शुक्रवार, अक्तूबर 20, 2006

सुनो मिर्जा और शराफत अली से आज का चर्चा!

मिर्जा: अमाँ सुना क्या , देसीपँडित गुजर गये।
शराफत अली: हाँ सुना मियाँ। रवि रतलामी ने बड़ी गमगीन खबर सुनायी। क्या है कि आला दर्जे का काम शुरू करना मुश्किल होता है पर उसे आला दर्जे का बनाये रखना तो उससे भी मुश्किल। ऐसी बुलंद कोशिशो को चलाने के लिये बहुत कुर्बानियां देनी पड़ती है। जब कुर्बानियों की हद खुद की जिंदगी पर हावी हो जाये तो ऐसे बोरे की तरह पटक दी जाती हैं आला दर्जे की साईट।
मिर्जाः अच्छा तो मियां अब क्या ब्लागिस्तान में अंधेरा छा जायेगा? सुना है कि हिंदी ब्लागजगत में चिहाड़ मच गयी है कि कहीं चिठ्ठा चर्चा भी बंद न हो जाये।
शराफत अलीः अमां मन की बात सुनो तो धरती के दीये भी तारो की रोशनी को फीका करने का माद्दा रखते हैं। चिठ्ठा चर्चा को कौन्हो रोजनामचा या मुंबई ब्लाग समझ रखा है जो ईमान ईकराम मिलते ही चादर तान के सो जाये। अमां बड़े जहीन लोग चलाते है इसे और फिर कौन सा इसकी होस्टिंग पर किसी का धेला भी लगता है।

मिर्जाः यार ई माईक टेस्टिंग तो सुने थे ये फोटू की सब काहे टेस्टिंग में जुट गये?
शराफत अलीः वह क्या है कि
अब नारद प्रभू समाचार के साथ-साथ फोटो भी दिखायेंगे ताकि पता चल सके कि "ई मुंछवाला लिखा है", "ई चुटियावाली" और "ई ड्रेगनवा का चिट्ठा है" अब सोच लेयो किस पर क्या टिप्पणी करनी है???

यार अपन को तो लगता है कि ब्लागिस्तान में जल्दी ही शहजादियाँ आने वाली हैं तबही जवान तो जवान, बुढ़ऊ भी सींग कटाके बछड़ो में शामिल हो रहे हैं, देखना नारद पर क्या धांसू पोज बना बनाके सब फोटू चिपकईहें।
मिर्जाः यार ये ऐन दीवाली पे खून खच्चर कौन दिखा रहा है?
शराफत अलीः मियाँ ये पँकजवा खिचांई के तीर फेंक रिया है , इश्तेहार बनाने वालो पर। वैसे यहाँ दास्ताने झोला सुनना मत भूलियो, समीर बाबू लिखिन है। गजब चीज है भई।
मिर्जाः मियां एक बात तो माननी पड़ेगी, पब्लिक पुरानी बाते भूल कर नये चोंचलो में क्या फंसी एक से एक शैतानी बीमारियाँ गले पड़ गयी।
शराफत अलीःसही फर्मा रहे हो मिर्जा, अगर सब इन मोहतरमा के कहे पर ध्यान धरे और रंगाई पुताई सगाई पर ध्यान दे तो चिकुनगुनिया से छुटकारा मिल जाये।
मिर्जाःयार ये कौन मुच्छाड़ियल है जो प्रेम छे प्रेम छे गा रहा है?
शराफत अलीःअमां तमीज से बोलो, ये संजय भईया है , इनके लिखे को दो बार पढ़ो। यार बंदा साफ कह रहा है, कि साध्वी ने प्रेम किया तो क्या गलत किया? यार गलती पब्लिक की है, पहले दुनिया की बंदिशे लगाकर खुदाबंदगी के तरीके ईजाद किये, खुद तो इबादत के तौर तरीके भूल गये, साधू संतो के प्रवचनो सुनकर शार्टकट खुदाबंदगी करना चाहते हैं सब। संजय भाई अगर थोड़ी इसपे रोशनी डालते कि पब्लिक उल्लू बन जाने पर खामखां का गुस्सा साध्वी पर निकाल रही है तो किस्सा झकास हो जाता।
मिर्जाः अच्छा शराफत भाई, आओ अब दीपावली के दीये देखने चलें।
शराफत अलीःहाँ भाई मिर्जा तुम्हे और चिठ्ठा चर्चा के पाठको को दीपावली मुबारक, और देखो छुट्टन से कहना अब्कि स्वामी की लुंगी में राकेट न दागे पिछली बार की तरह।
मिर्जाः अमां छुट्टन ने ऐसा कब किया?
शराफत अलीः जीतू भाई से कहो, वह तुम्हे भी सुनाये और सबको बताये उनके पन्ने पर।


आज की टिप्प्णी (हाल आफ फेम): अनुराग श्रीवास्तव अरे! ए तो प्रेम छे पर
चाहिये देवत्व पर इस आग को धर दूं कहां पर
कामनाओं को विसर्जित cयोम में कर दूं कहा पर
वह्नि का यह ताप यह उन्माद बोलो कौन लेगा
आग के बदले मुझे संतोष बोलो कौन देगा
मैं तुम्हारे वाण का मारा हुआ खग
वक्ष पर धर शीश विश्राम करना चाहता हूं
मैं तुम्हारे रक्त के कण में समा कर
प्रार्थना के गीत गाना चाहता हूं।
- “उर्वशी” से
यही प्रेम है। यह ईश्वर पथ का बाधक नहीं है - ईश्वर तक ले जाने वाला पथ है। स्माधि का मार्ग है। परमात्मा से साक्षात्कार है। मोक्ष है। स्वर्ग है। शून्य है - क्योंकि शून्य से ही उत्पत्ति है और शून्य में ही विलय।
ईश्वर का मार्ग संसार से भाग कर नहीं, संसार से हो कर जाता है - धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष।
हिन्दू धर्म में एक परंपरा है, मंदिर में ईश्वर के दर्शन को जाने से पहले हम मंदिर की परिक्रमा करते हैं फिर भीतर जा कर ईश्वर के दर्शन करते हैं।
खजुराहो के मंदिरों में इन बाहरी दीवारों पर पूर्ण कामसूत्र चित्रित है।
परंपरानुसार जब तक आप मन्दिर की परिक्रमा करते हुये, इन प्रणय लिप्त मूर्तियों को नहीं देखते हैं, तब तक आप मंदिर के भीतर जा कर ईशवर को ‘प्राप्त’ नहीं कर सकते।
ईश्वर मार्ग प्रेम या प्रणय मार्ग से होता हुआ जाता है।
साध्वी जी को ज्ञान प्राप्त हुआ है। उन्हें बधाई!



आज की फोटू सात समंदर पार से!

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12 टिप्‍पणियां:

  1. अतूल,
    तुम्हारा भी अनोखा अंदाज है, भई. मजा आ गया यह चर्चा रुपी चिट्ठा.

    बधाई स्विकारो, बहुत बहुत.

    दीपावली की बहुत शुभकामनायें.

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  2. भई मज़ा आ गया! इस अंदाज़ में चिट्ठा चर्चा ,क्या बात है

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  3. भाई मान गये, इस चिट्ठा चर्चा का। क्या कहने।

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  4. कमाल हैं यार. एक से एक नये इसटाइल में चर्चा करे हैं. मजा आ गया.

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  5. शराफत अली की शराफ़त के तो हम कायल हो गये, हमरे चिट्ठे कि चर्चा भी कर दिये और किसी को पता भी नहीं चला।

    अब आप ढ़ुंढ़ते रहिए - "भारत में शराफत" और "चिट्ठाचर्चा में शत् शत् नमन" :) :) :)

    वैसे चिट्ठाचर्चा का यह नया रूप हमें सर्वाधिक पंसद आया।

    अतुलजी को हमारी ओर से बहुत बहुत बधाई!!!

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  6. चिट्ठाचर्चा अगर ऐसा ही नित्य निखरता रहा तो तमाम अंग्रेज़ी चिट्ठाकार देसी पंडित को भूल कर चिट्ठाचर्चा की ओर रुख कर देंगे ऐसा प्रतीत हो रहा है...

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  7. वाह जी वाह! क्या अंदाज है। देसी पंडित वालों को सीखना चाहिये चिट्ठाचर्चा से। हिंदी चिट्ठाकारों के जज्बे का १०% भी अगर अंग्रेजी वालों के पास हो तो दस देसीपंडित चल सकते है।

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  8. कमाल की शैली!
    नागर जी और के.पी. जिंदा होते बहुत आशीष देते अतुल को .

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  9. वाह, बहुत दिन बाद अपने रंग में आये और बहुत अच्छा लेख/चर्चा लिखी. बहुत अच्छा लगा.प्रियंकरजी केपी जी तो अभी जिंदा हैं मेरे ख्याल से.

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  10. फिर सहसा ही याद आ गये गंगाराम बुलाकी नाई
    खूब अतुलजी करी आपने चिट्ठे की ऐसी चर्चाई
    किस्सागोई के अंदाज़ों से हो भरे पड़े यह माना
    वरना हम सोचे बैठे थे,"जाने हैं तुहार प्रभुताई"

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  11. अगर मेरी स्मृति दगा दे रही है और वे जीवित हैं तो समझिये मैं मर गया हूं .इस अपराध के बाद (हालांकि अनूप भाई भी अगर-मगर कर रहे हैं)और क्या लिखूं ?

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