शनिवार, सितंबर 27, 2008

... भेजा शोर करता है

आज की चर्चा में अगर भाषा की गंदगी नजर आये तो उसे वैसे ही नजरअंदाज कर दें जैसे भारत के हर शहर की हर गली में बिखरे कूड़े को नजर अंदाज करते आये हैं। भारत की डेमोक्रेसी की सबसे बड़ी बात है कि जिसे जब मन करे कहीं भी थूक देता है जहाँ मन करे खड़े होकर मूत देता है। सड़क पर कूड़ा वैसे ही बिखरा होता है जैसे भारत की जनसंख्या। कुछ इसी दिशा की ओर अग्रसर होता जा रहा है हिंदी ब्लोगजगत, जिसके जो मन में आया छाप दिया बगैर ये सोचे की कलम की मार तलवार की मार से ज्यादा खतरनाक हो सकती है। एक घटना घटी, भेजे में शोर उठा, आव देखा ना ताव तड़ से पेल मारी पोस्ट। एक ने मोदी को गाली दी दूसरे ने गाली देने वाले को गाली दी, इसने उसकी बैंड बजायी, उसने इसकी बैंड बजायी, बस हो गयी ब्लोगिंग। फिर किसी चर्चाकार ने सुबह खराब की किसी ने शाम, कुछ इससे मौज ली कुछ उससे मौज ली, उसके बाद टिप्पणी करने कुछ गुणीजन आये थोड़ा पढ़ा, अहा आनंदम् आनंदम् कहा निकल लिये कुछ और तलाशने।

चलिये आज की चर्चा शुरू करते हैं इन चंद लाईनों के साथ -
मुसलमाँ और हिंदू की जान,
कहाँ है मेरा हिन्दुस्तान,
मैं उसको ढूंढ रहा हूँ,

मेरे बचपन का हिन्दुस्तान,
न बांग्लादेश, न पाकिस्तान,
मेरी आशा मेरा अरमान,
वो पूरा पूरा हिन्दुस्तान,
मैं उसको ढूंढ रहा हूँ,

वो मेरा बचपन, वो स्कूल,
वो कच्ची सड़कें, उड़ती धूल,
लहकते बाग़, महकते फूल,
वो मेरे खेत और खलिहान,

...

वो उर्दू ग़ज़लें, हिन्दी गीत,
कहीं वो प्यार, कहीं वो प्रीत,
पहाड़ी झरनों के संगीत,
देहाती लहरा, पूरबी तान,

...

जहाँ थे तुलसी और कबीर,
जायसी जैसे पीर फ़कीर,
जहाँ थे मोमिन, गालिब, मीर,
जहाँ थे रहिमन और रसखान,
मैं उसको ढूंढ रहा हूँ,

मुसलमाँ और हिंदू की जान,
कहाँ है मेरा हिन्दुस्तान,
मैं उसको ढूंढ रहा हूँ.
अज्मल साहेब की ये गजल ढूँढ निकाली अभिनव ने, इसे आप इनके यहाँ जाकर सुनिये जरुर। आजकल ऐसा लिखने वाले नही मिलते मैं भी उन जैसों को ढूँढ रहा हूँ।

इसे सुनाने पढ़ाने के बाद क्या पढ़ाऊँ ये मुश्किल आन पड़ी है सभी खबरें या पोस्ट लगभग एक जैसी हैं लेकिन बताना तो पड़ेगा ही क्योंकि किसी का भेजा शोर करता है। इसी शोर से परेशान जा पहुँचे उस चांद को देखने जो निकला ही नही, चांद तो मिला नही लेकिन ये पढ़कर गंगा ढाबा जरूर याद आ गया जिसके सामने पड़े पत्थरों में बैठकर हमने भी कई शामें चाय की चुस्कियों और पराठों की खुशबूओं के बीच गुजारी।
और हम दोनों ने देखा...उस लड़की को जिसकी बातें कभी रूकती ही नहीं थी, और उस लड़के को जो खिलखिला के हँसता था...वो लड़की जिसे हवा में दुपट्टा उड़ना पसंद था, आलू के पराठे, गुझिया और मामू के ढाबे से हॉस्टल तक रेस लगना पसंद था...और जिसे वो लड़का पसंद था जो खिलखिला के हँसता था।
चांद को छोड़कर आदमी को देखता हूँ तो लगता है गोया आदमी ना हुआ क्रिकेट के मैदान में उछाले जाने वाला सिक्का हो गया यानि या तो हैड बोलो या टेल। ऐसा लगने की वजह है रूपाली से किसी का ये कहना - आप संघ के नही हैं तो आप सिमी के हैं। ज्यादा पुरानी बात नही है जब सुनने को मिलता था "तू हिंदू बनेगा ना मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा", ये तब था आजकल तो बस भेजा शोर करता है।

शराब का नशा सुना था, यौवन का नशा भी सुना था लेकिन इस तरह का नशा पहली बार सुना और ये है बाढ़, बम और करार का नशा, अनुजा का लिखा माने तो ये फिलहाल तो सिर्फ मीडिया वालों का शौक है -
बाढ़ का नशा उतरने के बाद अब मीडिया के सिर पर दो ही नशे सवार हैं। एक बम का नशा और दूसरा परमाणु करार का नशा।
नशे के उतरते ही याद आया कि कभी पढ़ा था लोहे को लोहा काटता है, अगर ये सच है तो क्या आप बता सकते हैं कट्टरपंथ को कौन काटेगा या मारेगा? क्या कहा कट्टरपंथ? गलत क्योंकि अनिल रघुराज की माने तो उनका कहना है कि लोहिया ने बोला था हिंदू कट्टरपंथ देश को जोड़ता नहीं, तोड़ता है। सौलह आने सच लेकिन क्या किसी और धर्म का कट्टरपंथ देश को जोड़कर रख सकता है? समझ नही आता ये कोई क्यों नही बोल पाता।

चलिये ये लगी बुझायी तो चलती रहेगी जब तक लोगों का भेजा शोर करता रहेगा आप बतायें क्या आपको मोटर साईकिल चलानी आती है, अगर हाँ तो समझिये आपकी तो निकल पड़ी। इब वो दर्जिन बोली -
ताऊ मैं तो न्युं करके रौवू सुं कि इबी मरने के तीन दिन पहले ही वो मोटर साइकिल हिरोहोन्डा आली खरीद कै ल्याया था! इब उस मोटर साइकल नै कुण चलावैगा ?
जरा जल्दी हाँ, अपना ताऊ सरपंच होने की दुहायी देकर जबरदस्ती से लाईन पर सबसे पहले खड़ा हो गया है।

जहाँ सभी ब्लोगर जाति के प्राणी घर की उठापठक का गणित लगाने में लगे हैं वहीं बालेन्दु थोड़ा सा हटकर बात करते हैं, हो भी क्यों ना ये मतांतर जो है -
हो सकता है कि धीरे-धीरे रूस और चीन के इर्द-गिर्द विभिन्न देशों के एकत्र होने की प्रक्रिया शुरू हो लेकिन अर्थव्यवस्था के प्राधान्य के इस युग में कोई देश अमेरिका की कीमत पर रूस-चीन के खेमे में नहीं जाएगा। न आसियान देश, न खाड़ी देश, न दक्षिण अमेरिकी देश, न नाटो के सदस्य और न ही पूर्व वारसा संधि के अधिकांश सदस्य देश। यही बात कमोबेश भारत पर भी लागू होती है।
अब चलते चलते एक सामान्य ज्ञान का सवाल, क्या आप जानते हैं ब्रिटेन की सबसे पहली महिला डाक्टर होने का लाइसेंस किसे मिला, अगर नही तो ये पढ़िये एक सशक्त बेटी और एक स्नेहिल पिता की कहानी


एक दूजे के लिये
1. टिप्पणी हो तो ऐसी मालूम है लिखने की जरूरत नाही है दिख रेला है भाई सब

2. वह चुप न रह सके, तो मैं भी चुप न रह सका इसलिये चिल्लाकर कहे देता हूँ HIIIIIII....I AM SUMIT
झरोखा

कहते हैं कि पति पत्नी एक दूसरे के प्रयाय होते हैं अगर यकीन ना आये तो इन दोनों के एबाउट मी पढ़िये। आप भी यही कहेंगे।
अनुप भागर्व लिखते हैं - "ज़िन्दगी इक खुली किताब यारो, पुण्य हैं कम पाप बेहिसाब यारो" वहीं
रजनी भागर्व लिखती हैं - "किताबों में कुछ किस्से हैं, मेरी उम्र के कुछ गुज़रे हुए हिस्से हैं"

3. बच्चे भविष्य भारत के, गुडिया, रामू और श्याम के हाथ में कलम नहीं है कूड़े की बोरी क्या करें फिर भी शर्म हमको मगर नहीं आती

4. अब टैबू नहीं रहा सेक्स और ना ही टैबू रहा क़त्लेआम

5. आप सड़ें चाहे गलें, लेकिन अगर हमारा साथ छोड़ा, तो मिटा देंगे प्लीज ऐसा ना करें बिखर जाऊंगा

6. पर्वतों की ओट में एक दिन ईश्‍वर जो गया फिर आया नहीं

7. लघुकथा क्या है लघुकथा जैसे न्यायधीश बना सियार

8. रांची में लड़कियों के निकलने पर पाबंदी पुरूषों जागो! ऐसे लोगों से जरा कड़क कर बोलो खबरदार! जो अब महिलाओं व बच्चों का दिल दुखाया

9. आतंकवाद दुनिया का ढाँचा गिराता रहा और ये मुआ रेडियो गाता रहा

10. सत्तू के मारे भईयाजी हमारे खाते हू सुनाने लगे पत्नी-पुराण

11. फिर ज़िन्दगी के दांव पेंच चलने लगे हैं कहने वाले आप संघ के नही हैं तो आप सिमी के हैं कहने लगे हैं


कुछ नये चिट्ठाकार
1. विधोत्तमा का स्वंतासुखाय सर्वजनहिताय
2. ड्रीम्स अनलिमिटेड का डीपेस्ट थॉट
3. विनय जैन सुनाते हैं कुछ अपनी कुछ दुनिया की
4. आदर्श राठोर पिला रहे हैं एक विचार भरा प्याला
5. विरेन्द्र शर्मा की भी सुन लो राम राम भाई
6. मनुज मेहता दिखा रहे हैं अपना कमरा


चिट्ठाचर्चा का स्वरूप
वैसे तो वक्त से पहले ही अपने को बदल लेना चाहिये, अगर ऐसा ना हो पाये तो वक्त रहते ही ऐसा करने की कोशिश करनी चाहिये। इस बात को कहने का सीधा आशय ये है कि चिट्ठाचर्चा जब इस फोर्मेट में शुरू हुआ था तब गिनती के चिट्ठे थे और चर्चा करने में इतना वक्त नही लगता था। लेकिन आजकल ऐसा नही है इसलिये मुझे लगता है कि हमें भी इसका स्वरूप बदल कर देशी पंडित जैसा कर देना चाहिये। इससे ज्यादा से ज्यादा लोग सहभागिता दिखा सकते हैं। आप लोग जरूर अपनी राय दीजियेगा।

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12 टिप्‍पणियां:

  1. सुबह सुबह सुंदर-चर्चा। गारंटी कि दिन अच्छा बीतेगा जो सुबह सुबह इसे पढ़ लेंगे।
    कुछ का खराब हो जाए तो अपने अंदर झांक कर देखें।
    फार्म को तो उस का कंटेंट खुद बदल देता है।

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  2. "...लेकिन आजकल ऐसा नही है इसलिये मुझे लगता है कि हमें भी इसका स्वरूप बदल कर देशी पंडित जैसा कर देना चाहिये..."

    आज की स्थिति में यह अति आवश्यक सा हो गया है. पाठकों के लिए भी और चर्चाकार के लिए भी. क्योंकि हो सकता है कि उस दिन का सबसे बढ़िया चिट्ठा - चर्चा में आ ही न पाए क्योंकि चर्चाकार की नजर तीन सौ पोस्टों के बीच उस पर पड़ी ही नहीं (संभव ही नहीं है)

    तो, भले ही ठीक देसी पंडित जैसा न हो, परंतु आइडिया लिया जा सकता है. चिट्ठाचर्चा में अलग, विशिष्ट, काम के और समुदाय के लिए महत्वपूर्ण और रुचि वाले अधिकतम 5-6 पोस्टों के बारे में जानकारी दी जाए. एक पोस्ट में एक चिट्ठे के बारे में दिया जा सकता है. दिन भर में आठ दस चिट्ठा-चर्चा पोस्टों के जरिए (अलग अलग चर्चाकारों के द्वारा)दिया जा सकता है इत्यादि...

    और हाँ, पाठकों की पसंद कि (टिप्स देने के लिए) - किसी विशिष्ट पोस्ट पर चर्चा की जानी चाहिए के लिए भी कुछ प्रयोजन हो.
    वैसे इस थ्रेड में गंभीर और लंबी बहस (सार्थक और विनम्र!)चले तो काम का फ़ॉर्मेट भी निकल सकता है और चर्चाकार भी मिल सकते हैं.

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  3. .

    ठीक तो है, देशी पंडित भी आज़मा कर देख लेते हैं...
    पर यहाँ की बात ही कुछ और है...

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  4. बात तो सही है परिवर्तन की दरकार तो है ही ..सही कहा रवि जी ने लम्बी और सार्थक बहस की दरकार है.

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  5. तरुण जी बेहतरीन चिठ्ठा चर्चा ! बहुत सुंदर ! आपकी और रवि रतलामी जी
    की बात से मैं भी सहमत हूँ ! सही बात है की जब चिठ्ठों की संख्या में इजाफा
    है तो समय के हिसाब से बदलाव भी नितांत आवश्यक है ! फ़िर हमारे गुरुदेव
    डा. अमर कुमार जी ने जिस देशी पंडित फार्मूले को मंजूर कर लिया है , उसको
    भी आजमा लिया जाए ! लेकिन मेरी एक गुजारिश है की चिठ्ठा चर्चा का बेसिक
    स्वरुप कायम रखने की थोड़ी कोशीश भी रहे ! मेरी बहुत २ शुभकामनाएं !

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  6. भई अपन तो चिटठा चर्चा के वर्तमान फॉर्म से संतुष्ट हैं. लेकिन जरूरत हो तो बदलाव का भी समर्थन करेंगे. लोगों की भागीदारी बढ़ाई जा सकती है. अगर यहाँ चर्चा के लायक कोई पोस्ट हो जो छूट गयी हो तो पाठक उसका लिंक अपने कमेन्ट में दे सकते हैं.

    आज की चर्चा भी अच्छी रही.

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  7. बढते चिट्ठों के साथ साथ, चिट्ठा चर्चा धीरे धीरे मुश्किल और आगे जाकर असम्भव होती जाएगी। इस समाधान के दो उपाय है:

    १. चिट्ठा चर्चा के एक दिन मे तीन संस्करण निकाले जाएं, अलग अलग लोगों द्वारा, अलग अलग टाइम जोन से। (भारत, यूरोप, अमरीका के चिट्ठाकारों की चर्चा। इसमे चर्चाकार, अपने अपने इलाके के चिट्ठों पर सही नज़र रख सकेंगे। साथ ही एक रविवारीय चिट्ठा चर्चा हो, जिसमे सप्ताह के अच्छे चिट्ठों पर नजर डाली जाए।
    २. इसे देसी पंडित का स्वरुप दिया जाए, जो साथी(लिमिटेड और नामिनेटेड) चाहे चर्चा करे। चाहे एक पोस्ट की, चाहे तो कई पोस्ट की एक साथ।

    दोनो स्वरुपों मे अलग अलग नफ़े नुकसान है। पहले वाले मे टीम को कमिटेड होना पड़ेगा, जो आज के व्यस्त समय मे मुश्किल है। दूसरे वाले मे चर्चाओं की भीड़ मे से अच्छे चिट्ठे छांटना मुश्किल होगा।

    एक और बात, चिट्ठा चर्चा को व्यवसायिक रुप देना जरुरी है, अन्यथा चर्चाकारों का थोड़े समय बाद ये काम बोझ लगने लगेगा। यदि इस विकल्प पर विचार किया जाता है, तो पहली आहूति मेरी तरफ़ से।

    दोनो मे से एक विकल्प को लेना ही पड़ेगा, आज नही तो छ:/बारह महीने बाद।

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  8. Totally agree with Jitu/Ravi

    Narad these fays looks like indic version of a news reader. Because most of the post are copy-paste-ad-my-comments version. Very few blogs (may be 20-30) are worth reading.

    To be very frank, I don't read blogs too much, but whenever I revisit them, my view will reflect a new comer's view of hindiblogdome.

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  9. चिंतन करती यह चिट्ठा चर्चा बहुत अच्‍छी लगी। किसी भी चीज में परिवर्तन तो जरूरी होता ही है। चिट्ठा चर्चा में अभी भी नित्‍य नयापन देखने को मिल रहा है, उसी क्रम को जारी रखा जाए तो भी बुरा नहीं।

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  10. परिवर्तन तो प्रकृति का अटल सत्य है
    एक कहावत है
    ""बदलो नही तो समय आपको मिटा देगा ""

    अच्छी चिटठा चर्चा हुई आज तरुण जी की वाणी में कुछ कुछ रोष प्रकट हुआ जो आवश्यक भी है

    वीनस केसरी

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