बुधवार, अक्तूबर 18, 2006

लिखिये तो छपाइये भी न!

वार वार का वार है, आया है बुधवार
सोच में हैं पड़े हुये, हमरे थानेदार.
हमरे थानेदार कि नारद फिर आया है
क्या हमरी हालात पर तरस खाया है?
कहे समीर अब हमे कौन पढ़े है यार
नारद के इस तीर के, कैसे झेलें वार.


--समीर लाल 'समीर'

अब जब नारद जी लगभग लौट आये हैं तब उनका नया पायदान सिस्टम कुछ चिट्ठों को देर से रिपोर्ट करेगा, वो उसकी मजबूरी है और लम्बी सेहतमंद उम्र के लिये जरुरी भी. तब ऐसे में निचली पायदानों वालों का क्या होगा? उन्हें हमारी नेक सलाह है कि वो नियमित लिखा करें ताकि नारद में ऊपर की पायदान पर आ सकें, अन्यथा अगर वो संभव नहीं, तो हमें ईमेल या यहां टिप्पणी के माध्यम से सूचित करें ताकि हम उन्हें अगले दिन की चिट्ठा चर्चा में शामिल करने की कोशिश कर सकें.


जगदीश भाई आईने के माध्यम से आपको भीष्म साहनी की, ओ हरामजादे का भाग-२ पढ़वा रहे हैं. कहानी पूरे समय बांधे रहती है और लंबी होने के बावजूद भी पूरा पढ़ने को मजबूर करती है. जगदीश भाई अपने इन प्रयासों के लिये विशेष बधाई के पात्र हैं.

जुलाई माह में जब गलती से ब्लागस्पाट पर बैन लग गया था, उसकी याद संजय भाई को फिर आ गई. मगर इस बार लगता है बैन उनके खुद के कम्प्यूटर ने ही लगाया है, कम से कम अगर उनके आई. एस.पी. के मानें तो. चिट्ठे न पढ़ पाने और उससे भी ज्यादा टिप्पणी पीर को टिप्पणी न कर पाने की कितनी पीड़ा होती है, यह उनके लेख से साफ झलकता है. हम सब संजय भाई को विश्वास दिलाना चाहते हैं कि उनकी टिप्पणियों के बिना हमारे ब्लाग भी बिल्कुल सूने हैं और जल्दी करें अन्यथा हम सबका तो लिखने का उत्साह भी जाता रहेगा.

दिवाली मुहाने पर है. सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें. इस मौके पर क्षितिज भाई अब अपनी धनतेरस की समझाईशी खरीददारी से जूझ रहे हैं तो राकेश भाई अपने कवित्त्मय शैली में उन्हें और समझाईश दे गये टिप्पणी के माध्यम से:

आप खरीदेंगे सोने के आभूषण जब धनतेरस पर
तब सुनार की औ' सर्रफ़ की ही सच में दीवाली होगी
धन आने की बातें करते, और खर्च वे करवाते हैं
असमंजस है आखिर कैसे सचमुच में दीवाली होगी.


और फिर जा कर अपने गीत कलश पर गुनगुनाने लगे, चाँदनी अपना चेहरा छुपाने लगी है:

गंध ने रंग को शिल्प में ढाल कर
एक प्रतिमा गढ़ी, जो रही आपकी
इन्द्रधनुषी गगन पर संवरती हुई
जो छवि इक रही, थी छवि आपकी
पालकी में बिठा मौसमों को घटा
आपकी उंगलियों का इशारा तके
आपके इंगितों से समय चल रहा
कब ढले यामिनी और दिन कब उगे

ज़िन्दगी आपको केन्द्र अपना बना
साधना के दिये फिर जलाने लगी.


हम तो बस वाह वाह ही करते रह जाते हैं कि तब तक वो फिर गाने लगते हैं और देखिये फिर गाये यादों के चन्द्रमहल

शिष्य गिरिराज फिर क्यूँ चुप बैठें. कहीं पर कुछ बिखेर आये थे और लगे उसकी समीक्षा करने. छाप दिये छपास की धड़धड़ाहट में. अब विवाद हो तो हो, वो तो हेलमेट भी खरीद लाये हैं:

उबल रहा अब रक्त रगो में
फिर इतिहास बनाने को
कलम छोड़ बंदूक उठा लो
इंकलाब लिख जाने को


अब इनका जो भी हो वो तो ये जाने, शुएब भाई का ये खुदा है का अगला अंक आ गया है, अबकी बार नया मुद्दा. भई, खुब सही श्रृंखला चल रही है और बहुत बेहतरीन अंदाजे बयां है:

अमेरिका ने खुदा के आगे चीन देश पर मुकद्दमा ठोंका कि वो चांद पर खुल्लम खुल्ला फ्लैट बेच रहा है, वो दिन दूर नही जब पूरे चांद पर चीन अपना कब्ज़ा जमाले। फिर पता नही उन लोगों का क्या होगा जो चांद को पूजते हैं, बगैर चांद के रमज़ान कैसे बिताएँ और ईद क्या खसाबों की शकल देख कर मनाएं? अचानक खुदा के आंसू निकल पडे, वो बिलक कर रोने लगा।


प्रतीक पांडे जी भी खुब हैं. कहते हैं पटरी से उतरी रावलपिंडी ऐक्सप्रेस एक अलग अंदाज में:

यहाँ हम अपने पठान को दूध-घी खिला-पिला रहे थे, सुबह-सांझ बदाम घिस के देते थे; फिर भी क्या मजाल कि लड़का १२० के ऊपर फेंक दे और वहाँ उनने धाँय-फाँय मचा रखी थी। ससुरी बड़ी टेंशन थी, लेकिन अब दिल को नैक तसल्ली हुई। काहे कि यहाँ हमारा दूध-घी वगैरह कुछ बर्बाद ज़रूर हुआ, लेकिन वहाँ वो महँगा प्रोटीन पाउडर खिला रहे थे ससुरों को। फिर भी वो तेज़ नहीं फेंकेगा, तो क्या हमारी छिरिया तेज़ फेंकेगी... हैं...?


इस पर टिप्पणी करते करते विजय भाई एक नया शब्द इज़ाद कर गये, बखर, देखें:

चकाचक!!

भई वाह! जितना मज़ा खबर में नहीं उससे ज्यादा तो बखर में निकल आया.

बखर - ब्लाग खबर!! :))


अब सुनिये प्रियंकर की प्रेम कविता, बहुत सुंदरता से भाव उकेरे गये हैं:

भटकाव के बीहड़ वन में
वे ही होंगे पथ-संकेतक
गहन अंधियारे में
दिशासूचक ध्रुवतारा
तुम मेरे मन का कुतुबनुमा हो
अभौतिक अक्षांसों के
अलौकिक फेरे
संभव नहीं हैं तुम्हारे बिना


इंडिया गेट पर नये कानून पर नजर डाली गयी है, पोटा नहीं तो वोटा लगे फारुक पर

क्या आतंकवाद के लिए भड़काना गुनाह नहीं। गुनाह है, तो चुप क्यों है सरकार। पोटा ऐसे लोगों के लिए भी था। जिसे मनमोहन ने हटा दिया। अब 'पोटा' के जगह 'वोटा'- वार ऑन टेररिज्म एक्ट- लाने की सोच रहे हैं।

डा. प्रभात टंडन डेंगू या डेंगू फ़ोबिया पर होम्योपैथिक विचार लेकर आये और गज़ल नज्म पर पढ़िये मिर्ज़ा गालिब की गज़ल.

सुखसागर पर आप देखें कि महाभारत की रचना कैसे हुई और वेदों का विभाजन के विषय में और फिर देखें प्रतीक पांडे की बेबाक जुबानी ये व्लर्ड है न!:

वैसे भी मनमोहन-मुशर्रफ़ तो हीरा-मोती बैल हैं। कुछ भी कर लें, आख़िर में अपने मालिक बुश के पास पहुँच जाते हैं। कहानी में डीविएशन बस इतना है कि यहाँ ये दोनों बैल आपस में ही जूतम-पैजार करके मामला सुल्टाने के लिए मालिक के पास जाते हैं। हालाँकि पाकिस्तान के ख़िलाफ़ सुबूत लेकर मनमोहन जी दर-दर भटक रहे हैं, लेकिन होता-जाता कुछ नहीं है... वही ढाक के तीन पात।


मिडिया युग पर एक अर्जेंट अपील छपी है तो हितेन्द्र जी डिजिटल सांस्कृतिक संपदा पुस्तकालय के विषय में उपयोगी जानकारी दे रहे हैं. उन्मुक्त जी ने अपनी अलग अलग चल रही श्रृंखलाओं में से हरिवंश राय बच्चन जी की श्रृंखला जारी रखी और रितेश जी ने अपने पापा को कविता भेजी

नये कवि के रूप में हमें बहुत प्रोत्साहन मिला है जी
उत्साहित हो हमने पापा को कविता भेजी
कविता पढ़कर पापा बोले बेटा बड़ा आनंद आया है
और तुमने सिर हमारा फ़ख्र से ऊँचा उठाया है.



नकाबी बदमाश ने अपनी गतिविधियां जारी रखते हुये जीतू भाई को फिर परेशान किया, यह देखें मिडिया युग पर:

जीतू:
यार देखो पब्लिकली बोलना पड़ रहा है, ये अंग्रेजी पोंकना बंद करो , अगर नारद पर बैन कर दिया तो कलेस मत मचाना बाद में.

भईया, बोलने का लहजा तो यार गजब कापी करता है. :)


खैर, चौपाल पर पढ़ें, कर दिजिये!!

फुरसतिया जी ने आज एक लेख लिखा: लिखये तो छपाइये भी न!:

पता नहीं आपको कैसा लगता है लेकिन मुझे कृष्ण बलदेव वैद की डायरी पढ़ते समय अपने तमाम ब्लागर साथियों के लेख याद आ रहे थे और यह कहने का मन कर रहा था कि ब्लाग में लिखने के साथ-साथ अपने लेख, कहानियां, कवितायें जगह-जगह पत्र-पत्रिकाऒं में छपने के लिये भेजते रहें- बिना इस बात की परवाह किये कि वे छपेंगी या नहीं। मुझे अपने तमाम साथियों की रचनायें इस स्तर की लगती हैं जो थोड़े फेर बदल के साथ आराम से पत्र-पत्रिकाऒं में छपने के लायक हो सकती हैं और सच पूछिये तो कुछ साथियों की रचनाऒं का स्तर तो ऐसा है कि वे जिस पत्रिका में छपेंगी उसका स्तर ऊपर उठेगा। मेरा सुझाव है इस दिशा में सोचा जाये और हिचक और आलस्य को परे धकेल कर अपनी रचनायें छपने के लिये भेजने का प्रयास किया जाये।


वाह भई वाह, क्या बात है हमारे फुरसतिया की. बहुत उत्साही करने वाला लेख रहा तथा आपको नया मकान खरीदने की बहुत बहुत बधाई.


अब हम चलते हैं.
इतना ही आज का पर्चा, कल के लिये पढ़ते रहिये चिट्ठा चर्चा.

आज की टिप्पणी:
अनुराग श्रीवास्तव की प्रिंयकर की प्रेम कविता पर: (यह तो पूरी पोस्ट हो सकती थी, मगर चलिये टिप्पणी ही सही)

प्रियंकर जी,
जल पोत के कपतान के रूप में मैने छ: वर्षों तक काम किय है। मेरा समुद्री जीवन कुछ 15 वर्षों का रहा है। अक्षांश, देशान्तर और कुतुबनुमा मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। समुद्र का खारा पानी लहू बन कर मेरी वह्लि में आज भी दौड़ता है - यह सब इतने रूहानी भी हो सकते हैं यह तो बस आपकी कविता पढ़ कर ही पता चला। मन करता है एक बार फिर मन की पतवार खोल उमंगों की हवाओं से कहूँ - बहा ले चलो वहीं जहाँ अभिव्यक्ति का सागर साँसे ले रहा है।
प्रशिक्षण पोत ‘राजेन्द्र’ पर नाविक जीवन पर एक गीत सीखा था, आपकी कविता पढ़ कर याद आ गया, कुछ पंक्तियाँ
We’re on the road, we’re on the road to anywhere,
with never a heart ache with never a care,
got no homes,
got no friends
and thankful for anything
the good Lord sends…..
***
…..that the road to anywhere, the road to anywhere
will lead to somewhere some day
we’re on the road….
ये है नाविक जीवन - एकाकी, द्वीप के समान अलग थलग लेकिन फिर मद मस्त, खुश, बिंदास्त और तूफ़ानों में भी आशा का दिया जलाये हुये।
….somewhere…someday…..
बीच बीच में आंग्ल भाषा का प्रयोग किया है क्योंकि यह गीत मूलत: आंग्ल भाषा में है और अनुवाद में भावनायें शायद कहीं गुमनाम सी हो जातीं।
…मेरे जहाजों की याद दिला दी आपने। धन्यवाद!


आज की चित्र: सुखसागर से:


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5 टिप्‍पणियां:

  1. समीरजी,मैं खुद भी लिखता हूं चिट्ठाचर्चा लेकिन जिस तल्लीनता से आप लिखते हैं वह काबिलेतारीफ़ है.और कुंडलिया तो सोने में सुहागा!

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  2. आपने तो वो ही बात कर दी जो आज मैने अपने आलेख मे की है:
    http://udantashtari.blogspot.com/2006/10/blog-post_17.html

    जरा इसे भी देखें.. आप महान हैं. :)

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  3. समिक्षात्मक विवेचन पढकर सुखद अनुभव हुआ। धन्यवाद लालाजी।

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  4. बुधवार का इंतजार क्यों रहता हैं?
    अरे जलेबी खाने को मिलती हैं, इसलिए.
    हमेशा की तरफ मजे लेकर खा ली है, कहे तो तारीफ भी दूं.

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  5. 'चिट्ठा चर्चा' वह दर्पण है जिसमें हर ब्लॉगर अपने ब्लॉग का रूप निहारना चाहता है . सभी अपना सही-सही/सच्चा प्रतिबिम्ब देखना चाहते हैं .जो बहुत कैजुअल हैं और लगभग आत्मभर्त्सना की मुद्रा में रहते हैं वे भी और जिन्हें 'नारद मोह' है वे भी . ऐसे में 'चिट्ठा चर्चा' दल का दायित्व और भी बढ जाता है . आप सब बधाई के पात्र हैं. आपकी निष्ठा,विश्वसनीयता और उत्कृष्टता की प्रतिध्वनि ऐसे ही चिट्ठाकारों की चौपाल में गूंजती रहे .

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