गुरुवार, फ़रवरी 26, 2009

सरदार हमने आपकी टिप्पणी खाई थी.

दो-तीन दिन से ब्लॉगर डरे हुए हैं. कारण यह है कि माहौल डरावना हो गया है. न्यायालय ने बताया है कि ब्लॉग पर न केवल आपत्तिजनक लेख से बल्कि टिप्पणियों की वजह से भी केस चल जायेगा. सज़ा हो सकती है.

सज़ा हो सकती है, ऐसा इसलिए कह रहा हूँ कि तमाम मुकदमों में सज़ा नहीं हो पाती. चोर-डाकू, आतंकवादी, नेता, अभिनेता, प्रणेता वगैरह-वगैरह सजा से बच निकलते हैं. कई बार तो मुकदमा चलता रहता है, तारीख बढ़ती रहती है लेकिन कोई फैसला नहीं आता. जो मुक़दमा दायर करता है वो भी और जिसके ऊपर मुकदमा चलता है, वो भी बोर होकर दुनियाँ से कूच कर जाता है. बच जाते हैं अदालत के रेकॉर्ड्स.

आप पूर्व (या फिर अभूतपूर्व) केन्द्रीय मंत्री माननीय सुखराम जी के केस को ही ले लें. तेरह साल पहले पूजाघर में रूपये की पूजा करते धर लिए गए थे. रुपया मिला था वो भी करेंसी. न किसी बैंक खाते की जांच करनी थी और न ही किसी कागजात की. लेकिन तेरह साल लग गए उन्हें सज़ा होने में.

इसके बावजूद माननीय सुखराम जी कह रहे हैं कि जज लोग जल्दबाजी में फैसला लेते हैं.

रांची में ब्लॉगर मीट हो गई. जो शामिल हुए वे तो खुश हैं लेकिन जो नहीं शामिल हो सके वे इस बात पर पछता रहे हैं. विष्णु बैरागी जी के आह्वान पर अभिषेक मिश्र जी ने एक सफल ब्लॉगर मीट के मूल तत्वों पर एक श्रृंखला आज ही शुरू की है. आज उन्होंने छ महत्वपूर्ण विन्दुओं पर प्रकाश डाला है.

अगले अंक में वे कार्यक्रम के स्वरुप पर चर्चा करेंगे.

आजाद भारत की तमाम सरकारों को आम आदमी के साथ धोखा-धड़ी की तो जैसे आदत पड़ गई है. बात इस कदर बढ़ गई है कि मौजूदा सरकार ने अपने अंतिम बजट में भी आम आदमी को निराश नहीं किया और धोखा-धड़ी जारी रखी.

अब आम आदमी को शायद इस बात का इंतजार है कि चुनाव के बाद अगली सरकार बने तो धोखा-धड़ी फिर से रिज्यूम हो. तबतक क्या कर सकते है? अगली सरकार के बनने का इंतजार.

२२ फरवरी को लालू जी ने पटना में भोलापन अचीव कर लिया और "रविदासों के समक्ष भले भोलेपन से यह सवाल किया हो कि आखिर उनसे क्या गलती हो गयी जो बिहार की सत्ता से उन्हें बेदखल कर दिया गया.."

लालू जी से भी गलती हो सकती है? यह बात विश्वास करने योग्य तो नहीं है लेकिन वे कहते हैं तो हम विश्वास कर लेते हैं. उनके ऊपर अविश्वास का कारण भी तो नहीं है. आखिर आज तक संसद में या विधानसभा में उनके ऊपर अविश्वास प्रस्ताव नहीं आया तो हम क्यों लायें?

कौशल जी ने आज बताया है कि लालू जी भ्रष्टाचार के चलते ही सीएम बने थे. ये नया खुलासा है. हम तो सोच रहे थे कि वे वोट लेकर सीएम बने हैं. खैर, यह चूंकि नया खुलासा है तो आप भी पढिये. हर नया खुलासा पढ़ने की चीज होती है.

अंशुमाली रस्तोगी जी ने गुड क्वेश्चन किया है कि "लोकतंत्र में आम आदमी कहाँ है?"

खो गया है आम आदमी या फिर खोया-खोया है. लोकतंत्र को चलने वाले इतने लोग हैं. नेता हैं, जनता है, मीडिया है, न्याय-प्रणाली है. सबका अपना-अपना आम आदमी है. नेता का आम आदमी बूथ और चुनावी सभाओं में मिलता है तो मीडिया का आम आदमी टीवी के सामने बैठा टीवी देखता है या फिर हाथ में अखबार लिए अखबार पढता है. नाय-प्रणाली चलाने वालों का आम आदमी अदालत में हलकान हुए न्याय खोज रहा है.

अब तो यह हमें तय करने की ज़रुरत है कि हम किसके आम आदमी हैं?

रांची ब्लॉगर मीट के बारे में बहुत कुछ लिखा गया. कुछ लोगों ने व्यंगात्मक लिखा तो कुछ ने सकारात्मक. व्यंगात्मक और सकारात्मक के बाद बचता है तो सिर्फ नकारात्मक. वो भी लिखा ही जा चुका है. लेकिन मनीष जी खुद को इन सब के बीच पाते हैं.

यही कारण है कि उन्होंने रचनात्मक लिख डाला है. साथ में फोटो भी हैं.

विस्फोट एक साल का हो गया. दाना, पानी और विस्फोट लिखते हुए संजय तिवारी जी ने लिखा; "लोगों को लगता है कि संजय तिवारी नाम के किसी आदमी ने विस्फोट को जैसी शक्ल दी है वह बहुत समझदार आदमी होगा. ऐसा नहीं है. मेरी समझ तो औसत भी नहीं है.."

हम बिलकुल यह मानने के लिए तैयार नहीं हैं. आप हैं क्या? नहीं न. तो पढ़ डालिए संजय जी का आज का लेख.

रोजगार होगा चुनावी मुद्दा, राम नहीं.

भोपाल में बीजेपी की सभा में यही एलान हुआ है. मजे की बात यह है कि बीजेपी की चुनावी सभा हुई है लाल परेड ग्राउंड में. बड़ी गजब जगह सभा कराया है भाई लोगों ने. मध्य प्रदेश के लोग कन्फ्यूजिया नहीं जायेंगे? लाल परेड ग्राउंड में केसरिया पार्टी की सभा?

और फिर राम जी ने इसबार मुद्दा होने से मना कर दिया है क्या?सर-ए-आम अगर ऐसा बोल रहे हैं तो शायद यही बात होगी.

भारतीय विश्वविद्यालयों में एंट्रेंस परीक्षा बहुत ही कठिन होती है. ऊ भी छात्र ही छात्र की परीक्षा ले लेता है. भगीरथ जी ने आज एंट्रेंस टेस्ट के बारे में लिखा है. वे बताते हैं कि एंट्रेंस टेस्ट के प्रैक्टिकल में क्या-क्या करवाया जाता है. पैंट की चेन खोलने से लेकर मुर्गा बनाकर अंडा दिलवाने तक. बड़ा हार्ड टेस्ट होता है. सब नहीं पास कर पाते.

विश्वास नहीं हो रहा? खुद ही पढ़ लीजिये.

पाठ्य-पुस्तकें शिक्षक के अशक्तीकरण का एक प्रतीक है. वैसे तो कई प्रतीक होते हैं. लेकिन मास्टर साहब ने आज केवल पाठ्य-पुस्तकों की बात की है. उनका कहना है कि हर वर्ष सरकारी पाठ्य-पुस्तकों की बाज़ार में कमी का माहौल तैयार किया जाता है.

अब भी जब सरकारी चीज है तो माहौल बनते-बिगड़ते कितना टाइम लगता है? जैसे पेट्रोल, मिट्टी का तेल, गैस का सिलिंडर, वैसे ही पाठ्य-पुस्तक. सब की कमी हो जाती है. ऐसे में पाठ्य-पुस्तकों को बख्स दिया जायेगा तो वो नाराज़ नहीं होगी? पुस्तक को लगेगा कि उसके साथ नाइंसाफी हो रही है.

आप मास्टर साहब की पोस्ट पढिये और उसपर अपने विचार व्यक्त करिए. माने टिप्पणी दीजिये.

पाश्चात्य देशों के लोगों ने हमें कुत्ता तक कहा. यह बात आज शास्त्री जी ने बताई. आज तो क्या अपनी पिछली पोस्ट में बताई है. बताते हुए उन्होंने हर देशभक्त को दुखी होने आह्वान भी किया था. आज उसी पोस्ट पर आई टिप्पणियों पर विमर्श है.

उन्होंने बताया था "किस तरह यूरोप के साम्राज्यवादी अपने कुत्तों को “टीपू” कहते थे क्योंकि टीपू सुल्तान ने उनके छक्के छुडा दिये थे.."

आप शास्त्री जी द्वारा किया गया विमर्श पढिये.

आलोक पुराणिक जी व्हाइट हाउस के सामने जा रहे थे तो अन्दर से ओबामा जी ने आवाज़ लगाईं; "का हो, गऊना हो जाई हमार फिल्मे देखे कि नाही। बहुत बोंबास्टिक भोजपुरी फिलिम है।"

हम अंग्रेजी बोल रहे हैं, पहन रहे हैं, ओढ़ रहे हैं. खा भी अंग्रेजी में ही रहे हैं. कहीं ऐसा त नहीं न कि एही एहसान उतारने का वास्ते ओबामा जी आजकल भोजपुरी और हरियाणवी सीख रहे हैं.

पता नाहीं अईसा काहे कर रहा है ई मनई? अमेरिका में अपना कुर्सी का चिंता त नाहीं सता रहा है सरकार के? शायद सोच रहे हों कि चार बाद री-इलेक्शन नहीं हुआ त भारत ही में आकर इलेक्शन लड़ लेंगे.

पुराणिक जी का बाकी बात ओनके पोस्ट पर ही पढ़ लीजिये. हमसे काहे कॉपी पेस्ट मरवाएंगे? वैसे भी आजकल बसंत का मौसम में पेस्ट लोग बहुत इधर-उधर उड़ रहा है. केतना को मारेंगे?

लवली ने ब्लॉगर मीट के बाद पोस्ट क्या लिखी कुछ लोगों को भुनगई सताने लगी है. आज तो ज्ञान जी भी स्तरीय लेखन के चक्कर में पड़े हुए हैं.

भुनगा-गति को प्राप्त न हों, इसके लिए प्रार्थना भी लिख डाली हैं. वो भी 'अस्तरीय' प्रार्थना. और तो और पोस्ट न ठेलने तक पर राजी हो गए हैं. शर्त खाली एक ही है. "प्रभु जी मोहें भुनगा न करो. इस अस्तरीय प्रार्थना में सतीश पंचम जी स्तरीय री-ज्वाईन्डर दे मारा है. पढ़कर देखिये.

हिन्दुस्तान में बीहड़ आ गया है. लाने वाले हैं रवीश कुमार जी. योगेश जी बता रहे हैं कि एक साल से जिस रंग को पाने के लिए वे मेहनत कर रहे थे, वो मिल गया है. उन्ही के शब्दों में "आखिर बीहड़ का रंग लोगों पर चढ़ना शुरू हो गया है."

चलिए कम से कम सोमेश जी तो भुनगा ब्लॉगर होने से बच गए.

मैंने कहा था न कि डरने-डराने का समय है. आज युसूफ किरमानी जी गब्बर सिंही अंदाज़ में पूछ रहे हैं; "तेरा क्या होगा रे ब्लॉगर?" कालिया वाले अंदाज़ में अभी तक किसी ने नहीं कहा कि; "सरदार, हमने आपकी टिप्पणी खाई थी."

आज बस इतना ही. चर्चा का फॉर्मेट इसलिए चेंज कर दिया कि आज समय की फिर से कमी हो गयी थी. वैसे भी आपलोग भी एक ही तरह के फॉर्मेट से बोरिया गए होंगे.

बाकी सब ठीक है. कोशिश करेंगे कि अगले वृहस्पतिवार फिर से चर्चा करें.

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21 टिप्‍पणियां:

  1. प्रणाम

    चिट्ठा - चर्चा पढ़के बहुत जानकारी मिली लेकिन सबसे जरुरी जानकारी आपने पहले ही दे दी की
    " सज़ा हो सकती है, ऐसा इसलिए कह रहा हूँ कि तमाम मुकदमों में सज़ा नहीं हो पाती"
    ब्रिटानिया ५०-50 की तरह थोडा मीठा थोडा नमकीन .

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  2. फ़ॊर्मेट बढ़िया है, चर्चा भी रुचिकर।

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  3. डरो कि लब सी दिए गए हैं तुम्हारे।

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  4. बहुत बहुत धाँसू और आनददाई चर्चा......

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  5. अच्छी जानकारी दी है आपने। आभार।

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  6. देखो भैया मुझे नहीं मालूम कि कौन-सा जज क्या फ़ैसला दे रहा है! आइ.टी. क़ानून 2000 के तहत आप किसी वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी लेख या सामग्री के तहत आप उसे कोई सज़ा नहीं सुना सकते यदि वह एक डिसक्लेमर में वह उसे अन्य स्थान से उठाया या पूर्णतया अपना क़रार करता हो और उसके दुरुपयोग या प्रभाव को सिर्फ़ पाठक पर छोड़ दे! इस विषय पर तो अंतर्राष्ट्रीय क़ानून भी सर झुका देता है!

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  7. "आज बस इतना ही. चर्चा का फॉर्मेट इसलिए चेंज कर दिया कि आज समय की फिर से कमी हो गयी थी. वैसे भी आपलोग भी एक ही तरह के फॉर्मेट से बोरिया गए होंगे."

    फार्मेट से जरूर बोरिया जाते हैं, लेकिन चर्चा की लम्बाई से नहीं. अत: आप अगली बार जम कर कीजिये मेराथन चर्चा.

    हां, एक गडबड हो गई है. आज आप ने ऐसी भयानक खबर सुनाई कि लगता है "सारथी" पर वैचारिक-क्रांति का आंदोलन छोड अब तो उसे बाल-बच्चों की कहानी, लोरी, आदि का चिट्ठा बना देना पडेगा. बच्चे कहां कोर्ट कचहरी जाते हैं, और इस बुढापे में कौन फंसना चाहता है.

    सस्नेह -- शास्त्री

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  8. फ़ार्मेट अच्छा है. चर्चा के लिये धन्यवाद.

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  9. बहुत ही अच्‍छी सायंकालीन चर्चा हो गयी ..

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  10. लगता है अब तो टीपणी भी ज्यादा सोच समझकर या वैधानिक चेतावनी के साथ करनी पडेगी.

    रामराम.

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  11. आज आपने अपनी शैली से हटकर चर्चा की.. बढ़िया रही.. शैली से इतर लिखना तोड़ा मुश्किल होता है. पर विविधता होना भी ज़रूरी है.. बहुत ही उम्दा रही चर्चा आज की

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  12. चर्चा बढ़िया है।
    डिस्क्लेमर - उक्त विचार मेरे ओरीजिनल नहीं हैं और कोई भी कानूनी कार्रवाई टिम्बकटू की भौगोलिक सीमा के अन्दर ही हो!

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  13. मैं तो सोच रही हूँ की ब्लॉग पर भी disclaimer लगा दूं. चर्चा बहुत अच्छी लगी.धयवाद.

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  14. चर्चा बढ़िया है।
    क्लेमर - उक्त विचार मेरे ओरीजिनल ही हैं और कोई भी कानूनी कार्रवाई जहाँ मन आए कर लेना!

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  15. मैंने भी आज चर्चा पूरी पढ़ी, रुचिकर जानकारियां बांटने और रोचकता बनाये रखने के लिए धन्यवाद.

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  16. चर्चा कल ही पढ़े थे। टिपिया आज रहे हैं कि अच्छी लगी। कोई कष्ट?

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  17. ‘टिप्पणियों की वजह से भी केस चल जायेगा. सज़ा हो सकती है.’
    >हम तो टिप्पणी करेगा
    सज़ा से नहीं डरेगा... हमारे सलाहकार है ना द्विवेदी जी..बस, दस हज़ार की बात तो है:)

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