बुधवार, अक्तूबर 04, 2006

हे राष्ट्रपति इसे माफ मत करना

दो अक्टूबर, गाँधी जयंती, आई और चली गई. पूर्ण हर्षोल्लास छाया रहा और इस तरह हुई एक और औपचारिकता की इति श्री. हल्की फुल्की छांया अभी भी कहीं कहीं दिख जाती है, कल परसों तक वो भी छट जायेगी, ऎसा मौसम विभाग वालों का अनुमान है. काफी चर्चा चिट्ठा जगत में भी रही और वो भी बस बंद होने की कगार पर है, फिर और जरुरी चींजे भी तो हैं, दिवाली है, ईद है और फिर क्रिसमस. उन सब पर भी तो लिखना है.

एक कुंडली नुमा पेशकश:


गाँधी जी के नाम पर, छिड़ गये कई प्रसंग
दो अक्टूबर का काम यह, नहीं कोई है जंग
नहीं कोई है जंग कि हरदम ऎसा ही देखा है
जिसने जैसा समझा, उसी का यह लेखा है
कहे समीर कि यह तो हफ्ते भर की आँधी
अगले बरस याद आयेंगे अब फिर से गाँधी.


--समीर लाल 'समीर'

हमने भी गाँधी जयंती के मौके पर 'लगे रहो मुन्ना भाई' की तर्ज पर विनय भाई से विनम्र (मुन्ना भाई स्पेशल) से अहिंसात्मक विचार विमर्श किया तो उन्होंने इसे हमारा बड़प्पन बता कर और बड़े गाँधीवादी होने का संकेत दे डाला व हमारा हृदय परिवर्तन (फिर मुन्ना भाई स्पेशल) कर दिया और हमने भी उनकी गाँधीवादिता को अपना शीश नवा दिया और समस्त विचार विमर्श भाईचारे की भावना से लिपटा हुआ सफलता को प्राप्त हुआ.

उसी हल्की फुल्की छांया मे प्रेमलता जी गांधी जी कविता के माध्यम से परिवर्तन की आशा की बात कर रही है:

"एक दूसरे पर त्याग करना,
जीवन में स्नेह के रंग भरना।
आएगी बड़ी क्रांति,
सर्वत्र होगी शांति॥"


तो, जोगलिखी वाले भाई संजय बेंगाणी जहाँ एक ओर अपनी पूर्व प्रविष्टी पर टिप्पणी का आभार व्यक्त करते रहे, वहीं "गाँधीजी के दोनो पक्ष" मे अपने विचार देने लगे:

"गाँधीजी ने अस्पर्श्यता को खत्म करने के साहसपूर्ण कदम उठाये थे, भारत को एक राष्ट्र के रूप में देखते हुए राष्ट्रभाषा के महत्व को समझा तथा हिन्दी को बढ़ावा दिया. ग्राम स्वराज का सपना देखा. ऐसे अनेक-अनेक कार्य उन्होने किये थे. सच कहें तो वे महात्मा ज्यादा थे और राजनेता कम. "


तो अब चलें इस जयंती आयोजन से आगे और देखें क्या हुआ चिट्ठा जगत मे आज:

चिट्ठा चर्चा पर आज से एक अभिनव शुरुवात की है भाई पंकज बेंगाणी ने 'गुजराती चिट्ठों' की चर्चा के साथ. पहली चर्चा ' ना तो कारवाँ की तलाश है'.अब इसके माध्यम से गुजराती चिट्ठा विश्व मे क्या क्या चल रहा है, यह हम सबको पता चलता रहेगा और वो भी हिन्दी में पंकज के निराले अंदाज में.
अंत में उनके चिट्ठे पर दिखी यह बेहतरीन शायरी:

"तेरा इश्क है मेरी आरज़ु,
तेरा इश्क है मेरी आबरु..
तेरा इश्क मैं कैसे छोड दुं,
मेरी उम्रभर की तलाश है.."


गीत सम्राट राकेश खंडेलवाल जी ने ख्याल कराया कि यह पंक्तियां साहिर लुधियानवी जी की हैं, जिनका जिक्र कहीं नही आया है, राकेश जी का बहुत आभार इस ओर ध्यान दिलवाने के लिये. आशा है भविष्य मे भी ऎसा ही सहयोग मिलता रहेगा.

पंकज को बहुत बधाई.

वहां रत्ना की रसोई मे सागर चन्द जी के प्रभाव मे हिन्दी अंग्रेजी मिक्स वेजिटेबल Man, Woman And Happiness का बना नुस्खा, वो भी ऎसा कि सजनी कभी रुठे ही नहीं. करो कोशिश, हमें क्या. जब पानी मे लकीर खींच लेना, तब बताना. लकीर नापनें हम भी आयेंगे, यह वादा रहा.

दिल्ली ब्लॉग मे सुर जी का सुर सुनिये "अपनी भी साइट हैक हुई याहूज हैकर्स डे पर" अब वो परेशान हो रहे हैं और आप सबसे मदद मांग रहे हैं:

"अब परेशानी है कि मेरे सहयोगी को ये समझ नहीं आ रहा कि इस समस्या का निदान कैसे किया जाए. तकनीकी सहयोग के लिए सर्वर एडमिनस्ट्रेशन को संपर्क साध लिया है, पर सर्वर कंपनी हैदराबाद में होने के कारण वहां से मदद मिलने में देर होगी. इसलिए सभी तकनीकी जानकारों से मदद की अपेक्षा है. क्या किया जा सकता है इसके बारे में जो भी संभव हो बताए."

फिर जैसा कि ऎसे में होता है, उनकी परेशानी पर संजय टिप्पणी के माध्यम से मौज ले रहे हैं, चलो, परेशानी मे कुछ तो मन हल्का होगा:
"क्या इसके लिए आपको हैदराबाद गाड़ी में बैठ कर जाना होगा. एक ई-मेल पर आपका काम होना चाहिए."

छुट-पुट पर उन्मुक्त जी किसी छुट-पुट घटना से अति भाव विभोर 'सही-गलत'का नाप तौल विभाग खोल कर बैठ गये. वैसे उसमें हमारा जिक्र भी लायें और हमारा नाम धरा 'यहां' और विनय को भी उसी नाम से 'यहां' पुकारा. अब दो समनामपुकारी आपस में गले मिल रहे हैं और उन्मुक्त जी इससे बेखबर अपनी नाप तौल में जुटे हैं कि देखते हैं यह बहस कब तक चलती है. जब जान जायेंगे कि खत्म हो गई तो कृप्या सूचित करियेगा, भाई साहब, तब तक लगे रहो.


की बोर्ड के सिपाही भाई नीरज दीवान ने मुहम्मद अफ़जल को फांसी की सजा से संबंधित बातचीत मे पहले तो तमाम तथ्य, फिर तमाम अनसुलझे प्रश्न उठाये और फिर ' हे राष्ट्रपति इसे माफ मत करना ' के नाम से आप सबसे अपील कर रहे हैं:

"ब्लॉगजगत के तमाम भाईयों से अपील है कि राष्ट्रपति को ईमेल भेजकर उन्हें संविधान के अनुच्छेद 72 का प्रयोग नहीं करने की अपील करें. हम अपने दस मिनट देकर तमाम भारतीयों की तरफ़ से आ़वाज़ उठा सकते हैं. औरों को भी प्रेरित करें ताक़ि वे भी आतंकवाद के खिलाफ़ जनता की इस लड़ाई में हाथ से हाथ मिला सकें."

अब आप यदि इनकी अपील पर समर्थन कर ईमेल भेजना चाहते हैं, तो आपको एक नहीं, दो गृहकार्य दिये जा रहे हैं:

एक तो अपील तैयार करें और दुसरा, माननीय राष्ट्रपति जी का ईमेल पता खोजें. कट पेस्ट का कोई जुगाड़ नहीं है.



आज की टिप्पणी:

अनूप शुक्ला: जोगलिखी पर:

संजय भाई,चिट्ठे की सीमायें होती हैं. सब कुछ समझा-समझाया नहीं जा सकता.खासकर ऐसे विषय पर जिसके पक्ष-विपक्ष में तमाम सामग्री उपलब्ध हों. लोगों की अपनी धारणायें बनी होती हैं सालों से उसी के अनुसार तर्क गढ़े जाते हैं.आपने किसी जगह खुद ईमानदारी से स्वीकार किया है आप स्वभाव से दक्षिणपंथी
हैं. इस लिहाज से आपके तर्कों पर उस सोच की छाया पड़ना स्वाभाविक है. गांधीजी भी हाड़-मांस के पुतले थे. उनके व्यक्तित्व में तमाम विसंगतियां थीं, स्वभाव में हठधर्मिता थी ,ब्रह्मचर्य के अटपटे प्रयोग थे और भी न जाने क्या-क्या. लेकिन यह सभी मानते
हैं कि वे एक महान व्यक्ति थे.राष्ट्रपिता मानना न मानना कोई ऐसी बात नहीं.यह तो मानद पद है गुरुदेव ने दे दिया सो चल रहा है. मुझे लगता है कि कुछ
तर्कों के आधार पर गोडसे द्वारा गांधी की हत्या सही ठहराना और फ़िर -’गांधी-गोडसे दोऊ’ भले कहकर
कहीं न कहीं गांधीजी को गोडसे के बराबर बताने की बात ध्वनित होती है. अगर गोडसे ने इतने तर्क पूर्ण निर्णय के बाद गांधी को मारा तो उसकी राजनैतिक
समझ बेकार थी जो यह नहीं समझ पाया कि गांधीजी की अब कोई सुनता. तमाम द्स्तावेज बताते हैं गांधीजी को बड़े नेता शोभा की वस्तु मानने लगे थे.अगर वे जीवित रहते तो शायद उनकी स्थित वही होती जो जयप्रकाश नारायणजी की जनता सरकार बनने के बाद हुई थी.
बहरहाल बातें तो तमाम हैं और यह बात आप भी मानते हैं कि गांधीजी महान थे.और आज की तारीख में दुनिया में ऐसा कोई महापुरुष नहीं है जिसके खाते में कुछ श्याम पहलू न हों और ये पहलू भी समय-स्थान सापेक्ष होते हैं.


आज की फोटो: मन की बात से :


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9 टिप्‍पणियां:

  1. वाह! बहुत अच्छी तरह से चिट्ठों के बारे में लिखा आपने.संजय बेंगाणी ने बहुत अच्छा काम शुरू किया है.आशा है कि निकट भविष्य में अन्य भारतीय भाषाऒं के चिट्ठों के बारे में भी जानकारी मिलेगी.

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  2. ऊपर की टिप्पणी पंकज के लिये है. पंकज के भैया संजय उन तक पहुंचा दें.

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  3. ये लो, क्ल्लो बात. संजय जी ही छाये हैं फुरसतिया जी के दिलों दिमाग पर. अब, किया पंकज ने पूरा काम और बधईया रहें हैं संजय को. खैर, दोनो भाईयों का सहयोग हमेशा ही रहा है, आधा आधा बांट लेना, फुरसतिया जी का आशिष...और थोडा मुझे भी दे देना. :)

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  4. अनूपजी, लालाजी,

    बहुत धन्यवाद।

    राष्ट्रपति को मेल यहाँ से भेजें :
    http://presidentofindia.nic.in/scripts/writetopresident.jsp

    उत्तर देंहटाएं
  5. दोनों गृहकार्य कर लिए गए हैं. अब साथियों को सिर्फ़ कॉपी पेस्ट की तक़लीफ़ करनी होगी. परिचर्चा में छपा ये रहा ईमेल
    http://www.akshargram.com/paricharcha/viewtopic.php?id=629

    और इस पते पर राष्ट्रपति को भेज दिया जाए.http://presidentofindia.nic.in/scripts/writetopresident.jsp

    धन्यवाद

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  6. दोनों गृहकार्य कर लिए गए हैं. अब साथियों को सिर्फ़ कॉपी पेस्ट की तक़लीफ़ करनी होगी. परिचर्चा में छपा ये रहा ईमेल
    http://www.akshargram.com/paricharcha/viewtopic.php?id=629

    और इस पते पर राष्ट्रपति को भेज दिया जाए.http://presidentofindia.nic.in/scripts/writetopresident.jsp

    धन्यवाद

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  7. दोनों गृहकार्य कर लिए गए हैं. अब साथियों को सिर्फ़ कॉपी पेस्ट की तक़लीफ़ करनी होगी. परिचर्चा में छपा ये रहा ईमेल
    http://www.akshargram.com/paricharcha/viewtopic.php?id=629

    और इस पते पर राष्ट्रपति को भेज दिया जाए.http://presidentofindia.nic.in/scripts/writetopresident.jsp

    धन्यवाद

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  8. नीरज,
    इस शुरवात के लिये शुक्रिया। क्या आप पत्र को http://www.petitiononline.com/ पर भी रख सकते है? कुछ और लोग जुड सकेगे।
    धन्यवाद
    - दीपक

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  9. धन्यवाद नीरज भाई और पंकज भाई

    अब सरल होगा सबके लिये.

    समीर लाल

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