शनिवार, नवंबर 29, 2008

आतंक से जंग गोलकीपिंग करने जैसी है

कल रात एक एस.एम.एस. मिला। उसका हिंदी अनुवाद है:
एक आतंकवादी को माफ़ करना भगवान का काम है। लेकिन भगवान से उसकी मुलाकात करवाना हमारी जिम्मेदारी है।
कल ही एक अखबार में मुंबई धमाकों के बारे में एक लेख के में किन्हीं पाल विल्किंसन का वक्तव्य दिया था:
आतंक से जंग गोलकीपिंग करने जैसी है, जिसमें लोग आपके सैकड़ों बचाव को नहीं , एक चूक को याद रखते हैं।
कल समाचार चैनल आतंकवादियों से मुठभेड़ का लाइव कवरेज दिखाते रहे। बीच-बीच में बताते भी रहे कि हमें ज्यादा कुछ दिखाने के लिये मना किया गया। वे यह बताते भी रहे, सब कुछ दिखाते भी रहे। मीडिया तो जैसा है तैसा है ही। एन.एस.जी. के लोग भी मीडिया के झांसे में आकर, प्रचार कामना में बहकर एलियन की तरह मुंह ढंककर अपने किये का विस्तार से वर्णन करते रहे।

आश्चर्य हुआ जब एन.डी.टी.वी. के पचौरीजी एक दर्शक से पूछा- आपको इस मौके पर किया गया हमारा कवरेज कैसा लगा? यह सवाल पूछना शायद वे भूल गये कि अगली बार जब इस तरह का कवरेज करें तो आप क्या सुधार और देखना चाहेंगे।

इस तरह के लाइव कवरेज जनता को जानकारी कम देते हैं! आतंकवादियों के मंसूबों को ज्यादा पूरा करते हैं। राजीव जैन इस बात को - अपनी पोस्ट में कहते हैं!

आलोक नन्दन का भी मानना है कि राष्ट्रीय मीडिया को वार जोन की तमीज नहीं

शायद इसीलिये स्वामी ने लिखा:
अगर जागना है तो सबसे पहले अपनी नशीली टीवी बंद कर दो. उसी की मदद से आपकी सोच और जीवनशैली पर काबू पाया जा रहा है. एक जापानी नें कहा था दुनिया सुधारना आसान है. बस हम अपने आसपास के परिवेश को ठीक-ठाक करने की कोशिश कर लें, बाकी सब अपने आप सुधर जाएगा.
इस दौरान हिंदी ब्लागजगत में स्वाभाविक तौर पर मुंबई धमाकों से संबंधित पोस्टें लिखी रहीं। सभी के मन में आक्रोश, क्षोभ, गुस्सा, कुछ न कर पाने की बेबसी और देश की इज्जत पर आंच आने पर जैसे भाव मन में उठने चाहिये वैसे रूप में अपने को व्यक्त किया है। टिप्पणियों में भी यही पैटर्न रहा। कुछ लोगों ने लगभग हर पोस्ट पर आतंकवाद से संबंधित टिप्पणी ही लिखी। ब्लाग पर भी लाइव कवरेज हुआ! आतंकवाद की निंदा करने वाला एक ब्लाग भी बना!

ज्ञानदत्त जी इस मौके पर इंदिरा गांधी जी की कमी महसूस करते हैं। इंदिराजी फ़ौलादी इरादों वाली महिला थीं। अटलजी ने उन्हें १९७१ के युद्ध के बाद आधुनिक दुर्गा कहा था! लेकिन कुछ लोग यह भी कहते हैं इंदिराजी ने ही लोकतांत्रिक संस्थाओं के खात्मे की शुरुआत की थी। सेवाओं में राजनैतिक हस्तक्षेप बढ़ा! जनाधार वाले नेताओं के स्थान पर मुंहदेखी कहने वाले लोगों को ऊपर उठाया। उनकी इसी प्रवृत्ति के चलते उनके चारो तरफ़ दरबारी लोग बढ़ते गये जो उनके मिजाज के हिसाब से या अपने फ़ायदे के लिये उनको सलाहें देते रहे। समस्यायें पनपीं और फ़िर जब अति हो गयी तब इंदिराजी दुर्गा हो गयीं और दुष्टों का संहार कर दिया।

प्रशान्त प्रियदर्शी अर्जुन और भीम का आवाहन करते हैं।
रे रोक युधिष्ठिर को ना यहां,
जाने दे उसको स्वर्ग धीर..
लौटा दे हमें गांडीव-गदा,
लौटा दे अर्जुन-भीम वीर..
जब युधिष्ठिर के स्वर्ग जाने की बात हो रही होगी तब तक अर्जुन अपनी पारी खेल चुके थे। वे बेचारे गोपियों की रक्षा में भी असमर्थ हो लिये थे:
पुरुष बली नहिं होत है, समय होत बलवान,
भीलन लूटी गोपिका, वहि अर्जुन, वहि बान!
मेरी समझ में हमारे यहां अर्जुन, भीम की कमी नहीं है। ढेरों हैं। उनको समझाइस देकर सही काम में लगाने के लिये ऐसे नायक चाहिये जो वो भूमिकायें निभा सके जैसी कॄष्णजी ने महाभारत के समय में निभाई!

मुठभेड़ के समय तमाम लोग शिवसैनिकों और राज ठाकरे को खोज रहे थे।

समीरलाल अपना दुख प्रकट करते हुये कहते हैं:
हम (हिन्दु हैं,हम) हिन्दुस्तानी कायर हैं
हल्ला करने को शायर हैं..
तुम खेल सियासी चालों का
हम इक टुकड़ा हैं खालों का...
प्रमोदजी आगे क्या होगा इसकी झलक दिखलाते हुये लिखते हैं:
फुदकन प्रसाद फुदकते फिर सबको ख़बर करते घूमेंगे ढहा दिया उड़ा लिया गिरा दिया. इस रौरव जुगूप्‍सा की वज़ह जाने क्‍या होगी, खुद के चूतड़ के चिथड़े नहीं उड़े का आह्लाद होगा? सवारियां फिर इस गली से निकल उस सड़क पर जायेंगी, स्‍कूल का भारी झोला लिये एक बच्‍चा अपने घर आयेगा, समय और समाज के जंगल में खुशहाली सबसे आंख चुराती-सी होगी. फिर भी जो बचा रह जाता होगा उसके बच लेने में सरकार की कोई भूमिका न होती होगी.
युसुफ़ किरमानी सवाल पूछते हैं- पाकिस्तान पर हमले से कौन रोकता है ?

नीरज रोहिल्ला कहते हैं-
विस्फ़ोट की जिम्मेवारी लेने सरीखा काम भी केवल सनसनी फ़ैलाने वाला है । जब ब्रेकिंग न्यूज से सनसनी फ़ैल ही रही है तो अपना नाम भी क्यों बतायें । आज डेक्कन मुजाहिदीन तो कल शाहजहाँपुर मुजाहिदीन तो परसों औरैया मुजाहिदीन । कर लो जो करना है, हम नहीं बतायेंगे कि हमने किया है । आतंक सबसे भयावह होता है जब वो आपकी आंखो में हो, आप दिल में हो कि कोई भी जगह सुरक्षित नहीं है । क्या करेंगे ऐसे में आप ?
तमाम तरह के कानून और एजेन्सी बनाने के मसले पर उनका विचार है:
केवल एजेन्सियाँ बना देने से काम नहीं होगा । जो हवलदार ५०० रूपये लेकर ट्रक को बिना चैक कर जाने दे रहा है कि कागज पर सेब लिखा है लेकिन असल में टैक्स बचाने के लिये मसाले भरे हैं, उससे आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि अगली बार वो गोलियों से भरा ट्रक रोक लेगा । २०० रूपये लेकर ड्राइविंग लाईसेंस और राशन कार्ड बनाने वाला अनजाने में एक आतंकवादी को भारत का नागरिक नहीं बना देगा इसकी क्या गारण्टी है ? जब तक जनता ईमानदार नहीं होगी अगर फ़रिश्ते भी हमारी सेवा में लग जायें तो सुरक्षा की कोई गारण्टी नहीं दे सकता।
अब सवाल यह भी तो होगा कि जनता कैसे ईमानदार बने?

अनिल पुसदकर एक वाजिब सवाल उठाते हैं- क्‍या बिना लात खाए हम देश भक्त नहीं हो सकते! शिवकुमार मिश्र भी लगे हाथ सवाल पूछ लेते हैं- प्रभो, 'कंघीबाजी' से आगे भी कुछ सोचेंगे कि नहीं?

कुश की पीड़ा है-जबाब जो मिलते नहीं

कंचन लिखतीं है- हर तरफ ज़ुल्म है, बेबसी है, सहमा सहमा सा हर आदमी है

एस.टी.एफ़. के चीफ़ हेमंत करकरे की शहादत पर अपनी समझ के हिसाब से फ़ब्तियां कसने वाले भी यहां मौजूद थे। हेमंत करकरे की याद करते हुये गौरव सोलंकी की कविता बेचैन करने वाली है। ब्लाग जगत की सहज नेटवर्किंग की प्रवृत्ति के चलते शायद यह कम पढ़ी गयी| गौरव लिखते हैं:
हेमंत करकरे नाम का एक आदमी
मर गया था
और नहीं जीने देता था हमें।
ऐसे ही कई और साधारण नामों वाले आदमी
मर गए थे
जो नहीं थे सचिन तेंदुलकर, आमिर ख़ान
या अभिनव बिन्द्रा,
नहीं लिखी जा सकती थी उनकी जीवनियाँ
बहुत सारे व्यावसायिक कारणों से।
वे आगे लिखते हैं
कमज़ोर याददाश्त और महेन्द्र सिंह धोनी के इस समय में
यह हर सुबह गला फाड़कर उठती हुई हूक,
हेमंत करकरे, अशोक काम्टे, विजय सालस्कर
और बहुत सारे साधारण लोगों को बचाकर रख लेने की
एक नितांत स्वार्थी कोशिश है,
इसे कविता न कहा जाए।


खेतीबारी से जुड़े अशोक पाण्डेय जानकारी देते हैं- चीनी लहसुन से देश को खतरा, सुप्रीम कोर्ट ने दिया जलाने का आदेश

इस बीच युनुस अपने मन की तरंग दिखाते हुये एक लोकल स्टेशन का बुक स्टाल दिखाते हैं:
तो चलिए बुक-स्‍टॉल के 'मायाजाल' से होकर गुज़रें ।

शिखंडी, डेढ़ पसली का रावण, मेरी बीवी झांसी की रानी, कब मरेगा रावण, 24 कैरेट ऑपरेशन । केशव पंडित, ओमप्रकाश शर्मा और अन्‍य भारतीय बेस्‍ट-सेलर्स । चालीस रूपये की भारी-भरकम लुगदी।

एक लाइना

  1. कौन से दड़बे में घुसे हो नेताजी? : बूझो तो जाने!
  2. पुजारी बनाम मसीहा मुकाबला जोरो पर
  3. क्‍या बिना लात खाए हम देश भक्त नहीं हो सकते: कैसे हो सकते हैं जी, आदत से गद्दारी कैसे करें?
  4. प्रभो, 'कंघीबाजी' से आगे भी कुछ सोचेंगे कि नहीं? : कत्तई नहीं! तेल से सूट खराब हो जायेंगे!
  5. कहां हो शिवसैनिकों, मुंबई तुमको ढूंढ रही है : शिव सैनिक मौके के इंतजार में हैं
  6. आत्मसमर्पण गीत - हम हैं भेड़ बकरियों जैसे : कोई आये, चराये- जैसे मन चाहे वैसे!
  7. हम लुट चुके हैं दोस्तो! हमारे अपनों ने ही हमें लूटा है...: दुखवा मैं कासे कहूं सजनी
  8. आतंकवाद के विरुद्ध प्रहार : करने के लिये कविता का हथियार
  9. देश के लिये दौड़:चल भाग
  10. जागो देशवासियों: टीवी पर नया कार्यक्रम आ रहा है!
  11. रोया बहुत हूं मैं... : आंखे कुलबुला रहीं थीं, अब आराम है न!
  12. मुंबई हमले पर नया ब्लॉग : बाकी शहरों के लिये भी बना लिया जाये, काम आयेगा
  13. बच्चों को बताना ही पड़ेगा...: सो तो है!
  14. पोटा या नया कानून? से पहले जरुरी है सोंटा कानून
  15. नाकारा रहनुमाओं ने देश को किया शर्मसार : उनका यही काम है! उन्होंने किया!
  16. भारत को रूस की तरह तोड़ना चाहते हैं आतंकी: लेकिन हम फ़ेवीकोल के मजबूत जोड़ हैं!
  17. उफ़! किया क्या जाए?: ब्लाग लिखा जाये
  18. "दोषी कौन":जांच के बाद पता चलेगा

मेरी पसंद

तीस सेन्टीमीटर था बम का व्यास
और इसका प्रभाव पड़ता था सात मीटर तक
चार लोग मारे गए, ग्यारह घायल हुए
इनके चारों तरफ़ एक और बड़ा घेरा है - दर्द और समय का
दो हस्पताल और एक कब्रिस्तान तबाह हुए
लेकिन वह जवान औरत जिसे दफ़नाया गया शहर में
वह रहनेवाली थी सौ किलोमीटर से आगे कहीं की
वह बना देती है घेरे को और बड़ा
और वह अकेला शख़्स जो समुन्दर पार किसी
देश के सुदूर किनारों पर
उसकी मृत्यु का शोक कर रहा था -
समूचे संसार को ले लेता है इस घेरे में

और अनाथ बच्चों के उस रुदन का तो मैं
ज़िक्र तक नहीं करूंगा
जो पहुंचता है ऊपर ईश्वर के सिंहासन तक
और उससे भी आगे
और जो एक घेरा बनाता है बिना अन्त
और बिना ईश्वर का.

येहूदा आमीखाई की कविता कबाड़खाना से साभार

और अंत में

सुबह छह बजे से शुरू करके अभी साढे आठ बजे तक इत्ते ब्लाग देख पाये सो इत्ती चर्चा कर दिये। बाकी आप देख लीजियेगा। आप सभी को शुभकामनायें।

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11 टिप्‍पणियां:

  1. और अनाथ बच्चों के उस रुदन का तो मैं
    ज़िक्र तक नहीं करूंगा
    जो पहुंचता है ऊपर ईश्वर के सिंहासन तक
    और उससे भी आगे
    और जो एक घेरा बनाता है बिना अन्त
    और बिना ईश्वर का.

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  2. गागर मे सागर भर दिया आपने.

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  3. आपको मिले एस एम एस से वो चुटकुला याद आया जिसमें शराबी कहता है मैं भगवान का छोटा भाई हूं और सबूत के लिए मच्छर मार देता है। जब उससे कहा जाता है कि तू भगवान का छोटा भाई है तो इसे जिला तो वह कहता है - ये तो बडे भाई का काम है॥ हमारे छोटे भाई [सरकार] तो सत्ता के नशे में चूर है और वे उस शराबी से बद्तर हैं जिसने मच्छर मारा था।

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  4. मैं 'मेरी पसंद' को दिन की चर्चा के संदेश के रूप में देखता हूँ।
    आज का संदेश गहरा, बहुत गहरा है।

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  5. संजीदा और शानदार चर्चा। समूचा ब्‍लॉगजगत जब मुंबई धमाकों के असर से उबर नहीं पा रहा हो, तो चर्चा मंच पर उसका असर स्‍वा‍भाविक ही है। हालांकि अच्‍छा होता कि ब्‍लॉगजगत इसे रस्‍मअदायगी भर नहीं होने देकर, एक सबक के रूप में याद रखता।

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  6. आज क्या कहूँ ? सिर्फ़ श्रद्धांजलि शहीदों को !

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  7. आतंक से जंग गोलकीपिंग करने जैसी है - और गोलकीपर के पास कोई पैड नहीं हैं। इसके अलावा अपोजिट टीम ही नहीं, अपनी टीम वाले कुछ लोग भी गोल ठोक जाते हैं।

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  8. "कभी मिले खुदा, तो पूछना यारो
    तेरी इस दुनिया में ईन्सान की कीमत क्या है
    मर कर तो सभी कहते हैं कि शहीद हुआ
    कभी सोचा है, कि इस जान की कीमत क्या है ?"

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  9. टीम के चयनकर्ताओं से चूक हुई है .

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  10. आपकी पसंद नायाब लगी, मुझको भी पसंद आयी ! धन्यवाद !

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  11. आप की पसंद की कविता बहुत पंसद आयी, आप की आज की चिठ्ठाचर्चा मन की उदासी को, नेताओं और नौकरशाही की खुदगर्जी के प्रति आक्रोश को वाणी प्रदान करती है।
    ये नहीं कह सकती मजा आया। मजे जैसे कोई बात नहीं, अकारण मरे लोगों के परिजनों के चेहरे आखों के सामने से नहीं हटते, लेकिन आप की वन लाइना बहुत सटीक हैं, बहुत बढ़िया।

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