शुक्रवार, अक्तूबर 17, 2008

रूठे उल्लू की मान मनौव्वल और हिन्दी चिट्ठाकारी मे जेंडर विमर्श

एक लड़की ने मेंहदी लगवा ली लेकिन कहा कि वह व्रत नहीं रहेगी. पड़ोसनें उसे कोसने लगीं. घर लौटते उसने अपनी दोस्त से कहा कि इनमें से कई की अपने पति से शाम ढलने के बाद बातचीत बंद हो जाती है. वे इस उम्मीद में सज रहीं हैं कि शायद, शादी की स्मृति ताजा हो जाए और रातों का जानलेवा सूनापन टूट जाए. मैं चाहता हूं कि ऐसा ही हो. लेकिन उस क्षण भी वे आप ही के भीतर रहना चाहती है.

जाम में फंसी दयनीय ढंग से सजी औरतें देखीं, ब्यूटीपार्लर श्रमिकों के घनघोर परिश्रम के बावजूद लटकते लोथड़ों, जीवन की सोहबत छोड़ चुकी त्वचा, झुर्रियों समेत वे ध्यान खींच पाने में विफलता के क्षोभ से चमकती आंखों से वे मेंहदी रचे, कुचीपुडी नृत्य की मुद्राएं बनाते हाथों को कारों की खिड़कियों से बाहर झुलाते निहार रहीं थी। सौंदर्य-विज्ञान की विफलता पर बेहद क्रोध आया कि वह इन अरमानों से उफनाती औरतों की सहायता क्यों नहीं कर सकता, इराक पर बम गिराने वालों की तो लाल-भभूका दृश्यावलियां रच कर करता है. क्रोध उन सुंदर लड़कियों पर भी आया जो सूरत का सत्यानाश कराकर गांवों की रामलीला में मुर्दाशंख पोते सेत्ता जी से मुकाबला कर रहीं थीं


जब अनिल यादव ये लाइने लिख चुके हैं और हम उन्हें व अन्य चिट्ठों को पढ रहे है तो अनायास ही एक स्मित रेखा मुख पर आ गयी है ,अनिल की पारखी नज़र की तारीफ से ज़्यादा मन क्षुब्ध है क्यों यह कटाक्ष नही सुन पा रहीं हैं सब !
यह चोखेर बाली के उद्भव के ठीक 9 महीने बाद का समय है कि आज ठीक करवा चौथ के दिन चिट्ठाजगत लिव इन रिलेशनों और मातृत्व के साथ जुड़े माहात्म्य और अनब्याहे मातृत्व के तिरस्कार पर बात कर रहा है
।मातृत्व स्तुत्य है तो अनब्याही माँ होना अपराध क्यों हो जाता है , और वहीं किसी पुरुष द्वारा उस स्त्री व बच्चे को अपना लेने से वही मातृत्व फिर से पवित्र हो जाता है ?और मातृत्व स्तुत्य है तो बेटियों की माँ हमेशा तिरस्कृत्त क्यों होती है ?कहीं समाज के मानदण्डों के अनुसार मातृत्व के स्तुत्य होने की शर्त विवाह संस्था के भीतर प्राप्त हुआ मातृत्व और केवल बेटे का जन्म तो नही है ?

दिनेश द्विवेदी लिखते हैं और हम भी आशा करते हैं -
समाज अपने तरीके से परिस्थितियों का मुकाबला करते हुए आगे बढ़ता है। राज्य को उसे नियंत्रित करने के लिए कानून बनाने पड़ते हैं। वह अराजकता को एक सीमा तक ही बर्दाश्त कर सकता है। देर सबेर राज्य को कानून बनाने ही पड़ेंगे।


नारद मुनि करवा चौथ की बधाई देते देते भी कह ही जाते हैं कि -
साल भर में ना जाने कितने व्रत वह रखती है। कभी पति देव के लिए और कभी अपने बाल गोपाल के लिए। उस के ख़ुद के लिए कोई व्रत है ही नहीं। वह मकान को घर बनाने में इतना रम जाती है कि अपना वजूद तक भूल जाती है।

अब इस लेख का पाठ कैसे किया जाए यह पढने वाले के ऊपर है , इससे स्त्री के त्याग और अपना वजूद खो देने को और माहात्म्य से मढ दिया जाए या सबक लिया जाए कि स्त्री अपने वजूद के प्रति सचेत हो और हम सब भी।


कुछ खट्टी कुछ मीठी पर कामोद भी एक सच्ची व्रत कथा लिख ही डालते हैं

एक समय की बात है .......
लक्ष्मी जी दिपावली के दिन पृथ्वीलोक में अपने भक्तों के घर आशीर्वाद देने जा रही थी. इधर से उधर , एक भक्त के घर से दूसरे भक्त के घर, फिर तीसरे फिर चौथे.... बारी-बारी सभी भक्तों के घर जा रही थी. सभी भक्त बड़े तन, मन और धन से लक्ष्मी जी की पूजा कर रहे थे. लक्ष्मी जी पर आरती आरतीयां गाई जा रही थी. लक्ष्मी जी खुश होकर आशीर्वाद दे रही थी.

बाहर बैठा लक्ष्मी जी का वाहन उल्लू यह सब देख रहा था. उल्लू को बहुत दुख हुआ. उसने सोचा कि वह लक्ष्मी जी का वाहन है फिर भी कोई उसे पूछता नहीं है उल्टा दुत्कारते ही है. लक्ष्मी जी का वाहन ‘उल्लू’ रूठ गया और बोला “आपकी सब पूजा करते हैं , मुझे कोई नहीं पूछता”. लक्ष्मी जी बात समझ गई . लक्ष्मी जी हल्का सा मुस्कराई और बोली “ अब से हर साल मेरी पूजा से 11 दिन पहले तुम्हारी पूजा होगी”. उस दिन सिर्फ उल्लू पूजे जायेंगे
.


करवा चौथ की महिमा का दिनो दिन बढना बाज़ार के हित में ही है,बाज़ार कितने दिनों से लदे फदे पड़े हैं ,चूड़ी -बिन्दी ,साड़ी , ज्यूलरी ,फल-मिठाइयाँ ,ड्राई फ्रूट ,गिफ्ट्स न जानी क्या क्या !और हम सब उल्लू बनाए जाने के इस खेल मे सहर्ष आस्था का झंडा उठाए शामिल हो जाते हैं। बाज़ार कैसे चलता है इसकी सच्ची कथा तो समीर भाई ने बन्दर के बहाने सुना ही दी है ।लेकिन बाज़ार प्रतिभा -अप्रतिभा के ठेकेदार भी हो जाएँ तो प्रमोद जी व्यंगयाने ही लगेंगे न -
बाबा मार्क्‍स ने पता नहीं किस बंगालन की संगत में भांग पीकर, या किसी बिहारिन की मुहब्‍बत में चचा ग़ालिब का शेर पढ़कर भावुकता की पीनक में कभी कह दिया था कि एक दिन पूंजीवाद का नाश होगा और उसके अनंतर सर्वहारा-शासन में सब छककर मौज़-मज़े का जीवन जीयेंगे. बाबा मार्क्‍स को आज कोई उनके कब्र से बहरिया कर अपने कहे का जवाब पूछने लगे तो बाबा की घिग्‍घी बंध जायेगी और बुढ़वा छटपटाकर एक बार फिर भांग-भांग करने लगेगा!


अब आप अगर उल्लू नहीं बनना चाहते तो पत्नी से कहें कि वह आपको आपके हाल पर छोड़ दे और अपना भी हाल सुधारे !
और मेरी भारतीय सखियाँ अपना वजूद पहचाने वर्ना तो अनिल यादव की पंक्तियाँ हर साल मुझे दहलाती रहेंगीं ।

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7 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छा रहा वातावरण करवाचौथमय हो रहा है .

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  2. आज वन लाईना नही है चर्चा में उसकी कुछ कमी लगी। कामोद जी की कथा अच्छी लगी ।

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  3. कुछ लिंक भी पकड़ाइये, न !
    वरना एक अच्छी पोस्ट खँगालने में ही समय निकल जाता है !

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  4. बेहतरीन..बहुत बढ़िया चर्चा की है. साधुवाद. :)

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