गुरुवार, फ़रवरी 12, 2009

जब सवाल परेशान करें तो कविता बांचिये

बड़ी परेशानी के दिन हैं जी. परेशानी है, मंदी से. सवालों से. जबाबों से. नेताओं से. सेनाओं से. सीमाओं से. व्यवस्था से. अवस्था से. यहाँ तक कि बसंत से.

और भी न जाने किन-किन से.

लेकिन पुण्य प्रसून वाजपेयी जी की मानें तो सवालों से परेशानी सर्वोपरि है. उनकी और मानें तो;

"कहते हैं जब सवाल परेशान करें और कोई जवाब न सूझे तो कविता पढ़ लेनी चाहिये।"

कौन कहता है? ये बात उन्होंने नहीं बताई. लेकिन उनकी बात से ये साबित हुआ जाता है कि सवाल उन्हें परेशान कर रहे हैं. और उन्हें जवाब भी नहीं सूझ रहा. उन्होंने शायद सोचा कि सवाल ब्लॉगर भाइयों को भी परेशान कर रहे होंगे.

ऐसे में कविता पढ़ना सबसे उत्तम काम है. कविता पढ़ना सवालों से निजात पाने का घणा प्रूवेन तरीका है.

और ऊपर से अगर कविता विदेशी कवि की हो तो क्या कहने?

अब विदेश का तेल,साबुन, शैम्पू, सिगरेट, शराब, फिल्में वगैरह अच्छी होती हैं तो जाहिर है कि कविता भी अच्छी ही होगी. आप पढिये. ग्वातेमाला के कवि अटो रेने कस्तिइयो की कविता.

अभी तो आप केवल कविता पढ़ सकते हैं. इसकी चर्चा बाजपेयी जी अगली पोस्ट में करेंगे. उन्होंने आश्वासन देते हुए लिखा है;

"चर्चा अगली पोस्ट में...."

खैर, आते हैं कविता पर. कविता का शीर्षक है, 'अराजनीतिक बुद्धिजीवियों'.

कविता के शीर्षक से साबित होता है कि ग्वातेमाला में अराजनीतिक बुद्धिजीवी भी थे. यह अलग बात है कि बाजपेयी जी ने कविता का काल नहीं लिखा है. इसलिए यह कह पाना मुश्किल है केवल थे या अभी भी हैं? या शायद ये कालजयी रचना होगी इसलिए बाजपेयी जी ने कविता का काल नहीं बताया है.

खैर, कभी तो उस देश में अराजनीतिक बुद्धिजीवी थे. हम अपने देश में तो ऐसे लोगों को देखने के लिए तरस जाते हैं.

कविता कुछ यूं है;

एक दिन
मेरे देश के
अराजनीतिक बुद्दिजीवियों से
जिरह करेंगे
देश के सबसे सीधे सरल लोग
उनसे पूछेगे, वे क्या कर रहे थे
जब उनका देश मरा जा रहा था
धीरे-धीरे
नरम-नरम आग की तरह नन्हा और अकेले


वैसे अगर कवि महोदय को इस बात का विश्वास था कि एकदिन सीधे सरल लोगों को सवाल पूछने का हक़ मिलेगा ही तो फिर देश के मरने की बात हमें तो बेमानी लगी जी. खैर, विदेशी कवि की कविता है. ऐसे में जल्दी से कुछ कह देना ठीक नहीं रहेगा.

कविवर कविता के अन्तिम भाग में लिखते हैं;

चुप्पी का एक गिद्द
तुम लोगों की गूदा और अंतडी फाड़कर खायेगा,
तुम लोगों की अपनी दुर्दशा ही
खरोंच-काटकर फाड़ती रहेंगी तुम लोगों की आत्मा,
और अपने ही शर्म से सिर झुकाए
तुम लोग गूंगे बने रहोगे


इन विदेशी कवि की रचना पढ़कर अंशुमाली रस्तोगी जी को अच्छा नहीं लगा. उन्होंने अपनी टिपण्णी में लिखा;


"वाजपेईजी, आप लोगों को हमेशा विदेशी कवि और उनकी कविताएं ही क्यों याद रहती हैं?
क्या अपने देश के पुराने कवि और उनकी कविताएं आपको उस हैसियत की नजर नहीं आतीं? या यहां के पुराने कवियों की विचारधारा ही कमजोर है? बंद ठंडे-गर्म कमरों में बैठकर विदेशी कवियों को गुनगुनाते हुए लफ्फबाजी करने में आपको शायद काफी मजा आता है।"

ये भी कोई बात हुई? एक तो कोई हमें विदेशी कवि की कविता पढ़वाए और हम उनकी विचारधारा पर टिपण्णी कर बैठें?

वैसे एक बात मेरे मन में आई है जो मैं लिखता चलूँ. हमारे अपने देश के कवियों की चर्चा जिस दिन विदेशों में हो जायेगी और कोई विदेशी उन कविताओं का अंग्रेज़ी अनुवाद कर डालेगा, तब हमारे ब्लॉगर भी उन रचनाओं को अपने ब्लॉग पर जगह ज़रूर देंगे.

पहले कविताओं पर कस्टम्स ड्यूटी तो लगे.

इष्टदेव सांकृत्यायन ने कई कड़ियों में जूते की महिमा का बखान अपने एक सीरीज 'अथातो जूता जिज्ञासा' में किया. अब तक चौदह कडियाँ प्रकाशित हो चुकी थीं. आज पंद्रहवी कड़ी प्रकाशित करते हुए वे लिखते हैं;


"जूते के प्रताप की सीमा यहीं सम्पन्न नहीं हो जाती है. नज़र उतारने या बुरी नज़र से अपने भक्तों को बचाने की जूता जी सामर्थ्य तो उनकी शक्तिसम्पन्नता की एक बानगी भर
है ."

नज़र उतारने के लिए जूता!!!! ये बात कांग्रेस पार्टी के नेताओं को नहीं पता होगी. शायद इसलिए उन्होंने नीबू और हरी मिर्च का प्रयोग किया. वैसे सोचिये कि अगर ये बात उन्हें पता रहती तो क्या होता? हाल ही में संपन्न हुए सम्मलेन में तमाम महान नेताओं की तस्वीरों के ऊपर जूता टंगा दीखता.

अच्छा हुआ इष्टदेव की ये पोस्ट उन्होंने नहीं पढी. अगर उनकी नज़र में पोस्ट चढ़ जाती तो नज़र उतारने के लिए पार्टी जूते का प्रयोग करती.

मिर्गी नामक रोग के उपचार की पद्धति में जूते के महत्व के बारे में इष्टदेव लिखते हैं;


"नए ज़माने के पढे-लिखे टाइप समझे जाने वाले लोग फिट्स कहते हैं. पता नहीं इसे फिट्स कहना वे कितना फिट समझते हैं, लेकिन एक बात ज़रूर है और वह यह कि फिट के इस बहुवचन का प्राथमिक उपचार वे भी जूते से ही करते हैं."

उनका लिखा हुआ ये पैराग्राफ पढ़कर मुझे फ़िल्म चुपके-चुपके के डॉक्टर परिमल त्रिपाठी याद आ गए. फ़िल्म में एक जगह वे कहते हैं; "अंग्रेज़ी कितनी अवैज्ञानिक भाषा है."

बात सही भी लगी. फिट का मतलब होता फिट. माने एक दम चौचक्क. लेकिन ये क्या? फिट्स की बात आते ही आदमी बेहोश हो जाता है. मतलब अगर चौचक्कता में इजाफा हो जाए तो वो स्टेज मनुष्य के लिए हानिकारक होती है?

इष्टदेव की इस सीरीज का पिछला भाग पढ़कर संगीता पुरी जी को लगा था कि वो अन्तिम भाग था. लेकिन जब आज पन्द्रहवां भाग छपा तो वे खुश हो गईं. उन्होंने अपनी टिप्पणी में लिखा;


"अरे वाह !!! और भी है !!!!"

खुशी होने के लिए किसी तैयारी की ज़रूरत नहीं पड़ती. हमसब किसी बात से खुश हो सकते हैं. जूते की महिमा का बखान पढ़कर भी.

इंडियन अगर स्मार्ट हो तो उसका इंटरव्यू लेने ताऊ जाते हैं. लेकिन अगर स्मार्ट न रहे तो? तब शायद सैम और वीनू फिरंगी से काम चल जाता है.

जी हाँ, आज ताऊ जी स्मार्ट इंडियन याने अनुराग शर्मा जी का इंटरव्यू छापा है. इंटरव्यू लेने के लिए ताऊ ख़ुद पिट्सबर्ग जा पहुंचे. समय की डिमांड यही है. आख़िर ताऊ की भैंस चाँद पर जा सकती है तो ताऊ का पिट्सबर्ग जाना ज़रूरी है.

इंटरव्यू का माहौल बनते हुए ताऊ लिखते हैं;

"हम "पिट्सबर्ग इंटरनेशनल एअरपोर्ट." से बाहर निकले ही थे कि हमको एक आवाज सुनाई दी. ताऊ, जय राम जी की!"

शर्मा जी और उनके परिवार के साथ ताऊ जी नगर की तरफ़ चल दिए. रास्ते के बारे में बताते हुए वे लिखते हैं;


"दो विशालकाय नदियों के संगम के किनारे चमकती अट्टालिकाओं से भरा हुआ एक बहुत ही सुंदर नगर हमारे स्वागत में खडा था."

ये पढ़कर मुझे लगा कि आज सबसे पहले पिट्सबर्ग के श्रृंगाररस के कवियों की रचना खोजकर पढूंगा. जिस जगह का बखान ताऊ जी ने इस तरह से किया है, उस जगह के बारे में लिखते हुए वहां के श्रृगाररस के कवियों ने अपनी रचनाओं में तो धूम मचा दी होगी.

इंटरव्यू का पहला सवाल और उसका जवाब ही गज्जब है. एक निगाह डालिए;

ताऊ - : आपके जीवन की कोई अविस्मरणिय घटना हमे बताईये. हमने सुना है कि
आपका जीवन बहुत ही घटना प्रधान रहा है?
अनुराग - कहावत है कि पूत के पाँव.......
ताऊ - अरे आगे भी तो कुछ है
कहावत में...
अनुराग - हाँ, याद आया... पूत के पाँव, खाने के और, दिखाने
के और


आप अनुराग जी का पूरा इंटरव्यू ताऊ जी के ब्लॉग पर पढिये.

वैसे इंटरव्यू पढ़कर प्राईमरी के मास्टर जी को लगा कि अनुराग जी लफडेदार आदमी हैं. उन्होंने अपनी टिप्पणी में लिखा;

शर्मा जी और आप ताऊ को भी धन्यवाद !!!
पढ़ कर अच्छा लगा !!
लगता है कि काफी लफडेदार आदमी रहे हैं अनुराग जी ??

पिट्सबर्ग वाले स्मार्ट इंडियन लफड़ेदार हैं या नहीं लेकिन दिल्ली वाले कुछ स्मार्ट इंडियन वाकई बड़े लफड़ेदार होते हैं.

जो इंडियन स्मार्टेस्ट होते हैं वे संसद पर कब्ज़ा कर लेते हैं. लेकिन जो स्मार्टर होते हैं वे? वे तमाम पुरानी इमारतों पर कब्ज़ा कर लेते हैं.

इसका नतीजा क्या हो सकता है, इसके बारे में बताते हुए आलोक पुराणिक जी लिखते हैं;

"कश्मीर के एक हिस्से पर पाकिस्तानी कब्जे को लेकर मैं नाराज हुआ करता था, अब
नाराज होना छोड़ दिया है। 6 फरवरी, 2009 के टाइम्स आफ इंडिया की लीड खबर के मुताबिक दिल्ली के बीचों बीच करीब पांच सौ साल पुरानी बिल्डिंग-बाड़ा लाव के गुंबद को अवैध कब्जे से फ्री कराने में करीब साठ साल लग गये। कश्मीर का मसला तो छह सौ साल ले सकता है।"

वे आगे लिखते हैं;

"वैसे दिल्ली में सही टाइम पर आकर शाहजहां, औरंगजेब निकल लिये। अब का सीन तो घणा डेंजरस हो लेता।शाहजहां दिल्ली का लाल किला बनवा रहे होते, आधे प्लाट पर कब्जा हो लेता, पता लगता कि आधे किले में झुग्गियां उग आयी हैं।"

ऐसे डेंजरस सीन की श्रृष्टि होने का चांस रहता. डेंजरसता से डरे हुए शाहजहाँ अगर कुछ कहते तो क्या होता? इसकी कल्पना करते हुए आलोक जी लिखते हैं;


"शाहजहां कहते कब्जा करने वालों से कि शिकायत कर दूंगा-पुलिस से, डीडीए से, एमसीडी
से।कब्जा करने वाले हंसकर बताते-उन्ही से पूछकर तो यहां कब्जा किया है।"

अच्छा हुआ, समय रहते शाहजहाँ जी दुनियाँ से कूच कर गए. ये उनके लिए अच्छा हुआ और ताजमहल और लाल किले के लिए भी.

आलोक जी की इस पोस्ट पर टिप्पणी करते हुए सतीश पंचम जी ने लिखा;

"आलोक जी, आज तो एकदम धांसू-फांसू-हांसू पोस्ट है।
वैसे मुगलिया सल्तनत के एक चिराग को खुर्रम भी कहते थे।
उसी के नाम पर पापड वालों ने स्लोगन तो नहीं बनवाया था।
मजेदार….लज्जतदार कुर्रम-कुर्रम। लालकिले वाला पापड"


लालकिला और पापड. वो भी खुर्रम-खुर्रम. मजेदार....

हमारी पसंद की आज की कुछ और पोस्ट:

पाप और पुण्य पर घुघुती जी की यह पोस्ट पढ़िए.

अजित भाई से द्विवेदी जी की मुलाकात के बारे में द्विवेदी जी यह पोस्ट पढ़िए.

पाबला जी की मुंबई यात्रा के बारे में उनकी यह पोस्ट पढ़िए.

आज आदित्य साहब मौज के मूड में हैं. तसवीरें देखिये.

अपना शहर सबको प्रिया क्यों होता है? प्रशांत की यह पोस्ट पढ़िए.

अनुराग अन्वेषी जी के ब्लॉग पर शैलप्रिया जी की कविता पढ़िए. कविता का शीर्षक है आमंत्रण. शैलप्रिया जी ने लिखा है;

आओ
हम फिर शुरू करें
आजादी का
गीत,
कि खुले कंठ से स्वरों को सांचा दें
कि हमारी आकांक्षाएं
पेड़ के तनों पर टंगे घोंसलों में
स्वेच्छया कैद
पंछी बन गयी है
और आकाश के उन्मुक्त फैलाव से
उसका कोई दैहिक संबंध
नहीं रह गया है।

जोशी कविराय की गजल पढ़िए. आदमी के बारे में वे लिखते हैं;

वक्त का मारा हुआ है आदमी ।
तंत्र से हारा हुआ है आदमी ।

बस चुनावों के समय उनके लिए
काम का नारा हुआ है आदमी

चर्चा को आगे बढ़ाने से क्या मिलेगा? शायद कपड़ों के बारे में चर्चा करनी पड़ी. ऐसे में चिट्ठाचर्चा फैशन चर्चा में बदल सकती है. आख़िर कपड़ों की लेन-देन पर इतनी पोस्ट लिखी गई हैं कि फैशन का बोलबाला हो जायेगा.

इसलिए इसी मोड़ से मुड लेते हैं. अगले वृहस्पतिवार को फिर से मुलाकात होती है.

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26 टिप्‍पणियां:

  1. जब सवाल परेशान करें तो केवल कविता ही न बांचिये...कार्टून भी देख लीजिये... :)

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  2. बंधु, लगता है आप वाजपेईजी से कुछ ज्यादा ही 'प्रभावित' हैं। अक्सर लोग 'बड़ी हस्तियों' से यूंही प्रभावित होते रहते हैं। इससे खुद भी 'सुविधा' मिलती है, इसलिए। यही कारण है कि आपकी चिठ्ठाचर्चा भी 'कुछ बड़ों' की 'महानता' को सिद्ध करने में ही लगी रहती है।
    दूसरी बात, मैंने अपनी टिप्पणी में यह कहीं नहीं लिखा कि मैं वाजपेईजी असहमत हूं या यह (कविता) मुझे अच्छी नहीं लगी। विदेशी कवियों और उनकी रचनाओं का जिक्र तो हमारे कथित प्रगतिशीलों की 'प्रगतिशीलता की निशानी' है, भाई। अशोक वाजपेई जनसत्ता में अपने स्तंभ कभी-कभार में यही सब तो लिखते-करते रहते हैं।
    आखिर आज तक ऐसा क्यों नही हुआ है कि किसी कथित प्रगतिशील ने हंसराज रहबर की किसी ग़ज़ल का जिक्र अपने ब्लॉग या लेखन में किया हो। दरअसल, रहबर को छूने के कई वैचारिक खतरे हैं। भला प्रगतिशील क्यों ऐसे खतरे उठाने लगे? बेहतर तो यह है कि किसी अनोखे विदेशी कवि का जिक्र अपनी रचना में कर दो और पलभर में गंभीर और प्रगतिवादी बन जाओ।
    अब तो प्रगतिशील मुक्तिबोध, पाश, दुष्यंत, नागार्जुन, शमशेर आदि को मजबूरी में ही याद करते हैं।

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  3. लज़्ज़तदार,मज़ेदार,शानदार,और अगली बार का इंतज़ार्।

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  4. कविता बांच रहे हैं कविवर झालकवि ’वियोगी’ की. :) परेशानी कुछ कम हुई.

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  5. अरे मिश्राजी, कहां अंग्रेज़ी के पीछे पडे़ हैं आप - जहां to टू और go..... क्यों नहीं होता:)
    > इन अंग्रेज़ों के चक्कर में ही तो आज ब्लाग जगत में गुलाबी चड्डी और केसरिया चड्डी की जंग छिडी हुई है....कहां है आप!!!!

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  6. अंत तक मजेदार चर्चा !शुभकामनायें !

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  7. यह चर्चा हुई कुछ बढ़िया, इस लिहाज से कि कविता की बात कुछ समीक्षात्मक अंदाज में करने से चर्चाकार का दृष्टिकोण भी पता चल जाता है, बात अलग है कि दृष्टि का खयाल हम करें या न करें .

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  8. बहुत मज़ा आया पढ़कर। आपका समीक्षा का यह अंदाज़ अच्छा है।

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  9. अरे आज हमारी टिपण्णी पर ही तलवार की नोक लटकी ????

    अनुराग जी से माफ़ी सहित मजाक की अनुमति ??????

    अच्छी चर्चा !!!

    पर एक लेना थोड़े कम से लगे ???

    लगता है की यात्रा की खुमारी रही होगी???

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  10. आप ने आज की चिट्ठा चर्चा को बहुत महत्वपूर्ण बना दिया है। अच्छा रहा कि आप चड्डी,साड़ी और कंडोम से दूर रहे। लेकिन इस संदर्भ में अनिल पुसदकर जी की पोस्ट आज की सर्वोत्तम पोस्ट भी है।

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  11. जब सवाल परेशान करें तो केवल कविता ही न बांचिये..
    अजी सवाल परेशान करे तो हल आपने बता दिया पर यहाँ तो "रंग' परेशान कर रहा है...न ही कोई पोस्ट पढे बनती है ना comment ही करते बनता है.......अजीब problem है.... चर्चा पढ़कर कुछ सुकून मिला.."

    Regards

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  12. चर्चा तो बहुत अच्छी रही ...पढ़कर अच्छा लगा

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  13. वाह जी घणी चोखी चर्चा रही आज तो. शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  14. वाह शिव भईया, गजब की मेराथन चर्चा रही आज तो! आगे इसी तरह आपकी चर्चायें देखने का इंतजार है.

    सस्नेह -- शास्त्री

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  15. इस चर्चा की क्या तारीफ़ करूँ,
    कुछ लिखते हुये भी डरता हूँ !
    सो, लिखा कम समझना ज़्यादा.. :)

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  16. वाह !! घणा चोखा चर्चा (भुरता वाला नही, बढ़िया वाला) ........

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  17. "नज़र उतारने के लिए जूता!!!! ये बात कांग्रेस पार्टी के नेताओं को नहीं पता होगी. शायद इसलिए उन्होंने नीबू और हरी मिर्च का प्रयोग किया. वैसे सोचिये कि अगर ये बात उन्हें पता रहती तो क्या होता? हाल ही में संपन्न हुए सम्मलेन में तमाम महान नेताओं की तस्वीरों के ऊपर जूता टंगा दीखता.
    अच्छा हुआ इष्टदेव की ये पोस्ट उन्होंने नहीं पढी. अगर उनकी नज़र में पोस्ट चढ़ जाती तो नज़र उतारने के लिए पार्टी जूते का प्रयोग करती."

    अजी साहब! बिन पढे ही वे जाने कब से जूते का इस्तेमाल करते चले आ रहे हैं, पर हमारी-आपकी आँखों की जगह जो बटन है, बस उससे दिखाई नहीं देता है. वैसे वह जूता भी कुछ ख़ास किस्म का है. उसका जिक्र भी आगे मैं अपने जूता शास्त्र में करूंगा, पर थोडी देर लगेगी. वह ज़रा बाद का मामला है.

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  18. शिव कुमार जी, कुछ ब्लोग को लेकर विस्तार से चर्चा करने का आपका अंदाज "हट" के है.. अगर पोस्ट नहीं भी पढी हो तो summary ्मिल जाती है.. बहुत अच्छी.. बधाई..

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  19. बहुत कुछ समेटे हुए एक शानदार चर्चा........

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  20. बस बस मिश्रा जी इसी तरह की चर्चा का तो इंतज़ार था, जिसमें मेहनत से पोस्ट लिखने वालों के दिलों का मान रखा जाए। खिल्ली उड़ते देखते रहे अब तक जी, क्या करें मजबूरी थी। आप का बहुत बहुत आभार ऐसी सुन्दर चिट्ठाचर्चा के लिए।

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  21. अच्छी चर्चा करी आपने। लेकिन भीगी पलके वाले ज्ञानजी अभी तक नहीं पढ़े इसकॊ!

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