मंगलवार, अक्तूबर 28, 2008

जो दीप उम्र भर जलते हैं वो दीवाली के मोहताज नहीं होते

 दीपावली
आप सभी को एकबार फ़िर दीपावली की मंगलकामनायें। सब तरफ़ दीपावली के चर्चे हैं। खर्चे ही खर्चे हैं। बधाइयां है। शुभकामनायें हैं।

द्विवेदीजी के ब्लाग लेखन का एक साल पूरा हुआ। एक साल के बच्चे ने अपने उद्गार प्रकट किये।:
आज मैं पूरे एक साल का होने जा रहा हूँ। आज सुबह ठीक 7.43 बजे। हाँ पिछली 28 अक्टूबर को इसी वक्त मेरा जन्म हुआ था। वे वकील तो थे ही पर वकील होने के पहले से ही साहित्य में खुरचटी की आदत पड़ चुकी थी जो अभी तक गई नहीं। सो मौका मिलते ही हिन्दी ब्लागरी टटोलने लगे। वहाँ बिलकुल "एक्सीडेण्ट हो गया" की तर्ज पर फुरसतिया सुकुल से टकरा गए। फिर क्या था? कहने लगे एक ब्लाग पैदा करो। वे इधर न्याय-प्रणाली से जूझे पड़े थे। प्रणाली थी, लेकिन न्याय वैसे ही गायब था जैसे गंजे के सिर से बाल। तो इस एक्सीडेण्ट की बदौलत मैं पैदा हुआ।
पैदा होने के बाद के जो लफ़ड़े होते हैं वे भी हुये इस ब्लाग-बच्चे के साथ। द्विवेदीजी को सालगिरह पर बधाई!

घुघुतीबासूती जी पिछले दो माह से अपने पति के स्वास्थ्य के चलते व्यस्त थीं। घुघूतजी की बाईपास सर्जरी होनी थी। अब जब घुघूतजी पर्याप्त स्वस्थ हो गये हैं तब घुघूतीजी ने उनका स्वास्थ्य समाचार बताया। अपने इस लेख के माध्यम से घुघूती जी ने उन सभी लोगों के प्रति आभार भी व्यक्त किया जिन्होंने इस कठिन समय में सहयोगी की भूमिका निभाई:
इन कठिन दिनों में हमें कुछ लोगों का बहुत सहयोग मिला । भर्ती करने से पहले ही चार बोतल खून का प्रबन्ध करने को कहा गया था । बिटिया ने जिस संस्थान से पी एच डी की थी वहाँ के छात्र छात्राएँ आकर खून दे गए । उम्र में कई वर्ष बड़े दादा हर समय सहायता को तत्पर रहते थे, जबकि उनका स्वास्थ्य भी कोई बहुत अच्छा नहीं चल रहा था । मेरे पति की कम्पनी के एक व्यक्ति दिल्ली में एक छोटा सा औफिस चलाते हैं । वे व कम्पनी भी सदा सहायता देते रहे । उन्हीं के द्वारा हम एक एजेंसी से कार किराये पर लेते थे। उसका ड्राइवर घर के सदस्य की तरह हर समय सहायता को तत्पर रहता था। जब खून देने की बात आई तब भी देने को तैयार था ।


इसी पोस्ट पर आये कमेंट के बहाने पता चला कि अपने ताऊ भी बाईपास्ड हैं। वे लिखते हैं:
घुघुत जी को जिन परेशानियों से गुजरना पडा वैसी स्थितियों में मरीज की तो अपनी पीडा होती ही है ! पर परिजन जिस भय और आशंका में जीते हैं वो कोई भुक्त भोगी ही जान सकता है ! मैं स्वयं इस रोग का १९८८ से मरीज रहा हूँ और दिल्ली एस्कोर्ट होस्पीटल में मेरी एंजियोग्राफी उस समय हुई थी !


सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने अपने एक मित्र की दुविधा का जिक्र किया है। इसमें एक शिक्षा मित्र के रूप में एक लड़की के चयन और उससे जुड़ी सामाजिक समस्याओं का जिक्र है। लड़की का पिता लड़की के चुने जाने के आसन्न संकट देखता है। अधिकारी समस्या के सामाजिक पहलू को भी देखता है।

इस लेख में कई लोगों के विचार हैं। बात नारी बनाम पुरुष की तरह भी मुड़ गयी है। संबंधित अधिकारी स्कन्द गुप्त का कहना है कि
It's very easy to say to have selected the lady for those who cannot imagine the plight of her poor father. The father has to live in his society not in that of Roshanji. Would the socity have left him unscathed had he postponed her 'gauna'? We should remember that the father is not against his daughter working,(it was he who got her educated) but he is bogged in his circumstances. It must not be forgotten that the incident has emotional aspects apart from economic.

ज्ञानदत्तजी, द्विवेदीजी के साथ मेरा मत भी है कि ऐसी स्थिति में अधिकारी को अपना काम नियम के अनुसार करना चाहिये।

इस तरह के निर्णयों के दूरगामी परिणाम होते हैं। अगर नियमानुसार लड़की की नियुक्ति , भले ही वह कुछ ही दिन वहां रहकर काम करे , होनी चाहिये तो इसको दुविधा का सवाल नहीं बनाना चाहिये।

हमारे एक अधिकारी अक्सर कहा करते हैं- अगर आपको सामाजिकता, उदारता निभानी है तो अपने व्यक्तिगत पैसे/खर्चे से दिखाइये। सरकारी अधिकारों का दुरुपयोग करके नहीं।

रचना सिंह जी ने इसे स्वाभाविक तौर पर इसे नर बनाम नारी का मुद्दा बनाया। जबकि यह बात नर-नारी की उतनी नहीं है जितनी कि उस जिस व्यक्ति को जो अधिकार मिलना चाहिये उसको मिलने न मिलने की है।

राज्य सरकार के अधिकारियों/कर्मचारियों का स्थानीय लोगों से मिलना-जुलना, उठना-बैठना भी होता है। यह मिलन-जुलन स्वाभाविक रूप से उनके निर्णय पर प्रभाव/दबाब डालता है। ऐसी स्थिति में अक्सर लोगों के लिये अप्रिय निर्णय लेना कठिन होता है। लेकिन स्पष्ठ नियम की अनदेखी करके लोकप्रिय निर्णय लेने का सहज लोभ आपके लिये आगे परेशानी का कारण बनता है। लोग आपके पास दबाब बनाते हुये आयेंगे कि साहब, आपने उस केस में तो ऐसा किया था।

मेरी अपनी नजर में नियमानुसार अगर लड़की का चयन होना चाहिये तो अधिकारी को वही करना चाहना। आप अपने विचार इस मुद्दे पर यहां प्रकट कर सकते हैं।

सागर एक फ़िर छप गये तो समीर सम्प्रदाय में दीक्षा ले लिये। बता रहे हैं:
एक दो बार तो पोस्ट लिख कर चालीस पचास टिप्प्णीयाँ बटोर ली थी। :) इतनी लम्बी राम कहानी सुनवाने का मतलब आप समझ ही गये होंगे, भई अब एक बार और शर्माने को क्यों मजबूर कर रहे हैं… भई एक बार फिर हिन्दी मिलाप के दीपावली विशेषांक में नाचीज ने एक हजार रुपयों का पहला इनाम जीता है। यानि गुलाबजामुन की मिठास ने हमें…(?)पहले ही यह कहानी पढ़ा कर आपको बोर कर चुके हैं अब स्कैन कॉपी लगा कर लेख को फुरसतिया बना कर आपको बोर नहीं करेंगे.. :)


अनुजा ने ब्लाग लेखन में महिलाओं की भागीदारी की बात बताई:
ब्लॉग-लेखन में एक बात मैंने बेहद शिद्दत के साथ महसूस की है कि यहां महिलाओं को भी अपनी मन की बात कहने की पूरी आजादी मिली हुई है, जो उन्हें अक्सर अख़बारों या पत्र-पत्रिकाओं में नहीं मिल पाती। यहां जितनी भी महिलाएं अपना ब्लॉग लिख रही हैं, उन सभी के पास अपने-अपने अनुभव और अभिव्यक्तियां हैं। कोई महिला कविता के माध्यम से खुद को अभिव्यक्त कर रही है। कोई लेख या संस्मरण लिखकर। तमाम महिलाओं की अभिव्यक्तियों को पढ़कर मुझे सबसे ज्यादा गर्व इस बात पर होता है कि महिलाएं बंद कोठरियों से निकल बाहर उजाले में आकर अपनी बंद जुबानों को साहस के साथ खोल रही हैं। यहां उन पर किसी भी प्रकार का पुरुष-वर्चस्व हावी नहीं है।


संपादक वर्चस्व को पुरुष वर्चस्व अनुजा ने शायद इस लिये लिखा कि ज्यादातर जगह संपदान की कमान पुरुष संपादक संभाले हैं। ड़ेढ़ टांग के सम्पादक से अनुजा खासी नाराज सी दिखती हैं।

ज्ञानजी की आज की पोस्ट भाभी जी ने लिखी है-जय, जय। महालक्ष्मी जय, जय। यहां एक बार फ़िर से खुलासा हुआ कि वे अपनी सारी पोस्टें उनसे जंचवा कर ही पोस्ट करते हैं। जंचवायें न तो न जाने क्या गड़बड़ करें!

दीपावली पर पारुलजी ने पंडित भीमसेन जोशी का गाया भजन सुमति सीताराम पोस्ट किया तो मीत ने ठुमकि चलत रामचन्द्र बाजत पैजनया। सुनवाया!

एक लाइना


 दीपावली

  1. चाँद और दीपक : दोनों एक ही पार्टी के हैं।


  2. भूत पिशाच नोट दिलवावै :आलोक पुराणिक जब नाम सुनावैं


  3. विवेक चौधरी जी से संवाद जो अब निजी नहीं रहेगा... :बल्कि भड़ास बन जायेगा


  4. बतकहियों में लोकतंत्र : जम रहा है


  5. होश में आओ राज : वर्ना होश उड़ा देंगे!


  6. कैसे मनाये दिवाली ? :शिवमंगल सिंह’सुमन’ की कविता पढ़कर


  7. चलो ,ज्योती पर्व मनाएं !: चलना कहां हैं? यहीं मनाओ यार


  8. दीपावली की शुभकामनाएं :एक चिंतन : दीवाली में तो चिंतन छोड़ो भाई!


  9. राहुल की मुठभेड़ या हत्या : चुनाव आप करें!


  10. उल्लुओं का ठाठ :हमेशा रहता है बन जाओ


  11. एक वो भी दिवाली थी एक ये भी दिवाली है.:आम आदमी हमेशा ’ये’ ,’वो’ में ही मारा जाता है


  12. “रोशनी” से जुडी कुछ रोचक बातें :एक बार पढ़ तो लें


  13. फ़ोन किस को करूं मैं बुलाऊं किसको:जिसका लग जाये उसको करो बुलाओ उसको


  14. ऐसा क्यों होता है? :क्योंकि इससे अलग नहीं होता


  15. भुगतान: तो करना ही पड़ता है जी


  16. हज़ारों ख़्वाहिशें हैं :रोज गिन के हिसाब रखना पड़ता है


  17. आइए दीपावली पर भारत को कंजरवेटिव बनाने का संकल्प लेते हैं: केवल दीपावली के दिन ही क्यॊं? बाकी दिन क्यों नहीं?


  18. तो लोकनायक हैं कायस्थों के नेता ....:ये बात तो उनको भी न पता होगी


  19. मनुस्मृतिः गाली का उत्तर गाली से नहीं देना चाहिए :रागदरबारी:गाली का जबाब जूता है


  20. दीपावली की सभी दोस्तो और दुश्मनों को बधाई :शुभकामनायें भी मिली-जुली सरकार में शामिल हो गयीं!


  21. दिवाली पर बाजार हुआ दीवाना : निकल रहा दिवाला:सबके ऐसे ही हाल हैं लाला!


  22. एक साल के बच्चे की चिट्ठी :बच्चा बहुत पढ़ गया


  23. इस पगलाई व्यवस्था में किसी का बचना मुश्किल है!: व्यवस्था पागल है लेकिन है तो सही



  24. शुभ दीपावली - बहुत बधाई और एक प्रश्न
    :जो कि उल्लू से जुड़ा है


  25. गोली का जवाब गोली से : अत: सिद्ध हुआ कि न्यूटन का तीसरा नियम सत्य है


  26. यादों के सहारे :भविष्य का अंकुर फ़ूटेगा


  27. रात को कोई रोया था !! : सारा तकिया भिगा दिया


  28. क्षमा याचना सहित ताऊ रामपुरिया :को दीवाली मुबारक


  29. आतंकवाद नहीं, सिर्फ मुद्दे से निजात की कोशिश : मुद्दा निपट जाये फ़िर आतंकवाद को भी देख लेंगे


  30. आप क्या सोचते है , "राहुल - राज " का कत्ल हुआ है य़ा एनकांउटर : क्या सोचे दोनो में राज मरा ही होगा


  31. आवाज़ क्लियर है?: एकदम क्लियर है जी


  32. अनूप शुक्ल का प्रश्न! : शास्त्री जी ने लपक लिया


  33. कैसे रुकेगी चोरी????: डकैती को बढ़ावा देकर


  34. ...अगर बेटियों से है प्यार! :तो उनको अपनों से दूर रखें


  35. क्या हुआ...तुम्हरी जिंदगी को... :कुछ लेते क्यों नहीं?


  36. आर्थिक मंदी का दौर :अभी तो आया है काहे भगाने पर तुले हो


  37. कौन कहता है बुढ़ापे में इश्क का सिलसिला नहीं होता :आम तब तक मजा नहीं देता जब तक पिलपिला नहीं होता


  38. गुस्सा थूकिये पाटिल साहब :गुस्से में कुछ ज्यादा ही हसीन दिख रहे हैं।


  39. आखिर कौन देगा इन सवालों का जवाब?:सवाल का जबाब आजकल सवाल से ही देने फ़ैशन है जी


  40. क्यों कभी जवान नहीं हुए भगवान कार्तिकेय ? :सब जुयें की लत के कारण है


  41. वेब पत्रकारों की यूनियन! : जिंदाबाद,जिंदाबाद


  42. सुनो, बाजार कह रहा है, दीपावली आ गई है : कहती है दीवाला निकाल के जायेगी


  43. पता नहीं उन की दीवाली कैसी होगी? : बूझो तो जानें


  44. तीन तय चीजें :तय हैं - मृत्यु, टेक्स और अगर आपका ब्लॉग सफल हो गया तो लोगों की ईर्ष्या!



  45. एक बार मुस्कुरा दो
    :देखें तुमने ब्रश किया कि नहीं


  46. जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना : उजाला धरा पर कहीं दिख न जाये


  47. हम बनें वो दीप जिससे... :जगमगाए जग ये सारा


  48. अब अप्पन लोग भी चाँद पर!: हाथ फ़ेरेंगे


  49. गणित में उत्तर-प्रदेश के बच्चे पिछड़े, छठवां स्थान:अरे स्थान तो है ये कम है?


  50. रविश कुमार मीडिल क्लास के नही लगते ? : उनका क्लास ही अलग है जी


  51. हमे अश्को से ग़म को धोना नही आता : धोबी को सौंप दें यह काम भाई


मेरी पसंद


 दीपावली
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।


नई ज्योति के धर नए पंख झिलमिल,
उड़े मर्त्य मिट्टी गगन स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,


खुले मुक्ति का वह किरण द्वार जगमग,
ऊषा जा न पाए, निशा आ ना पाए
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

सृजन है अधूरा अगर विश्‍व भर में,
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी,
कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी,

चलेगा सदा नाश का खेल यूँ ही,
भले ही दिवाली यहाँ रोज आए
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ जग में,
नहीं मिट सका है धरा का अँधेरा,
उतर क्यों न आयें नखत सब नयन के,
नहीं कर सकेंगे ह्रदय में उजेरा,

कटेंगे तभी यह अँधरे घिरे अब,
स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।
गोपाल दास 'नीरज'

और अंत में


  • एक बार फ़िर से आप सभी को दीपावली की मंगलकामनायें। आज अधिकतर लोगों की पोस्टें और टिप्पणियां भी दीपावली की शुभकामनाओं से भरी-पड़ी हैं। पता लगा किसी ने लिखा -राज की मौत हत्या है या इनकाऊंटर। उस पर टिप्पणी है- दीपावली मुबारक। कोई पोस्ट लिखेगा- आज मरने का इरादा है- अगला टिपियायेगा-(मरो तो) दीपावली मंगलमय हो।
    हेस्ट एंड कट-पेस्ट जो न कराये।


  • विवेक सिंह की शुभ दीवाली लेउ मनाय और इसके पहले लिखना भी बाजार की तरह लुढकायमान है तथा इतवार को कविताजी की चर्चा-पोस्ट करने लगते हैं तुमसे प्यार : रविवार्ता पर हौसला आफ़जाई करती हुई टिप्पणियां आईं। हम उनके लिये शुक्रिया कह देते हैं।


  • टिप्पणियों के जबाब प्रतिटिप्पणियों के रूप में देना कुछ समय ज्यादा मांगता है। इसके अलावा जिसने चर्चा की उसके अलावा कोई दूसरा प्रतिटिप्पणी करे ये भी अटपटा लगता है। अत: मुझे लगता है कि जिस पोस्ट पर टिप्पणी हो उस पर ही प्रतिटिप्पणी होती रहे तो अच्छा है। इस काम को चर्चा करने वाला अंजाम दे सकता है। पिछली चर्चायें देखते रहें शायद आपके सवालों के जबाब दिये जा चुके हों।


  • तरुण ने कहा है कि वे अब नये साल में ही चर्चा करेंगे। तरुण ने चर्चा व्यापार को गम्भीर आयाम दिया। उनकी पिछली चर्चा बहुत मन लगाकर की गयी चर्चा थी। अक्सर यह भी होता है कि नयी चर्चा होने पर पुरानी चर्चा का पता नहीं लगता और पाठक शानदार (सही है न!) लेखन से वंचित रह जाते हैं। इस बारे में मेरे दो सुझाव हैं:
    १. चर्चाकार पिछली चर्चा का लिंक पोस्ट के अंत में या शुरू में दे दे।
    २. चिट्ठाचर्चा में यह सुविधा हो कि पिछली पोस्ट का लिंक दिखता रहे।

    दूसरे पर देबाशीष काम शुरू कर चुके हैं। जल्द ही वे टेम्पलेट में बदलाव करेंगे।


  • चलते-चलते हमारी पसंदीदा लाइने बांच लीजिये:

    जो बीच भंवर में इठलाया करते हैं वो बांधा करते तट पर नाव नहीं,
    संघर्षों के पथ के राही सुख का जिनके घर रहा पड़ाव नहीं,
    जो सुमन बीहड़ों में ,वन में, खिलते हैं वो माली के मोहताज नहीं होते
    जो दीप उम्र भर जलते हैं वो दीवाली के मोहताज नहीं होते॥


  • कल की चर्चा के लिये कुश आयेंगे। इसके बाद समीरलाल। फ़िर मसिजीवी और उसके बाद कौन आयेगा यह निठल्ले बतायेंगे। फ़िलहाल इत्ता ही। आपको दीपावली फ़िर से मुबारक!

    पिछली पांच चर्चा के लिंक:

    1. शुभ दीवाली लेउ मनाय

    2. लिखना भी बाजार की तरह लुढकायमान है

    3. करने लगते हैं तुमसे प्यार : रविवार्ता

    4. आज की चर्चा ताऊ के साथ

    5. चलो बस हो चुकी चर्चा ना तुम खाली ना हम खाली

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    20 टिप्‍पणियां:

    1. यही कि बढ़िया चर्चा रही । परन्तु आज तो कोई मरने की भी बात करेगा तो हम कहेंगे कि भाई/ बहन, पहले तो दीवाली मना लो, और हमारी दीपावली की शुभकामनाएं ले लो !
      आप तो फिर केवल चिट्ठा चर्चा कर रहे हैं, सो......
      आपको व आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं ।
      घुघूती बासूती

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    2. दीवाली पर सुंदर चर्चा। दीवाली मुबारक हो।

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    3. दिवाली पर चर्चा बहुत अच्छी रही |
      दिवाली की शुभकामनाये |

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    4. अन्यतम पंक्तियाँ:

      जो सुमन बीहड़ों में ,वन में, खिलते हैं वो माली के मोहताज नहीं होते
      जो दीप उम्र भर जलते हैं वो दीवाली के मोहताज नहीं होते॥
      ----

      पण्डितजी, तुसी ग्रेट हो।

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    5. आज तो खूब चली और यहाँ भी वही चलायेँगे:

      सभी को दीपावली की बहुत शुभकमनाऐं.

      चर्चा तो खैर बेहतरीन हईये है.

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    6. स्कन्द जी ने टिप्पणी में हमारा नाम रौशन से रोशन लिख दिया तो आपने उनका बेचारे का नाम क्यों बिगाड़ दिया .
      खैर स्कन्द जी जानते हैं पर शायद भूल गए हैं की एक लोक सेवक सिर्फ़ प्रशासक ही नही सामाजिक परिवर्तन का अभिकर्ता होता है. जिस तरह से वो अपनी दुविधा को लेकर आक्रामक हो रहे हैं उससे लगता है की शायद वो उन रूढियों से लड़ना नही चाहते हैं.
      ये जानना रोचक होगा कि स्कन्द जी ऐसे प्रश्न का साक्षात्कार में क्या जवाब देते.
      स्कन्द जी जवाब सोच लें वही उनकी दुविधा का उत्तर होगा
      चर्चा हमेशा की तरह जानदार है और हमें यकीन है मुबारकवाद देते समय सभी लोग चेक कर लेंगे कि मरने मारने की बात तो नही है.

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    7. रचना सिंह जी ने इसे स्वाभाविक तौर पर इसे नर बनाम नारी का मुद्दा बनाया। जबकि यह बात नर-नारी की उतनी नहीं है जितनी कि उस जिस व्यक्ति को जो अधिकार मिलना चाहिये उसको मिलने न मिलने की है।

      My Dear Anup
      Its very easy to say that "she by habit made it a issue between man and woman . Tell me has any one ever read a story where a mans father sold his career to get him maaried " . Its a classic case of exploitation of woman . Even the officer is thinkin about the social issues and not the woman . Why it never happens that a man has to sacrifice a career . Its pitable that even on a plat form of chittah carcha you felt like sayin स्वाभाविक तौर .

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    8. Diwali good wishes for you and your family and the entire blogger family

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    9. दीपों के प्रकाश और पटाखो की आवाज़ में चिट्ठा चर्चा पढ़ रहे हैं...पिछले कई दिनों से चिट्ठाचर्चा के माध्यम से ही ब्लॉगजगत का हाल जानते आए हैं..चर्चा करने वाले सभी मित्रों का धन्यवाद और दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ..

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    10. प्रिय अनूप, एक बार और इस तरह के एक मेराथन चर्चा पाठकों को भेंट करने के लिये मेरा अभिनंदन स्वीकार करें.

      इस बार लगभग सारे 'रस' देखे जा सकते हैं.

      एक लाईना गजब हैं.

      दोनों कार्टून इतने लाजवाब हैं कि उनको चुनने के लिये आपको विशेष बधाई !!

      सस्नेह -- शास्त्री

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    11. कविता लाज़वाब है, कार्टून तो भाई क्या कहें..
      शास्त्री जी के आगे तो बाटली ( बोलती ) बंद हो जाती है !
      बाकी अगली बार..

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    12. आपके पसंद की लाईना पसंद आयी और गोपाल दास नीरज जी की कविता पढ़वाने के लिये शुक्रिया, शुरू की दो लाईना तो मालूम थी बाकि का पता ना था।

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    13. सही समय पर सुंदर सटीक चर्चा
      आभार अच्छी पोस्ट के लीए

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    14. कैसे रुकेगी चोरी????: डकैती को बढ़ावा देकर

      बहुत शानदार रही आज की चर्चा ! एक लाईना तो शबाब पर हैं ! न. ३३ की उपरोक्त हर तरह से आज बहुत पसंद आई ! क्या लाजवाब है ? बहुत शुभकामनाएं !

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    15. आपकी एक लाईना पढ़कर आनंद आ जाता है ।
      आपको और आपके परिवार को दिवाली की बधाई ।

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    16. अच्‍छी चर्चा रही। सूचना के तौर पर भी और वि‍श्‍लेषण के स्‍तर पर भी।

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    17. बहुत बढीया लीखे हैं एक दम सजा सजा के लीखे हैं।

      फोटो तो एक दम सटीक लगाए हैं।

      दिपावली की एक बार फीर से शुभ कामनाऎं।

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    18. इसको कहते हैं चर्चा ! बहुत विस्तार से की गई है... अक्सर जैसा होता है हम देर से आए लेकिन मजा आ गया पढ़कर.

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    19. सुदीर्घ धैर्य से की गई चर्चा है। त्यौहार पर भी इतना समय निकालने के लिए आप बधाई के पात्र हैं।

      उत्तर देंहटाएं

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