शनिवार, अक्तूबर 21, 2006

जलाऒ दिये पर रहे ध्यान इतना...

ज्योति पर्व
ज्योति पर्व


आज दीपावली है। ज्योतिपर्व के मनाये जाने के कारण दुनिया जानती है। वंस अपान अ टाइम त्रेता युग में जब रामचंद्र रावण का तीया-पांचा करने के पश्चात चौदह साल बाद अयोध्या वापस आये तो सारे अयोध्यावासियों ने खुशी प्रकट करने के लिये बल भर रोशनी की। जिनके पास पैसा नहीं था उन्होंने उधार लेकर किया लेकिन किया, खुशी मनायी। जितनी खुद मना सकते थे मना ली, बाकी छोड़ दी आगे की पीढ़ियों के लिये। उसी खुशी को हम आज तक मनाते आ रहे हैं और बकौल नीरज जी कामनाकरते हैं:-

लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी
निशा की गली में तिमिर राह भूले।
दिल्ली ब्लाग से
दिल्ली ब्लाग से



तमाम लोग रामकथा को नहीं भी जानते हैं। ऐसे ही साथियों के लिये हमारे जी के अवधिया जी ने विकिपीडिया पर रामकथा की जानकारी दी है। हरि अनंत हरि कथा अनंता की तरह इस कथा में जितनी जानकारी दी गयी है उससे ज्यादा देने की संभावना होगी। आप इसमें जानकारी जोड़ें, बदलें और सुधार करें। हमें इसके बारे में जानकारी दी मितुल् ने जो कि खुद् कोई ब्लाग नहीं लिखते लेकिन अपनी रिमोट गुंडई के बल पर दूसरों से लिखवाते हैं। हमें जब सबेरे उनकी मेल मिली कि मैं इसकी जानकारी लोगों को दी तो लगा कि ये भाई कितना समर्पित है हिंदी विकिपीडिया के लिये।

लेकिन बात रामकथा की ही नहीं है। कल हम् जब अतुल् के चिट्ठाचर्चा को पढ़ते हुये गदगदायमान थे तो उसी समय हमारे एक ब्लागर साथी हमारे साथ गूगलायमान थे। प्रियंकर जी की टिप्पणी, जिसमें उन्होंने अतुल की शैली की तुलना नागरजी( अमृतलाल नागर) और के.पी.(के.पी.सक्सेना) से की थी , के बारे में बात करते हुये साथी ने पूछा कि नागरजी और के.पी.जी क्या सीनियर ब्लागर हैं?

वैसे तो यह बात कोई भी पूछ सकता है और् हर् एक् व्यक्ति सब कुछ् जान नहीं सकता लेकिन् मुझे ऐसा लगता है कि यदि आप साहित्यिक बातें लिखते हैं और नागरजी के बारे में नहीं जानते तो ब्लाग लिखना कम करके कुछ पढ़ने के लिये भी समय निकालना चाहिये।

अतुल की पोस्ट् को पढ़ते हुये मुझे अपनी ही लिखी बात भी याद आ रही थी-"सच पूछिये तो कुछ साथियों की रचनाऒं का स्तर तो ऐसा है कि वे जिस पत्रिका में छपेंगी उसका स्तर ऊपर उठेगा"। कल का अतुल का लेख हमारी बात की सनद थी।

बहरहाल आप सभी को दीपावली की शुभकामनायें देते हुये अपनी बात शुरू करता हूं। आज अधिकतर साथियों ने दीपावली के अवसर पर शुभकामनायें प्रेषित करते हुये अपने चिट्ठे लिखे हैं। राकेश खंडेलवाल लिखते हैं:-

रोशनी ओढ़ कर आई है ये अमा
आओ दीपक जला कर करें आरती
साथ अपने लिये, विष्णु की ये प्रिया
कंगनों और नूपुर को झंकारती


दीपाजोशी का मन कुछ दुखी सा है तभी वे लिखती हैं:-

हो रहा जीवन तिल तिल राख
मन में लिए मिलन की आस
उज्जवल आलौकिक फिर से
नव जीवन दीप जला दो

जुगलबंदी से
जुगलबंदी से

इसीलिये प्रेमेंद्र दुश्मन (अंधेरे)की नली तोड़ने के लिये जय बजरंगबली कह रहे हैं और जीके अवधियाजी महाभारत कथा कह रहे हैं।

दीपावली के अवसर् पर अनूपभार्गव बोले मुझे कुछ् कहना है हम बोले कहिये तो उन्होंने दीपावली की शुभकामनायें टिका दीं:-
:-
दीपिका की ज्योत बस जलती रहे
स्नेह की सरिता यूँ ही बहती रहे
आप जैसे दोस्तों का साथ हो
ज़िन्दगी यूँ ही सदा हँसती रहे


हम जब तक कुछ् कहें तबतक रजनीजी उनको रिटर्न् गिफ्ट् थमा गयीं:-

य़ूँ ही आशा बनी रहे हर क्षण,
गुँथे वेणी गेंदे और गुलाब से हर पल,
दीपावली जब भी आए
अमावस में दूज का चाँद खिले हर पल


प्रभाकर पांडेय् , दिल्ली ब्लाग, मत्सु, क्षितिज कुलश्रेष्ठ, विरेंद्र विज ने भी दीपावली की शुभकामनायें दीं। संजय बेंगाणी दीपावली के बाद भी मौज करेंगे काहे कि पूरा गुजरात बंद् है पांच दिन।

इस बीच् गिरिधर जी भाषा राजनीति के बारे में बता गये और जीतेंद्र जुगाड़ी लिंक् टिका गये तथा उन्मुक्तजी टोनाटटका करते हुये हेर संगीत नाटक दिखा गये।

वंदेमातरम् के साथी प्रख्यात कार्टूनिस्ट आर.के.लक्ष्मण के बारे में विस्तार से जानकारी दी यह अच्छा प्रयास है और अच्छा होता कि वे आर के लक्ष्मण के कुछ् कार्टून् भी साथ् में पोस्ट् करते।

इधरा जब दीपावली पर पटाखेबाजी हो रही थी तो लक्ष्मी नारायण गुप्त जी भगवान के दरवार का ड्रेस कोड तय कर रहे थे:-
कैसे कपड़े पहिन के जायें, प्रभु दरबार।
प्रश्न उठा है मनस में, सज्जन करें विचार।।
प्रश्न पादरी से करो, तो यह उत्तर देय।
सूट बूट टाई बिना चर्च न आवे कोय।।
चर्च न आवे कोय, करे ना प्रभु का आदर।
सुन्दर वस्त्रों बिना घुसे, जो प्रभु के मन्दिर।।
हिन्दू मन्दिर बहुत से, हैं जग में विख्यात।
जिनमें धोती ही पहिन, घुस सकते हैं आप।।


इस पर कुंडली मारते हुये राकेश खंडेलवालजी ने टिप्पणी में लिखा:-
अच्छे संकट में लिया, तुमने खुद को डाल
रोज लगाते हो नये जी को तुम टंटाल
भक्ति-प्रेम मन में रहे तो क्यों भटको यार
वो जो प्रभु हैं आयेंगे, खुद चल कर के द्वार
अपने घर में नग्न रहो या पहनो कच्छे
प्रभु को भेज निमंत्रण कर्म करो बस अच्छे


सागर चंद नाहर अपने लेख में साध्वी सिद्धा कवँर उर्फ़ समता के जैन के साध्वी जीवन को त्यागकर सांसारिक जीवन में प्रवेश की पड़ताल करते हैं अपना सुझाव देते हुये वे लिखते हैं:-

जैन धर्म में दीक्षा के लिये भी नियम होने चाहिये की जब तक लड़का या लड़की बालिग नहीं हो जाते उन्हें दीक्षा नहीं देनी चाहिये, लोग तर्क देते हैं कि कई महान साधू और साध्वियाँ बहुत कम उम्र में दीक्षा लेकर इतने विद्वान और महान बने है, पर वो यह बात भूल जाते हैं कि जिस तरह जमानाहम सब के लिये बदला है उन मुमुक्ष { दीक्षा के उम्मीदवार} के लिये भी बदला होगा।


आज की सबसे विचारणीय पोस्ट अमित ने लिखी है और देसीपंडित के बंद होने का हवाला देते हुये ब्लाग, समूह ब्लाग, नारद, चिट्ठाचर्चा के बारे में अपने विचार व्यक्त किये।

अमित के अनुसार समय सबसे बड़ा निर्णायक तत्व है इस तरह के प्रयासों की नियति तय करने के लिय। इन बातों के बारे में और लोग अपने विचार व्यक्त करें तो बेहतर रहेगा।

अमित का अपना कहने का अंदाज है, उनका ब्लाग है वे जैसा चाहें वैसा कहें,लिखें, जबाब दें इसके लिये वे पूर्णत: स्वतंत्र हैं लेकिन मुझे लगता है कि जिस अंदाज में उन्होंने राकेश खंडेलवाल की टिप्पणी पर टिप्पणी की वही बात और बेहतर अंदाज में कही जा सकती है। और मुझे यह भी लगता है कि जो कुछ समूह ब्लाग उनके समन्वयन में बंद हुये उनमें कहीं न कहीं इस तीखे अंदाज ने भी जरूर सहयोग किया होगा।

उनके श्रीमुख से:-
१.चिठ्ठा चर्चा को कौन्हो रोजनामचा या मुंबई ब्लाग समझ रखा है जो ईमान ईकराम मिलते ही चादर तान के सो जाये। अमां बड़े जहीन लोग चलाते है इसे और फिर कौन सा इसकी होस्टिंग पर किसी का धेला भी लगता है।
अतुल्

२.गाड़ी और लदे हुए ट्रक को धक्का लगाने में ज़मीन आसमान का अंतर है। अमित
३.शुरू शुरू में उत्साह से आरम्भ किया गया प्रयास बाद में साबुन के झाग की तरह बैठने लगता है। और जब पूरी तरह झाग बैठ जाता है तो दुकान बढ़ाने का समय आ जाता है।अमित

आज की टिप्पणी:-


१.अरे आप तो उन जगहों की बात कर रहे हैं जहां ईश्वर कैद हैं . प्रभु का दरबार तो यह अखिल विश्व है . वह उस आत्मा में भी रहता है जो हर क्षण हमारे अंतर का उजास बिखेरती रहती है और इस जीवन को आलोकित करती है. हां ! आत्मा के वस्त्रों के बारे में मुझे कुछ पता नहीं है,उधर कोई नया अध्ययन या शोध हो तो बताइएगा.

प्रियंकर

आज की फोटो:-



आज की फोटो जापान के कोने से
मैसूर महल
मैसूर महल

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4 टिप्‍पणियां:

  1. माँ लक्ष्मी और प्रभू श्री गणेश के चरणों में "कविराज" का शत्-शत् नमन!!!

    आप सबको दीपावली की ढ़ेरों शुभकामनाएँ!!!

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  2. शुक्लाजी दीप पर्व की हार्दिक शुभकामनायें

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  3. मुझे लगता है कि जिस अंदाज में उन्होंने राकेश खंडेलवाल की टिप्पणी पर टिप्पणी की वही बात और बेहतर अंदाज में कही जा सकती है।

    अनूप जी, टिप्पणी दोबारा पढ़ लीजिए, मैंने किसी गलत भाव से या कड़े स्वर में नहीं कहा(इसलिए smiley भी लगाया)। जो कहना चाहता था वही कहा कि अपने को कविता की भाषा समझ नहीं आती, इसलिए इस भाषा का प्रयोग हमारे साथ ना किया जाए। :)

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  4. अमित भाई, आप कह रहे हैं तो सही ही होगा. मुझे जो लगा मैंने लिखा. चलिये अब फुलझड़ी
    छोड़ी जाये. दीपावली की शुभकामनायें.

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