मंगलवार, अक्तूबर 24, 2006

पहली दर्शनीय सफलता

मना दिवाली, अन्नकूट खा, पूजा है गोवर्धन
श्रद्धा सहित किया है देवी देवों का अभिनंदन
और दूज के दिन अपनी भगिनी के घर पर जाकर
आशीषों का सहज लगाया है माथे पर चन्दन

गुझिया, लड्डू और इमरती, बरफ़ी, बालूशाही
सोहन पपड़ी, काजू कतली, पिस्ते की कतराई
रसगुल्ले, सन्देश, केवड़े वाली चमचम लेकर
दीवाली पर जो भी है उपलब्ध, मिठाई खाई

फिर तलाशनी निकला, लगता चिट्ठाकर सो गये
दीवाली की मदहोशी में लगता कहीं खो गये
सिर्फ़ अनिद्रा से पीड़ित जो रहे वही बस आकर
जल्दी जल्दी लिखा और फिर अन्तर्ध्यान हो गये

रत्ना की रसोइ कविता की संध्या दिखा रही थी
देख न पाया कोई सफ़लता जिसको बता रही थी
उधर खड़े गिरिराज पूछते मेरे कवि मित्रों से
प्रश्न, मगर असफ़लता केवल, पंजा दिखा रही थी

आकर थे चौपाल खड़े अनुराग वहां बतियाते
उठो पार्थ गांडीव संभालो रह रह कर दोहराते
औए टिप्पणी को अनूप शुक्लाजी उनसे आकर
अच्छी रचना को बकवास न बोलो, ये समझाते

आदिम प्रवॄत्तियों का वर्णन, शिल्पी सॄजन कर रहे
नींद, सेक्स के और भूख के चक्रव्यूह में खोये
दएशी दवा और दारू की खबरें लगे सुनाने
ये छत्तीसगढ़ी खबरों की दुनिया रहे संजोये

और कोई फिर नजर न आया, लौटा मैं अपने घर
किन्तु तभी कुंडली लिखने का याद आ गया वादा
चन्द पंक्तियां लिख कर सोचा चर्चा बन्द करूं मैं,
अबकी बार रहा है विवरण केवल सीधा सादा

शुक्लाजी के पै लागी, लाल साब की जय
पंकज,जीतू साथ हैं, फिर काहे का भय
अतुल अरोड़ा हैं इधर, उधर हैं देवाशीष
रवि रतलामी की मिली चर्चा को आशीष
संजय को भी देखिये, नये रंग हर रोज
अब फ़ुरसतियाजी किसे, देखें लायें खोज

लगा खोजता चित्र मिले कोई तो जो भी पाया
वही एक नत्थी कर मैने चर्चा तक पहुंचाया
पहले तो सोचा था मैने बिना चित्र के चल दूँ
याद वाक्य आ गया कि जिसने खोजा उसने पाया.

आज की टिप्पणी:
अनूप शुक्ला चौपाल पर:
अपनी उद्बोधनात्मक कविता को बकवास क्यों कहते हैं अनुराग भाई. ये तो अच्छी बात नहीं है.

आज की फोटो:


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1 टिप्पणी:

  1. इतने कम चिट्ठों पर, वो पूरी चर्चा कर गये...
    भाई राकेश तो, छिट्ठों को शर्मिंदा कर गये...

    --चलिये, भाई लोगों, अब छुट्टियां बहुत हुई, फिर लिखना शुरु करें. :)

    उत्तर देंहटाएं

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