मीडिया चतुर तो है ही वो गिरगिट की तरह रंग बदलना भी जानता है, पिछली खबरों पर दर्शकों और पाठकों की पसंद नापसंद की विवेचना करके वो जान गया है कि टी आर पी किस खबर से बढ़ेगी वरना चंद दहशत पसंद दहशतगर्दों के कारनामों की जगह हजारों लाखों अमन भाई-चारा पसंद लोगों की कहानी पढ़ने को मिलती। खैर थोड़ा सा टर्न लेते हैं और सी एन एन कि इस खबर पर भी नजरें ईनायत करते हैं जिसे आज (यानि अमेरिकी शुक्रवार) मैं पढ़ रहा था। इतने बड़े भारत में घट रही घटनाओं में से सी एन एन को यही खबर मिली थी - Brothers share wife to secure family land, यही नही ये खबर फ्रंट पेज पर रखी गयी थी। इस बात के सही-गलत की बात यहाँ नही करूँगा लेकिन इसमें छुपे मसाले ने सीएनएन के फ्रंट पेज में जगह बनाकर रखी थी। वो जानते थे कि इसे दबाकर पढ़ा जायेगा लेकिन इस खबर पर मिली टिप्पणियों पर मैं यहि कहूँगा - "जॉनी, जिनके घर शीशे के होते हैं वो दूसरों के घर पर पत्थर नही फेका करते", पत्थरों की बारिश में एक ईंट का टुकड़ा हम भी मार आये हैं। खबर और टिप्पणियाँ पढ़ लीजिये डायलॉग का मतलब समझ जायेंगे।
अब कुछ चर्चा करते हैं, प्रभाष मीडिया और तथाकथित बुद्धिजिवियों के लिये
अपना मत कुछ यूँ व्यक्त करते हैं -
बुद्धिजीवियों का एक बड़ा तबका कह रहा था कि आतंकवाद को इस्लाम से जोड़कर न देखा जाए। आतंकवादियों को कोई मजहब नहीं होता है। वैसे यहां तक तो मैं भी मीडिया और बुद्धिजीवियों की राय से सहमत हूं। लेकिन ये सारे तर्क और विवेकपूर्ण बातें धरी रह गईं जब मालेगांव और साबरकांठा विस्फोट में हिंदू आरोपी बनाए गए। कल तक चीख-चीखकर संयमी और विवेकी बनने की नसीहत देने वाले लोग अब अपना उपदेश ही भूल गए हैं।
वहीं दूसरी तरफ मुट्ठी खोलकर राजकिशोर
अपनी बात कुछ इस तरह से रखते हैं -
लेकिन मुट्ट्ठी भर लोग भी कितना अधिक नुकसान कर सकते हैं, यह बाबरी मस्जिद के विध्वंस से, ईसाइयों के साथ हाल में हुए सलूक से और मुसलमान आतंकवादियों की तैयारियों से भली भांति समझा जा सकता है। सच यही है कि किसी भी देश-काल में कोई भी पूरा का पूरा समुदाय खराब नहीं हो जाता। मुट्ठी भर लोग ही दुष्टता करते हैं, जिसका परिणाम पूरे समाज को भुगतना पड़ना है। हिटलर के जर्मनी में भी ऐसे लोगों की संख्या कम न थी जो उसके जुल्मो-सितम के खिलाफ थे।
कभी कभी मुझे तो लगता है, शायद किसी को अक्सर ऐसा लगता हो, सियासत पसंद वोट के लिये और मीडिया टीआरपी के लिये इस धर्म के नाम की गोटी ना खेल रहा हो।
आजकल एक नया ट्रेंड चल पड़ा है कोई किसी का भी कहीं छाप देता है, सरपंच में
सुरेश का लिखा मिला, उनका कहना है -
समस्या को बढ़ाने, उसे च्यूइंगम की तरह चबाने और फ़िर वक्त निकल जाने पर थूक देने में मीडिया का कोई सानी नहीं है। सबसे पहले आते हैं इस बात पर कि "राज ठाकरे ने यह बात क्यों कही?" इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि जबसे (अर्थात गत बीस वर्षों से) दूसरे प्रदेशों के लोग मुम्बई में आने लगे और वहाँ की जनसंख्या बेकाबू होने लगी तभी से महानगर की सारी मूलभूत जरूरतें (सड़क, पानी, बिजली आदि) प्रभावित होने लगीं, जमीन के भाव अनाप-शनाप बढ़े जिस पर धनपतियों ने कब्जा कर लिया। यह समस्या तो नागरिक प्रशासन की असफ़लता थी, लेकिन जब मराठी लोगों की नौकरी पर आ पड़ी (आमतौर पर मराठी व्यक्ति शांतिप्रिय और नौकरीपेशा ही होता है) तब उसकी नींद खुली। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
मीडिया के लिये कही बात से इत्तेफाक लेकिन इसके लिये उन्हें कहीं से भी दोषी नही ठहराया जा सकता जो उत्तर प्रदेश, बिहार या उत्तराखंड से आ रहे हैं। अगर देश में डेवलपमेंट के नाम पर सारा विकास एक ही शहर में होगा तो जाहिर है लोग उसी शहर की तरफ भागेंगे। अभी भी वक्त है कि बजाय बाल की खाल निकालने के मीडिया सकारात्मक भूमिका निभाते हुए इस बात पर बहस करे या करवाये कि सेंट्रलाईज डेवलपमेंट को डिसेंट्रलाईज किया जाय। वरना ये जो हो रहा है ये तो सिर्फ ट्रेलर है पिक्चर तो अभी बाकि है मेरे दोस्त।
वर्तिका नंदा बेल्जियम का अपना सफर
कुछ यूँ बयाँ करती हैं -
यात्रा जोड़ती है और अंदर बनी गांठें खोलती है। पराए मुल्क में अपने देस की भाषा भीनी लगती है और बेहद स्वादिष्ट लगती है अपने घर की वही दाल भी जिसे घर में रोज खाते हुए उसकी अहमियत समझ में ही नहीं आती।
बलविन्दर
देसी इंजीनियरों का जुगाड़ बताते हुए लिखते हैं -
नई युक्ति शुध्द यांत्रिक नियमों पर आधारित है। इसमें टायलेट पाइप के नीचे एक प्लेट फिट कर उसके नीचे एक निश्चित भार लटका दिया जाता है। खड़ी स्थिति में यह प्लेट टायलेट पाइप को खुलने नहीं देती है मगर 40 किमी से अधिक की रफ्तार में हवा के विपरीत दबाव से यह प्लेट सरक जाती है और टायलेट पाइप खुल जाता है।
लेकिन हमारे मन में सशंय बना हुआ है (रेलवे की बात है ज्ञानजी को शायद कुछ मालूम हो), अगर कोई टॉयलेट में बैठा हल्का हो रहा हो और कोई स्टेशन आ जाये, ट्रेन रूक जायेगी और पाईप बंद हो जायेगा तब क्या होगा? या कई बार ट्रेन को कई कारणों से धीमे धीमे चलना पड़ जाता है, ऐसे हालातों में अगर ट्रेन की स्पीड ४० से नीचे बनी रही तो वो टॉयलेट पाईप खुलेंगे ही नही, फिर क्या?
सनराईज,
राज एक रक्तबीज अनेक कहते हुए लिखते हैं -
महाराष्ट्र में तो उत्तर भारतीयों को निशाना बनाकर उन्हे वहां से खदेड़ा गया...लेकिन बिहार में किसे निशाना बनाया जा रहा है ? राज ठाकरे को ज़मानत मिलने के बाद से बिहार में शुरू हुई हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है।वहां पर खुद को छात्र कहने वाले गुण्डे सड़कों पर उतर आए हैं और खुलेआम प्रशासन की नाक के नीचे तांडव कर रहे हैं। उन्होने कई गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया...काफी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया...ये छात्र शायद अपनी इस करनी पर अपनी पीठ ठोंक रहे हों...पर मैं तो एक बात दावे के साथ कह सकता हूं कि ये जितना भी नुकसानहुआ है वो बिहार का ही हुआ है...महाराष्ट्र का नहीं।
ये मैं कभी नही समझ पाया कि हम भारतीय हर बात पर तोड़ फोड़ पर क्यों उतारू हो जाते हैं, ये सारे लोग कालिदास क्यों बन जाते हैं, जिस शहर में रह रहे होते हैं उसी में तोड़-फोड़-आगजनी-लूटपाट। (कोई और दास था तो सही करें प्लीज)
मोनिका
अधूरी जिंदगी को कुछ यूँ परिभाषित करती हैं -
फिर भी मुझे तुम्हारा आज भी इंतजार हैं कभी तुम आओगे और मुझे माँ कहोंगे. मेरी अधूरी जिंदगी पूरी करोगे और मेरे जीवन का एक दाग हमेशा को मिटा दोंगे.
मुझे कुछ कमेंट नही करना चाहिये क्योंकि मैं खुद ये बात नही समझ सकता लेकिन इसको इस नजर से क्यों देखा जाता है - अधूरी जिंदगी या दाग?
रविन्द्र व्यास पेंटिंग के साथ पीले हाथ की बात करते हुए
लिखते हैं -
उसने सोचा उसके हाथ पीले देखकर लोग सवाल करेंगे। उसने सोचा पानी से हाथ धो ले तो यह रंग छूट जाएगा। लेकिन उसने देखा पानी में रगड़-रगड़कर हाथ धोने के बाद भी पीला रंग छूट नहीं रहा। फिर उसने साबुन लगाकर हाथ धोए। वहां अब भी पीला चमक रहा था। उसने कपड़े के साबुन से हाथ धोए। वहां पीला रंग ही दमक रहा था। उसने सोचा कैरोसिन ट्राई किया जाए। फिर सोचा मि्टटी। लेकिन उसके हाथ हमेशा के लिए पीले हो चुके थे
लिव-इन रिलेशनशिप की बात अभी थमी नही है शायद, इमरोज से इसी विषय पर हुई चर्चा के बाद शायदा
लिखती हैं -
जिस का़नून की हम बात कर रहे हैं अगर वह बनता भी है तो उससे इतनी मदद होगी कि पुरुष, स्त्री को छोड़कर भागने से पहले एक बार सोचेगा ज़रूर, और अगर चला भी गया तो कम से कम पीछे छूट गई औरत उस सामाजिक प्रताड़ना से बच जाएगी जिससे वह अब गुज़रती है।
अब ये अलग बात है कि जिसे भागना होगा उसके लिये क्या शादी क्या लिव-इन। जहाँ तक प्रताड़ना की बात है तो लोग शादीशुदा औरत के पति के भाग जाने पर उसे नही छोड़ते तो ये तो लिव-इन होगा। दरअसल सारा मुद्दा आदमी की सोच का है, जरूरत है उसे बदलने की। अगर वो बदल जाये तो शायद इसकी नौबत ही ना आये लेकिन ध्यान रहे मैंने शायद कहा है।
दीपक कुमार का कहना है कि आखिर क्यों सब
ब्यूटीफुल और हैंडसम की चाहत करते हैं? आप में से किसी को पता हो तो बताओ
प्रत्यक्षा का कहना है
बाजूबंद खुल खुल जाये, और हमारा कहना है कि कल की पोस्ट खत्म ही नही हो रहीं हम बोर बोर हुए जायें।
लगता है चिट्ठाकारों को माइक्रो का पता नही, अब अनिल
पोस्ट लिखते हैं और बताते हैं माइक्रो, नौ दो ग्यारह वाले आलोक को अगर ऐसी माइक्रो पोस्ट का पता चल जाये तो वो तो अपने बाल पक्का नोच लेंगे। अनिल जी ने जो पोस्ट माइक्रो कहके लिखी है आलोक उस पोस्ट को बगैर माइक्रो कहे यूँ लिखते - समझ नही आता न्यूज़ देख रहा हूं या सामना पढ रहा हूं। पीरियड, अब आप समझते रहें।
स्वप्नदर्शी कितनी व्यस्त हैं ये इसी से पता चलता है क्योंकि उन्होंने फिल्म की
समीक्षा और व्हाइट टाईगर दोनों को एक ही पोस्ट में समेट लिया।
नीतिश राज पूछते हैं,
मुसलमान की शादी में जाने को आतुर क्यों हो? क्यों? समीरजी झट से जवाब देते हैं,
ये लो भई-टीवी पर भी आ लिए इसलिये आतुर हैं
वीनस केसरी मानव के कल्याण की बात कर रहे हैं, आप खुद जाकर
पढ़ लीजिये क्योंकि उन्होंने सेंपल उठाने के लिये ताला लगा रखा है, इसी वजह से उनको मिली टिप्पणियों में भी ये सेंपल का टोटा देखने में नजर आया।
घुघुती बासूती
लिखती हैं -
विचित्र है प्रकृति का खेल
विसंगति तो देखो
बैसाखियाँ चल पड़ती हैं
पाँव जड़ हो जाते हैं ।
अरूण
पहाड़ के लिये कहते हैं -
पानी में कांपते अपने अक्स को देखकर भी
कितना शांत निश्चल है पहाड़
एक और तरूण आ गये हैं और
आवाज लगा कर कह रहे हैं -
मैंने कब कहा
मुझे तुम प्यार करो ।
मैंने कब कहा
मेरा ध्यान रखो ।
मैंने कब कहा
मुझे दुलारा करो ।
बस
मुझे पेट में न मारा करो ।
अब जब उस तरूण की सुना दी तो
इस तरूण ने किसी का क्या बिगाड़ा है -
आदमी को चाहिये दो वक्त की रोटी और पीने को पानी
मीडिया को चाहिये टीआरपी बढ़ाने को सनसनी और ऊटपटाँग कहानी।
आदमी को चाहिये एक अदद नौकरी और रहने को छत
सेना के जवान को चाहिये घर से आया एक प्यारा सा खत।
बेजी को हमारे
कंट्रोल पैनल का पाठक बन जाना चाहिये, खासकर वक्त निकाल कर ब्लोगर टेंपलेट वाले लेख क्योंकि वहाँ सब कुछ बिखरा बिखरा पड़ा है, इतनी अच्छी लाईने साईड बार में जा छुपी थीं -
हम एक दूसरे के
कितने आदी हो चुके हैं
तुम्हारा अचानक से आ जाना भी
सामान्य सा लगता है
घर में हर दीवार पर
सोफे पर, फर्श पर
तुम मिल जाते हो
जैसे खुद को थोड़ा बहुत
उतार कर जाते हो
रंजना ने इस बार दो रंग बिखेरे हैं, उसमें से
एक रंग को थोड़ा सा चुटकी में भरकर यहाँ बिखेर देते हैं -
नख शिख पूर्ण अलंकृत करके,
रच सोलह श्रृंगार सजाऊँ.
सावन हो या जेठ दुपहरी,
झूम के नाचूं झूम के गाऊं.
इन्द्र धनुष के रंग चुराकर,
एक मनोहर चित्र बनाऊं.
पथिक राह में कोई भी हो,
सबको अपने ह्रदय लगाऊँ.
योगेन्द्र मुदगिल को लगता है
इंसान की जान खतरे में है और वो इतने घबराये कि उन्होंने इस मुनादी का सेंपल पर्चा उठाने पर भी पहरा बैठा दिया लिहाजा आप चाहें वहाँ जाकर पढ़ सकते हैं।
एक महत्वपूर्ण सूचनाः लगता है कवि-कवियत्रियों की कवितायें पढ़ पढ़ कर या किसी कबिईईईईईता से चोरी-चोरी चुपके-चुपके मिलकर फुरसतिया के ऊपर
कवि होने का खतरा मंडरा रहा है। इसलिये समस्त कवि-कवियत्रियों को सूचित किया जाता है कि अपनी लिखी कबितततताओं के खैर-मकदम के लिये कुछ दिनों लिखना बंद रखें। सूचना समाप्त हुई।
आज के लिये इतना काफी, आप सभी लोगों को
दिवाली की हार्दिक शुभकामनायें। अब हर कोई तो अनुप शुकुल हो नही सकता इसलिये वक्त की कमी के कारण अगले कुछ सप्ताहंतों तक हम चर्चा से दूर रहेंगे और जो थोड़ा वक्त किश्तों में मिलेगा उसे स्वार्थवश अपने ब्लोगस के लिये रखेंगे। दिसम्बर में इंटरनेट से दूर होकर भारत में छुट्टियों का आनंद लिया जायेगा। इसलिये आज ही आप सभी को नववर्ष की शुभकामनायें भी दिये जाते हैं,
आने वाला वर्ष मंगलमय और सुख शांति वाला हो। चर्चा में अब अगले साल मुलाकात होगी तब तक के लिये - चलो बस हो चुकी चर्चा ना तुम खाली ना हम खाली।
शुभ-दिपावली हैप्पी न्यू ईयर
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