मंगलवार, अक्तूबर 10, 2006

कविता में चिट्ठा चर्चा

चिट्ठा चर्चा कीजिये, मुझे मिला आदेश
फ़ुरसतियाजी ने किया जारी अध्यादेश
जारी अध्यादेश, कुण्डली लें समीर से
और सजायें काव्य-सुधा रस भरी खीर से
लगे हर्द फिटकरी न होवे कुछ भी खर्चा
लेकिन करें सिर्फ़ कविता में चिट्ठा चर्चा

ज्ञान तकनीकियों का नहीं है मुझे
जानता हूँ नहीं लिंक्स की बात मैं
इसलिये जो भी हैं गलतियां, कोई भी
पा नहीं पाई है हल मेरे हाथ में
आईये बात आगे बढ़ाते हैं हम
और देखें कि कितने ब्लागर मिले
एक के बाद एक सैर करते चलें
और चर्चा भी करते चलें साथ में
....
घर से बाहर निकले, देखा खड़ी सामने उड़नतश्तरी
हर खिड़की पर खड़ी हुई थी कथा, कहानी लिये रसभरी
नारद की बीमारी से हलकान हुए भगवान श्री को
साष्टांग कर खिला रही थी, मृदु बातों की मक्खन मिश्री

हमरे दर पर आये थे, एक दिन श्री भगवान
हम भी मिलकर आ गये, अपना सीना तान.
अपना सीना तान, वो कुछ परेशान से लगते
नारद की बीमारी से आम इन्सान से दिखते
कह समीर कविराय कि नारद जल्दी आ जाओ
भगवान बहुत ही दुखी दिखे, अब न तड़पाओ.


अब अगले पड़ाव पर पहुंचे, थे कविराज सोच में डूबे
विषय ढूँढ़ते, शब्द संजोते, हुए व्योम में शून्य समूचे

सोचता हूं वह विषय,जिस पर करूं मै कविता।
शून्‍य मे विषय खोया,व्‍योम मे खोई कविता।।


काव्यकला में लक्ष्मीजी आ करते प्रस्तुत आज सुभाषित
शूद्रक का नाटक, रहीम के दोहों को करते परिभाषित

हे चातक (पपीहा) सावधान होकर एक क्षण के लिये मेरी बात सुनो। आकाश में बहुत से बादल होते हैं किनतु सभी समान नहीं होते हैं। किन्हीं की वर्षा से पृथ्वी गीली हो जाती है और कुछ व्यर्थ ही गरजते हैं। इस लिये जिस जिस को देखते हो उन सभी के सामने दीन वचन न बोलो।इसका लगभग समानार्थी रहीम का दोहा हैःरहिमन निज मन की व्यथा मन ही राखौ गोय।सुनि अठिलैहैं लोग सब बाँटि न लेहै कोय।।


रचनाकार लिखे हैं कविता त्यागी जी की हंसने वाली
देसी रंग में ढाल फ़्लाईट, नये नियम बतलाने वाली

सीट बेल्ट नहीं हैं,जरुरत पड़ने पर अपनी बेल्ट तथा चुनरी से स्वयं को बांधे रखेथोडी बहुत मुसीबत आने पर अपना तथा अपने साथियों का साहस बाँधे रखें

रवि रतलामी दिखा रहे हैं, हमको सत्य आईना लेकर
आज शीर्ष पर हम पहुंचे हैं लेकिन क्या क्या कीमत देकर

अपना प्यारा देश भारत भी कई मामलों में विश्व में नं1 है. हर्ष का विषय है कि एक बार फिर यह नं1 की स्थिति पर है. इस खुशी के मौके पर आप सबको बधाइयाँ व आने वाले वर्षों में यह स्थान बरकरार रहे इसके लिए शुभकामनाएँ. आखिर हम आप सभी के सद्प्रयासों से यह स्थान हासिल हुआ है. अतः बधाईयों व शुभकामनाओं के असली हकदार तो हमीं हैं.


अगले पग पर एक नजरिया तिरछी जलवे दिखा रही थी
पूरी ही वेताल पचीसी हमें जाल पर पढ़ा रही थी
पहले रुके कि पूरा पढ़ लें, किन्तु सामने टेबल पर की
घड़ी हर घड़ी जल्दी जल्दी आगे बढ़ना, जता रही थी

बहुत पुरानी बात है। धारा नगरी में गंधर्वसेन नाम का एक राजा राज करता थां उसके चार रानियाँ थीं। उनके छ: लड़के थे। सब-के-सब बड़े ही चतुर और बलवान थे। संयोग से एक दिन राजा मर गया और उसकी जगह बड़ा बेटा शंख गद्दी पर बैठा। उसने कुछ दिन राज किया, लेकिन छोटे भाई विक्रम ने उसे मार डाला और वह आप राजा हो गया। उसका राज्य दिनोंदिन...


छायाचित्रकारजी आगे खड़े कैमरा हिला रहे थे
अद्भुत दॄश्यों वाले फोटो ला ला करके दिखा रहे थे

रुमझाटार, नेपालः मन का विश्वास वृक्ष और निर्जीव पत्थरों में भी भगवान की छवि दे कर प्रार्थना योग्य बना सकता है. समझ में नहीं आता कि चींटीं में भी जीवन देखने वाले, जाति भेद का सोच कर अन्य मानवों के प्रति कैसे निष्ठुर हो जाते हैं?

आज की टिप्प्णी:

संजय बेंगाणी , पानी के बताशे पर:
पूरी बत्तिसी निकालते हुए आपके लाडले को आशिर्वाद दे रहा हूँ. भगवान आपकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण करे. आप तो छाते जा रहे हो.


अनूप शुक्ला, उड़न तश्तरी पर:
कनपुरिया भाषा में कहें तो गजनट! मजा आ गया पढ़ के. वाह-वाह.चिट्ठाचर्चा का भविष्य तो समय तय करेगा वैसे मुझे लगता है कि आजकल सबसे ज्यादा अगर कोई चिट्ठा लिखा-पढ़ा जा रहा है तो वो है चिट्ठाचर्चा. मुझे नहीं लगता कि नारद के वापस आने से इसकी उपयोगिता में कोई कमी होगी.


आज का चित्र:

छाया चित्रकार से:

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10 टिप्‍पणियां:

  1. कविता में ही कर गये, पूरी चिट्ठा चर्चा आज
    शब्द-पुष्प की झांकियां, गजब सजी कविराज.
    गजब सजी कविराज है मां शारदा का आशीष
    लेखनी आप चलाये रहो, हमें भी दो बक्सीस
    कहे समीर कि अब बह निकली जो सरिता
    हफ्ते दर हफ्ते सुनाओ, कविता पर कविता.


    --बहुत खुब, राकेश भाई.बड़ा अभिनव और अदभुत प्रयास है. सफल रहा.

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  2. कविता कविरात की नही है, मै हूं मै। :-)

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  3. कविता में ही कह सकें ऐसी क्षमता दो नाथ
    हम को करनी आज है राकेश जी से बात ...

    धन्य हो प्रभू..........

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  4. राकेशजी, आपके अभिनव प्रयोग चिट्ठाचर्चा में देखकर बहुत अच्छा लगा.इससे चिट्ठाचर्चा में चार चांद लग गये.समीरजी भी बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने राकेशजी की सहायता करके यह पोस्ट लिखने में सहायता की.अगली पोस्ट तक राकेशजी अपने आप सब कुछ कर लेंगे.
    प्रेंमेंन्द्र देखो तुमको राकेशजी,जिनको हम गीत सम्राट कहते हैं, कविराज कह रहे हैं और तुम मैं,मैं कह रहे हो. यह तो कहो कि किसी मीनमेख वाले की निगाह इस तुम्हारी टिप्पणी पर नहीं पड़ी वर्ना कहता 'कविरात' नहीं 'कविराज' लिखना चाहिये. लिंक में नाम उतना जरूरी नहीं जितना तुम्हारी पोस्ट/कविता तक पहुंचना.

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  5. बात बात में कह गये पूरी कविता आप
    हम भी इसको पढ गये एक साँस मेँ आज

    बहुत बढिया ! चिट्ठा चर्चा के नित नये रंग ने इसको पढने का मज़ा दूना कर दिया है ।

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  6. नित नये रंग,
    अब चर्चा कविता के संग!.
    पढ़ने वाले रह गये हैं दंग,
    कमाल हैं आपका यह ढ़ंग.
    जमा दिया चिट्ठाचर्चा में रंग,
    हो न यह सिलसिला अब भंग.

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  7. अभिनव प्रयोग!
    हिंदी चिट्ठाकारिता को आपलोगों के इन प्रयोगों से नये नये आयाम मिल रहे हैं। कभी कुंडलियां, कभी व्यंजल, कभी कवितायें और कभी अनुप जी और अतुल जी का अनूठा अंदाज।

    प्रतिदिन चिट्ठाचर्चा का इंतजार रहने लगा है।

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  8. राकेशजी आए लेकर कवितामय चिट्ठा चर्चा
    लो बधाई हम भी दे देते क्या लगता हैं खर्चा
    प्रमेन्द्र जी समझे नहीं यह कैसे हुआ कमाल
    "कविराज" के चरचे होते पर लगा हमारा माल
    "उडन तश्तरी" मांग रही हाथ फैला बक्सीस
    "अनूप भार्गव" टीका गये प्रभू चरणों में सीस
    कहे "कविराज" अब कुछ अपनी सुध भी ले लो
    मेरे चिट्ठे पर आकर "ब्लागर हाइकु" पढ़ लो

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  9. 'चिट्ठा चर्चा'मे भी कविता का रंग छा गया !
    वाह वाह वाह! मजा आ गया!!

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  10. जो मै कहता हूं,
    उसे गलत अर्थ मे लिया जाता है।
    चिठ्ठा चर्चा पर,
    मेरी टिप्‍पणी पर टिप्‍पणियां हो जाती है।
    मै कहता कुछ हूं,
    उसे कुछ और समझा जाता है।
    वह तो केवल मेरी टिप्‍प्‍णी थी,
    जो केवल औपचारिकता मात्र मे दे डाली थी।
    नाम वाम मे क्‍या रखा है
    जब मन मे प्रेम समाया हो।
    कहते है संसार मे दो ही चीजे है,
    जो वापस नही किया जा सकती है,
    वह है मुंह की वाणी और तरकश से निकला तीर। कविराज को लिखा कविरात जब मैने,
    पर छपने के बाद ध्‍यान गया मेरा,
    पर क्‍लिक का तीर चला दिया था मैने,
    और तब मै कुछ करने मे बेवस था।
    चिठ्ठा चर्चा को नया रूप दिया,
    कविवर राकेश खडेलवाल जी ने,
    पर मैने उस पर नुक्‍स निकाला
    क्षमा करों हे कविवर मुझको
    नही गलत दृष्टि से मैने टिप्‍पणी डाला।
    मै हूं मै व्‍यर्थ की बाते
    जब आपने कविवर कह डाला।

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