मंगलवार, नवंबर 11, 2008

आज की चर्चा का सीधा प्रसारण चिट्ठा चौक से..

प्री मेच्योर चिट्ठा चर्चा में आपका स्वागत है.. आप सोच रहे होंगे की ई प्री मेच्योर चर्चा क्या है... अजी आप खुद ही सोचिए हमारा चर्चा करने का दिन है बुधवार को.. और हमारी चर्चा की डिलीवरी एक दिन पहले यानी की आज मंगलवार को ही हो गयी.. तो हुई ना प्री मेच्योर चर्चा...

आज की चर्चा का सीधा प्रसारण चिट्ठा चौक से.. जी हाँ चिट्ठा चौक एक छोटा सा चौराहा है जहा पर रोज़ बाज़ार लगता है.. और आपको मिलती है कुछ अनोखी चीज़े वो भी बिल्कुल वज़िब दाम में..

बीच बाज़ार में यदि आपके मन में भी प्रश्न कुलबुलाता है की सामूहिक ब्लॉग 'चोखेर बाली' का नाम चोखेर बाली क्यो है ? तो आप ये पोस्ट पढ़े..

"कुछ पोस्ट्स आप पुन: पढें और राय दें कि यदि चोखेर बाली का नाम चोखेर बाली की जगह
प्रगतिशील नारी, नयनतारा , गृहशोभा ,सरिता या अनामिका या कुछ भी और होता लेकिन कंटेंट यही रहता तो भी क्या लोगों का रेस्पॉंस यही नही होता?"


सामने वाली गाड़ीपर खड़े अंकल बता रहे है की अगर आप इस बार वोट नही दे रहे है तो आप पप्पू है! कैसे? पढ़िए सुरेश चंद्र गुप्ता जी समझा रहे है..

"दोस्तों में वह राजा है,

पर पप्पू वोट नहीं देता,

पप्पू मत बनिए, वोट दीजिये."


ज़रा रुकिये बहनजी.. आप बच्चे को लेकर कहा जा रही है? क्या कहा प्ले स्कूल में बच्चे को एडमिशन दिलवाने.. ज़रूर जाइए पर जाने से पहले देख लीजिए जितेंद्र जी बता रहे है की क्या होता है प्ले स्कूल में..

"कि‍सी बच्‍चे को उससे खेलने नहीं दि‍या जाता था। बच्‍चे को ब्रेड पकौड़े और ऐसा ही अन्‍य तेलीय भोजन कराया जाता था। हफ्ते में एक-दो बार तो लंच के नाम पर सि‍र्फ आधा केला खि‍लाकर खानापूर्ति कर देते थे। सबसे बुरी बात थी कि‍ 5-7 बच्‍चों को एक ही ग्‍लास से जूठा पानी ही पि‍ला देती थी। यहॉं हाईजीन का कोई ध्‍यान नहीं रखा जाता था। कि‍सी बच्‍चे को खॉसी, कि‍सी को जुकाम, कि‍सी को कुछ और बीमारी होती थी, मगर उन्‍हें साथ ही रखा जाता था।"


ओ चक्कु छुरिया तेज़ करा लो...
ओ मैं तो रखू ऐसी धार.. के चक्कु बन जाए तलवार
ये ज़माना है तेज़ी का जमाना...


भाइयो और बहनो.. चक्कु तो हमने आपको बहुत दिए है.. पर इस बार हम लाए है नीरज जी का खोपोली ब्रांड का ख़ौफ़ का खंजर

"ख़ौफ़ का ख़ंज़र जिगर में जैसे हो उतरा हुआ
आजकल इंसान है कुछ इस तरह सहमा हुआ

साथियो ! गर चाहते हैं आप ख़ुश रहना सदा
लीजिए फिर हाथ में जो काम है छूटा हुआ"


बाज़ार में हमेशा से जो पॉपुलर फंडा रहा है वो है एक साथ एक मुफ़्त मुफ़्त मुफ़्त (आंशिक डायलॉग साभार जब वी मेट)
ऐसा ही कुछ बाइ वन गेट वन की तर्ज़ पर है संजय बेंगाणी जी की ताज़ी पोस्ट... बांचिए श्रीमान इस पोस्ट को बांचिए ... देखिए कैसे दो समस्याए एक सी ना होकर भी एक सी लगती है..

यह हमारे समाज की विसंगति है या विड़म्बना? जहाँ दोष सदा पीड़ित के सर आता है. उसके एक गेर-कानूनी कृत्य ने पति के सारे पापों को धो दिया.

***

जो भी है इस घटना की देश में घट रही हाल की आंतकी घटनाओं से तुलना नहीं कि जा सकती है? जहाँ हिन्दु-आतंकवाद की कथित घटना के बाकी सभी घटनाओं को पाप मुक्त कर दिया है."


नयी लेटेस्ट एम पी थ्री.. जिसको भी चाहिए इधर आइए सागर रेडियो सर्विस.. सभी नये पुराने गीतो की महफ़िल उपलब्ध है.. लीजिए एक नयी पेशकश


वैसे आज बाज़ार का भाव काफ़ी बढ़ गया है.. बाज़ार में घपला करने वाला ताऊ यमलोक पहुँच गया.. कैसे ? आइए देखिए..

"ताऊ को जब यमराज के एजेंट आकर बोले - ओये ताऊ चल उठ खडा हो और हमारे साथ चल !

ताऊ एक बार तो कुछ समझा कोनी ! फ़िर अपना साफा बाँध कर लठ्ट उठाया और भैंस को खोल कर उनकै साथ चल दिया !"


चुटकुला, शायरी, सामान्य ज्ञान.. कौन है दुनिया का सबसे लंबा आदमी, सबसे बड़ा अंडा किसका होता है? सारी किताबे एक ही दाम.. मैडम एक किताब ले लो ना.. क्या कहा? फेमिना... हा है ना मैडम.. और वो भी हिन्दी में... यकीन ना आए तो मनीषा जी का ब्लॉग पढ़ लो..

इसे व्यवसाय की मजबूरी कहें या मौजूदा दौर में सभी पत्र-पत्रिकाओं और बड़ी वेबसाइटोंFeminaHindi का हिंदी संस्करण होने का फैशन, महिलाओं की अंग्रेजी की प्रसिद्ध पत्रिका फेमिना (Femina) अब हिंदी में भी उपलब्ध हैं। फेमिना हिंदी की पहला संस्करण इस समय मैगजीन स्टैंडों पर बिक रहा है। फेमिना अपने प्रकाशन के पचासवें वर्ष में है और हिंदी वालों के लिये उसका तोहफा है। हिंदी फेमिना की कीमत 40 रुपये रखी गई हैं। आप चित्र में देख सकते हैं कि पत्रिका का नाम अभी भी अंग्रेजी में है मानो अंग्रेजी अभी भी संपादकों पर हावी है।


प्यार में धोखा या शादी ना होना... किस्मत की मार या डेंगू का बुखार.. शराबी को बिना बताए शराब छुडाये आज ही मिले बाबा अजमल खा बंगाली से.. नयी सर्विस चालू है .. ब्लॉगर को बिना बताए ब्लॉगिंग छुडाये..

"अब अखबार में 'बिन बताये शराब छुडाएं' तो आता है पर 'बिन बताये ब्लॉग्गिंग?' कभी ना सुना ना देखा... अब करती भी क्या बेचारी ! ये नए जमाने में कैसी-कैसी बीमारियाँ और कैसे-कैसे नशे आ रहे हैं... क्या होगा इस दुनिया का। झूठ का ही पंडितजी जपते हैं 'कलियुगे कलि प्रथम चरणे...' अरे ये प्रथम है तो अन्तिम कैसा होगा?"


ज्ञानू पैंटर.. आ गैएला है.. अपनी फोटो बनवाइए सिर्फ़ 10 रुपये में.. हुलिया सुनकर फोटो बनाने वाला विश्व का आख़िरी चित्रकार.. एम एफ हूसेन की प्रेरणा.. यकीन ना आए तो इस चित्र को देखिए..



इस चित्र की उत्पति के लिए यहा चटका लगये..

गीत पुस्तिका.. आज ही ले जाइए.. गीतो की अनुपम पुस्तक.. जल्द ही कीजिए सीमित प्रतिया उपलब्ध.. सिर्फ़ सतीश सक्सेना जी के ब्लॉग पर..

"कामिनी की मनहर मुस्कान
झुकी नज़रों के तिरछे वार
बिखेरे नाज़ुक कटि पर केश
प्रेम अनुभूति जगाये, वेश ,
लक्ष्य पर पड़ती मीठी मार, रूप आसक्ति बढाता कौन ?
देखि रूपसि का योवन भार प्रेम अभिव्यक्ति कराता कौन ?"


अब एक महत्वपूर्ण बात

कुछ ब्लॉगर्स कितनी जल्दी कुछ भी निर्णय ले लेते है.. दो प्रकरणों से साफ़ हुआ.. पहला ये की मेरे ब्लॉग की पिछली प्रविष्टि "ज़िन्दगी कभी यू भी मुड़ जाती है..." पर एक अनोनामस टिप्पणी आई जिसमे लिखा था "मैं दावे से कह सकता हू की ये काल्पनिक कथा है.."

उन्होने पोस्ट पढ़ी और किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर दावा कर दिया की ये काल्पनिक है.. ये ठीक उसी तरह से था जैसे कोई दावा करे की सूरज पूर्व से उगता है.. मैने अपने ब्लॉग पर कही नही लिखा की ये संस्मरण है अथवा कहानी.. यदि मैं संस्मरण लिखता फिर वो दावा करते तो उनका दावा ज़्यादा मजबूत लगता..

मैं इस से पूर्व भी कहानिया लिख चुका हू.. संस्मरण मेरे अपने लेबल "यादो की गुल्लक फूटी है" के अंतर्गत आते है.. खैर शंका चाहे जो भी हो कोई भी स्वतन्त्र है अपने नाम से टिप्पणी करने के लिए.. या फिर मुझे मेल भेजने के लिए...

दूसरा प्रकरण है रक्षंदा का.. कविता जी ने सर्वप्रथम अपनी चर्चा में इसका उल्लेख किया..

सबसे पहले मैं बात करूँगा दो टिप्पणियो की ... रचना जी और अनुराग जी की टिप्पणियो की.. दोनों ने ही बिल्कुल ठीक बात लिखी है..

किसी के अभिभावक ने एक निर्णय लिया हैं वज़ह कुछ भी हो सकती हैं . जरुरी नहीं हैं की वो वज़ह सार्जनिक रूप से वो सब को बता सके . कोई ब्लॉग लिखता हैं या नहीं लिखता हैं ये उसका अपना नजरिया हैं . अगर कोई अपने अभिभावक के संग रहता हैं और आप उसके अभिभावक से इस विषय मे बात करते हैं { जो उस परिवार से नितांत अपरिचित हैं } तो आप एक पारिवारिक बात मे दखल अन्दाजी कर रहे हैं . हर बच्चे का अभिभावक इस जगह अपने को रख कर सोचे की क्या वोह इस दखल अंदाजी को पसंद करेगा / करेगी . फिर ये बात लवली जी की तरफ़ से शुरू हुई हैं जिनका उसके बाद कोई भी व्यक्तव्य नहीं आया हैं ? हो सकता हैं की बात कुछ और हो और केवल और केवल ब्लॉग लेखन तक ही सिमित ना हो . अभिभावक से बात करने का कोई मतलब नहीं निकलता हैं और इस इस्शु को यही ख़तम कर देना चाहिये ताकि अगर ब्लॉग की दुनिया की वज़ह से परेशानी हुई हो तो ख़तम हो जाये उस परिवार से. ब्लॉग परिवार की कोई भी पहल केवल और केवल एक दखलंदाजी भी समझी जा सकती हैं किस परिवार मे . ब्लॉग लाखन कोई ऐसी चीज़ नहीं हैं की जिस के बिना एक लड़की का जीवन ख़तम हो जाएगा . ये मेरी व्यक्तिगत राय हैं - रचना जी


पहली बात रक्ष्नंदा को लेकर -
तथ्यों को जाने बगैर प्रतिक्रिया व्यक्त करने की जल्दबाजी ना करे ....ये भी ध्यान रखना होगा की किसी की निजता का उलंघन न हो ......रचना जी की बात से सहमत हूँ.....- अनुराग जी


अनुराग जी की बात तथ्यों को जाने बगैर प्रतिक्रिया व्यक्त करने की जल्दबाजी ना करे " वही बात यहा पर हुई है

सतीश सक्सेना जी ने अपनी टिप्पणी में ये पंक्ति भी लिखी है..

यह आवश्यक नही है कि यह धमकी कोई गंभीर धमकी ही हो, किसी साधारण और घटिया प्रवृत्ति का कोई ब्लागर भी हो सकता है - सतीश सक्सेना जी


किसी भी घटना को लेकर ब्लॉगर साथियो पर शक़ करना जल्दबाज़ी है तथा हमारा एक दूसरे के प्रति अविश्वास दर्शाता है.. मैं यदि सारी बात सच भी मान लू तो मुझे कोई भी ब्लॉगर ऐसा नही नज़र आता जो इस प्रकार की हरकत करेगा...

इस पूरे प्रकरण में ऐसा नही है की किसी ने ग़लती की है.. परंतु एक भूल तो हुई ही है हम सभी से.. जल्दबाज़ी में निर्णय लेने की.. जल्दी यहाँ हुई की अमर कुमार जी के पास मेल आते ही उन्होने लवली का मेल उसी रूप में कविता जी को फॉर्वर्ड कर दिया और कविता जी ने भी उसी रूप में उसे चिट्ठा चर्चा में पोस्ट कर दिया..

ये किसी की निजता का उल्लंघन ही था.. हालाँकि मैं जानता हू की इसके पीछे सकारात्मक भावना थी तथा ये सब जानबूझकर नही किया गया.. परंतु भूल तो हुई है.. लवली से मेरी फ़ोन पर हुई बात में उसने मुझसे कहा की

" मुझे बुरा लगा जब मैने अपना मेल चिट्ठा चर्चा में देखा.. - लवली "


हम सभी को इस बात का ख्याल रखना चहिये..कि किसी की पर्सनल मेल को सार्वजनिक नही किया जाए..

और रक्षंदा का मामला उनका नितांत पारिवारिक मामला है इस बारे में मेरी लवली से बात हो चुकी है.. रक्षंदा ने लवली से कहा था की उनके पिताजी ने उन्हे ब्लॉग लिखने से मना किया है.. और हम इस बात के अधिकारी भी नही की उनके पिताजी से ये सवाल पूछे... कल यदि मेरे परिवार वाले मुझे ब्लॉग लेखन के लिए मना करे तो मैं भी नही लिखूंगा.. शायद हम में से कोई नही लिखे..

फिर भी हमारी शुभकामनाए रक्षंदा के साथ है वजह चाहे जो भी हो हम यही कामना करते है की वे जल्द से जल्द अपने ब्लॉग परिवार में फिर से सक्रिय रूप से शामिल हो...

अंत में

पिछले रविवार दिल्ली में नारी ब्लॉग की अगुवाही में एक ब्लॉगर स्नेह मिलन का आयोजन किया गया जिसमे ब्लॉग जगत की कई महिलाओ ने भाग लिया.. हमारी और से इस स्नेह मिलन के सफलतापूर्वक संपन्न होने पर बधाई...

सम्पूर्ण विवरण के लिए पढिये मीनाक्षी जी का ये आलेख

तस्वीरे आप यहा देख सकते है..

एक और बात

मैने ड्राफ्ट्स में शिव कुमार मिश्रा जी की चर्चा देखी.. बहुत शानदार! सिस्टम हेंग होने की वजह से वो इसे पूरा नही कर पाए शायद अगले एक दो दिनों में से कभी वो चर्चा करे.. आप ज़रूर पढ़िएगा.. बिल्कुल नये स्टाइल में है...

अभी मैं आपसे विदा लेता हु ... फ़िर मिलेंगे अगले बुधवार तब तक के लिए "दसविदानिया.."

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26 टिप्‍पणियां:

  1. लुढ़काये जा स्याही काग़ज़ पर... पर झूठ मत बोलना... सटीक संक्षिप्तिकरण!

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  3. आज की चर्चा का सीधा प्रसारण चिट्ठा चौक से.. जी हाँ चिट्ठा चौक एक छोटा सा चौराहा है जहा पर रोज़ बाज़ार लगता है.. और आपको मिलती है कुछ अनोखी चीज़े वो भी बिल्कुल वज़िब दाम में..

    आईडिया किंग भाई कुश की बेहतरीन चर्चा ! मजा आगया आपके इस चिट्ठा-चौक के लाईव प्रसारण में ! बहुत शुभकामनाएं !

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  4. हर बार नया अंदाज! कहाँ से लाते हो जी? :)

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  7. बहुत बढ़िया रही चिट्ठाचर्चा...हमेशा की तरह.

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  8. वाह, बहुत बढ़िया !
    घुघूती बासूती

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  9. भाई सा’ब...चोखेर बाली हो या चोखरी की बाली, बात तो कान खाने की है ना!

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  10. बहुत सटीक और सार्थक चर्चा. नये नये तरीके से पेश करने में उत्सुक्ता बनी रहती है, आभार.

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  11. प्री मैच्योर बस दिन के हिसाब से ही है बाकी मामलों में तो बड़ी सयानी चर्चा है :-)

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  12. बहुत बढ़िया रही चिट्ठाचर्चा

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  13. कुश मैने पहली बार आपकी चिट्ठा-चर्चा पढ़ी है...वाकई बहुत अच्छा लिखते है आप...बधाई एक सार्थक चर्चा के लिये...

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  14. अजीब बात है न कुश भाई....लोग कितनी माइक्रो - टिपण्णी दे रहे है आज !

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  15. चौक की पूरी तस्‍वीर उभरकर ब्‍लॉग में आ गई है, और चि‍ट्ठा-चर्चा के साथ लगा भोंपू का 'लोगो' चौक में लगा हुआ है, इसलि‍ए सबलोगों तक आवाज भी पहुँच रही है:)

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  16. बहुत अच्छी और एक बार फ़िर शानदार च जानदार चर्चा। इसके लिये बधाई।

    लवली कुमारी के एतराज और अनुरोध पर उनकी मेल चर्चा से हटा दी गयी है।

    डा.अनुराग और रचनाजी ने बिल्कुल ठीक टिप्पणियां की हैं। तथ्यों पर जाने बगैर प्रतिक्रिया व्यक्त न करने की जल्दबाजी न करें। यह भी सही है - यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी की निजता का उल्लंघन न हो।

    सिद्धांतत: किसी का मेल उसकी अनुमति के बिना सार्वजनिक करना उचित नहीं है। यहां किया गया। लेकिन जिस उद्देश्य को लेकर यहां यह सब चर्चा की गयी वह उद्देश्य इस चर्चा से बाधित होता है।

    जब आप यह लिखते हैं कि डा.अमर कुमार ने हड़बड़ी में मेल फ़ारवर्ड की और कविताजी ने उसे चर्चा में प्रकाशित करके गड़बड़ी की तो आप यह भूल जाते हैं कि डा.अमर कुमार और कविताजी भी अपना पक्ष रखना चाहें शायद। और फ़िर वे फ़िर कुछ बातें इस मुद्दे पर लिखना चाहें जिससे और कुछ भले हो लेकिन जो निजता की रक्षा करने की बात आप करते हैं वह तो नहीं हॊ होगी।

    कोई लड़की अपनी सहेली के बारे में कुछ सहायता मांगती है। डा.अमर कुमार को सहायता कातर मेल करती है। डा.अमर कुमार को जो समझ में आता है वो करते हैं। कविता जी को मेल कर देते हैं। कविता जी को जो समझ में आता है वह वो करती हैं। उनको कुछ भी नहीं पता इस मामले में लिहाजा वे मेल जस का तस छाप देती हैं। बिना अपनी तरफ़ से कुछ लिखे।

    जब यह आशा की जाती है कि और इस बात को चर्चा में शामिल करने का अनुरोध किया जाता है कि इस बात को चिट्ठाचर्चा में स्थान दिया जाये तो एक चर्चाकार जो इस प्रकरण से अन्जान है उसे किस रूप में वहां लिखे?

    क्या वह यह लिखे कि विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि एक महिला ब्लागर के घर वालों को किसी ने फोन पर धमकी दी है कि वह लिखना बंद कर दे?

    या फ़िर और कोई तरीका हो तो बतायें!

    तमाम लोग लिखना बंद कर देते हैं। किसी न किसी कारण से। आप उसकी सूचना भी देना चाहते हैं सामूहिक मंच में इस प्रकरण को उठाना भी चाहते हैं लेकिन यह भी चाहते हैं कि आपके नाम का जिक्र न हो।

    पेश करने के तरीके अलग हो सकते हैं लेकिन निजता की बात यहां वहीं पर खतम हो जाती है जहां आप तमाम लोगों को मेल करते हैं, कुछ लोगों को फोन करते हैं। इस मुद्दे को सबको सूचना देने के लिये कहते हैं। ऐसा कैसे होगा कि आप सबको सूचित भी करना चाहते हैं लेकिन यह भी चाहते हैं कि किसी को पता भी न चले ।


    ऐसा करके आप तमाम सहज, परदुखकातर लोगों की भावनाओं से भी खिलवाड़ भी करते हैं। ऐसे लोग जो किसी को भी परेशान देखकर परेशान हो जाते हैं और तुरंत कोई भी सहायता करने के लिये तैयार हो जाते हैं। तमाम लोगों के पास ऐसा सूचना का नेटवर्क नहीं होता कि उनको अंदर-बाहर की बातें पता हों।

    जो समझाइश तमाम देने वाले लोग हैं कि सामूहिक ब्लाग पर व्यक्तिगत चर्चा नहीं होनी चाहिये वे तमाम व्यक्तिगत टिप्पणियां ब्लाग पर करते हैं। टिप्पणियों में किसी जिले में हुये मर्डर का जिक्र न करने पर ब्लाग लिखने वाले को कोसते हैं।

    टिप्पणी कुछ लम्बी हो गयी लेकिन एक पोस्ट लिखने से अच्छा मैंने इसे यहीं लिखना उचित समझा। यह एक पाठक की टिप्पणी थी।

    अब चिट्ठाचर्चा से जुड़े ब्लागर की टिप्पणी। कहीं न कहीं कविता जी को बुरा लगा होगा क्योंकि जहां तक मुझे पता है चिट्ठाचर्चा में मेल का जिक्र करने से पहले उन्होंने डा.अमर कुमार से इस बारे में पूछा था। उन्होंने अनुरोध करके इस मामले का जिक्र करने की बात कही। उनको कष्ट हुआ उसके लिये मैं अपनी तरफ़ से अफ़सोस प्रकट करता हूं। जैसा कि कुश ने लिखा ही है सकारात्मक भाव में भी भूल हो जाती है।

    लवली कुमारीजी कुछ कहकर उनकी या किसी और की निजता उल्लंघन नहीं करना चाहता। उनकी मेल मैंने हटा दी है। और जो बातें हटानी हों बता दें मैं उनको भी हटा दूंगा। चिट्ठाचर्चा के माडरेटर होने के नाते उनके ही अनुरोध पर जिक्र जिस मुद्दे का जिक्र किया उसमें उनकी मेल पोस्ट हो जाने से उनको जो कष्ट हुआ उसके लिये मैं अफ़सोस व्यक्त करता हूं।

    डा. अनुराग की शिकायत अब शायद दूर हो गयी हो कि लोग माइक्रो टिप्पणी दे रहे हैं।

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  17. अनुप जी का कमेंट पढ़ने के बाद अब कुछ कहने को बचता ही नहीं है.. हां मगर डा.अनुराग जी पर एक चुटकी लेना चाहूंगा.. सरजी आप भी तो माईक्रो वे में ही निकल लिये थे.. :D

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  18. अच्छी चर्चा के लिए कुश को बधाई !
    मेरे ख्याल से बात को बतंगड़ बनाया नही जाना चाहिए, अमर जी और कविता जी की सदाशयता और निश्छल सहयोग भावना का आदर होना चाहिए न कि उनके सत्प्रयत्नों पर प्रश्नचिन्ह लगाया जाए ! सवाल अपनी अपनी भावना का है जिससे अनजाने में गलतफहमियां पैदा हो रही हैं ! प्रयत्न यह थे ...
    -यह सच है कि रख्शंदा के परिवार को धमकी दी गयी है, और प्रतिक्रिया स्वरुप एवं भय वश वह परिवार, अपने आपको अकेला महसूस न करे अतः चिटठा जगत उनका साथ दे !
    - हम उस परिवार को साथ देने के प्रति आश्वस्त करें !
    -रही बात रख्शंदा के लिखने और ना लिखने की, वह उस परिवार का व्यक्तिगत फ़ैसला है और हम उसका सम्मान करते हैं !

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  19. अनुप जी की सफाई के बाद प्रकरण समाप्त हो ले। वैसे इस मुद्दे को जबर्दस्ती इतना लम्बा खींचा गया है। निजता की बात करने वाले अपनी करनी कैसे भूल जाते हैं? एक तथ्य को बिना छेड़छाड़ किए प्रकाशित कर देने में कोई बुराई मुझे नहीं दिखती। प्रकाशित करने वाले ने उसे कहीं से चोरी करके तो उड़ाया नहीं था। मेल करने वाले ने कोई मनाही भी नहीं की थी।

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  20. इस पूरे प्रकरण पर आपके विचार पढ़ना सुखद रहा.. आपका कथन अक्षरश सही है.. मैने भी यही बात लिखी थी की अमर कुमार जी एवं कविता जी दोनो के कार्य के पीछे सकारात्मक भावना थी.. उन्होने जो किया उसका मैं सम्मान करता हू.. यदि मैं उनकी जगह होता तो यही करता.. परंतु जैसा मैने कहा की मेल को उसी रूप में प्रकाशित नही किया जाना चाहिए था.. किसी और रूप में मुद्दे को उठाया जाना था..

    हालाँकि मैं उम्र और अनुभव दोनो में ही आप सभी से बहुत छोटा हू तो शायद बात को समझ नही पा रहा हू.. यदि मेरी वजह से आप में से किसी को भी कोई ठेस पहुँची हो तो मैं क्षमा चाहता हू...

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  21. व्यक्तित्व विकास के यही गुण हैं, जो आपने प्रकट किए! आप जवान हैं और लेखनी में बहुत शक्ति है, अपनी आत्मा की आवाज से कभी मत भटकियेगा ! कुछ लोग अपनी उम्र और सम्मान का दुरुपयोग करते हुए सामान्य को भी असामान्य बनने का प्रयत्न करते हैं इन सबके मध्य अपनी मित्रता बनाये रखते हुए आप अपने विवेक से ही कार्य करें फिर चाहे वह सही हो या लोगों की निगाह में ग़लत !
    मेरी आपको शुभकामनायें कुश !

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  22. "एक बार फिर वो हुआ जो मैं नही चाहती थी ..मेरे कहने का बिल्कुल यह मतलब न लगाया जाय की किसी ने रक्षन्दा के माता-पिता से कुछ बात करनी है या समझाना है ..उसने मुझसे सिर्फ़ इतना कहा था की "सबको बता देना मैं नही लिख पाऊँगी अब .." मैंने इसके लिए चिठ्ठाचर्चा को चुना (क्योंकि यह एक सार्वजानिक मंच है )..मेरा मेल सार्वजनिक करने से पहले न मुझसे पूछा गया न बताया गया..हाँ मुझे बुरा लगा..मैं इस ब्लॉग के मोडरेटर से यह अनुरोध करती हूँ की उस मेल को हटाया जाय."
    मेरी इस टिप्पणी पर अनूप जी ने मेल हटा दिया है ..मैं उन्हें धन्यवाद देती हूँ...और अगर मेरी किसी बात से किसी को बुरा लगा हो तो मैं छमा प्राथी हूँ .
    Lovely

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  23. बहुत सुन्दर कुश भाई चर्चा भी और चौक भी

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