सोमवार, अक्तूबर 16, 2006

व्यंज़लमय चिट्ठाचर्चा


(मनोरमा तोमर की तैल रंग से बनी कलाकृति)
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अगर तुम मेरे साथ रहो तो विदेश में अकेलापन कैसा
हरियाली हर ले जाते हो तो बताओ चांद पर घर कैसा

देर लगी तुम्हें आने में पर उम्मीद का दिया जल रहा है
जय हास्य, जय नेता!!! है हमारी पहचान तो डर कैसा


लौ तुम्हारी थी शतरंज के अविवादित बादशाह क्रैमनिक
यूरोप में खगोल शास्त्र में मैप माइ इण्डिया २००७ है कैसा

पनी रचनायें भेज देते झटपट तो कितना अच्छा था!
दिवाली प्यारी आती है तो इसमें कोई कठिनाई कैसा

हम भारतीयों के राष्ट्रप्रेम को लग गई है लौ तुम्हारी तो
अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो का ये गायन कैसा


हितोपदेश की संपूर्ण कथाओं
की हुई है अनोखी स्मगलिंग
चिट्ठा चर्चा वाया यूएसए तो यह सप्ताह का कार्टून कैसा

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4 टिप्‍पणियां:

  1. अगर जीवन ना हो व्यंजलमय, तो जीवन कैसा?

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  2. चिट्ठा चर्चा लिखने का यह तो नायाब तरीका है

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  3. बड़ा अभिनव एवं सफल प्रयास है. संक्षिप्त सार गर्भित व्यंजल में छिट्ठा चर्चा. वाह भई वाह!

    समीर लाल

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  4. वाक्य आपका एक एक है सतसैया के दोहरे जैसा
    प्रश्न बना कर खुद ही, खुद ही उत्तर दिया आपने कैसा

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