बुधवार, जनवरी 21, 2009

बीता हुआ कोई क्षण नहीं लौटता







कल की चिट्ठाचर्चा और आज की चर्चा के बीच बराक ओबामा ने अमेरिकी राष्ट्रपति की शपथ ले ली| वाशिंगटन में माईनस ४ डिग्री सेल्सियस के तापमान के बावजूद जुटे लोगों ने आज तक वहाँ ऐसे समारोह में जुटने वाली संख्या के सारे रेकोर्ड तोड़ दिए। अमेरिका के इतिहास में तो निस्संदेह यह एक ऐतिहासिक क्षण था। वे प्रथम अश्वेत राष्ट्रपति हैं.जिस देश में अश्वेतों को मतदान का अधिकार १९६५ में मिला हो, उस देश में यह घटना एक बड़े वैश्विक परिवर्तन की लहर की शुरुआत है।


न्यूयॉर्क टाईम्स द्वारा जारी आधिकारिक चित्रों को आप चाहें तो यहाँ देख सकते हैं।


और कुछ अन्य चित्रों को यहाँ भी - देखिए -



अन्यभारतीय भाषाओं से

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मकर संक्रांति पर दिनेशराय द्विवेदी जी ने हाड़ौती में एक बहुत रोचक व सामयिक प्रविष्टि लिखी, उसे पूरी तो आप वहीं जा कर पढ़ें, पर अंश के दर्शन यहीं कर लें -


हाड़ौती



उश्याँ बरस को आरंभ मंगळ सूँ होणी छावे नँ, जीसूं तेरा अपरेल नँ जद भगवान सूरजनाराण मंगळ म्हाराज का घर मँ परबेस करे तो ऊँ दन बैसाखी मनावे छे। अर ऊं दन ही सूरजनाराण का बरस को आरंभ होवे छे। ऊँ क आस पास ही आपणी गुड़ी पड़वा भी आवे छे। दो म्हीनाँ ताईं जद भगवान सूरजनाराण को मुकाम गुरू म्हाराज बरहस्पति जी क य्हाँ रह छ। तो कोई भी आडो ऊँळो काम करबा की मनाही छ। अब आपण परथीबासियाँ का तो सारा काम ही आडा ऊँळा होवे। जीसूँ ही आपण याँ दो म्हीनां क ताईं मळ का म्हीना ख्हाँ छाँ। अर य्हाँ में भगवद् भजन, कथा भागवत अर दान पुण्य का कामाँ क अलावा दूसरा काम न्हँ कराँ। आज ऊ एक म्हींनो पूरो होयो। आज सूँ फेर सारा काम सुरू होता। हर बरस सुरू हो ही जावे छे। पण ईं बरस आज क दन ही बरहस्पति जी खुद भी घरणे फ्हली सूँ ई बिराज रिया छे। अब दोन्यूँ को मिलण अर साथ 10 फरवरी ताँईं रहगो जीसूँ व्हाँ ताईं आडा ऊँळा काम, जासूँ आपण मंगळ काम ख्हाँ छाँ न होवेगा, जश्याँ सादी-ब्याऊ, मुंडन आदी।


पंजाबी

अभी अभी लोहिड़ी गयी है, तो पंजाबी के गिद्दे का रसास्वादन कीजिए


ਗਿੱਧੇ ਵਿੱਚ ਤੂੰ ਨੱਚਦੀ
(गिद्दे विच तूँ नच्चदी )


रूप दे शिकारी
अख रखदे कमारीआं 'ते
असीं वी नी रहिणा किसे कोलों डरके
किहड़ा लंघ जू जटी दे वल अख करके

*
*
अड़ीए अड़ीए अड़ीए
रुसे माहीए दा की करीए
अंदर वड़े तां मगरे वड़ीए
चुंनी लाह पैरां विच धरीये
इक वारी बोलो जी
आपां फेर कदे ना लड़ीए

**

छंने उते छंना
छंना कदे वी ना डोलदा

पोह-माघ दा रुसिआ माहीआ
हाले वी नी बोलदा

**

नी तूं नच नच नच
नी तूं हौली हौली नच
डिग पवे ना गुआंढीआं दी कंध बलीए
तेरा गिधा सारे पिंड दे पसंद बलीए

**

गिधे विच तूं नचदी
मार मार के अडी
मुंडे वी बैठे ने
बैठे ने मूंह टडी


**



गुजराती

सुन्दरम की एक गुजराती ग़ज़ल को कई मित्र इसी लिपि में समझ लेंगे; विशेषत: लावण्या जी :-)

નમું તને, પથ્થરને? નહીં, નહીં,
શ્રદ્ધા તણા આસનને નમું નમું :
જ્યાં માનવીનાં શિશુ અંતરોની
શ્રદ્ધાભરી પાવન અર્ચના ઠરી.

કે મુક્ત તલ્લીન પ્રભુપ્રમત્તની
આંખો જહીં પ્રેમળતા ઝરી ઝરી.
તું માનવીના મનમાં વસ્યો અને
તનેય આ માનવ માનવે કર્યો;

મનુષ્યની માનવતાની જીત આ
થયેલ ભાળી અહીં, તેહને નમું.
તું કાષ્ઠમાં, પથ્થર, વૃક્ષ, સર્વમાં,
શ્રદ્ધા ઠરી જ્યાં જઇ ત્યાં, બધે જ તું.

તને નમું, પથ્થરનેય હું નમું, શ્રદ્ધા તણું આસન જ્યાં નમું તહીં



मराठी को अगली बार के लिए स्थगित किया है।



विश्व से
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- अन्टार्कटिका में १ करोड़ ५० लाख वर्ष से भी पूर्व के एक जलाशय के अद्भुत वर्णन पढने- देखने के लि यहाँ जाएँ



- डायबिटीज के बारे में यह शोध आप-हम के लिए एकदम नया है, सावधान! अपनी खानपान की आदतें सही रखिए, सुधारिए।



- इस समाचार से आप चौंकेंगे जरूर। भारत में बाल मजदूरों के मामले में जब अभिनय करने वाले बाल कलाकारों तक के लिए कोर्ट आदेश जारी कर रहा है, तो उन के समान्तर इसे रख कर देखें कि कैसे व क्यों वैज्ञानिक अपने बच्चों को शोध की वस्तु के रूप में प्रयोग कर रहे हैं।



अंश चर्चा : अभिलेखागार से
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चर्चा को चर्चा ही रहने दो कोई नाम दो

पिछले कुछ दिन से देख रहा था कि चिठ्ठे कम लिखे जा रहे थे और चर्चायें ज्यादा। एकाध बार ऐसा भी देखने को मिला कि कुछ चिठ्ठाकार बँधु पसड़ गये कि हमरी पोस्ट काहे नही बांची? वही कुछ अति उत्साही चर्चाकार ऐसे भी आगे आये जिन्होने चिठ्ठो के उगते ही चर्चा की गुगाली कर डाली ।

यह सब जहाँ उत्साह जगाता है कि वह महायज्ञ जो अनुप शुक्ला जी ने शुरू किया उसमें इतने सारे चिठ्ठाकार भाई इतने प्रेम से आहूति दे रहे हैं, वही मेरे मन मे कुछ प्रश्न छोड़ रहा है। अपने शंकालु दिमाग में जो विचार घुमड़ रहे हैं उन्हे यहाँ उकेर दे रहा हूँ , कृपया इन्हें मेरे निजी विचार समझ कर मत व्यक्त करिये ।


  • चिठ्ठा चर्चा को नारद का पूरक नही समझना चाहिये। हर चर्चाकार की रूचि अलग होती है, उसे अपने हिसाब से चर्चा करने की खुली छूट होनी चाहिये , जिन चिठ्ठो को वह छोड़ दे, ऐसा मान लिया जाये कि या तो उस दिन चर्चा के लायक नही थे या फिर चर्चाकार की रूचि मे फिट नही बैठे। यह आवश्यक नही कि उसे पूरक चर्चा के द्वारा सबको फिर से पढ़ाया जाये, नारद किसलिये है फिर?
  • अगर चर्चाकार ज्यादा हो गये हो तो अब विभिन्न भाषाओं , श्रेणियो के हिसाब से चर्चा हो।
    कभी कभी कुछ टिप्पणियों से ऐसा लगा कि कुछ नये चिठ्ठाकारो मे यह भ्रम है कि सब चिठ्ठाकार कुछ खास चिठ्ठाकारो की ही चर्चा करते हैं , जैसे मानो कि कोई काकस हो। मैं यहाँ यह स्पष्ट करना चाहूँगा कि कुछ पुराने चिठ्ठाकारो में आत्मीय संबध इसलिये बने कि वे गिने चुने ब्लागरो के जमाने से एक दूसरे को जानते हैं पर काकस जैसा कुछ नही यहाँ। बात सिर्फ व्यक्तिगत रूचि का है। उदाहरण के लिये, हो सकता है कि मुझे लाल्टू, नीरज दीवान और ईस्वामी के तीखे तंजो की या फिर फुरसतिया, जीतू वगैरह की हास्य की चर्चा करना ज्यादा अच्छा लगता हो और वही जीतू को उन्मुक्त की तकनीकि कौशल का बखान सुहाता हो। इसमें व्यक्तिगत संबध कही से नही आते।
  • चर्चा समीक्षात्मक हो , ड्राईंगरूम मे बैठकर विदेशनीति पर चर्चा करना अलग है और पान की दुकान पर खड़े होकर शोऐब अख्तर की लुच्चई की सुर्रेबाजी अलग। हम कैसी चर्चा चाहते हैं चिठ्ठाचर्चा में?

फिलहाल इतने ही विचार है अपने दिमाग में। आप सबके सुझावो का इंतजार रहेगा।


अब देखे क्या लिखा गया।

लाल्टू जी ने वाघा के आडंबर की धज्जिया उड़ा दी। साथ ही चित्रो के लिंक के लिये उन्हे धन्यवाद देना चाहूँगा।

बिहारी बाबू ने समाज में नैतिकता का सर्टिफिकेट बाँटने वालो की खासी मौज ली है। अगर बिहारी बाबू इस लेख के दूसरे संस्करण में इन तथाकथित संगठनो, सर्टिफिकेट बाँटने वालो के चरित्र की पोल खोल दें तो मजा दुगुना हो जाये।

त्रिवेणी कविता की विधा के बारे में समीरलालजी का ज्ञानपरक लेख है, बुकमार्क करके रखने लायक है मेरे जैसो के लिये जिन्हे कभी कभी तुकबंदी की खब्त सूझती है।

अब कुछ और मस्त ब्लागो की चर्चा।

  • एरियाना हफिंगटन को जानते हैं? वही जिन्होने कैलिफोर्रनिया के चुनाव में आर्नोल्ड श्वाजनेगर से पंजा लड़ाया था। उनके इस ब्लाग पर बड़े पत्रकार लिखते हैं। एक बार जरूर देखिये।
  • मिर्ची सेठ के पसंदीदा ब्लाग मे शामिल है ब्रिज सिंह का यह जबरदस्त तकनीकि ब्लाग। अगर मेरी जानकारी ठीक है तो ब्रिज सिंह भी कनपुरिया हैं।
  • क्या आपको पता है दीपक चोपड़ा, शेखर कपूर , नंदिता दास और राहुल बोस भी ब्लाग लिखते हैँ? नही, अमां कहाँ रहते हो आप भी। इंटेंट ब्लाग हफिंगटन पोस्ट से बीस ही है।
  • और यह देखिये भारत को जहाँ हम विकसित बनाने के सोच रहे हैं सूचना क्रांति के जरिये तो कुछ दिलजले भी हैं दूसरी तरफ।




स्त्री लेखन
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इस बार आप को मिलवा रही हूँ स्वर्गीय शैलप्रिया जी से ; जिनका लिखा पढ़ कर तो आप भावुक होंगे ही, स्तब्ध भी होंगे किंतु इनके सुपुत्र अनुराग अन्वेषी ने जिस प्रकार अपनी माँ को मान - सम्मान, अश्रुपूर्ण भावांजलि (या जाने कितने शब्दों से आप संबोधित करेंगे, पढ़ कर ) दी है, उसके बाद मन से एक ही आवाज आती है कि कैसी होगी वह माँ, जिसने ऐसे संस्कार दिए कि इतनी श्रद्धावनत, मातृभक्त संतान पाईं| दोनों भाईयों ( अनुराग जी के बड़े भाई प्रियदर्शन को आप स्वयं वहीं जाकर जानिए ), को इतना भावाकुल पढ़ कर आप की सहज ही माँ के प्रति श्रद्धा हिलोरे लेने लगेगी। मैं अधिक नहीं लिखूँगी, एक बार किसी भी एक लिंक पर आप इनके किसी ब्लॉग पर पहुँच जाएँगे तो स्वत: अन्य सब को पढ़ने के लोभ से अछूते नहीं रहेंगे |


ये हैं बानगी देते कुछ अंश शैल जी का औपचारिक परिचय, असली परिचय वहीं मिलेगा।






जन्म 11 दिसंबर 1946, मृत्यु 1 दिसंबर 1994, शिक्षा : एमए, कविताओं का संकलन : अने लिए (1983), चांदनी आग है (1992), घर की तलाश में यात्रा (1995)। इन तीन संकलनों को देखकर कहना पड़ता है कि वह मूल रूप से कविताकर्मी रहीं। कभी-कभार दूसरी विधाओं में भी उन्होंने लिखा। ऐसे ही लेखन का संग्रह है 'जो अनकहा रहा' (1995) और फिर बची-खुची उनकी कुछ रचनाएं आईं 'शेष है अवशेष' (2000) में।



शैल जी की एक कविता
निष्कर्ष

आम आदमी से
खैरियत पूछते हुए
जूझती
हूं अपने से।

अखबारी
कतरनों
के बीच
शांति तलाशते लोग
गुमराह
सीढ़ियां तय करते हैं।

उनमें अपने को भी शामिल महसूसती हूं बार-बार।

भटकाव की दिशा में

फन काढ़े नाग की कोठरी में

मणि की प्राप्ति नहीं हो सकती।

शक्तिहीन
रीढ़ के पीछे

वार
करते कभी सोचा है

कि
यह अपने लोग हैं,

यह
अपनी धरती है,
यह अपनी ही माटी है,
यह अपना ही खून है।

- शैलप्रिया


यहाँ से मूल
पाठ तक जा सकते हैं

माँ की आखिरी शाम
Thursday, December 25, 2008 3:35 PM


मेरे लिए 1 दिसंबर 1994 की रात बेहद काली थी। इसी रात तकरीबन 10 बजे पराग भइया ने दिल्ली से फोन कर बताया कि मां की तबीयत बेहद खराब है, हमलोग कल उसे लेकर रांची आ रहे हैं। मैंने पूछा - प्लेन से या ट्रेन से। भइया का जवाब था - प्लेन से। उसके इस जवाब से मैं समझ गया कि 1 दिसंबर की शाम माँ की जिंदगी की आखिरी शाम हो गई। बहरहाल, मैं उन यातनादायी दौर से फिर गुजरने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा, इसलिए इस चर्चा को यहीं पर रोक कर एक दूसरी बात कहूं। माँ की मौत के बाद उनकी एक कविता ने हमसबों का ध्यान अपनी ओर खींचा। यह कविता माँ की कविताओं के दूसरे संकलन 'चाँदनी आग है' में शामिल है। 'एक संदेश' नाम की इस छोटी-सी कविता में माँ ने दिसंबरी शाम से आखिरी बार मिलने की बात कही है। वाकई, इस संयोग ने मुझे हैरत में डाल दिया।
आप भी पढ़ें माँ की यह कविता :


एक संदेश
ओ दिसंबरी शाम।
आज तुमसे मिल लूँ

विदा बेला में
अंतिम बार।
सच है,
बीता हुआ कोई क्षण
नहीं लौटता।
नहीं बाँध सकती मैं
तुम्हारे पाँव।
कोई नहीं रह सकता एक ठाँव





अंत में

आगामी सप्ताह की चर्चा के लिए मैं उपलब्ध न रहूँगी, इलाहाबाद की यात्रा पर जा रही हूँ, जहाँ २७/१/२००९ को अपनी पुस्तक "समाज-भाषाविज्ञान : रंग- शब्दावली : निराला- काव्य" के विमोचन में सम्मिलित होना है। अत: आगामी चर्चा अब लौटने के पश्चात ही सम्भव हो पाएगी। जो मित्र इलाहाबाद में रहते हैं, उनसे उस दिन सम्मिलित होने का आग्रह, निमंत्रण है।

आप सभी का प्रत्येक दिन सपरिवार मंगलमय हो, उल्लासमय हो।

इस बार इतना ही, शेष अगली बार .......

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26 टिप्‍पणियां:

  1. अनेक फ़लक समाहित करती हुई चर्चा. बहुत कुछ नया जान पाते है हम.
    धन्यवाद.

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  2. बेहतरीन, व्यापक , बहुआयामी चर्चा। दो साल पहले की गयी चर्चा की चर्चा देखकर बहुत अच्छा लगा। तमाम बातें याद आ गयीं। उन दिनों नारद अकेला संकलक था और अतुल हमारे सबसे लोकप्रिय चर्चाकार।
    शैलबालाजी के और अनुराग अन्वेषी के बारे में परिचय कराने का आभार!

    अनुराग की मां के बारे में लिखी पो्स्टें अभी पढ़नी हैं। लेकिन सोचिये कि अगर ब्लाग जैसा सहज सुलभ माध्यम नहीं होता तो क्या हम अनुराग की अपनी मां के बारे में लिखीं पोस्टों तक पहुंच पाते। यहीं राजेन्द्र यादव जैसे अनुभवी लेकिन पूर्वाग्रही महारथी गलत साबित होते हैं कि ब्लाग पर जो है सब कूड़ा है और मन की भड़ास है।

    आपकी पुस्तक के विमोचन के लिये अभी से बधाई। "समाज-भाषाविज्ञान : रंग- शब्दावली : निराला- काव्य" शायद एकदम नया विषय है। पुस्तक का इंतजार रहेगा।

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  3. पुस्तक के विमोचन की अग्रिम बधाई ! बनारस में होता तो शामिल हो लेते !

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  4. "चर्चा को चर्चा ही रहने दो कोई नाम न दो बहुत सटिक...... आपको अपनी पुस्तक "समाज-भाषाविज्ञान : रंग- शब्दावली : निराला- काव्य" के विमोचन पर ढेर सारी शुभकामनाये ...."
    Regards

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  5. विश्व भ्रमण कराती आपकी चिठ्ठा चर्चा एक अलग रंग देती जा रही है इस मंच को। बधाई।

    इलाहाबाद पधारिए। हम आपके स्वागत को उत्सुक हैं।:।

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  6. आज भान होरहा है.... " हम बालक नादाँ "
    शो, मँई कूश्श नेईं बोलेंगा, हम बोलेगा तो, बोलोगे कि बोलता है ।
    चर्चा को चर्चा ही रहने दो, अख़ाड़ा न बनाओ !

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  7. बहुत ही व्यापक और रोचक चर्चा.
    सभी पक्षों का ध्यान रखा गया है.ग्लोबल चर्चा जैसी रही .बधाई.

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  8. कब इलाहाबाद जाना है-जबलपुर रास्ते में ही है. नहीं रुक पायें तो स्टेशन पर मुलाकात हो जाये. खबर करिये.

    चर्चा बेहतरीन है.

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  9. ज़ोरदार चर्चा


    ---आपका हार्दिक स्वागत है
    चाँद, बादल और शाम

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  10. प्रियदर्शन जी के लेख को यहाँ देखकर खुशी हुई.....कविता जी शायद चिटठा चर्चा की गरिमा को एक नए आयाम देती है..वैसे भी मेरा मानना है की एक खूब पढ़ा पाठक किसी लेखक जैसा ही होता है.....या उससे ही थोड़ा इतर ...
    कई बार मेरे मन में भी ये प्रशन आता है की हमारे यहाँ कुछ पोस्ट की उम्र महज़ २४ घंटे ही होती है ....ओर मै कई बार सोचता हूँ की काश इस महीने की कुछ बेहतरीन पोस्ट एक जगह इकट्ठी कर पाता ...कल कुश से इसी विषय पर बात हुई थी की क्यों ना एक ऐसा ब्लॉग बनाया जाए जहाँ बेहतरीन पोस्ट का संग्रह हो.....किसी भी लेखक की ....लेकिन सवाल फ़िर वहां निजी पसंद का आ जाता है ....
    कई बार नेट इस्तेमाल करने वाले भी ब्लॉग कैसे पढ़े ये प्रशन पूछते है....जाहिर है पत्रकार या दूसरे माध्यम अखबार में किसी चिट्ठाकार का चर्चा तो कर देते है पर अग्ग्रीगेटर का प्रसार नही करते .....जिसकी ज्यादा आवश्यकता है....

    वैसे डॉ अमर कुमार ने एक विधि सुझाई थी..चिटठा चर्चा को वर्गीकृत करने के लिए ..एक बार कुश ने उस पर चर्चा भी की थी....

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  11. ओर दूसरी बात .शब्दों के चित्तेरे राजेन्द्र यादव असल में मानस के तौर पे कैसे है.ये इस माह का कथादेश पढ़कर आप समझ जायेंगे ..

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  12. अच्छी चर्चा. पुस्तक विमोचन की बधाई ! आपकी यात्रा शुभ हो.

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  13. सभी ब्लॉगर साथियों की शुभकामनाओं व प्रतिक्रियाओं के प्रति कृतज्ञ हूँ.

    समीर जी,
    मेरा आईडी है - kavita.vachaknavee@gmail.com
    आप मुझे अपना फोन नं भेजें ताकि कार्यक्रम संपर्क किया जा सके. मेरा नं आपके पास होगा ही.

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  14. शानदार चर्चा. विस्तृत चर्चा.

    दो साल पहले की चर्चा भी पढ़ी. लेकिन एक बात है. कभी-कभी लगता है दो साल में ज्यादा कुछ नहीं बदला. मसले वही हैं जो सौ-पचास चिट्ठों के समय थे. दो साल का समय छोटा होता है शायद. सचमुच ऐसा है क्या?

    आपकी पुस्तक के विमोचन के लिए हमारी शुभकानाएं और बधाई.

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  15. यहां मां के ब्लॉग की चर्चा देखकर वाकई बेहद खुशी हुई। कविता वाचक्नवी का हार्दिक आभार। कृपया शैलबाला की जगह सुधार कर शैलप्रिया कर दें। एक बार फिर आभार...
    -अनुराग अन्वेषी

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  16. इस बार की चर्चा में सबसे महत्त्व पूर्ण रहा
    शैलप्रिया जी का प्रसंग.
    ऐसे प्रसंग चर्चा को संग्रहणीय बना देते हैं.


    आपकी नई पुस्तक के
    प्रकाशन और लोकार्पण पर हार्दिक बधाई !
    अभिनन्दन!!

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  17. सुंदर चर्चा. आज के दिन की चर्चा का इंतज़ार रहता है. भाषाई दीवारों के पार भी बहुत कुछ है जो एक संवेदनशील मानस की बाट जोहता है.

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  18. बहुत विविधता है चर्चा में। प्रभावी।

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  19. कविता जी,
    चिठ्ठा चर्चा का एक नया आयाम आज ही देख पाई हूँ -
    बहुत अच्छा लगा देख कर गुजराती मेँ कविता देखकर और हाँ, समझ भी गई:)
    -लावण्या

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  20. बहुत अलग हट कर बहुत बढिया चर्चा करने के लिए बधाई।।

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  21. अनुपम चर्चा- हर बार एक नया आयाम और एक नया सा रंग.

    बहुत बधाई.

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  22. पुरानी ही चर्चा फिर आन पड़ी एक नये प्रभाव के साथ अतएव उपरोक्त टिप्पणी.

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