रविवार, अक्तूबर 08, 2006

'उठ जाग मुसाफ़िर भोर भई

रात बिछौना सो गये,पहुँचे सपनन धाम
पूरा जब विश्राम हो, तब करना है काम
तब करना है काम कि जल्दी जाग सबेरे
निकल जायेंगे खेत, यही सब चक्कर घेरे
कहत समीर, सीखो तुम भी इनकी भाषा
सोने चलते रात, सुबह उठने की आशा.

सोप ओपेरा
सोप ओपेरा

वाह-वाह करने के पहले यह तो जान लीजिये कि ये कविता किसने लिखी है। ये हैं हमारे कुंडलिया नरेश समीर लाल जिन्होंने यह कविता तरकश के लिये लिखी है। पूरी कविता यहां पढ़िये न!
ये कविता नहीं है पूरा जीवन वृत है। इसके साथ ही आप जीवन भर चलने वाले सोप ओपेरा के खिंचते रहने के फंडे बता रहे हैं पंकज बेंगाणी जिनको कि शिकायत है कि तरकश के तीर चिट्ठाचर्चा में काहे नहीं चलते दिखते। अरे भाई आप भी तो लिखवैया पार्टी के सदस्य हैं और आपका न दिन तय है न समय। जब मन आये तब लिखिये न! अपने बारे में, हमारे बारे में और सबके बारे में ।साथ में गुजराती चिट्ठों के बारे में भी लिखिये न!
क्याप
क्याप

किताबों की चर्चा की शुरुआत प्रत्यक्षा से हुई तो उसे शानदार तरीके से जारी रखा मनीष ने। उन्होंने स्व. मनोहर श्याम जोशी की रचना 'क्याप' की चर्चा की। रोचक चर्चा मय किताब के कवरपेज के फोटो के देखकर अच्छा लगा। इसके लिये मनीष बधाई के पात्र हैं। एक तरफ जहां अन्य साथियों से आशा है कि वे पुस्तक चर्चा के काम को जारी रखेंगे वहीं मनीश और अन्य साथियों से अनुरोध है कि वे अपनी चर्चा को विकिपीडिया में जगह दें ताकि इसे और भी लोग देख सकें और जरूरी समझें तो सुधार सकें।

चेन्नई में हुई ब्लागर्स मीट दिल्ली में किस तरह हो इसके लिये अमित गुप्ता पूछ रहे हैं कि करें कि न करें। आप अपने विचार देना चाहो तो परिचर्चा में दे दीजिये ताकि अमित का काम कुछ आसान हो जाये।

अवधियाजी इस बार बता रहे हैं लैब असिस्टैंट कुमुदलाल कांजीलाल गांगुली के दादा मुनि अशोक कुमार बनने की कथा। उधर जीतेंद्र चौधरी बाल-बाल बचे कि हरभजन सिंह के बालों के बारे में पूछते-पूछते किसी की नजर उनके बालों तक नहीं गयी वर्ना वो पूछ सकता था ब्लाग क्यों लिखते हो!

रत्ना जी 'उठ जाग मुसाफ़िर भोर भई'कहकर सोने चली गयीं और जब नींद खुली तो हाथ आयी यह कविता:-
रोके रज़ाई की गरमाई
गुदगुदे गद्दे की नरमाई
लगे बदन में कुनकुना दर्द
बाहर हवा भी है कुछ सर्द

अभी तो हुई थी रोशनी मंद
अभी तो की थी आँखें बंद
थोड़ी देर ज़रा और सो लें
सपनों की नगरी में डोलें

सालों से न किया आराम
चलते रहे उमर भर काम
चलो सुबह की सैर आज छोड़े
बरसों पुराना नियम तोड़ें


रत्नाजी अभी रजाई का मौसम कहां आ गया! कविता हिल स्टेशन में लिखी गयी है क्या! अभिनव श्रीवास्तव के हिस्से की धूप पर उनके मित्र नीरू ने अपनी राय भेजी है अब जब कविता पसंद की है तो उस पर राय भी तो देख लीजिये। देखना तो आपके लिये क्रासवर्ड भी उचित होगा जहां बकौल शैल
हिंदी की किताबें भी अब मिलने लगीं हैं।

समीरलाल जब उड़ते हैं तो अपने साथ दुनिया भर को उडा़ लेते हैं। देखिये उनकी ताज़ा गजल कुछ ऐसी ही है कि नहीं:-
अपना मकसद सबको प्यारा, तुझ पर भी यह बात सही
मंजिल की है राह सही क्या,कुछ इनको भी बतला दो न.

इक धरती के इक टुकडे़ पर, क्यों मचता कोहराम यहाँ
किसकी खेती कौन है जोते, कुछ तो हिसाब समझा दो न.

कल की ही तो बात रहे थे, हम प्याला हम भी तुम भी
फिर क्यूँ हुये खून के प्यासे, कुछ प्रेमसुरा छलका दो न.


आपको कैसी लगी ये तो आप बतायें लेकिन पंकज बेंगाणी को ऐसी चढ़ी प्रेम सुरा कि वे भी कह उठे:-
प्रेम के प्यासे हैं तुम भी, हम भी.
फिर बेवजह खड़ी इन दीवारों को ढ़हा दो ना.


सूत न कपास जुलाहे से लठ्ठम लठ्ठा
यह तब याद आया जब आलोक ने खबर फैला दी कि नारद जी का दुबारा अवतारहो गया। ये तो अभी रिहर्शल हो रहा है नारद्जी के आने का सच्ची-मुच्ची अभी आये थोड़ी न हैं जब आयेंगे तो नारियल फूटेगा शंख बजेगा और न जाने क्या-क्या अभी तो यही कह रहे हैं -तुम कब आओगे नारद! शून्य में ही यह खबर,बमार्फत रविरतलामी, कि जीमेल अब मोबाइल पर उपलब्ध है और यह भी कि भोमियो (कौन रखिस है ऐसन फंटूस नाम!)भी कौनो चीज है। आज की दुकान बंद करने के पहले तनिक कविराज जोशी जी के बिखरे शब्दों की समीक्षा भी बांच लीजियेगा नहीं तो बहुत लोग माइंड कर लेंगे काहे से कि इसमें जिक्र ही जिक्र है।

ये तो हमसे जैसा बना वैसा लिख दिया अब आगे धांसू चर्चा पढ़ने का सुयोग है आपका काहे से कि कल लिखेंगे हमारे व्यंजल नरेश रविरतलामी, परसों बोले तो मंगलवार को हनुमान जी का दिन है हमारे गीत सम्राट राकेश खंडेलवाल का जिन्होंने हमारे अनुरोध पर हफ्ते में एक दिन चिट्ठाचर्चा करना स्वीकार किया है। उनके अंदाज में नयापन है वो अनूठा लगेगा आपको। इसके बाद वुधवार को मिलेंगे उड़नतस्तरी वाले कुंडलिया गुरू समीरलाल। लेकिन यह मत समझियेगा कि हम दिखेंगे ही नहीं। हमारे और पंकज बेंगाणी के लिये कोई बंदिश नहीं है हम जब मन आये तब लिख सकते हैं। वैसे बंदिश तो किसी के ऊपर भी नहीं है। आपके ऊपर भी नहीं। बोलिये, लिखेंगे चिट्ठाचर्चा!

आपको अपनी रचना के बारे में कुछ जानकारी देनी है या चिट्ठाचर्चा के बारे में कोई भी सुझाव देना है तो chitthadak@gmail.com पर दें।


आज की टिप्पणी


एक और अचूक रामबाण है।
गलतिया बताने वाले ब्लॉग को अपनी पठनीय ब्लॉग लिस्ट से हटा दें। यानि फिल्टर कर दें। यदि ब्लॉगर साहित्यकार और भाषाविद बन जाएंगे तो साहित्यकार क्या तेल बेचेंगे?

इसलिए अपने ब्लॉग को अपनी आत्मा की आवाज बनाइए और जो मन मे आए, लिख डालिए। ज्यादा फुरसतिया-शुरसतिया के मात्रा, व्याकरण मे पड़ेंगे तो नारद की रेटिंग मे निचली पायदान पर पहुँच जाएंगे। फिर ऐसा ना हो कि गाना पड़ जाए:
“मै और मेरी तन्हाई, अक्सर ये ब्लॉग पढते है, व्याकरण ना होती तो क्या होता, ये मात्रा इधर लगती, वो मात्रा उधर से हटती, काश ब्लॉग पर लोग आते, पढते, कमेन्ट करते। मै और मेरी तन्हाई, अक्सर ये बाते करते है।”

जीतेंन्द्र चौधरी

आज की फोटो


आज की फोटो फिर सुनील दीपक के ब्लाग से जो देख-दिखारहे हैं एक विकलाँग गर्भवती महिला को
विकलाँग गर्भवती
विकलाँग गर्भवती

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2 टिप्‍पणियां:

  1. आप फुरसत में लिखते होगें फिर भी नाम का 'लोचा' हो ही जाता हैं. समिरलाल जी के चिट्ठे पर मेरी टिप्पणी को आपने पंकज की टिप्पणी बताया हैं. यह सब बेंगाणी उपनाम की वजह से होता हैं. खैर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की मूलतः किसने लिखा हैं, इसलिए आगे से जहाँ भी ऐसा 'लोचा' होगा कभी शिकायत नहीं की जाएगी.

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  2. अनूप जी,
    वातानुकूलित कमरों में साल भर रजाई का उपयोग होता है। वैसे असली शब्द थे-
    रोके मगर उनकी गरमाई--
    पर आप 'उनकी गरमाई' पढकर ठन्डे-गर्म न होने लगें, इसलिए बदल दिया। भाई जी, हम तो विनय भाई से ज्यादा आपसे डरते है। एक तो पड़ोसी,दूजे शस्त्र निर्माण कला में निपुण और तीसरे ---दूर-दराज़ के गुरू।

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