गुरुवार, अक्तूबर 26, 2006

आपके चिट्ठे का भविष्य

कल ईद के मौके पर मैं समीरलाल जी को बोलकर गया था कि मैं बाहर जा रहा हूं आप अपने साथ हमारा दिन भी देख लीजियेगा और गुरुवार की चिट्ठाचर्चा कर दीजियेगा। अब जब मैंने देखा कि उनका लेख भी चर्चित होना है तो सोचा हम ही काहे न उनकी तारीफ़ कर दें। तो अभी रात बारह बजे तक के चिट्ठे हम देखते हैं बाकी के सज्जन व्यक्ति की उपमा धारण किये हुये कुंडली किंग समीर लाल जी करेंगे।

आज का सबसे खास लेख समीरलाल जी का ही रहा। चिट्ठा जगत के ब्लागों के भविष्य के बारे में बताया गया है इस पोस्ट में। गजब की कल्पनाशीलता और मौज मजे का अंदाज। इसमें लोगों ने अपने-अपने ब्लाग के बारे खबरें ग्रहण कीं। मतलब कि:
जाकी रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी।।


लेख वैसे तो पूरा का पठनीय है और इसका मजा ही तब है जब आप इसे पूरा बांचे लेकिन कुछ अंश यहां भी देख लिये जायें:-
यह साल आपके चिट्ठे के लिये बहुत शुभकारी रहेगा. वर्ष के पूर्वार्द्ध में टिप्पणियां बहुतायत में मिलेंगी. इस अति प्राप्ति के अहम में डुबकर आप अपने आपको एक वरिष्ठ चिट्ठाकार मानने लगेंगे और आपकी प्रविष्टियों की गुणवत्ता पर इसका प्रभाव दिखने लगेगा और उसमें कमी आने की संभावनायें हैं.



अगर आप ब्लाग स्पाट पर हैं तो संभव है आप वर्ड प्रेस पर स्थानान्तरित हो जायें मगर प्राईवेट होस्टिंग का अगर मन बनाते हैं तो पहले ट्रेफिक काउंटर लगा कर अपनी औकात का आंकलन कर लें अन्यथा कहीं लेने के देने न पड़ जायें. कभी आपको यह अहसास भी हो सकता है कि आप इससे कुछ कमा लेंगे. तो ऐसे बहकावे में न आयें. इस तरह की अफवाह फैलाने वाले खुद भी फ्री ब्लाग स्पाट पर ही हैं और वो इतना बेहतरीन लिख लिख कर कुछ नहीं उखाड़ पा रहे तो आप क्या कर लोगे. कम से कम दृष्टिगत भविष्य में तो इसकी संभावनायें नहीं दिखती हैं.



चिट्ठे का तो खैर जो भी हो, आपके तिरछे तेवर के कारण आपकी बदनामी तय है और उसका परिणाम झेलेगा बेचारा आपका चिट्ठा बिना किसी वजह के. कोशिश करके इस वर्ष कम से कम लिखें और जब भी लिखें तो सिर्फ लिखें न की बकर करें. दूसरों के उपहास से सबको फायदा नहीं पहूँचता, यह आपको याद रखना चाहिये.


ये अंश ऐसे ही बिना किसी तरतीब के दे दिये हैं। आप इसके झांसे में न आयें। आप पूरा लेख पढ़ें। पसंद आयेगा। पसंद न आये तो समय वापस।

इस लेख में दो टिप्पणियं भी एक से एक बढ़कर हैं। समीरजी के काबिल चेले ने तो लगता है कि ५१ टिप्पणियों की यात्रा शुरू की थी लेकिन लगता है एक बार फिर सांस फूल गयी कविराज जी की और मात्र तीस की गिनती तक टिप्पणियां करके बैठ गये। प्रेमेंद्र ने राज को राज नहीं रहने दिया और ब्लाग के नाम का खुलासा कर दिया अलग से एक पोस्टलिख कर जिसे वे बताते हैं कि कविता है। प्रेमेंन्द्र लगता है आत्म्विश्वास की कमी के दौर से गुजर रहे हैं। वही कविता(?) टिप्पणी में लिखी, उसी को पोस्ट में लिखा। इसके बाद सबको बताने के लिये मेल किया। अरे हमें बता दो यार और भरोसा रखो कि हम सबको बता देंगे। ये रुपये में तान अठन्नी काहे भंजाते हो भाईजी!

इसी कारण से महाभारत मेंकलयुग आ गया जिसके बारे में बता रहे हैं जी के अवधियाजी। उन्मुक्त जी किताबों की दुकान में बता रहे हैं जहां आप तरह-तरह की चाय पीते हुये किताब खरीदने के बारे में विचार बना-मिटा सकते हैं।

फिलहाल इतना ही। आगे की चर्चा समीरजी से सुनिये।

सूचना:- इसके पहले कि हम भूल जायें हम आपको बता दें कि आज यानि कि प्रख्यात महिला चिट्ठाकार को कवि, कथाकार, चित्रकार, टिप्पणीकार, कलाकार प्रत्यक्षा का जन्मदिन है। इस अवसर पर चिट्ठाचर्चा की तरफ से प्रत्यक्षाजी को ढेर सारी शुभकामनायें। जन्मदिन के अवसर पर खासतौर से प्रत्यक्षा से बातचीत पढ़ने के लिये आप फुरसतिया देखते रहिये। पता नहीं कब पोस्ट हो जाये इंटरव्यू।

आज की टिप्पणी:-
१.समीर की उड़ान लिए उड़ा कुन्डली रूपी यान
गद्य-पद्य मय हास्य-व्यंग्य,सुसज्जित सब सामान
सुसज्जित सब सामान, देख कर हम चकराए
विभिन्न स्वाद एक तश्तरी किस विधी समाए
कह 'रत्ना' मुस्काए समां बस बंध सा जाए
'समीर लाल' की कलम जब करतब दिखलाए।
रत्ना

2.हमारे नामाराशि अनूप भार्गव जिनको विदेशों में हिदी प्रसार के लिये सम्मानित किया गया है अक्सर एक शब्द बोलते हैं- अमेजिंग. वे इसका कापीराइट नहीं कराये इसलिये हम भी कह रहे हैं इस लेख के बारे में -अमेजिंग. बहुत अच्छा लिखा .बधाई. अब हम अपने को खोज रहे हैं कि हम किस कैटेगरी में हैं. हर जगह कुछ-कुछ हैं, कैसे सब जगह से समेट के अपना कोलाज बनायें समझ में नहीं आता. चिट्ठे में कोई परिवर्तन हमारे स्वामी के हाथ में है. वही कुछ करेगा तभी कुछ होगा. बहरहाल बाकी लोग करें अपना काम-धाम. सबको शुभकामनायें.

अनूप शुक्ला

3.बांग्ला में जोरदार प्रशंसा के लिए कुछ बहुप्रयुक्त शब्द हैं, यथा 'दारुण' और 'दुर्दान्त'. इस चिट्ठा चर्चा के लिए इन्हीं का इस्तेमाल करना चाहूंगा .

प्रियंकर

आज की फोटो:-
आज की फोटो तरुन के ब्लाग अंखियों के झरोखे से

फूलों के रंग से..
फूलों के रंग से..

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1 टिप्पणी:

  1. 1- प्रेमेंद्र ने राज को राज नहीं रहने दिया और ब्लाग के नाम का खुलासा कर दिया अलग से एक पोस्ट लिख कर जिसे वे बताते हैं कि कविता है।
    2- प्रेमेंन्द्र लगता है आत्म्विश्वास की कमी के दौर से गुजर रहे हैं।
    3- वही कविता(?) टिप्पणी में लिखी, उसी को पोस्ट में लिखा। इसके बाद सबको बताने के लिये मेल किया।
    4- अरे हमें बता दो यार और भरोसा रखो कि हम सबको बता देंगे।
    5- ये रुपये में तान अठन्नी काहे भंजाते हो भाईजी!


    नम्‍बर 1 से- कौन सा भंन्‍टा फोड दिया मैने और राज को बेराज कर दिया और आज की कविताओ और गद्यों को चाहे गद्य मे पढे या पद्य मजा दोनो मे है।

    नम्‍बर 2 से- मुझे नही लगता है यह वाक्‍य लिखने की कोई जरूरत थी, और कहां मै कोई ऐसी बात की कि आपको लगा कि मेरा आत्‍म विश्‍वास मे कभी आ गई।

    नम्‍बर 3 से- टिप्‍पणी को आपने ब्‍लाग पर देने की मेरी अपनी वजह थी, और आज मेरे पास कईयो के ईमेल आये कि ईमेल न करे तो मैने उन्‍हे आश्‍वासन दे दिया है कि अब उनके पास मेरे अपनी ओर से कोई ईमेल प्रेषित नही किया जायेगा। वैसे आज मैने पहली बार कोई ईमेल से सुचना नही दी है। आज तक मैने जिनती भी लेख, कविता और फोटो ब्‍लाग पर डाले थे, सदा उनकी सूचना ईमेल से मैने दी है। अगर अब किसी को अपत्ति है तो अब उसे नही दूगां। :) अगर आपको लगता है किसी रचना का ब्‍लाग पर तथा टिप्‍पणी के रूप मे अलग अलग जगह पर होना गलत है तो आप मेरी टिप्‍पणी को हटवाने के लिये कह दे मुझे अपत्ति नही है।

    नम्‍बर 4 से- भरोसे और विश्‍वास पर पूरा संसार टिका है और कुछ लोगों ऐसे है, जिन पर मै अपने से ज्‍यादा भरोसा करता हू। पर मानवीय भूल भी कुछ होती है। मैने अपनी पोस्‍ट दीवार मे सेध की सूचना चिठ्ठा चर्चा को दी थी पर उसका कही भी जिक्र नही हुआ। तब मै कैसे विश्‍वास कर लू? एक दो चिठ्ठाचर्चा कारो पर तो विश्‍वास हे कि मेरे लेख और कविता को इस चर्चा पर जगह देगें पर सब पर नही है।

    नम्‍बर 5 से- आज कल तो रूपये मे अठ्ठनी भाजने का ही जमाना चल रहा है पुराने एक रूपये के सिक्‍के की कीमत आज दो से ज्‍यादा हो गई और पूरी भारत वर्ष के जाल साज उसे पिघला कर दो रूपये से ज्‍यादा का लाभ ले रहे है और मै तो उसे केवल तीन अठ्ठनी मे भुना रहा हूं।

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