शनिवार, जनवरी 24, 2009

हम हैं इस पल यहाँ, जाने वो हैं कहाँ

आप जरूर सोच रहे होंगे कि ये 'वो' है कौन? बताते हैं लेकिन उससे पहले स्कूल के वक्त छत्रपति शिवाजी से जुड़ी इतिहास में पढ़ी एक बात याद आ रही है - गढ़ आया सिंह गया। शायद अब आप समझ ही गये होंगे हम किस तरफ जा रहे हैं। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं उन शहीदों की जो देश की रक्षा की खातिर शहीद हो गये। ये वो 'वो' हैं जो देश के भीतर भी देशवासियों की रक्षा करने के लिये अपनी जान की बाजी लगा गये। २ दिन बाद २६ जनवरी है यानि गणतंत्र दिवस, आइये उन शहीदों को पहले अपनी एक विनम्र श्रद्धांजलि देते हैं और देते हैं एक जोरदार सैल्यूट - जय जवान, जय हिंद

चर्चा की शुरूआत में पकड़ते हैं चुंगकिंग एक्सप्रेस, इसमें प्रत्यक्षा टिकट की जगह कहती है -
मैं बेतहाशा हँसती हूँ। इसलिये कि मुझे रोना नहीं आता।
ये तो अच्छी बात है, कई लोग तो सिर्फ इसलिये ही नही रो पाते क्योंकि रो रो कर उनके आँसू सूख गये। लेकिन अच्छा है अगर सब लोग यूँ ही हँसने लग जाये तो - हंसते हंसते कट जायें रस्ते।

हंसने से किसी का कल्याण हो ना हो लेकिन कमलकांतजी के कल्याण के सिद्धांत पढ़कर किसी का कल्याण तो जरूर होना चाहिये। अब ये भी बताने की बात है क्या कि "उनके भाग्‍य में पीएम इन वेटिंग होना ही लिखा है, पीएम होना नहीं।" किसके लिये कहा गया होगा। कमलकांत बुधकरजी राजनीति के ऊपर लिखते हैं -
बार बार साबित होता है कि राजनीति वेश्‍या है और वह किसी भी कोठे पर बैठ सकती है या किसी को भी अपने कोठे पर बुला सकती है। अब देखिये न, कभी के कटखने आज एकदूसरे की पप्‍पी लेने पर उतारू हैं और वह भी सरेआम। कह रहे हैं कि दोस्‍ती हो गई है। मस्जिद गिराने का श्रेय लेनेवाले उतावले अब मुल्ला मुलायम की गोद में हैं
।ऐसा नही है कि बात राजनीति में आकर ही चिपक गयी हो, बल्कि दोस्ती के लिये भी तारीफ के दो शब्द उनकी लेखनी से कुछ यूँ निकले -
लोग समझ लें कि यह दो विपरीत मगर सिद्धांतवादियों की दोस्‍ती है। दोस्‍ती का आधार तीन और छह के ही अंक हैं। अब तक के छत्‍तीस अब त्रेसठ होकर दोस्‍त बन गए हैं। यह एक ही प्रदेश के दो पूर्व मुख्‍यमंत्रियों की दोस्‍ती है यानी सेम स्‍टेटस। यह दो पूर्व अध्‍यापको की दोस्‍ती है और यह दोस्‍ती है दो धोतीवालों की। यानी अगेन सेम स्‍टेटस। और सबसे बड़ी बात यह है कि यह दो होनहार पुत्रों के स्‍नेहबद्ध पिताओं की दोस्‍ती हैा इस दोस्‍ती की जयजयकार होनी ही चाहिये। धिक्‍कार है इस दोस्‍ती को धिक्‍कारने वालों पर।
पीएम की वेटिंग का तो हमें समझ नही आया लेकिन विवेक गुप्ता जो पेंटिंग पेंटिंग कह रहे थे वो थोड़ी समझ जरूर आ गयी। वो पेंटरानी (स्त्री लिंग के लिये यही कहेंगे क्या?) पुष्पा द्रविड़ की बात कर रहे हैं जो क्रिकेटर राहुल द्रविड़ की माँ भी हैं। वो बताते हैं -
देश के प्रसिद्ध चित्रकारों में शामिल, कर्नाटक की लोकप्रिय चित्रकार डॉ. पुष्पा द्रविड़ के लैंडस्केप, पोट्रेट और वॉश के फिगरेटिव पेंटिंग्स भी देशभर में सराही जाती हैं।
यही नही इनके बारे में पढ़कर एक बात और क्लियर हो जाती है कि पढ़ने के लियेकोई उम्र नही होती, देखिये तो 58 वर्ष में पीएचडी -
कॉलेज की पढ़ाई के दौरान ही मेरा मन पीएचडी करने का था, लेकिन उस समय संभव नहीं हुआ। बाद में भी किसी न किसी कारण से यह टलता रहा। रिटायरमेंट के अंतिम वर्षो में मुझे लगा कि अब परिवार की जिम्मेदारियां पूरी हो गई हैं, तो सोचा कि यही समय है और बस पीएचडी कर ली।

पंकज अवधिया अपनी प्रतिक्रिया इस बार कुछ इस तरह से दे रहे हैं -
"अरे, यह तो भ्रमरमार है। एक नही दो-दो है।" मै लगभग चीख पडा। मेरी खुशी का ठिकाना नही रहा। ऐसा लगा जैसे मुझे अनमोल रत्न मिल गये हो।
क्या है ये भ्रमरमार, जाकर आप खुद देखिये

पौराणिक कथायें भी बड़ी अगड़म बगड़म होती हैं अगर हमारी बात पर यकीन नही आ रहा तो ओडेपस की ये कथा को ही ले लीजिये जिसमें ओडेपस ने अपनी माँ से शादी की थी बताया जा रहा है -
ग्रीस जिसे हम यूनान कहते हैं, के पौराणिक कथाओं में ओडेपस (Oedipus) नामक एक राजकुमार की कथा मिलती है. लगभग ईसा पूर्व ७वी शताब्दी में लाईअस (Laius) नाम का एक राजा थेबेस नगर राज्य का शासक था. उसकी पत्नी का नाम था जोकस्ता (Jocasta). इन्हें एक पुत्र होता है ओडेपस (Oedipus). राजा लाईअस ने , डेल्फी के पुरोहित, तिरेसियस, जो भविष्य वक्ता था (ओरेकल) से बच्चे के भविष्य की जानकारी चाही. ओडेपस स्फिंक्स के प्रश्न का उत्तर देते हुए उसने यह बता दिया कि बच्चा बड़ा होकर अपने पिता की हत्या करेगा और अपनी माँ से शादी कर लेगा.
और कमाल ऐसा कि ये हो भी गया। इस पर लावण्या जी ने एक सही टिप्पणी की - फ्रोइड महाशय ने इसीलिये तो "ओडीपस कोम्प्लेक्स " की थियरी प्रतिपादीत की थी - Truth is stranger then fiction !!धरोहर में अभिषेक नेताजी सुभाष चंद्र बोस को याद करते हुए लिखते हैं -
अपने विद्रोही स्वाभाव से ब्रिटिश साम्राज्य को झकझोर देने वाले सुभाष चन्द्र बोस का मानना था कि किसी भी युग में युवाओं कि बुनियादी सोच समान होती है। उन्हें अंजान राहें ज्यादा लुभाती हैं, जबकि समाज उन्हें अपनी आजमाई हुई लकीर की ओर ही खींचना चाहता है।
हमने भी बचपन में ये गीत प्रभात फेरियों में खूब गाया था, आप भी गुनगुना लीजिये -
कदम-कदम बढाये जा, खुशी के गीत गए जा;
ये जिंदगी है कौम की, तूँ कौम पर लुटाये जा।
शहीद तो शहीद ही होता है, उसका कोई सर नेम नही होता और ना धर्म ना जाति और ना ही ओहदा, हमें ऐसा ही लगता है और इसी से इत्तेफाक रखते हुए राम त्यागी पूछते हैं, मुंबई के कुछ ही शहीदों को सलाम क्यूं ?? -
क्यूं हर रोज केवल चुनिन्दा पुलिस वालो को ही बार बार शहीद बताया जा रहा है, सिर्फ़ इसलिए की वो उच्च पदों पर आसीन पदाधिकारी थे या फिर इसलिए की वो तथाकथिस शहरी वर्ग से आते थे, क्यों महानगरीय ठप्पे वाले लोग जैसे हेमंत जी, सालसकर जी को ही हम अशोक चक्र या वीरता चक्र देने की बात कर रहे है? क्या वो पुलिस वाले जो तीसरे विस्वयुद्ध की बंदूको से लड़ रहे थे या फिर अपने डंडे से ही कुछ कमाल दिखा रहे थे, शहीदी का तमगा नही लगा सकते ? मेने आज तक किसी भी टीवी चैनल पर साधारण पुलिस वालो का नाम या लिस्ट नही देखी , मेने अपने ज्ञान के अनुसार वेब पर भी इधर उधर नजर दौडाई पर कही भी मुंबई के ३ अफसरों के अलावा किसी और का नाम नही दिखा, ये क्या मजाक है?
ये तो पहले भी हुआ है आजादी से पहले और बाद सिर्फ किरदार बदल गये हैं, हम तो देश के हर शहीद के लिये नमन करते हैं। बात फर्क की चली ही तो आजादी से पहले की ये बात भी देख लीजिये -
सुभाष चंद्र बोस, महात्मा गांधी की इच्छा के विरुद्ध जब कांग्रेस अध्यक्ष चुन लिए गए, तो कांग्रेस में बवाल हो गया था। रामगढ़ कांग्रेस में सुभाष चंद्र बोस ने अध्यक्ष पद के चुनाव में पट्टाभि सीता रमैया को हराया था। इस पर महात्मा गांधी ने कहा था कि पट्टाभि की हार मेरी हार है। फिर क्या था, पूरी कांग्रेस कार्यसमिति ने इस्तीफा दे दिया। हार कर सुभाषचंद्र बोस ने भी अध्यक्ष पद छोड़ दिया।इसमें सुभाष की नैतिक जीत और गांधी की नैतिक हार हुई।
नेताजी को साहित्य शिल्पी में भी याद किया जा रहा है -
“दिल्ली चलो” और “तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आजादी दूँगा.. खून भी एक दो बुंद नहीं इतना कि खून का एक महासागर तैयार हो जाये और उसमे मै ब्रिटिश सम्राज्य को डूबो दूँ” का नारा देकर स्वाधीनता संग्राम मे नई जान फूँकने वाले सुभाष चन्द्र बोस
बाल-उधान में शोभा बच्चों को बता रही हैं - सुभाष चंद्र बोस से सीखो


अब कुछ कविताओं में नजर डालते हैं
दिल इक पुराना सा म्यूजियम है में रोशन नेता सुभाष चंद्र बोस को उनके जन्मदिवस पर याद करते हुए उनपर गोपाल दास व्यास की लिखी ये कविता 'ख़ूनी हस्ताक्षर' समर्पित करते हैं -
उस दिन लोगों ने सही-सही, खूं की कीमत पहचानी थी।
जिस दिन सुभाष ने बर्मा में, मॉंगी उनसे कुरबानी थी।
बोले, स्‍वतंत्रता की खातिर, बलिदान तुम्‍हें करना होगा।
तुम बहुत जी चुके जग में, लेकिन आगे मरना होगा।

आज़ादी के चरणें में जो, जयमाल चढ़ाई जाएगी।
वह सुनो, तुम्‍हारे शीशों के, फूलों से गूँथी जाएगी।
आजादी का इतिहास कहीं काली स्याही लिख पाती है
इसको लिखने के लिए खूनकी नदी बहाई जाती है।
.........
सारी जनता हुंकार उठी- हम आते हैं, हम आते हैं!
माता के चरणों में यह लो, हम अपना रक्‍त चढ़ाते हैं!
सीमा सचदेव भी नेताजी पर नन्हें मनों के लिये एक बड़ी प्यारी सी कविता पढ़वा रही हैं -
सुभाष चन्द्र जी बोस महान
थे बच्चो वो गुणों की खान
तीक्ष्ण बुद्धि उन्होंने पाई
देते थे अंग्रेज दुहाई
बचपन से ही थे महान
सभ्य,सुसंस्कृत और विद्वान
अपने देश से करते प्यार
प्रभु मे आस्था भी अपार
महा-विचारों को अपनाया
अपना जीवन लक्ष्य बनाया
लडेंगे देश के हित मे लडाई
नव-युवकों की सेना बनाई
दिया एक जन-जन को नारा
है यह हिन्दुस्तान हमारा
खून दो मुझको मै फरियादी
बदले मे दूंगा आजादी
वहीं मुक्ति बड़ी होती हुई लड़की के बारे में अपने ख्यालों को अल्फाजों में कुछ इस तरह से सिमेटती है -
अपने ही घर में वह डरती है /और अंधेरे में नहीं जाती /हर पल उसकी आँखों में /रहता है खौफ का साया /जाने किस खतरे को सोचकर /अपने में सिमटी रहती है /रास्ते में चलते -चलते /पीछे मुड़कर देखती है /बार -बार /और किसी को आता देख /थोड़ा किनारे होकर /दुपट्टे को सीने पर /ठीक से फैला लेती है /गौर से देखो /पहचानते हो इसे /ये मेरे ,तुम्हारे /हर किसी के /घर या पड़ोस में रहती है /ये हर घर -परिवार में /बड़ी होती हुयी लड़की है /... ... आओ हम इसमें /आत्मविश्वास जगा दें /अपने हक के लिए /लड़ना सिखा दें /हम चाहे चलें हों /झुक -झुककर सिमटकर /पर अपनी बेटियों को /तनकर चलना सिखा दें .
अल्पना ने पहले हाइकू की कल्पना की उड़ान भरी थी आज त्रिवेणी में हाथ दे मारा, हाईकू तो समझाये थे लेकिन त्रिवेणी कैसे लिखते हैं नही बताया लेकिन जो भी है पहली कोशिश शानदार रही -
हर दिन तलाशती हूँ जीवन -परिभाषा के शब्द ,
मेरा शब्द कोष अधूरा है या तलाशना नही आता ?
वह परिभाषा जो तुमने ही तो बतलायी थी मुझे.

टूट कर जुड़ती रही नीर भरी गगरी,
रिसता रहता है खारा पानी ,
फिर भी छलका जाते हो 'तुम ' आते -जाते!
हम सोच रहे हैं क्यों ना थोड़ा हाथ हम भी आजमा लें, अरे रे रे ब्राउजर क्लोज करने कहाँ चले, छोड़िये इस बार बख्श देते हैं।


अब हमको दीजिये इजाजत, हम हैं राही प्यार के फिर मिलेंगे चलते-चलते लिखते-लिखते लेकिन उससे पहले आप सभी लोगों को गणतंत्र दिवस की बहुत बहुत बधाई, और अंत में माखन लाल चतुर्वेदी की ये प्रसिद्ध कविता देश के तमाम शहीदों के नाम -

चाह नहीं मैं सुरबाला के
गहनों में गूँथा जाऊँ
चाह नहीं, प्रेमी-माला में
बिंध प्यारी को ललचाऊँ
चाह नहीं, सम्राटों के शव
पर हे हरि, डाला जाऊँ
चाह नहीं, देवों के सिर पर
चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ
मुझे तोड़ लेना वनमाली
उस पथ पर देना तुम फेंक
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पर जावें वीर अनेक ।।

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12 टिप्‍पणियां:

  1. मेरे एक मित्र बासठ की उम्र में पीएचडी के लिए पंजीकरण कराए हैं। पीएचडी चल रही है, पूरी भी होगी। रमेश उपाध्याय जैसे समर्थ कथाकार और संपादक 66 की उम्र में कथन का संपादन भार अपनी पुत्री को सौंप कर हफ्ते भर पहले ब्लागर बिरादरी में शामिल हुए हैं और अपना ब्लाग बेहतर दुनिया की तलाश लेकर आए हैं।
    जज्बा और कुछ करने की इच्छा हो तो उम्र कहाँ बाधक है?

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  2. बड़ी विस्तृत चर्चा. आभार.

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  3. काफ़ी विस्तृत चर्चा की जी आपने.

    रामराम.

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  4. मस्जिद गिराने का श्रेय लेनेवाले उतावले अब मुल्ला मुलायम की गोद में हैं
    --------
    कुछ भी शाश्वत नहीं है। कल मुल्लाजी मन्दिर न बनवाने लगें, और बीजेपी के हाथ से मुद्दा झटक लें!

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  5. इस रोचक पोस्ट के लिये बधाई और नेता जि को शत शत प्रणाम गणतंत्र दिवस के लिये बधाई

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  6. लिखिए आप भी..मैं ने हाथ आजमाया है...कोशिश सफल रही...आप भी लिखें ब्राउजर बंद नहीं करेंगे.पढेंगे और टिपियायेंगे भी.मैं ने त्रिवेणी यूँ नहीं समझाई क्योंकि इस के महारथी अनुराग जी हैं वही बता सकते हैं कैसे सम्पूर्ण त्रिवेणी होती है!
    आज की चर्चा विस्तृत रही और बढ़िया भी--जो पोस्ट
    रह गई हैं अब पढ़ लेंगे.गणतंत्र दिवस के लिये बधाई

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  7. अच्छी चर्चा की !
    नेताजी को नमन !
    ठेलते रहो !

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  8. सुभाष चन्द्र बोस अमर सेनानी हैं!

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  9. सुन्दर चर्चा। सब लिंक पढ़ के ईमानदारी से टिपिया रहे हैं। और हां त्रिवेणी के बारे में दो साल पहले समीरलालजी ने ये लेख लिखा था:
    त्रिवेणी: एक विधा समीरलाल जी के पहले हम भी एक ठो लेख लिखे थे:
    गुलजा़र की कविता,त्रिवेणी । आज की पोस्टों में ब्लागमामा डा.कमलकांत बुधकर जी का लेख धांसू च फ़ांसू लगा।

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  10. मैं हिन्दी ब्लॉग दुनिया की नई लिक्खाड़ हूँ आप. अपनी चर्चा में मेरी कविताओं को शामिल करके मेरा मान बढ़ा रहे हैं ,इसके लिए धन्यवाद !

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