शनिवार, फ़रवरी 07, 2009

छुपा लो यूँ बैंगलोर में प्यार मेरा कि जैसे पब में बोतल बियर की

आज के दौर में दो अतिवादी संस्कृतियाँ अपने पैर पसार रही हैं, पहली वो जिसका प्रतिनिध्त्व राम सेने कर रही है और दूसरी वो जो आजादी का मतलब ड्रग्स सेवन से लगाते हैं। लेकिन फिलहाल देश हर साल की तरह दिवाना हुआ जा रहा है वैलेंटाईन दिवस के पीछे। Valentine day is a big fuss in India, कह नही सकता कितने लोग समझते होंगे ये दिन प्यार करने के लिये नही बल्कि प्यार की भावना को जिंदा रखने का दिन है। लेकिन इस दिन की मार्केटिंग इंडिया में इलु-इलु टाईप प्यार की की गई है। दरअसल ये वैसा ही है जैसा हमारा बंसतोत्सव जो उतने उत्साह से नही मनाया जाता। खैर आने वाली १४ तारीख को दुनिया को कामसूत्र का ज्ञान देने वाले, खजुराहो की मूर्तियों में प्यार परिभाषित करने वाले देश के युवा वैलेंटाईन दिवस मनाने की तैयारी कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ स्वयंभू संस्कृति के रक्षक बने कुछ लोग सारे नियम कानून तोड़ने की कवायद में जूटे होंगे। लेकिन अगर कोई रिसर्च करे तो ये जानना इंटरेस्टिंग रहेगा इनमें से कितने मँजनू बने अंत तक लैला के साथ डटे रहते हैं और कितने चाँद मोहम्मद की राह में चल पड़ते हैं।

जैसे योग हमने ईजाद किया लेकिन सीखा किसी और से वैसे ही भोग भी हमने ही ईजाद किया लेकिन सिखना पढ़ रहा है किसी और से, इस से पहले कोई गलत अर्थ में ले ले, मैं क्लियर कर दूँ मेरा मतलब चाकलेट के भोग ;) से है - अभी से चढ़ने लगा वेलेण्टाइन-डे का खुमार

वो आपने गीत सुना है ना पीठ ऊँची ऊँट की ऊँचाई से नही होती, होती ही है होती ही है पीठ ऊँची ऊँट की। बस इस बार इसी पीठ के पीछे पड़े हैं अरविन्द मिश्रा जी। अब चूँकि वो राजस्थान में नही है इसलिये पुरूष पीठ ढूँढ लाये हैं। वो पूछते हैं, रोयेंदार पुरूष पीठ -आकर्षक या अनाकर्षक? जो देख कर आये हैं उसे देख के तो यही कहेंगे ना आकर्षक ना अनाकर्षक बल्कि खौफनाक।

लगता है शुक्रवार का दिन मानव अंगों के बारे में बतियाने का ही दिन था, वहाँ पीठ तो निठल्ले के यहाँ नाक के ऊपर सवाल उठाये जा रहे थे - “सुर्पनखा बन नाक कटाये”, क्या इसे कहावत बना सकते हैं?

पुलिस वालों का फ्रस्टेसन दिनों दिन बढ़ता जा रहा है क्योंकि नेताओं पर हाथ डाल नही सकते, कॉलेज के छोरों के आगे इनकी चलती नही, पीकर गाड़ी चला सरेआम फुटपाथियों को कुचलने वाले रईसजादों पर भी इनका बस नही चलता, धर्म की ठेकेदारी के लिये बनी टुकड‌ियों पर भी जब इनका जोर नही चला तो इनका डंडा चल पढ़ा १० साल की एक छोटी बच्ची पर

हाथ मिला और गाल पर दे एक प्यारा सा चुम्मा तभी ये कहलायेगी नमस्ते, इस तरह से अभिवादन करने के लिये जाना पड़ेगा गोवा। और अगर ट्रेनिंग की जरूरत हो तो मेटेरियल यहाँ पड़ा है

हमारा बस चले तो हम पोस्टर बनाने वालो से ये गुजारिश भर कर दें कि पोस्टर के सबसे ऊपर छोटे-छोटे अक्षरों में इतना और लिख दें - रास्ते, और जगहों के पते इस पोस्टर के पीछे छुपे हैं, इधर-उधर देख अपना समय बरबाद ना कर किसी से पूछ मंजिल तक शीघ्र पहुँचे। और अगर आप सोच रहे हैं कि हमें अचानक इंडिया से उतने दूर बैठे बैठे ये क्या सूझी तो बता दें, ये ख्याल हमें कांग्रेस की आय देख कर आया है -

कुछ गीत:


कविता-गजल
परमजीत बाली अपनी अपनी उड़ान कुछ यूँ समझा रहे हैं -
जिस दिन से
हम सभी आऐ हैं
उसी दिन से
धीरे धीरे मर रहे हैं
हर पल।
एक दिन
पूरे मर जाऐगें।
फिर भी सपने सजाऐगें।
राजीव थपेड़ा को शिकायत है कि कोई उनकी तस्वीर सीने से लगाता क्यूँ है -
वक्त मरहम है,दिल को तसल्ली देता है,गर
तो फ़िर वो हमें खंजर चुभाता क्यूँ है ?
दिल को मेरे भी जरा तपिश तो ले लेने दे
साए से मेरे धुप चुरा कर ले जाता क्यूँ है ?
रतन सिंह शेखावटी आरकुट में मिला स्क्रैप पढ़वा रहे थे -
आज एक बार मन्दिर हो आओ
पुजा कर के प्रसाद भी चढाओ
क्या पता कल के कलयुग मे
भगवान पर लोगों की श्रद्धा हो ना हो
इसे पढ़कर मुझे जाने क्यों सीधे राम सेने की याद आ गयी और... -

आज एक बार पब हो आओ
बियर के साथ व्हिस्की भी चढ़ाओ
क्या पता १४ तारीख की तोड़फोड़ में
बैंगलोर में पब हो ना हो


मुक्ति औरत होने के सुख बड़ी खुबसूरती से कुछ यूँ बयाँ करती हैं -
भीगी आँखों के /धुंधले परदे के पीछे से /मैंने देखा था /उसकी भी आँखें /गीली थीं /पर वो ठहरा मर्द /रोता कैसे ?/ तो पी गया वो /अपने सारे आँसू/पर मैं रोई /रो -रोकर /अपने ख़त्म होते रिश्ते के /दर्द को मैंने /आँसुओं में बहा दिया /और ...पहली बार /अपने औरत होने का सुख /महसूस किया /रोना ,फूट-फूटकर रोना /यही तो औरतें / आज़ादी से कर पाती हैं /और शायद / इसी कारण /बड़ा से बड़ा दर्द / सह जाती हैं।
सस्ते शेर में इस बार थोड़ा सा महँगा शेर पढ़ने को मिला, बानगी यहाँ देखिये पूरा वहाँ जाकर पढ़िये -
हमने ये माना पैदा हो गया, खायेगा क्या,
घर में दाने ही नहीं पायेगा तो भुनवायेगा क्या,
इस निखट्टू बाप से माँगेगा तो पायेगा क्या,
देख कहा मान ले, जाँ-ए-जबर पैदा न हो,
ऐ मेरे बच्चे मेरे लख्ते-जिगर पैदा न हो
शफक के फुरसत के रात दिन में एक बहुत ही खुबसूरत गजल पढ़ने को मिली, जितने हिट इसे मिले हैं, ये उससे ज्यादा की हकदार थी।

मुझे रास्ते ही अज़ीज़ हैं मुझे मंज़िलों की खबर नहीं
मेरा कारवां मेरा दोस्त है मुझे बस्तियों की फिकर नहीं
कभी मैने तुझसे गिला किया कभी तूने मुझको भुला दिया
हम यार हैं के रक़ीब हैं या तेरी दुआ में असर नहीं
लो ये मौज और ये कश्तीयाँ मुझे मेरे हाल पे छोड़ दो
यूँही डूबना मेरा शौक़ है मेरी साहिलों पे नज़र नहीं
उस एक पल की तलाश में जिसे लोग कहते हैं ज़िंदगी
मैं कहाँ कहाँ से गुज़र गया मुझे ज़िंदगी की कदर नहीं
जो ख्वाब देखे थे साथ में उन्हे पूरा करने का वक़्त दे
तेरी ता कयामत चाह है मुझे इक उमर से सबर नहीं||
डा रूपचंद्र शहीदों को नमन करते हुए लिखते हैं -
धन्य माता हुई, धन्य है यह धरा,
हो गया वो अमर, जो वतन पर मरा,
हैं समर्पित तुम्हें, वाटिका के सुमन।
ऐ शहीदो तुम्हें कोटि-कोटि नमन।।


हिंदी ब्लोगस का भी वही हाल है जो आजकल मंदी का, कुछ ब्लोग पर हिट्स इंडिया और चीन की ईकोनॉमी की तरह छाये हुए थे तो ज्यादातर में पश्चिमी देशों की ईकोनॉमी का असर साफ दिख रहा था जो किसी तगड़े बेलआउट पैकेज की राह तकते दिख रहे थे।

अब हमें दीजिये ईजाजत, आप सब हंसते रहें, मुस्कुराते रहें, हम हैं राही प्यार के, फिर मिलेंगे आपसे यूँ ही लिखते लिखते।

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20 टिप्‍पणियां:

  1. क्या बात है तरुण, कुछ जल्दी में मालूम पडते हो. कम से कम दस बीस एकलाईना देकर लोगों को प्रोत्साहित तो कर जाते!!

    निम्न पंक्तिया:

    "आज के दौर में दो अतिवादी संस्कृतियाँ अपने पैर पसार रही हैं, पहली वो जिसका प्रतिनिध्त्व राम सेने कर रही है और दूसरी वो जो आजादी का मतलब ड्रग्स सेवन से लगाते हैं।"

    अपने आप में एक क्लासिक है!!

    सस्नेह -- शास्त्री

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  2. इसे हाथ मत लगाना कि
    भाजपा के चरणों की धूल हूं मै--
    ये धूल माथे पे रख ली मैंने
    कि जैसे सेंटर का हो डैरेक्टिव...:)
    >शस्त्रीजी, तरुणजी ने पहले ही कह दिया है कि मंदी का बाज़ार है- तो जो मिला उसे ही अपड़ लो॥

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  3. शब्द-शास्त्री की पोस्ट ड्यू है - यह बताने को कि पब से पौव्वा आया या पव्वे से पब!

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  4. एकदम मस्त !
    वैसे हमें भी शामिल करने के लिए शुक्रिया ।

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  5. ये आपकी अब तक की सबसे बढ़िया चर्चा लगी मुझे..

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  6. जिस दिन से
    हम सभी आऐ हैं
    उसी दिन से
    धीरे धीरे मर रहे हैं
    हर पल।
    एक दिन
    पूरे मर जाऐगें।
    फिर भी सपने सजाऐगें।
    "मजेदार...शानदार....लाजवाब...."

    Regards

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  7. क्या तरुन जी! हमने तो सोचा था मधुमास आ गया. क्या पता आप सचमुच बियर की बोतल लेकर आ गए हैं.

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  8. धांसू चर्चा। लेकिन ये बताओ कि सच में बंगलोर जाना पड़ेगा प्यार करने के लिये? १४ की तो सीट भी न मिलेगी। वर्चुअली पहुंचे बंगलोर तो चलेगा?

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  9. ऊपर वाले सवाल का जबाब जल्दी देना भाई। सारा दारोमदार इसके जबाब पर है!

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  10. ऊपर वाले सवाल का जबाब जल्दी देना भाई। सारा दारोमदार इसके जबाब पर है!

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  11. वाह तरुण जी, वाह......... बढ़िया चर्चा..

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  12. बढ़िया चर्चा है तरुण जी पढ़कर आनंद आ गया . धन्यवाद.

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  13. @अनूप जी, श्रीराम सेने वालों की प्रोफाइल से लगता तो नहीं है की वो tech savvy होंगे...वर्चुअली से काम नहीं चलेगा. आप तत्काल में रिज़र्वेशन ले लीजिये, train टिकेट मिल जायेगी.
    चिटठा चर्चा अच्छी रही तरुण जी...शीर्षक कमाल का दिया है :) हमें शामिल करने का शुक्रिया.

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  14. tech sewy ना भी हो तो भी श्रीराम सेना को ज्यादा फर्क पड़ेगा क्या ... :) :)
    वैसे शीर्षक वाकई जानदार था

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  15. मेरी कविता में औरत होने का सुख ही उसका सबसे बड़ा दुःख बना कर व्यक्त किया गया है .दरअसल रोने का सुख पुरुषों को न मिलना एक विडम्बना है ,जिसकी जड़ें हमारी सामाजीकरण की प्रक्रिया में हैं .अपने इस कविता को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करके संवेदनशीलता का परिचय दिया है .आशा है अन्य पाठकों को भी इसका मर्म समझ में आएगा .

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