शुक्रवार, अक्तूबर 13, 2006

सूरज भेज देगा ‘लाइट’ का लंबा-चौड़ा बिल

कल ब्लाग जगत में मच्छर, अफजल और जीतेंन्द्र का डुप्लीकेट छाये रहे। कल ही कानपुर के दैनिक जागरण के जूनियर परिशिष्ट में हिंदी ब्लागिंग के बारे में जानकारी दी गयी थी। लगभग तीन चौथाई पेज में ब्लाग बनाने के तरीक, फोटो लगाने के तरीके तथा हिंदी के कुंजी पटल यानि कि कीबोर्ड के बारे में बताया गया था। इन की बोर्ड में ईस्वामी के हग टूल, रमनकौल के कीबोर्ड भी शामिल हैं। जिन ब्लाग्स के पते दिये गये थे वे हैं, अक्षरग्राम, ज्ञान-विज्ञान, बुनो कहानी और ब्लागनाद मतलब कि वे ब्लाग्स जिनमें पिछले कुछ दिनों में कोई नया लेख नहीं जोड़ा गया। यह हमारे मीडिया की जानकारी का स्तर है । लेकिन अब हुवां कि बातैं हुवनै छ्वाड़ौ औ ब्लागन का सुनौ हवाल।
ईरानी सौन्दर्य
ईरानी सौन्दर्य

क्षितिज कुलश्रेष्ठ अपने लेखन से समलैंगिकों की पीड़ायें सामने रखते रहे हैं। उनके सामने समस्या यह है कि अपने समलैंगिक होने की बात अपने मां-पिता को कैसे बतायें! यह अभिव्यक्ति का संकट कहा भी न जाये और रहा भी न जाये टाइप का है। पता नहीं उनके घर वाले उनका ब्लाग पढ़्ते हैं कि नहीं। कैसे एक लड़का किसी अधेड़ के चुंगल में फंसकर और जर्मनी पहुंचता है इसके बारे में भी वे जानकारी देते हैं:-

पिछले सप्ताहांत मैं शहर में तफरीह करते घूम रहा था कि सामने से एक भारतीय सी लगने वाली शक्ल पर नज़र पड़ी। उसकी नज़र भी मुझ पर पड़ी, तो अभिवादन हुआ। वह मेरे करीब आकर पूछने लगा कि क्या मैं भारत से हूं इत्यादि। हम दोनो पास के एक कैफे में बैठ कर एक दूसरे से जान पहचान करने लगे तो मुझे पता चला कि यहां मेरी विश्वपरिकल्पना से कितनी भिन्नता थी। वह अवैध रूप से बर्लिन तक पहुंचा था। वह १९ वर्ष का जवान लड़का था जो एक अधेड़ जर्मन पर्यटक के साथ करीब सवा साल पहले चेन्नई से भागा था। उसके परिवार को कोई खबर नहीं कि वह कहां है, ज़िन्दा है कि मुर्दा। कुछ महीने वह उस पर्यटक के साथ कॊलोन् में में रहा जहां उसे काफी शारीरिक शोषण का सामना करना पड़ा। अंततः जब वह पर्यटक उससे ऊब गया तो उसने उसे बेचने की अवैध कोशिश की। लड़का वहां से किसी प्रकार भाग तो आया पर अब बर्लिन में भी अपने शरीर को बेचने के अलावा वह कुछ नहीं कर सकता।


मुझे यही लगता है कि दुनिया के सबसे विकसित देशों में सुमार किये जाने वाले देश में एक नौजवान के पास अपना शरीर बेचने के अलावा और कोई कमाने का जरिया नहीं है क्या? क्या ऐसा सिर्फ इसलिये है कि वह अवैध रूप से वहां पहुंचा या फिर एक गलत मानी जाने वाली आदत के चक्कर में फंसकर उस युवा का मन और तन इतना खोखला हो गया है कि उसे अपना शरीर बेचना ही सबसे सुगम उपाय लगता है!

प्रियंकर की कविताऒ की पसंद उनकी रुचि के स्तर के बारे में बताती है। अपनी बेहतरीन कविता 'सबसे बुरा दिन' में वे लिखते हैं:-
सबसे बुरा दिन वह होगा
जब कई प्रकाशवर्ष दूर से
सूरज भेज देगा
‘लाइट’ का लंबा-चौड़ा बिल
यह अंधेरे और अपरिचय के स्थायी होने का दिन होगा


यह सोच खामख्याली और कवि-कल्पना मात्र लग सकती है लेकिन कल की ही एक खबर के मुताबिक कानपुर आई.आई.टी. के लोग कानपुर में बैठे-बैठे अमेरिका की प्रयोगशालाऒं का उपयोग कर सकेंगे तथा अमेरिका के चिकित्सक वहीं से भारत में आपरेशन कर सकेंगे । जब यह सब होगा तो बिल वगैरह भी बनेगा ! फिर सूरज भी अपनी ऊर्जा का हिसाब मांगने लगे तो क्या आश्चर्य! इस कविता में लीज पूरी होने पर क्रोध से कांपती धरती के भारत को भुज में बदल देने की बात है और विश्वग्राम में सिमटती जा रही दुनिया में आदमी के खुद को भूलते जाने की नियति का चित्रण है जो कि ऐसी स्थिति तक पहुंचता है कि व्यक्ति अपने पैदाइश के दिन तक को याद न रख पाये:-
सबसे बुरा दिन वह होगा
जब जुड़वां भाई
भूल जाएगा मेरा जन्म दिन
यह विश्वग्राम की
नव-नागरिक-निर्माण-परियोजना का अंतिम चरण होगा ।

कूड़े पर बना बाग
कूड़े पर बना बाग


जीतेंद्र पिछले दिनों नारद की टेस्टिंग में लगे रहे। टेस्टिंग की ऐसी लत लग गयी है कि अब हर चीज को फाइनली करने के पहली टेस्टिंग अभ्यास करते हैं ताकि कोई चूक न हो जाये। वो तो कहो समय पर घर-परिवार बस गया वर्ना आज बसाते तो वहां भी हेलोटेस्टिंग में लगे होते । अपनी इसी टेस्टिंग लत के चलते उन्होंने अपने इतवार को किये जाने वाले चिट्ठाचर्चा का पूर्वाभ्यास किया। यह उनकी ६०० वीं पोस्ट थी जिसके लिये उनको बधाई!
जीतेंद्र के डुप्लीकेट के पाये जाने के चर्चे विजय वडनेरे की पोस्ट पर छाये हैं जिन्होंने असली-नकली ब्लागर्स को पहचानने के अचूक उपाय बताये हैं।

इसके पहले कि आगे कुछ लिखा जाये तब तक आप अपनी बोरियत दूर करने के लिये प्रतीक के माध्यम से ईरानी सौंदर्य को निहार लीजिये, हितेंन्द्र से बेताल पचीसी सुनकर पुरानी यादें ताजा कर लीजिये, उन्मुक्त के पेटेंट कानून के निष्कर्ष बांच लीजिये और अधखुली साइट से उत्तरांचल क्रिकेट मैच देख लीजिये इसके बाद आपको पढ़वाते हैं प्रेमलता जी के मन की बातें। इनके मन की डोर के एक छोर से ईर्ष्या बंधी है तो दूसरे सिरे से प्रेम जिसका वार कभी खाली नहीं जाता:-
प्रेम
संसार का आधार है,
सबसे ज़्यादा इसका भार है,
यही सर्वाधिक असरदार है,
इससे बहती ठंडी ब्यार है,
हर रोग का करता इलाज तैयार है,
इसका ख़ाली नहीं जाता कभी वार है।


अब यह तो बताया ही नहीं प्रेमलता जी ने कि जो सबका उपचार करता है वो वार क्यों, कैसे करता है। वार भी ऐसा कि खाली न जाये -डर नहीं लगता! बिहारी बाबू फिर मच्छर के चक्कर में पढ़ गये और दिल्ली में छेड़छाड़ की घटनाऒं में हुयी कमी का कारण बताया बमार्फत एक मच्छर:-
बस ई समझ लीजिए कि मनचलों का हमने दिन खराब कर दिया है। का है कि दिल्ली की सुंदरियों का फंडा है- - कपड़े ऐसा पहनो, जो तन को ढंकने के बजाय उसको उघारे बेसी। लेकिन हमारे डर से आजकल इस फंडे से बालाओं ने तौबा कर ली है औरो पैर से सिर तक ढंककर निकलती हैं। कम कपड़ा पहनने वालियों के पास भी मनचले जा नहीं सकते, काहे कि वहां से मच्छर भगाने वाली क्रीम की बदबू आती है। अब आप समझ गए होंगे कि महीना भर से दिल्ली में एको ठो छेड़छाड़ की घटना काहे नहीं हुई है। ई मामला कुछ-कुछ वैसने है, जैसे आवारा भंवरा फूल तक तो पहुंचे, लेकिन उससे आ रही बदबू से ऊ बेदम हो जाए।



इस मच्छर के हमले से घबराकर मनीष छींकते हुये हिल स्टेशन चले गये और शुभम लाहोटी दोहावली का जाप करने लगे:-
देखो साधौ सारा जगत, भागत उसके पीछे।
जो नही भागत पीछे, वही तो साधौ होये।।

रविरतलामी बिना मिठाई खिलाये और बिना व्यंजल सुनाये बता रहे हैं कि ब्लाग स्ट्रीट में उनका ब्लाग इस सप्ताह ८१ वें पायदान पर पहुंच गया। अफजल के मामले में क्या होगा यह समय बतायेगा लेकिन इस घटनापर निगाह रखने वाला हर शख्स बकौल स्वामीजी रायचंद बना हुआ है। इंडियागेट पर इसकी बात की चर्चा जोरॊं से है कि राष्ट्रपति जी को अफजल के परिवार से नहीं मिलना चाहिये।

निराला जी की प्रसिद्द कविता वह तोड़ती पत्थर के भाव में रचनाबजाज मजदूर औरत के प्रति अपनी संवेदनायें जाहिर करती हैं:-
बोझ सभी उसे उठाना था,
थकना उसने कब जाना था?
जल्दी उठी रात जाग कर,
वो तो………
सुनती नही, जो कहता है मन,
साँसें-ढोना, उसका जीवन
जीती रहती, भाग्य जानकर,
वो तो…….
नही चाहती, कुछ अपने को,
जो वो चाहे, सब बच्चों को
लडती है शक्ती समेट कर,
वो तो………
भाग्य से उसे कुछ ना मिलता,
खुद पाती, वो भी लुट जाता
जीती है वो, सभी हार कर,
वो तो…………


धरती पर बढ़ते दिन-प्रतिदिन जा रहे प्रदूषण के प्रति चिंतित सुनील दीपक अपने उद्गार व्यक्त करते हैं:-

चीन और भारत में जो विकास हो रहा है, उससे तो और भी खतरा महसूस हो रहा है सबको. अगर भारत और चीन भी विकसित देशों की तरह धरती के बलात्कार में जुट जायेंगे तो दुनिया कहाँ जायेगी, पूछते हैं और सलाह देते हैं कि इन्हें विकास के नये तरीके खोजने होंगे. अपने बच्चों के लिए कल के जीवन की रक्षा करनी है हमें, कहते हैं.

आज के समाज के बाजारवादी रवैये के प्रति उनकी खीझ साफ झलकती है:-
आप देते रहिये सलाह, सभाएँ करिये और नयी नयी योजनाएँ बनाईये. कुछ भी नयी तकनीक जिससे प्रदूषण कम हो सकता है उसे बाँटने के लिए हमें खूब मुनाफा चाहिये, यहाँ तक कि लाखों की जान बचाने वाली दवाईयों को भी हम बिना करोड़ों के लाभ के बिना नहीं बेचना चाहते. सारा जीवन का सबसे बड़ा मंत्र जब व्यापार है और अगर यहाँ का मानव सिर्फ अपना आज का, अभी का सुख देख पाता है, तो भारत और चीन के मानव भी उस जैसे ही हैं, और वहाँ भी बेचने वाले बिक्री बढ़ाने के नये नये तरीके खोज रहे हैं. अगर विकास का यही अर्थ दिया है कि अधिक से अधिक बेचो और फैंकों तो फ़िर चिंता कैसी, सभी को विकसित होने दीजिये. जब साथ साथ ही डूबना है तो हम भी क्यों न मजे ले कर डूबें?


अब फुरसतिया को क्या कहें! वे खुद ही कहते हैं गये थे हरि भजन को ऒटन लगे कपास। कपास ऒटते-ऒटते वे कानपुर के प्रदूषण, कूड़े-कचरे से होते हुये कैसे दंगा स्थल पर पहुंच गये पता ही नहीं चला। अंत भला सो सब भला की तर्ज पर दंगा टल गया और कहा गया:-
एक लिहाज से यह सही भी है। पोस्टमार्टम मरे हुये लोगों का होता है। जीवनदायिनी घटनायें का पोस्टमार्टम कैसा? वे तो हमारे-आपके दिल में धड़कने बनकर यादों में खुशबू की तरह महकती रहती हैं।

ऐसी घटनायें ऐसा नहीं कि हमारे ही शहर में होती हैं। आपके भी यहां तमाम ऐसी घटनायें होती होंगी। वास्तव में तो ऐसा दुनिया के हर शहर में,हमेशा, भले ही कम क्यों न हो, होता रहा है लेकिन इनका कोई सर्वे नहीं किया जाता। इसमें मेहनत लगती है। और आपाधापी के इस युग में अब मेहनत करने की आदत कम होती जा रही है।

आप आंखें खोलकर देखें तो अपने आसपास भी इस तरह की घटनायें होती दिखेंगी वर्ना तो तुलसीदास जी ने कहा ही है -मूंदहु आंख कतहुं कछु नाहीं।

चलते-चलते आप भारतीय संस्क्रिति निर्माण परिषद एवं रचनात्मक साहित्यिक शैक्षणिक परिषद के संयुक्त तत्वावधान में नामपल्ली में आयोजित पुरस्कार समारोह में भी भाग ले लीजिये।

सूचना:- हमारा प्रयास है कि दुनिया की अधिक से अधिक भाषाऒं के चिट्ठों की जानकारी आपको दे सकें। इसी कड़ी में हमारे साथी संजय बेंगाणी ने राजस्थानी में लिखे जाने वाले चिट्ठों के बारे में जानकारी देने के लिये सहमति जाहिर की है। वे अपनी सुविधानुसार आपको राजस्थानी चिट्ठों के बारे में अपने मन से देते रहेंगे। हिंदी ब्लागर होने के नाते मेरा उनसे यह भी अनुरोध है कि वे हिंदी चिट्ठों के बारे में भी लिखते रहें।

आज का चिट्ठाचर्चा कैसा लगा अपनी राय बतायें ताकि हम इसमें सुधार कर सकें। अपनी नयी पोस्टों की जानकारी दें chitthadak@gmail.com पर ।

आज की टिप्पणी
कविता आपको भाई , धन्यवाद अनूप भाई !
एक इंजीनियर कविता पढ़ेगा तो भूल दिखेगी ही . कवि हृदय पाठक पढे़ तो शायद तथ्य को छोड़ कर सत्य को पकड़े और कवि को थोड़ा-सा ‘पोएटिक लाइसेंस’ दे . हालांकि आपने सत्य को भी पकड़ा है . आप डबल रोल में जो हैं . मुझे पता था कि सौर मंडल के सदस्यों की दूरी ए.यू. से मापते हैं ( तब मुझे तथ्यात्मक होना पड़ता और ९३,०००,००० मील या १,४९६,०००,००० किलोमीटर लिखना होता और कविता के प्रवाह का तो सत्यानाश होता ही प्रकाशवर्ष जैसा सुंदर शब्द खगोलशास्त्र की दुनिया से कविता के संसार में न आ पाता ) और आकाश गंगा और उसके परे की दूरियों के लिए खगोल शास्त्रीय मात्रक प्रकाशवर्ष है, यानी एक वर्ष में प्रकाश जितनी दूरी तय करता है उतनी दूरी . मैं इस तथ्य से भी वाकिफ़ था कि प्रकाशवर्ष को बहुत से लोग समय का मात्रक समझते हैं पर है यह दूरी का मात्रक . मेरी प्राथमिकता दूसरी थी और यह शब्द ‘प्रकाशवर्ष’ मेरा दूरी वाला अभिप्राय ठीक-ठीक ध्वनित कर रहा था . आशा है आप मजबूर कवि (मगरूर नहीं)की स्थिति समझेंगे . आपको बहुत-बहुत धन्यवाद कि आपने मेरी कविता इतनी सूक्ष्मता से पढ़ी और उसे सराहा .
अनूप भार्गव जी की एक गणितीय कविता पर भी किसी पाठक ने ऐसा ही सवाल उठाया था, उस पर भी मेरी प्रतिक्रिया यही थी . नत्थी कर रहा हूं शायद आपको अच्छी लगे . हो सकता है यह मेरी सीमा हो पर कम से कम मेरी कविता संबंधी समझ यही है.
(अनूप भार्गव की कविता ‘आस्किंग फ़ॉर अ डेट’ पर आई एक टिप्पणी पर मेरी टिप्पणी )
“अनूप भाई! क्या कविता है .पढ़ कर आनन्द आया. कहन की शैली में नवीनता न हो तो बात बनती नहीं है. वृत्त के कोने और परिधि के केन्द्र कोई कवि ही देख सकता है गणितज्ञ नहीं . इसी को तो साहित्यशास्त्र में ‘पोएटिक लाइसेंस’ कहते हैं. काव्य सत्य हमेशा उपलब्ध और जगजाहिर तथ्य से बड़ा होता है क्योंकि वह एक विराट सत्य की ओर संकेत करता है जो हमेशा तथ्यात्मक नहीं होता . रामचरित मानस में लंका काण्ड का प्रसंग देखें — लक्ष्मण शक्ति के लगने से मूर्छित और घायल अवस्था में पड़े है,हनुमान संजीवनी बूटी लेकर अभी तक नहीं लौटे हैं,चिन्तातुर राम बहुत दुखी और विदग्ध मन से कहते हैं :

अस बिचारि जियं जागहु ताता ।
मिलइ न जगत सहोदर भ्राता ॥

क्या राम यह नहीं जानते थे कि लक्ष्मण उनके सहोदर भाई नहीं हैं या तुलसीदास यह तथ्य नहीं जानते थे . बल्कि तुलसी तो थोड़ी देर बाद राम से यह भी कहलवाते हैं कि :

‘निज जननी के एक कुमारा’

तब ऐसी भूल क्यों हुई? यह भूल नहीं काव्य सत्य है . राम और लक्ष्मण में ऐसा प्रेम था जैसा जैसा सहोदर भाइयों में होता है. या कह सकते हैं कि सहोदर भाइयों से भी बढ़ कर प्रेम था और राम के लिए यह तथ्य महत्वहीन था कि लक्ष्मण उनके सहोदर भाई हैं या नहीं . यही विराट सत्य है जिसे दुनियादार लोग नहीं देख पाते . आप गणित में भी कविता देख पाते हैं और श्रीमान प्रश्नवाचक कविता में भी गणित खोजने का प्रयास कर रहे हैं बस यही अंतर है आप दोनों में . विचलन कविता में नहीं प्रश्नवाचक जी की समझ में है . कविता का एक छोर कवि के पास होता है दूसरा कवि-हृदय पाठक के पास . यहां दूसरा छोर मात्र पाठक है,कवि हृदय नहीं . “

प्रियंकर


आज की फोटो

आज की फोटो फिर से सुनील दीपक के ब्लाग छायाचित्रकार से
दबी छुपी भक्ति
दबी छुपी भक्ति

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2 टिप्‍पणियां:

  1. जब कई प्रकाशवर्ष दूर से
    सूरज भेज देगा


    हुआ ज्ञान वर्धन , यह जाना दूर प्रकाशवर्ष सूरज है
    हम समझे थे ये है बैठा लगभग आठ मिनट दूरी पर
    नई भौतिकी, नव खगोल के अब नूतन सिद्धांत बनेंगे
    नये रंग अब चढ़ जायेंगे, सांझ-भोर की सिन्दूरी पर.

    -०-०-०-०-०-०
    देखो साधौ सारा जगत, भागत उसके पीछे।
    जो नही भागत पीछे, वही तो साधौ होये।।

    इसे अगर दोहा कहते हैं, मैं सचमुच ही अज्ञानी हूँ
    जितने छंद नियम जाने हैं,नहीं काम कुछ भी आयेंगे
    कविता में है छूट, मगर वह तथ्यों से तो परे नहीं है
    वरना अब निबंध को भी हम खंड काव्य कह कर गायेंगे

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  2. पता नहीं उनके घर वाले उनका ब्लाग पढ़्ते हैं कि नहीं।

    दुःख तो यही है कि घरवाले 'नैट सैवी' नहीं हैं, अगर होते तो समझाना आसान होता।

    दुनिया के सबसे विकसित देशों में सुमार किये जाने वाले देश में एक नौजवान के पास अपना शरीर बेचने के अलावा और कोई कमाने का जरिया नहीं है क्या?

    अवैध रूप से देश में आने वाले के पास कुछ फर्ज़ी कागज़ात होते है जिनके ज़रिए वे आम तौर पर नौकरी पा जाते है और फिर असली कागज़ बनवा लेते हैं। बेचे जाने और वहां से भागने के कारण इस युवक के पास कोई कागज़ात नहीं हैं और वह कोई नौकरी नहीं पा सकता। यदि पुलिस को खबर हो तो वे उसे गिरफ्तार तो कर लेंगे पर भारत नहीं भेज पाएंगे क्योंकि वह भारतीय नागरिकता भी साबित नहीं कर सकता।

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