कल सबेरे हमने चर्चा कर डाली तो लगता है कि वे सवाल लिये तैयारै खड़े थे। उन्होंने छूटते ही सवाल छोड़ दिया।
विवके उवाच:पहले अनुजा जी एक व्यक्ति का नाम तो बताएं जिसने स्त्रियों को प्रयोग करने के लिए मना किया हो :)
और ये 27 और 28 नम्बर क्या खाली रहने के लिए बनाए थे हमारे गणितज्ञों ने ?
अब भाई विवेक सवाल के पहिले हिस्से का जबाब तो अनुजा जी ही दे सकेंगी। पता नहीं वे इस पोस्ट को बांच भी पायेंगी या नहीं। वैसे उनके ब्लाग पर कापी प्रोटेक्शन वाला ताला लगा था वर्ना हम उससे कुछ भाग कापी करके भी पढ़वाते। रही बात 27 और 28 नम्बर खाली रखने की बात तो वो इसलिये छोड़ दिया था कि एक तो दफ़्तर भागने की जल्दी थी और दूसरे ये कि इसी बहाने लोग कुछ पूछेंगे तो हमें बताने का मौका मिलेगा। आपके सवाल से हमारे विश्वास की रक्षा हुई!
उड़नतश्तरी वाले साहब जो आजकल खंडित टिप्पणी देते पाये जाते हैं टेस्ट टिप्पणी के बाद कहते हुये पाये गये:
समीरलाल उवाच:बेहतरीन चर्चा के लिए बधाई इन्क्लूडिंग मुण्डली के लिए. :)
वेंकटरमण जी को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि!
अब मिश्रा जी के दरबार में अर्जी लगाये इन्तजार करेंगे.
मान्यवर बधाई और इन्क्लूसिव तो हम ग्रहण कर लिये।
वेंकटरमण जी की श्रद्धांजलि उन तक पहुंच गई होगी!
अब मिश्रा जी के दरबार में अर्जी लगाने की फ़र्जी बातें तो न ही करो जी। आप आराम से सो रहे होगे और बातें मिश्राजी की कर रहे हैं। कोई तो कह रहा था कि आप गाना गाते हुये पाये गये- मुझसे पहले सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग!
नवविवाहवर्षगांठिते शिवकुमार मिश्रजी कहने लगे:
शिवकुमार उवाच: बहुत बढ़िया चर्चा. एक लाइना तो गजब हैं.
कल की चर्चा शानदार होगी, ई कैसे पता चला? हमें प्रेशराइज कर रहे हैं का?
शिव प्रसाद जी की सहायता के लिए मैं तैयार हूँ. चूंकि बहुत बड़ी समस्या भाषा और शिव प्रसाद जी के कलकत्ते आने-जाने की है तो मैं कोशिश करूंगा कि कुछ अपनी कोशिश से और कुछ अपने संपर्क से उनकी समस्या का समाधान किया जा सके.
मान लिया जी चर्चा धांसू है। एक लाइना गजब के हैं! कलकी चर्चा शानदार होगी ये कहने में हर्जा क्या? हम आशावादी हैं! प्रेशराइज करने को अब क्या रह गया? दो दिन आपकी शादी की सालगिरह के पहले आपकी पत्नी की फोटॊ अलग कर दी गयी और कुछ बोले नहीं- हमारे ढेर उकसाने के बावजूद! जो महापुरूष उकसाने में न आयेगा वो दबाने में कैसे आ जायेगा? बताइये भला!
शिवप्रसादजी अगर इस पोस्ट को किसी तरह बांचें तो शायद आप तक अपनी समस्या भेंजे! या फ़िर साथी ब्लागर कुछ करें इस बारे में ताकि जानकारी शिवबाबू तक पहुंच सके।
रंजनाजी कहने लगीं:
एक लाइना बहुत बढ़िया रही .और आज तो हमारी पोस्ट का फोटोमय ज़िक्र हो गया धन्यवाद जी :)
हम आपको भी धन्यवाद कर देते हैं रंजनाजी! हिसाब बराबर न!
रंजन उवाच: बढीयां चर्चा.. काफी कुछ लपेट लिया..
शुक्रिया रंजनजी!। वैसे हम लपेटे नहीं! अपने आप लपिट गया!
डा.अमर कुमार उवाच:ठिक्कै लिखते हैं, जितू भाई..
अब समय हाथ पर हाथ बाँध कर बैठने का नहीं है..
आइये, हम एकजुट ( ? ) होकर पुनःब्लागिंग आरंभ करें !
"छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी... एट्सेट्रा एट्सेट्रा !"
पर ठहरिये पँचों,
मेरा खटारा ब्लाग तो बिना धक्के के चलताइच नहीं,
फ़र्स्ट हैण्ड उच्च टिप्पणी-पावर की पोस्ट न सही,
पर, कुछ तो.. धक्का-उक्का लगाइये, जो कि गाड़ी खिसके..
दू दिन से सुनते हैं न, बाऊ जी के..
"छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी... एट्सेट्रा एट्सेट्रा !"
मुला आपकी चर्चा तो चुस्त ढिंचक टुर्रा चर्चा है !
डा.साहब आपने जरूर यह टिप्पणी रात के तीन बजे नहीं लिखी इसीलिये मजेदार भी है ठिंचक टाइप भी!
संजय बेंगाणी का सवाल:शिवजी चर्चा करने वाले है?! हनीमून पर नहीं गए का? :)
जबाब: शिवजी इस कोहरे के मौसम में कहीं जाने की बजाय चर्चा करना और चर्चित होना पसंद कर रहे हैं। चर्चित तो २६ को हो लिये अब जस्ट फ़ार अ चेंज चर्चा भी कर डालेंगे कर के डाल देंगे।
ताऊ उवाच! वाह वाह ये हुई ना फ़ुरसतिया जी बिल्कुल ढिंचक चर्चा. बेहतरीन और लाजवाब.
रामराम.
जबाब: ताऊ रामराम! आप इधर आते रहो की कित्ती चर्चा होगी आपकी!
महेन्द्र मिश्र उवाच:चर्चा. बेहतरीन और लाजवाब.
भाई आपके चिट्ठाचर्चा का कोई जबाब नही . ये चर्चा करना तो कोई आपसे सीखे. धन्यवाद.
महेन्द्र भाई कोई सीखने की छोड़ो जो सीखे हैं वे भी जाने कैसे -कैसे बहाने बनाये जबलपुर में पड़े हैं। चर्चा करने का नाम ही नहीं लेते।
हिंमांशु उवाच:विस्तृत चर्चा के लिये धन्यवाद. एक लाईना की २७वीं और २८वीं लाइन नहीं दिख रही. कुछ अदृश्य तो नहीं उसमें.
हिमांशुजी इस २७/२८ का जबाब तो सबसे पहिले ही जबाब में दे दिया। बकिया चर्चा के लिये धन्यवाद। सब हमारे साथियों में बांट लेगें।
सीमा गुप्ता: इ चर्चा तो कुछ फुर्सत में लिखी गयी है.....शानदार .. और जानदार भी...Regards
सीमा गुप्ताजी: चर्चा तो हड़बड़ाते हुये लिखी थी। अब जबाब फ़ुरसत में लिख रहे हैं! Regards
विनय: वाह,वाह
जबाब: आह,आह! अश-अश!
कार्तिकेय उवाच:उड़ी बाबा... बड़े प्रयोग किए जा रहे हैं. गाँधी बाबा तो सही टाइम पर निकल लिए, तबतक स्त्रियों ने हको-हुकूक की बात ही न की.. आज के जमाने में होते तो.......???
मुंडलिया किंग समीर जी की जय हो... हाँ ये २७.: २८. : वाला फंडा हमहूँ को समझ न आया..
जबाब: गांधीजी होते तो नये प्रयोग करते। २७/२८ बता दिया भाईजी
रतन सिंह शेखावत उवाच:बेहतरीन चर्चा
जबाब: शरमाता हुआ शुक्रिया।
शास्त्रीजी उवाच:दो हफ्ते के बाद आपकी चर्चा पढने का मौका मिला. मन को बडा सकून मिला.
सब को ब्लागेरिया से इन्फेक्ट करने के तमाम तरीके हैं आपके पास. करते रहिये, चिट्ठाजगत के लिये यह बीमारी उतनी ही जरूरी है जितना अस्पताल के चलने के लिये रोगी जरूरी हैं
सस्नेह -- शास्त्री
जबाब: शास्त्रीजी मौके तो निकालने पड़ते हैं। मौका कोई इनीशियल एडवांटेज तो है नहीं कि बाद में उसके न मिलने के लिये परेशान हुआ जाये। चिट्ठाजगत का बीमारी नहीं स्वस्थ अदाओं के रूप में प्रचार हो तो कित्ता अच्छा होगा! है न!
ये सब सवाल-जबाब तो हम ऐसे ही कर दिये काहे से कि शिवकुमारजी भले ही हनीमून मनाने न गये हों लेकिन घर में तो हैं। हनीमून के मुकाबले आदमी घरमून में ज्यादा व्यस्त हो जाता है। दोपहर तक वे चर्चा कर पायेंगे लिहाजा तब तक आप इसे ही बांच लीजियेगा है न!
अब देखिये शिवकुमारजी ने एक पोस्ट लिखी जिसमे कुछ ब्लागिंस स्लागिंग का जिक्र है। विश्वामित्र के माध्यम से बताया गया है कि आदमी अगर ब्लाग लिखने लगे तो अपने आप व्यस्त हो जाता है। उसके पास टाइम ही नहीं बचता कि वो बेचारा रंभा.मेनका उर्वशी वगैरह से डिस्टर्ब हो सके। वह डिस्टर्बेन्स में आत्मनिर्भर होकर तपस्या रहित स्थिति को प्राप्त होता है।
इसी पोस्ट को बाद में शिवजी के भक्त विवेक सिंह जनता-जनार्दन के हित में सरल भाषा में लिखकर छाप दिया:
आज सुनाएं एक कहानी ।
अभी याद है मुझे जुबानी ॥
मेरे गुरु कहा करते थे ।
सूकरखेत रहा करते थे ॥
विश्वामित्र इन्द्र से रूठे ।
रहे सहे सम्बन्ध भी टूटे ॥
विश्वामित्र ऋषि थे ज्ञानी ।
सोच समझकर मन में ठानी ॥
आखिर में होता क्या ये देख लीजिये बस्स:
विश्वामित्र सभी भूलेंगे ।
सिर्फ बिलागिंग में झूलेंगे ॥
याद रहेगी नहीं तपस्या ।
कर डालो बस देख रहे क्या ॥
विश्वामित्र लुटे बेचारे ।
एक बार फिर से वे हारे ॥
कुछ भी ब्लॉगिंग में न मिला था ।
किंतु इन्द्र को चैन मिला था ॥
अब आप देखिये ब्लागिंग क्या हाल बना के छोड़ता है। उधर विश्वामित्र को इंद्र ने मामू बना दिया इधर ब्लागिंग के चलते समीरलाल को क्या हुआ कि कहने लगे- मुझसे पहली सी मोहब्बत! हमको पक्का पता है कि समीरलाल इसके बाद लिखने वाले थे - एक बार फ़िर से मांगो न! लेकिन ऐन टाइम पर बचा गये। और बात को गोलमोल जबलपुर जलेबी बना दिया। बहरहाल वो जाने उनका काम। उनकी मोहब्बत का हिसाब हम कहां तक रखेंजी!
लेकिन छोड़िये अब आप भी इसे। चलिये मैनपुरी षडयंत्र के बारे में कुछ जान लें।
एक लाइना:
- एक वीर्यवान और पौरुष से लबरेज समाज का नामर्द राष्ट्रपिता :अब जैसा भी है निभाना ही है! वैसे भी पिता और राष्ट्रपिता चुनने में हमारा कोई अधिकार तो है नहीं!
- क्या यह हिन्दुस्तान में संभव है? : काहे नहीं?
- क्या श्रीराम सेना ने जो किया उसकी निंदा उचित है? :बुराई क्या है निंदा करने में, कुछ खाना ही पचेगा!
- विश्वामित्र लुटे बेचारे : ब्लागिंग के चलते गये काम से बेचारे
- पगला हुआ :तो कहां ले जाओगे ?आगरा कि रांची?
- क्योंकि औरत हो जाना कोई महान काम नहीं है :अरे ! बहुत महान काम है जी!
- सविता भाभी के बहाने स्त्री विमर्श! राम ही राखै!! : राम कैसे स्त्री विमर्श कर सकते हैं जी?
- मुझसे पहली सी मुहब्बत.. :मेरे महबूब एक बार फ़िर से मांग!
और अंत में
चलिये एक और चर्चा ठेल दिये। वैसे मैंने सोचा कि शायद लोग पूंछे कि आप कैसे चर्चा कर लेते हैं लेकिन फ़िर काम में फ़ंस गये लोग तो ई सब नहीं पूछे।
अब आप सो जाइये। हम भी सो रहे हैं। बत्ती बन्द करके। आपको शुभरात्रि। जो लोग सुबह-सबेरे नेटदर्शन करेंगे उनके लिये शुभ प्रभात।
शुभ प्रभात:
जवाब देंहटाएंपूरी चर्चा पर भारी पड़ा वन लाईना नं १:
अब जैसा भी है निभाना ही है! वैसे भी पिता और राष्ट्रपिता चुनने में हमारा कोई अधिकार तो है नहीं!
जो सीखे हैं वे भी जाने कैसे -कैसे बहाने बनाये जबलपुर में पड़े हैं। चर्चा करने का नाम ही नहीं लेते।
-अभी तो आशिकी का लफड़ा निपटे, जब न चर्चा करें. अभी तो टंगे है सुलझाने में कि मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग..
आप भी समझ नहीं पाते इशारे में.
विवेक की विश्वामित्रिय कविता के तो क्या केने, क्या केने. :)
"...वैसे उनके ब्लाग पर कापी प्रोटेक्शन वाला ताला लगा था वर्ना हम उससे कुछ भाग कापी करके भी पढ़वाते।..."
जवाब देंहटाएंइसका सबसे सरल तोड़ यह है कि आप ब्राउजर में उस वेब पेज को फाइल>सेव एज के रूप में क्लिक कर के सादा एचटीएमएल के रूप में अपने हार्ड डिस्क में सेव कर लें और फिर उस सेव की हुई एचटीएमएल फाइल को ब्राउजर में खोलें. अब आप सामान्य कापी-पेस्ट आसानी से कर सकेंगे
आप कैसे कर लेते है दुनिया का थैंक्सलेस काम यानी चिटठा चर्चा . थैंक्स लेस इसलिए जिनकी चर्चा नही हुई वह तो नाराज़ होते है और जिनकी चर्चा आप ने कर दी उनेह लगता होगा बस इतनी सी चर्चा .
जवाब देंहटाएंफिर भी आप चिटठा चर्चको का दिमाग कम्पुटर से तेज़ दोड़ता है !
इ चर्चा फुर्सत मा रही उ चर्चा हडबडी मा.....कुछ गडबड है....इ हडबडी और फुर्सत की defination का रही ...हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा "
जवाब देंहटाएंRegards
वाह वाह . आज एक नया शब्द दिया आपने..खण्डित टिपणी. आईडीय़ा बुरा नही है जी. बाकी तो एक लाईना गजब हैं.
जवाब देंहटाएंरामराम.
जवाब देंहटाएंपिंचक चर्चा संज्ञान में ली गई,
पाठकों से संस्तुति की जाती है, कि
चर्चाकार को समुचित टिप्पणी प्रोत्साहन दें ।
ताकि भविष्य में पिंचक-चर्चा की संभावना बनी रहे ।
भवदीय - :)
फ़िर वही उड़न तश्तरी उर्फ़ कनाडा वाले उर्फ़ समीर लाल जी टिप्पणी
जवाब देंहटाएंपूरी चर्चा पर भारी पड़ा वन लाईना नं १:
अब जैसा भी है निभाना ही है! वैसे भी पिता और राष्ट्रपिता चुनने में हमारा कोई अधिकार तो है नहीं!
को कॉपी पेस्ट कर रहा हूँ .क्यूंकि सहमत हूँ.
वैसे भी बड़े बड़े 'सो कॉल्ड लिख्हड़-विचारक ' ब्लॉग जगत में टिप्पणी मोडरेशन नाम की सुविधा का दुरपयोग करते हुए सिर्फ़ अपने लेख के समर्थन में की गयी टिप्पणी को प्रकाशित करते है.......
"वैसे मैंने सोचा कि शायद लोग पूंछे कि आप कैसे चर्चा कर लेते हैं"
जवाब देंहटाएंमैं कम से कम दस बार पूछ चुका हूँ कि आप समय कैसे निकाल लेते हैं. (1000 बार मन मे सोच भी चुका हूँ कि इस आदमी के पास क्या मंतर है जो इस तरह के जंतर पेश करता रहता है).
आप का योगदान अनोखा है. अपने वश की बात नहीं है, क्योंकि अपन तो इनीशियल एड्वांटेज में ही मस्त हैं !!
सस्नेह -- शास्त्री
पिंचक चर्चा भी बहुत भायी:) बहुत मेहनत करते हैं सब इस चिटठा चर्चा में .बढ़िया
जवाब देंहटाएंएकदम झकास !
जवाब देंहटाएंपिंचक चर्चा तो ढिंचक चर्चा के भी कान काट ले गई :)
जवाब देंहटाएंRaviji, kuch bahut hi aasan upay yehan bhi hain, jisme kisi file ko save nahi karna parta
जवाब देंहटाएंताला लगे ब्लोगस या साईट का ताला कैसे खोले