं अपने दोस्तों को गर्व से बताया करता हूँ कि हिन्दी चिट्ठाजगत में कितना प्रेमपूर्ण माहौल है, कितने परिपक्व, सभ्य सदस्य हैं। अब मैं किस मुँह से यह सब कहूँगा।

‘परिचर्चा’ पर भी कुछ दिन पहले इस तरह की घटना हुई थी। मैंने सब से शांति बनाने की भी अपील की। फिर मैंने उस सूत्र पर पोस्ट करने का विचार ही त्याग दिया क्योंकि अगर कुछ कहता तो लोग मुझे किसी न किसी गुट में रख देते। लेकिन मैं ही जानता हूँ कि उस बात से मैं कितना आहत हुआ।

अंत में सबसे प्रार्थना है कि भाई शांति बनाए रखो, इस तरह के घटिया अल्फाजों से परहेज करो। कोई विवाद है तो सभ्य इंसानों की तरह सुलझाओ। हिन्दी चिट्ठाकारों की इस छोटी सी बगिया को महकने दो।
श्रीश

२.
परम आदरणीय, प्रात:स्मरणीय, पूज्यनीय, वंदनीय, आनंद दायक, सुखदायक, मंगलकारी,भवभयहारी श्री श्री एक करोड़ एक लाख एक हज़ार एक सौ आठ श्री श्री स्वामी समीरानंद जी महाराज को सादर नमन.

आपकी ज्ञानवर्धक हितोपदेशों की शब्दावलि हमारे चक्षुओं में एक दिव्य रोशनी भर कर अन्तर्मन को झंझोड़ कर कहने लगी कि बेटा उठ. इस संसार में सब नश्वर है. कुछ भी अगर शाश्वत है तो केवल तरकश और तरकश पर मौजूद बारह अवतार.

फिर उस शब्दावलि ने शौनकादि अट्ठासी हज़ार ॠषिओं को आशीर्वाद देते हुए कहा कि बारह में से नौ तो केवल मायाभ्रम हैं. उनकी ओर ध्यान मत दे. केवल तीन ही तो हैं जो त्रिमूर्ति की तरह तीनों लोकों में विद्यमान है. और तीनों का उद्गम तो एक ही है. एक ही शक्ति है जो विभिन्न रूपों में समय की पुकार के अनुसार चिट्ठाजगत में अवतरित होती है. जान ले कि न कोई पहले था, न है और न रहेगा. जो कुछ है शून्य है और इस शून्य को पार कराने का एकमात्र साधन है उड़न तश्तरी.

फिर सूतवचन की परिपाटी में दिव्य वाणी ने ्कहा सुन पुत्र. मैं तेरे हित में एक रहस्य प्रकाशित करने जा रहा हूँ जो कि देवों को भी दुर्लभ है. दुर्गा सप्तशती में वर्णित प्रधानिक रहस्यों से भी रहस्यमय और अनगिनत तिलस्मों के परे बारह तालों में बन्द यह रहस्य मैं तुझ पर अतिशय प्रेम के कारण प्रकाशित कर रहा हूँ

( हे मुनिश्रेष्ठ ! क्योंकि साधारण चिट्ठाकार आपके गूढ़ उपदेश को समझ [पाने में अक्षम हैं इसलिये मैं आपके दिव्य सन्देश में लीन गुप्त सारों को जनहित में बता रहा हूँ )

सुन ! जैसे आद्यशक्ति केवल एक ही है वैसे ही २००६ का सर्वश्रेष्ठ चिट्ठाकार होने का अधिकार तो केवल उड़नतश्तरी को ही है. इसी पर सवार होकर गीता ज्ञान से लेकर कुंडली जागरण और टिप्पणी का सही मार्ग प्राप्त कर सकता है. हां अब आगे की समझ अपने आप तलाश कर और बेझिझक और बेहिचक तरकश पर जाकर उड़न्तशतरी के हिस्से में स्व्र्णतीर चला आ. रजत और कांस्य के भ्रम में न पड़. उन्हें चाहे जिधर उठा कर रख दे,व्र पहुंचेंगे तो मेरे ही स्वरूपों पर.

हे महात्मने. आपकी दिव्य वाणी के सन्देशों की व्याख्या के लिये संभावनायें तो बहुत हैं परन्तु गॄहस्थी के झंझटों में पड़ा यह जीव इस वक्त तो विदा ही ले रहा है इस आशा के साथ कि आप भविष्य में भी हमें अपने अभूतपूर्व उपदेशों से गौरवान्वित करेंगे.

जय श्री हरे\इ. जय उड़नतश्तरी. जय श्री स्वामी समीरानंद
राकेश खंडेलवाल

आज की फोटो


आज की पहली फोटो दैनिक भाष्कर में प्रकाशित समाचार से। इसमें बेंगाणी बंधुऒं के साथ उनके मित्र हैं हार्दिक जिन्होंने तरकश के लिये प्रोग्रामिंग की।
हार्दिक,पंकज,संजय

आज की दूसरी फोटो अमित के ब्लाग से
 बड़ी आग है

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1 टिप्पणी:

  1. "इसमें श्रीषजी को आश्चर्य हुआ कि पिछ्ले तीन के हिंदी चिट्ठाकारी के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ।"

    'श्रीष' नहीं 'श्रीश' बहूहू :(

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