मंगलवार, जनवरी 06, 2009

पब्लिक को होशियार जान लो !

नमस्कार !

नववर्ष की प्रथम मंगल-चर्चा में आपका हार्दिक स्वागत है !

यह वर्ष सभी के लिए मंगलमय हो ! सबसे पहले उनका नम्बर जो पहले ही लेट हो गए हैं . कहते हैं : भाई साहब, हैप्पी नियू ईयर टू यू ! जो जो भाई साहब हों हाथों हाथ बाँट लें, फिर तो एक साल बाद मिलेगी . बाकी के लिए या तो पहले भिजवा दी होगी या पीछे आती होगी थोडा धीरज धरें .

धैर्य और अहिंसा जैसे शब्दों का प्रयोग हो तो गाँधी जी याद आ ही जाते हैं . किंतु अब गाँधी जी के विचारों को आप और नजदीक से जान पाएंगे . यह ब्लॉग उन्हीं को समर्पित है . झलक देखिए :

"गांधीजी ने कहा था कि - "यदि किसी को मेरी लिखी किन्ही दो बातों में असंगति दिखाई दे और फ़िर भी उसे मेरी विवेकशीलता में विश्वास हो, तो उसे उसी विषय पर मेरी बाद की तारीख में लिखी बात को मानना चाहिए।"
अपनी असंगतियों को खुलकर स्वीकार करने वाले गांधीजी की हिंसा और कायरता के सन्दर्भ में व्यक्त विचारों का यहाँ जिक्र उचित होगा-
(i) "समूची प्रजाति के नपुंसक हो जाने का खतरा उठाने के मुकाबले मैं हिंसा को हज़ार गुना बेहतर समझता हूं।"
(ii) "जहाँ केवल कायरता और हिंसा में से एक का चुनाव करना है वहां मैं हिंसा को चुनुँगा। कायर की भांति अपने अपमान का विवश साक्षी बनने की अपेक्षा भारत के लिए अपने सम्मान की रक्षार्थ शस्त्र उठा लेना मैं ज्यादा अच्छा समझूंगा। लेकिन मेरा विश्वास है की अहिंसा हिंसा से अत्यधिक श्रेष्ठ है।"

अहिंसा के नाम से तो गौतम बुद्ध भी जाने जाते हैं . किन्तु जब आशीष कुमार 'अंशु' बुद्ध की नगरी गया गए तो क्यों चौंक गए . क्योंकि : "बुद्ध की नगरी गया जाना हुआ. वही एक मन्दिर में यह सूचना पढ़ने को मिली.

'कृपया शोरगुल करना सख्त मना है'. अब भाई जान (सूचना लिखने वाले) सख्त ही करना था तो कृपया क्यों लिखा ?
"

वैसे इन्हें यह देखने के लिए गया जाने की आवश्यकता बिल्कुल न थी . यह तो रवि रतलामी जी ने ही कहा है . किसी भले आदमी से हिन्दी अनुवाद करवा लेते बस . हमें तो खैर अंग्रेजी आती नहीं . रवि जी कहते हैं : स्ट्रिक्टली, नो डंकी बिज़नेस प्लीज़! अब बताइए क्या कसर रह गई ? बस इसमें इंसानों के साथ साथ गधों को शामिल किया गया है . कहते हैं :

"ठीक है, गधा बनें, गाहे बगाहे बनें, जब चाहे बनें, मगर जब भी बनें तो मिस्री गधे बनें. मिस्री क्यों? भाई, मिस्र के गधों का एक स्टैण्डर्ड है. मिस्र के गधे ऐसे वैसे गधे नहीं हैं. उनका एक क्लास है वर्ग है. एलीट क्लास. वहां के गधे डायपर्स पहनते हैं. मिस्र की सरकार ने मिस्र में गधों को सार्वजनिक स्थानों पर पोतड़े (नैपी) पहने बगैर निकलने पर पाबंदी लगा दी है. यदि कोई गधा बिना पोतड़े पहने सड़कों पर नजर आया तो उनके मालिकों को जुरमाना अदा करना होगा. मजबूरी में मालिक भले पहने या न पहने, अपने गधे को वो पोतड़े मजबूरी में पहनाएगा."

क्या कहा ? गधों की बातें अच्छी लगीं तो और पढवा देते हैं . हमारा क्या जाता है :

"मिस्र में अब कुछ मनोरंजक परिस्थितियाँ नजर आएंगी – सड़कों पर हरे नीले पीले लाल रंगों के डिजाइनर पोतड़े पहने गधे जब इतराते हुए, दुलत्ती झाड़ते हुए चलेंगे तो सेंट लारेंस और मनीष मलहोत्रा से डिजाइन किए परिधान पहने मनुष्यों को भी शर्म आएगी. गधों की मालकिनें आपस में बातें करेंगी – मेरे गधे का पोतड़ा तेरे गधे के पोतड़े से सफेद कैसे? बाजार में वर्लपूल का नया फजीलाजिक फुल्ली ऑटोमेटिक वाशिंग मशीन जारी किया जाएगा जो विशेष रूप से गधों के पोतड़े और ज्यादा बेहतर, और ज्यादा साफ, और ज्यादा सूखा धोने के लिए विशिष्ट डिजाइन वाला होगा. किसी गधे की औक़ात अब उसके मालिक नहीं, बल्कि उसके पोतड़े – उसके डायपर से पहचानी जाएगी – कि उसने कितना क़ीमती पोतड़ा पहना है और कि क्या उसने डिस्पोज़ेबल डायपर्स पहन रखे हैं!"

गधों की बात हो और कुत्ते छोड दिए जाएं तो वोट बैंक को खतरा हो जाएगा . इस लिए समय की नजाकत को देखते हुए छोटी सी दुनियाँ में चलते हैं :

" कुत्ते को कुत्ता कहना जैसे कुत्ते को गाली देना है सो मैं उसे डॉगी कह रहा हूं.. बात यह है कि जब वही बात अंग्रेजी में कहते हैं तो लगता है जैसे अमृत वर्षा हो रही हो.. ये कुछ-कुछ वैसा ही है जैसे किसी अंधे को अंधा नहीं कहकर आजकल हम ब्लाईंड परसन तो लगता ही नहीं है कि हम कुछ बुरा कह रहे हैं.. कुछ गालियां भी ऐसी ही है, जिन्हें अगर हम हिंदी में कहें तो अक्षम्य हो जाये मगर अंग्रेजी में तो सब क्षम्य होता है.. ये कुछ ऐसा ही है जैसे पंछियों में राज हंस की बोली और आदमियों में गोरों की.. हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के शब्दों में कहूं तो, "जिसकी प्रशंसा हंस भी करे वह जरूर बड़ा तत्वज्ञानी होगा.. यह बात बहुत-कुछ ऐसी ही थी जैसे आजकल घटित हो रही है.. जिसकी प्रशंसा श्वेतकाय अंग्रेज कर दे उसे आज भी महान तत्वज्ञानी मान लिया जाता है..
"

कुछ शरीफ टाइप के लोग ये तथाकथित बेहूदा बातें पढकर लज्जा से धरती में गढे जारहे होंगे . उनकी तसल्ली के लिए बता दें कि हमने जानबूझकर ऐसी स्थिति बनाई है ताकि लज्जा से सुख उपज सके . भाई विष्णु बैरागी जी को लज्जा से सुख उपजा है . आप भी लज्जित होइए और सुख उपजाइए . हो गई ना सुख की खेती ? कहते हैं :

" अवर्णनीय सुखों में एक सुख और जोड़ लिया जाना चाहिए। नहीं, यह मेरी कोई नई खोज नहीं है। यह मेरी नवीनतम अनुभूति है जो सरिता के कण्ठ से चल कर मुझ तक पहुँची है। यह अवर्णनीय सुख है - ‘लज्जा से उपजा सुख।’ "

कहा जाता है कि भारत में बहुत ज्ञानी रहते हैं . यहाँ हर तरह की सलाह टके सेर मिलती है . अगर किसी को बोलो कि जुकाम हो गया है तो खडे खडे कम से कम चार दवाई तो बता ही देगा . यह बात अलग है कि पाश्चात्य वैज्ञानिक जुकाम की कोई अच्छी दवा अब तक नहीं खोज सके . यह हालत ज्ञान के सभी क्षेत्रों में है . फिर भी प्राइमरी के मास्साब तीन महीने से अपनी बच्ची के लिए कोई अच्छा सा नाम नहीं तय कर सके . अब बिलागरों से पूछ रहे हैं : "

वैसे मेरी बड़ी बेटी का नाम हिया है/ कुछ ऐसा ही छोटा नाम चाहता था मैं ..../मेरी पत्नी का कहना था कि मैंने ब्लॉग्गिंग के चक्कर में ही उसका अब तक नाम नहीं रखा है ,जाहिर है !!! 19 अक्टूबर को पैदा हुई बिटिया अब लगभग ढाई महीने की हो गई है तो मैंने सोचा कि क्यों न आप सब की ही मदद ले ली जाए!!अपनी घरवाली से चर्चा के बाद क्या नाम रखा ... यह आप सब को जरूर बताऊंगा !!आख़िर वह भी तो प्राइमरी कि मास्टरनी जो ठहरी!!!!! "

आप भी इस भलाई के काम में सहयोग कर सकते हैं तो बता दें कोई अच्छा सा नाम ! है न रोचक ?

रोचक जानकारियाँ ब्लॉगजत में और भी हैं . बाल उद्यान देखिए : "प्यारे बच्चों!मैं आपसे कुछ रोचक जानकारी बाँटना चाहती हूँ।

"

१ ऊँट की रीढ़ की हड्डी एकदम सीधी होती है।

२ रात में सोते समय अधिकांश लोग ४० बार करवटें बदलते हैं।

३ एक पंख रहित उड़ने वाली जाति का कीड़ा महीनों तक अंटार्टिका की बर्फ में जमकर तो जीवित रह सकता है, लेकिन मनुष्य के हाथ की गर्मी मात्र से मर जाता है।

४ चूहा ऊँटसे भी ज्यादा दिनों तक पानी के बिना रह सकता है।

५ लाल सागर सबसे गर्म व सबसे अधिक नमक वाला समुद्र है। इसमें कोई नदी नहीं गिरती। यह चारों ओर से झुलसी हुई जमीन से घिरा है। भी ज्यादा दिनों तक पानी के बिना रह सकता है। "

दिल को छूने वाली जानकारी रही ना ? अब रुख कीजिए दिल को छोने वाली पोस्ट का . यह खिताब मिला कुश की पोस्ट को . जिन्होंने बडा ही नेक रेजोलुशन लिया है : "

पापा को कोई गिफ्ट दू अच्छा सा? क्या दू?वक्त ! ........... हाँ यही ठीक रहेगा.. पापा को थोड़ा वक़्त देता हू.. यही रेजोलुशन ठीक रहेगा.. ये साल पूरा पापा के नाम है.. बस
"

कुश की लेखनी ने रेजोलुशन में ऐसा कुछ मिलाया है कि पढने वाला इसे अपना रेजोलुशन समझ बैठता है .

पापा के लिए रेजोलुशन तो बच्चों के लिए क्या ? बच्चों के लिए दो सुन्दर कविताएं :

बडे निराश न हों हमारे कविगण हर तरह की कविताएं लिख रहे हैं . कवि कविता किए बिना न मानेंगे . और हम आपको कविताओं के सागर में डुबाए बिना न मानेंगे . तो कूद पडिए :

  1. जितने मिले धूप के टुकड़े -राकेश खण्डेलवाल
  2. कोई वज़ह तो है......... -यौगेन्द्र मौद्गिल
  3. वेदना का वृक्ष -सीमा गुप्ता
  4. तखरीव का बादल -हरकीरत हकीर
  5. दिल !- पारुल
  6. जो मुझे होता है वह दर्द तुझ तक पहुँचे - विनय प्रजापति 'नज़र'
  7. ले दुनिया को साथ दुष्ट पर हमला करिए दिव्यदृष्टि
  8. शुभ की कामना ! रंजना
  9. नए साल पर मिला नैना को एक उपहार सुशील कुमार छौक्कर
  10. मेरा मुन्ना डॉ. भूपेन्द्र सिंह

कल लिकिंत मन नाम के ब्लॉग पर खूब रौनक रही . हुआ यूँ कि मिस्टर क ने अखबार में साझे ब्लॉगों का दौर नामक शीर्षक से कुछ छाप दिया . वैसे तो नए ब्लॉगरों के लिए यह लेख उपयोगी साबित होता . किंतु ख और ग ने मौका-ए-वारदात पर पहुँच कर इसे अपनी बहुमूल्य टिप्पणियों से अति उपयोगी बना दिया है . अब हम इसकी अनुशंसा किए बिना न रह सकेंगे . जिज्ञासु पाठक वहाँ जाएं और अपना ज्ञान बढाएं .

ज्ञान बढाकर घर नहीं लेजाना . यहीं बाँटना है . तो बाँटिए

:

और अंत में मुख्य समाचारों पर एक नज़र
:

अब एक जरूरी सूचना :पिछले कुछ दिनों से टिप्पणियों की संख्या में कमी देखी जारही है . अब उडन तश्तरी सेवा के बहाल होने से इसमें सुधार की आशा है . जो ब्लॉगर अपनी टिप्पणियाँ रेल द्वारा भेज रहे हैं वे कृपया कोई दूसरा तीव्र साधन तलाश लें . क्योंकि रेल मुख्यालय स्थित हमारे संवाददाता के अनुसार कुहासा रेलों का दुशमन बना हुआ है .

चलते- चलते :

कोहरा

माना धुँधला है यह कोहरा .

किन्तु न इसको बनाओ मोहरा ..

अपनी गलती छुपा रहे हो .

कोहरे का डर दिखा रहे हो .

पर पब्लिक सब कुछ जाने है .

सच्चाई को पहचाने है .

ट्रेन लेट होती गर्मी में .

कुछ न रखा इस हठधर्मी में .

अपनी गलती आप मान लो .

पब्लिक को होशियार जान लो ..



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30 टिप्‍पणियां:

  1. भई साल की पहली चर्चा बड़ी ज़ोरदार रही, ख़ूब लोगों के नाम आये।
    विवेक जी धन्यवाद!

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  2. वाह!! नये साल की नई चर्चा और इतना विस्तारित कवरेज. बहुत बधाई एवं शुभकामनाऐं.

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  3. सुबह-सुबह अच्छी सैर कराने का धन्यवाद...!

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  4. बहुत अच्छी चर्चा ! टिप्पणी तो हमारी बहुत बड़ी है लेकिन कुहासे के कारण दिखाई नही दे रही !

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  5. बहुत अच्छे ..बढ़िया चर्चा रही....

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  6. बढ़िया चर्चा मित्र.. :)

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  7. माना धुँधला है यह कोहरा .

    किन्तु न इसको बनाओ मोहरा ..

    अपनी गलती छुपा रहे हो .

    कोहरे का डर दिखा रहे हो .

    पर पब्लिक सब कुछ जाने है .
    " पब्लिक है सब जानती है की विवेक जी की चर्चा लाजवाब है , तालियाँ ...... नव बर्ष की शुभकामनाएं "

    regards

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  8. बहुत अच्छी रही चर्चा. वैसे कुहासे का भी अपना आनंद होता है, ये दिल्ली वाले ख़ास तौर से जानते हैं|

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  9. आपकी पिछ्ली चर्चाओं की भांती ही यह चर्चा भी खूब रही......

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  10. चर्चा तो लाजवाब रही जी.

    रामराम.

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  11. बढ़िया चर्चा रही ! टिपण्णीयों में कमी पर छुट्टियों के मौसम का असर है.

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  12. वाह विनय भाई...सुंदर और विस्तृत चरचा के लिये बधाई
    कैसे इतने धैर्य से इतना सारा कुछ लिख लेते हो आप लोग...

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  13. अब तो मंगलवार का इंतेज़ार रहता है.. चर्चा पढ़ते पढ़ते ही मन खिलखिला जाता है.. एक एक कड़ी एक दूसरे के साथ बहुत ही अच्छे से पिरोइ है..

    हमारी पोस्ट ने आपके दिल को छुआ हमारे लिए यही काफ़ी है.. इसी लिए तो शैलेंद्र साहब ने गाना लिखा है. दिल का हाल सुने दिलवाला..

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  14. बढ़िया चर्चा !!!
    हमेशा की तरह मजेदार!!! , काफी जानकारियों को समेटा आपने !!!
    नए साल की बधाई .......से लेकर कुहासा तक!!!

    और हाँ मदद की गुहार को बड़े फलक तक पहुचाने का विशेष शुक्रिया !!
    और अब चलिए !! मेरी मदद करने .....

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  15. यह इक्कसवीं मेरी...
    यह ठीक है, विवेक.. और चर्चा भी मस्त !

    इसलिये नहीं कि, आज मेरा चिट्ठा यहाँ दिख रह रहा है,
    बल्कि इसलिये कि, केवल लिंक देकर चर्चाकार की चंद लाइनों की
    टिप्पणी की पैरवी मैं करता आया हूँ । चट से ज़वाब आ जाय कि, फिर आपही कल्लो..
    सो ऎसा सुझाव टालता रहा ! यदि चर्चा के वास्तविक स्वरूप को अतीत तक में जाकर देखा जाय,
    तो यह ग्रुप-ब्लाग है.. सो, ऎसॆ किसी सुझाव को मान लिये जाने की बाध्यता भी मैं नहीं देखता !
    पर, ऎसा संतुलन देख कर अच्छा लग रहा है !
    अपने वास्तविक रूप में न तो यह एग्रीगेशन और न ही समीक्षा का मंच है ! बल्कि, सच तो यह है कि न तो यहाँ पारंगत समीक्षक आलोचक हैं, न ही ऎसे चिट्ठे.. जो दिमाग को अधिक देर तक बाँधें रहॆं ! शायद, अच्छे चिट्ठों को एवं चिट्ठालेखन को सामने लाने के लिये ही यह मंच बना होगा, क्योंकि सभी चर्चाकार एक से बढ़ कर एक उत्साही आत्मायें हैं,
    सो, अपने प्रयास में तुम सदैव सफल रहे हो.. एक बार फिर,बधाई दूँगा !

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  16. .उत्तर प्रदेश में बी. एस. पी. के एक मंत्री मनमानीय सी.. अवधपाल यादव ने इस आधार पर गाँधी जी , नेहरू ,लाल बहादुर शास्त्री जी ,एवं अन्य स्वतंत्रता सेनानी राष्ट्रीय नेताओं को माफ़िया कहा कि उनके विरुद्ध भी उसी प्रकार से मुक़दमे चले थे, जिस प्रकार '' डी.पी.यादव" के विरुद्ध चल रहे हैं और इसी लिए अगर डी.पी. यादव [नेता] को " माफ़िया " कहा जाएगा तो गाँधी जी आदि भी माफ़िया कहे जाएँगे |
    शायद मान नीय मंत्री महोद यह भूल गये कि राष्ट्रीय नेता, स्वतंत्रता सेनानी, और माफ़िया आदि कि उपाधि में से कौन सी उपाधि [डिगरी ] किसे दी जाए यह निर्णय इस पर लिया जाता है कि मुक़दमा किस नवैयत का चला है |
    अब इस पर गाँधी होते तो क्या कहते ?
    " चिट्ठा चर्चा मस्त ,बधाई भी अलमस्त "!!!

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  17. शानदार। बहुत मेहनत से चर्चा की। बहुत अच्छा लगा।

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  18. आप सभी को चर्चा अच्छी लगी तो मुझे खुशी हुई .धन्यवाद !
    @ शेखावत जी , कुहरा छँटने दीजिए तब गौर से देखेंगे :)
    @ गौतम राजरिशी, हम आपसे बहुत नाराज हूँ :) चर्चा हम कर रहा हूँ क्रेडिट विनय को दे रहें हैं :(
    @ कुश भाई, आपको मंगल का इंतजार रहता है जानकर अच्छा लगा . हमारी कोशिश रहेगी कि मंगल में जब आप जगें तो चर्चा पहले से ही तैयार मिले .
    @ प्रवीण त्रिवेदी जी, अजी शुक्रिया कहकर शर्मिन्दा क्यों करते हैं यह तो मेरा फर्ज़ था :)
    @ अमर जी , यह आपने इक्कीसवीं शुरू की होगी पर लिखते लिखते तेईसवीं हो गई . आपकी टिप्पणी विशेष होती है . शुक्रिया !
    @ ''ANYONAASTI '' , आपने चर्चा का उद्देश्य पूरा कर दिया कुछ मुद्दा उठाकर . बेशक विचारणीय मुद्दा है . शुक्रिया !

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  19. मंगल मंगल मंगल मंगल मंगल मंगल हो, बहुत खूब चर्चा

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  20. काफी जानकारियों को समेटा आपने !

    हमेशा की तरह बढ़िया चर्चा !

    बहुत बधाई एवं शुभकामनाऐं !

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