मंगलवार, अक्तूबर 03, 2006

बोनस बँटी,दिहाड़ी गोल

सबेरे से हम चिट्ठाचर्चा की खोज में वैसे ही बैठे हैं जैसे ब्लागर जन नारद के लिये आंखें बिछाये बैठे हैं। लेकिन चिट्ठाचर्चा दिखी ही नहीं। हमें बहुत गुस्सा आया कि ये क्या मजाक है। कभी दिन में चिट्ठे लिखे और कभी दो दिन ठप्प। उसको बताया बोनस चिट्ठा और रोज का लिखा ही नहीं। इसे कहते हैं -बोनस बँटी,दिहाड़ी गोल। बहरहाल आप परेशान मत हो बोले तो टेन्शन नहीं लेने का। अपुन सब संभाल लेगा। हम अभी देखता है लफड़ा क्या है तब तक आप इधर ये चिट्ठालोग को देखो। एकदम ताजे हैं:-
१.हिन्दी पखवाड़े की भेंट- रविरतलामी
२.गांधीगिरी-मनमोहनगिरी -इंडियागेट
३.भले ही मुल्क के (ग़ज़ल)- कमलेश भट्टकमल
४.जुगाड़ी लिंक- जीतेंद्र
५.संभावनाओं के द्वार- वंदेमातरम
६.धरम के नाम पर- उड़नतस्तरी
७.रांची की दुर्गापूजा- मनीष
८.एक मध्यवर्गीय कुत्ता-नीरज दीवान
९.सबको सन्मति दे भगवान- सागर चंद्र नाहर
१०.हरिवंश राय बच्चन- मांस मदिरा से परहेज- उन्मुक्त
११.सूरत बदलनी चाहिये- विनय
१२.और सरगम सोचती है-राकेश खंडेलवाल
१३.प्राचीन भारतीय औषधियाँ और उनके होम्योपैथी उपयोग-3- डा.टंडन
१४.गांधी - नेहरू चिट्ठेबाजी- अफलातून
१५.विकीपीडिया-साथी हाथ बढ़ाना-फुरसतिया
१६.चुटकुले - किश्त 651 से 700-रचनाकार
१७.हाशिए पर भविष्य-रविरतलामी
आज की टिप्पणी
१८.गाँधी-गोडसे दोउ भले- संजय बेंगाणी
१९.अंतहीन गणित राग-सुनील दीपक
२०.नौ की महत्ता-प्रभाकर गोपाल पुरिया
२१.गोवा के पथ पर- प्रभाकर गोपाल पुरिया
२२.दुर्गा जी के जूते- लक्ष्मीगुप्त
विनय की बात काबिले गौर है:-
मैं भी आपमें से अधिकतर की ही तरह एक सामान्य हिंदी भाषी हूँ. न तो मैं कोई भाषाविद हूँ न भाषाविज्ञ. भाषा में रुचि रखने वाला या शिक्षार्थी हूँ. यह हिंदी का दुर्भाग्य होगा अगर किसी व्यक्ति को सिर्फ़ इस बिना पर कि वह ठीक हिंदी लिखता है, व्याकरणाचार्य या भाषाविद समझा जाए. ठीक हिंदी लिखना हर हिंदी लेखक की बुनियाद होनी चाहिए, उसकी विशेषता नहीं.


इसके बाद मुद्दे की बात करते हुये वे कहते हैं:-
ख़ैर, अब मुद्दे पर आता हूँ. सार्वजनिक रूप से ग़लतियाँ बताना कुछ को खला है (हाँ, सार्वजनिक रूप से ग़लतियाँ *करने* में वे कोई बुराई नहीं मानते :)). खुली टिप्पणियों में सुधारों का ज़िक्र करने के पीछे मंशा यह थी कि चिट्ठा लिखनेवाले के अलावा उसे पढ़नेवाले भी फ़ायदा उठा सकेंगे. पर न तो मैं चाहता हूँ कि किसी को बुरा लगे, न ही किसी की कमियाँ दिखाना मेरा ध्येय है. दुष्यंत को उद्धृत करूँ तो:

सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए


राकेश खंडेलवाल तो हमारे गीतसम्राट हैं। आज उन्होंने लिखा:-
प्रीत की अभिव्यक्तियों में शब्द की बेचारगी को
देख कर बढ़ती हुई हर भाव की आवारगी को
फिर दरकते कांच सा,पल चीख कर निस्तब्ध होता
और उकसाता, कि बोले छोड़ कर दीवानगी को

स्वप्न की चाहत को रह रह नैन में आकर समाये
और सरगम सोचती है कोई उसको गुनगुनाय


संजय बेंगाणी ने अपने लेख में गांधी-गोडसे के बारे में लिखा और महापुरुष होने के बावजूद उनके व्यक्तित्व की कुछ विसंगतियों के बारे में अपनी राय जाहिरकी। मुझे यही
लगता है पचास साल दूर खड़े होकर घटनायें देखना और तात्कालिक रूप से होते देखना और उनका भागीदार होने में अंतर होता है। गांधीजी में तमाम कमियां रही होंगी और समय के साथ और ज्यादा दिखती होंगी लेकिन गोडसे को गांधी के बराबर खड़ा करना मेरे ख्याल में दोनों के साथ ज्यादती है। केवल तर्क से सारे फर्क नहीं मिटाये जा सकते। वैसे भी जब गांधीजी मारे गये थे तब वे कांग्रेस के लिये मात्र शोभा की वस्तु रह गये थे यह बात अफलातूनजी द्वारा प्रकाशित गांधी-नेहरू पत्रव्यवहार से पता चलती है।
समीरलाल जी ने धर्म के नाम पर कविता लिख मारी:-
पकड़ कर उंगलियां मेरी, जो चलना सीखते मुझसे
सहर की लाल किरणों मे, मुझी को पथ दिखाते हैं.

चमन में हर तरफ अब तक, अंधेरा ही अंधेरा था
वजह थी बेखुदी जिनकी, शमा वे ही जलाते हैं.

लगी है आग बस्ती में, झुलसती आज मानवता
दिये जो आँख में आंसू, उन्हीं से हम बुझाते हैं.


अब इस कविता की तुलना किस महान कवि की किस कविता से करें यह समझ में नहीं आ रहा है। बकौल दुष्यन्त कुमार:-
मैं अपने हाथ में अंगारे लिये सोच रहा था
कोई मुझे इन अंगारों की तासीर तो बताये।


नीरज दीवान ने परसाईजी की रचना एक मध्यवर्गीय कुत्ता पेश की। नीरज को धन्यवाद कि उन्होंने हमारे कहने पर परसाईजी की रचना हमको पढ़वाई। आशा है
कि आगे भी वे इस तरह का साहस दिखाते रहेंगे।

वंदेमातरम के साथियों ने चाणक्य के बारे में जानकारी देते हुये बताया कि । अब यह विचार करने की बात है कि ऐसा कैसे हुआ कि चाणक्य की नीतियां केवल किताबों में ही सुशोभित होती रहीं और जो भी आये टहलते हुये हमें रौंदता चला गया। वंदेमातरम के साथियों से फ़िर से अनुरोध है कि वे अपने लेख में लेखक का नाम देने के बारे में विचार करें ताकि पता चले
कि लेख का लेखक कौन है।

नया ज्ञानोदय में रविरतलामी द्वारा किया गया कहानी का अनुवाद छपा - "एक कहानी छोटी सी एमी की"। रवि भाई को बधाई।

फुरसतिया ने विकीपीडिया की बारे में जानकारी देते हुये भारतीय भाषाऒं की जानकारी कोष संपन्न करने का आह्वान किया है :-
अब आप क्या कर सकते हैं यह आप अपने आप तय कर सकते हैं। लेकिन अगर आप हमसे ही सुनने के लिये उतावले हैं तो सुनिये। आप विकीपीडिया में जिलों की सूची देखें। अगर आपका जिला इसमें है ही नहीं तो पहले जिला जोड़ें। फिर अपने जिले के बारे में जो भी जानकारी आपको पता हो वह डाल दीजिये। पूरी न पता हो तो अधूरी सही , सही न पता हो नाम सही, जैसी भी पता हो डालिये तो सही। कोई न कोई आयेगा उसे ठीक करने के लिये। इमारतें, व्यक्तित्व, साहित्य, साइंस, सिनेमाघर, सड़कें, बाग-बगीचे, स्कूल, कालेज, विश्विद्यालय, खान-पान, अलां-बलां, अटरम-शटरम जो मन आये डाल दीजिये। सब सुधर जायेगा अगर गलत होगा। शरमाइये नहीं शुरू तो करिये। आपको अच्छा लगेगा।


कल का चिट्ठा समीर लाल लिखेंगे लेकिन इसके पहले देखिये पंकज बेंगाणी लिख रहे हैं गुजराती चिट्ठों के बारें। उनकी हौसला आफजाई करिये ताकि और भारतीय भाषाऒं के चिट्ठों के बारे में लिखने वाले लोग आगे आयें।
आज की टिप्पणी
१.अरे विनय भाई, हम बुरा माने कि नहीं, यह तो पता नही (हमें तो नहीं लगता) मगर आपने जरुर समझा कि हम बुरा मान गये और यह भी तय है कि आप तो कम से कम बुरा मान ही गये और भावावेश मे दो पालियां भी बना गये:

"पर घबराइये मत (या अगर आप दूसरी तरफ़ हैं तो ख़ुश मत होइये :)), ...."

अरे भाई, यह सही है कि आप फ़ुरसतिया जी से जमाने से वाकिफ है और उनकी आदत भी जानते हैं कि वो मौज मस्ती लेते रहते हैं मगर आपने ये कैसे मान लिया कि हम ऎसा नहीं कर सकते. अरे यार, यह मौज मस्ती लेने का अधिकार तो हमें भी है. रही बात कि मैने लिखा क्यूँ:

तो मै जब भी लिखता हूँ तो अपने आपको समीर लाल मान कर नहीं, बस यह सोच कर कि इस बात का सबसे खराब रुप क्या हो सकता और कोई कहां तक जा कर सोच सकता है, वो अंग्रेजी मे कहते हैं न Worst Case Senario... बस उसी को ले कूछ मौज मस्ती हुई और आप तो हमारी पड़ोसन की तरह बुरा मान गये( वैसे अब मै पड़ोसन से बिल्कुल मजाक नहीं करता, जान गया हूँ न)...आप भी अगर बुरा माने रहे, तो आपसे भी मजाक बंद, बस बहुत सिरियसनेस का चस्पा चेहरे पर चिपका कर बात करेंगे, मगर करेंगे जरुर.
"अब ये कहाँ का शिष्टाचार कि किसी को अपने घर के जाले निकालने बुलाओ और जब वह निकाले तो कहो कि भई सचमुच थोड़े ही बुलाया था :)."
भाई मेरे, मेरा वाकया क्रं. २ फिर से पढ़ो न, प्लीज्ज्ज..!! " मगर अपने ब्लाग पर बुलाते वक्त मुझे इस वाकये का ख्याल भी नहीं था, वो तो लिखते वक्त बस उचक कर ख्याल आ गया जो कि सबसे ज्यादा मजा दे.
मैने तो यह भी लिखा था:
हम तो गड्डों से बच कर उछले
निकल गये वो, जो पीकर निकले.
कहीं टिप्पणी पोस्ट से बड़ी न हो जाये, तो बस, अब बस करता हूँ...बुरा न मानो मेरे भाई, इतने भी बुरे नहीं हैं हम. चाहे तो जो पहले हमें झेल चुके हैं उनसे पूछ कर देख लो.
अब थोड़ा मुस्करायें, फिर मेरे चिट्ठे पर आयें और फिर गोले बनायें, चाहें तो ईमेल से और चाहें तो खुले आम...हंस दे, भाई.

-समीर लाल उर्फ उड़न तश्तरी

आज की फोटो
आज की फोटो मनीष की पोस्ट से
चहल-पहल
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