रविवार, अक्तूबर 08, 2006

तेरी चाहत में कुछ खो दिया (गुजराती चिट्ठे)

तेरी चाहत में कुछ खो दिया
थे तो सिर्फ दो आंसु पर रो दिया।

भले ही मैने किसी दिन विरोध के स्वर उठाये थे कि गुजराती चिट्ठाकार कविताओं को ही महत्वपूर्ण स्थान क्यों देते हैं, पर वास्तविकता यही है कि गुजराती काव्यसंसार है ही इतना समृद्ध कि इसके बारे में चाहे जितना लिखा जाए यह कुबेर के धन की तरह खत्म ही नहीं होता। कुछ दिनों पहले एक समाचारपत्र में पढा था कि गुजराती में जितनी गज़लें लिखी गई हैं उतनी तो उर्दु में भी नहीं लिखी गई।

गुजराती के एक लोकप्रिय चिट्ठे "फोर एस वी", में चिट्ठाकार, मुकेश जोशी की इस गज़ल को प्रेषित करते हैं, जिसकी प्रथम दो पंक्तियों का अनुवाद आप उपर पढ चुके हैं, अंतिम दो पंक्तियाँ भी लाजवाब हैं कि :

तेरी चाहत में कुछ खो दिया
थे तो सिर्फ दो आंसु पर रो दिया।


समय तो दिया था तुमने मिलन का,
मैं भी क्या हुँ, वो वक्त खो दिया।

सुरेश जानी को पैसों के मोह ने व्यथित किया और वे कहते हैं कि पैसों का जीवन में वही मूल्य है जैसा खाने की थाली में एक मिठाई का होता है। स्वादिष्ट तो लगती है मिठाई पर पेट नहीं भरता।

प्रसिद्ध विचारक धुनी मांडलिया के शब्दों में - जीवन एक धारा के प्रवाह की तरह है जो बहता जाता है, अगर आपने इस जीवन में नृत्य और निनाद का आनन्द लिया है तो सही मायनों में आपने जीवन जीया है, अन्यथा नहीं।

गुजरात के सपूतों के बारे में जानकारी प्रदान करने का बेहतरीन कार्य कर रहे हैं "गुजराती प्रतिभा परिचय" के चिट्ठाकार। इसबार उन्होनें जमशेदजी टाटा और सयाजीराव गायकवाड के विषय में काफी उपयोगी जानकारी दी।

सोचता हुँ हममें से कोई चिट्ठाकार भी इस तरह का प्रयास शुरू करे तो कितना अच्छा हो, देश की प्रतिभाओं के विषय में एक नए चिट्ठे पर जानकारीयाँ प्रदान की जाए। मैं शुरू करता पर यहाँ तो पहले से ही 6 चिट्ठे नहीं सम्भलते! :-)

सम्भल तो मन मन्दिर भी नहीं रहा है। नवरात्रि तो चली गई पर लगता है, लोगों के मन से अभी भूत उतरा नहीं, अविनाश व्यास अपने चिट्ठे पर प्रसिद्ध गुजराती लोकगीत रखते हैं, जो गरबे में उत्साह से बजाया जाता है:

હે તને જાતાં જોઇ પનઘટની વાટે, મારું મન મોહી ગયું;
હે તારા રૂપાળા ગોરા ગોરા ઘાટે, મારું મન મોહી ગયું.
(हे तने जाताँ जोई पनघटनी वाटे, मारुं मन मोही गयुँ;
हे तारा रूपाळा गोरा गोरा घाटे, मारुं मन मोही गयु)

अंत में मोरपिच्छ चिट्ठे पर प्रेषित हुई अविनाश व्यास की यह गज़ल देखिए:

મારી પાસે આવ, તું; વાતો કરીશું,
સૌ દીપક બોઝાવીને રાતો કરીશું;
આપણી વચ્ચે તડપતુ મૌન તોડી,
સ્નેહભીના શબ્દને ગાતો કરીશું.

मैरे पास आओ, हम बात करेंगे,
सो दिपक बुझाकर रात करेंगे;
अपने बीच तडपता मौन तोडकर,
स्नेहभरे शब्दों को आबाद करेंगे।

Post Comment

Post Comment

5 टिप्‍पणियां:

  1. अविनाश व्यास के "सौ दीपक बुझा कर राता करेंछों" ने मन मोह लिया. धन्यवाद पंकज.

    उत्तर देंहटाएं
  2. "मेरे पास आओ, हम बात करेंगे,
    सौ दीपक बुझाकर रात करेंगे;
    अपने बीच तडपता मौन तोडकर,
    स्नेहभरे शब्दों को आबाद करेंगे।"

    --बहुत सुंदर रचना पढ़वाने के लिये धन्यवाद, पंकज भाई.

    उत्तर देंहटाएं
  3. पहली बार आपके ब्लोग पर आ रहा हूं 1 आप तो सिर्फ पढते ही नहीं है , पर इतना अच्चा उसका विवेचन भी करते है 1 बहोत खूब !
    गुजराती लोग भी इतनी सावधानीसे गुजराती ब्लोग पढते नहीं होंगे.
    मैंने उर्दूसे गुजराती का शब्द कोश नेट पर देनेका एक प्रयोग शुरू किया है. वह आप यहां देखें-
    http://kaavyasoor.wordpress.com/dictionary/
    आपकी इस कार्यमें सहायता होगी तो बहोत आनंद होगा.

    उत्तर देंहटाएं
  4. Hello Pankajbhai,

    It was very nice to read your thoughts here.

    Just wanted to make a correction.

    अंत में मोरपिच्छ चिट्ठे पर प्रेषित हुई अविनाश व्यास की यह गज़ल देखिए:

    These lines are by Dilip Modi, Not Avinash Vyas.

    उत्तर देंहटाएं
  5. चुक के लिए माफी चाहता हुँ जयश्री जी.

    उत्तर देंहटाएं

चिट्ठा चर्चा हिन्दी चिट्ठामंडल का अपना मंच है। कृपया अपनी प्रतिक्रिया देते समय इसका मान रखें। असभ्य भाषा व व्यक्तिगत आक्षेप करने वाली टिप्पणियाँ हटा दी जायेंगी।

नोट- चर्चा में अक्सर स्पैम टिप्पणियों की अधिकता से मोडरेशन लगाया जा सकता है और टिपण्णी प्रकशित होने में विलम्ब भी हो सकता है।

Google Analytics Alternative