शुक्रवार, अक्तूबर 03, 2008

काम अपना छोड़ के टिपियाने की ज़रूरत क्या थी

ताऊ की पोस्ट से


कल गांधी-शास्त्री जयन्ती पर तमाम पोस्टें आईं। मनीष ने एक बार फ़िर से कैलाश गौतम की कविता पढ़वाई:
सिर फूटत हौ, गला कटत हौ, लहू बहत हौ, गान्‍ही जी
देस बंटत हौ, जइसे हरदी धान बंटत हौ, गान्‍ही जी



शिवकुमार मिश्र गांधी जी को थैंक्स देने की योजना बनाते हैं।

और भी बहुत बेहतरीन पोस्टें हैं लेकिन उस सबका जिक्र करना छोटा माउस बड़ी पोस्ट होगा। वैसे भी गांधीजी का जन्मदिन तो कल था। अब रोज-रोज उनको क्या याद करना? अगले साल देखा जायेगा! कौन भागे जा रहे हैं कहीं गांधीजी? वे तो विचार रूप में हमारे साथ ही हैं ,जिंदा हैं इसीलिये तो नाथूराम गोडसे को बाइज्जत बरी कर दिया गया कुश की अदालत में।

कल कुछ साथियों को शिकायत रही कि शास्त्रीजी का जिक्र हमने नहीं किया! भैये हमने तो जो लोगों ने लिखा था उसे बता दिया। अब शास्त्रीजी किसी को न याद आये तो हमही क्यों आपको तकलीफ़ दें।

एक पोस्ट में जिक्र था कि शास्त्रीजी ने अपने बेटे को हड़काया था कि दफ़्तर की गाड़ी केवल सरकारी काम के लिये होती है। आज जमाना बहुत आ गया है। लोग दफ़्तर की हर चीज व्यक्तिगत उपयोग में लाते हैं और धांस के लाते हैं। ऐसे में उस पोस्ट का जिक्र करने से लोगों को बुरा लग सकता था न!

ब्लागिंग को लोग तात्कालिक और हड़बड़िया माध्यम माध्यम मानते हैं, काफ़ी कुछ है भी। लेकिन ऐसे-ऐसे ठेलुहे भी पड़े हैं
जो अप्रैल ,२००६ के प्रस्फ़्रुटित चिल्लर चिंतन को अक्टूबर २००८ में पेश करें,बिन छन्द, बिन ताल:

किसी के उकसाने पर ब्लागियाने की ज़रूरत क्या थी
काम अपना छोड़ के टिपियाने की ज़रूरत क्या थी

माना हमारे साथ बनती नहीं तुम्हारी
पर किसी और के संग खिलखिलाने की ज़रूरत क्या थी

अब जैसा भी है हमने यहाँ पे लिख दिया
पर इसपे भी ताली बजाने की ज़रूरत क्या थी


निवेदिता कभी शिक्षिका रही होंगी। शिक्षिका के रूप में पहला दिन कैसे बीत वो बता रहीं हैं:
वहां आसपास के सभी स्कूलो की हालत ऐसे ही थी(है)। हर स्कूल मे जितनी कक्षाये उससे आधे शिक्षक। बच्चो की पढायी मे दयनिय दशा। आठंवी कक्षा मे पहुचने के बाद भी उन्हे ढंग से हिन्दी लिखना पढ़ना नही आता था। गणित, विज्ञान और अंग्रेजी की बात ही मत पुछीये। चपरासी के अभाव मे शिक्षको ओर बच्चो को सारा काम खुद से करना पड़ता था। स्कूल की साफसफाई, झाड़ू लगाना, पानी भरनासभी कुछ बच्चो करते थे। शिक्षक गण भी अपने निजी कार्य जैसे चाय बनाना उन्ही से करवाते थे।
अब अध्यापक अपना निजी काम बच्चों से न करवायेंगे तो उनके प्रति प्रेम कैसे पैदा होगा? वैसे ही जैसे कि निवेदिता के लिखने में वर्तनी की कमियां न हों तो कौन मानेगा कि ये आशीष की पत्नी हैं जो हर तरह की मात्राओं के साथ एक जैसा ही प्यार करते हैं।

एक लाइना



  • गाँधी जी हम दोनों का थैंक्स डिजर्व करते हैं....: त कहते काहे नहीं मुंह खोल के


  • वापीस आ गया , हूई महंगी सराब की पानी पीया करो : शराब के लिये वापस आये गांधी जयन्ती के दिन


  • धुम्रपान निषेध पर भ्रम फैलाते हिन्दी समाचार चैनल : एक ब्लागर का खुलासा


  • मोम की तरह,आंखों से पिघल जाएंगे : आंखे क्या हमेशा सुलगती रहती हैं


  • हां! प्यार की तस्वीर देखी जा सकती है : प्यार की त मत ही पूछिये, कुछ भी हो जाता है


  • किसी के उकसाने पर ब्लागियाने की ज़रूरत क्या थी? : दो साल पहले के प्रस्फ़ुटन को अब झेलाने की जरूरत क्या थी


  • कुछ हायकू :लान में लेटे हुये दिखे


  • अरे.. दगाबाज थारी बतियाँ कह दूंगी ! : मैं ही बता देता हूँ की हम कुँए पै बैठ कै जुआ खेल्या करते हैं !


  • नो आम,फिर भी दाम :लगा दिया न काम


  • राजनीति की बिसात और उसपर प्यादों की चाल : आगे देखो क्या होता है हाल?


  • कैसे खुश होगी 'बापू` की आत्मा : जब अभी तक इस पोस्ट पर कोई कमेंट नहीं आया


  • कोशिश रंग लाई, मिला पानी :मेहनत का फ़ल मीठा होता है भाई


  • ब्लॉगरीय अर्थव्यवस्था की दुकानें :पर ज्ञानदत्त पाण्डेय द्वारा कब्जा करने की कोशिश


  • ...और अंत में



    1. अपने प्राइमरी स्कूल के दिन याद आते हैं। हमारे गुरु जी कहीं जाते थे तो कहते थे- तिवारीजी, जरा हमारी क्लास भी देख लीजियेगा हम जरा कचहरी तक होकर आते हैं। तिवारीजी भी दोनों की क्लास मिसिरजी को थमाकर पान खाने चले जाते थे।
      ऐसे ही मास्टर मसिजीवी सपरिवार छुट्टी मिलते ही निकल लिये सैर सपाटे को। छुट्टी मिलते ही लोग बाहर इसलिये निकल लेते हैं ताकि लौटकर कह सके -जो सुकून घर में है वो और कहीं नहीं। जब वो निकले तो हमें गये चर्चा का जिम्मा। सो आप एक शिक्षक की ज्ञान भरी बातें से वंचित हमारी हवा-हवाई झेलने के लिये मजबूर कर दिये गये। लेकिन इसमें हमारा-आपका कोई दोष नहीं है क्योंकि कहा भी गया है न- होइहै सोई जो राम रचि राखा।


    2. कुछ धांसू च फ़ांसू लिखने की सबेरे से कोशिश कर रहे हैं लेकिन नेट की बत्ती सबेरे से लुपलुपा रही है। आता है, झलक दिखलाता है चला जाता है। कोई स्थायित्व नहीं। लगता है कि यह भी गठबंधन सरकार बनायेगा। जब नेट नहीं तो ब्लाग कैसे देखें भाई! सो ब्लाग चर्चा छोड़कर और अंत में लिखने बैठ गये। ऐसा ही है न जैसे बच्चा पैदा होते ही वसीयत लिखने बैठ जाये।


  • कल सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी अपनी ताजा गजल ले झाँक गि़रेबाँ ऐ कातिल लोगों को ऐसे पढ़ाते रहे जैसे मेले-ठेले में अपने मंजन का विज्ञापन करने वाले हकीम पर्चा बांटते हैं। पर्चे कम हो जाते हैं तो हकीम लोग उन पर्चों को बटोर के फ़िर बांटने लगते हैं जिनको लोग बिना पढ़े फ़ेंक देते हैं। अपनी शानदार गजलों को इज्जत से अपने ब्लाग पर ही रखो भाई। वहीं आयेंगे पढ़ने।


  • कल की चर्चा के शीर्षक हम बुलबुल मस्त बहारों की, हम बात तुम्हारी क्यों मानें ? पर रचना जी का एतराज है कि
    what you are proijecting is just not charcha but ridiculing woman is a maater of enjoyment for bloggers । सतीश सक्सेनाजी इस बात पर सफ़ाई पेश करें कि उनकी कविता में महिलाओं के खिलाफ़ हास्य क्यों है? बाकी रचनाजी हम कभी विस्तार से लिखेंगे अपनी बात। फ़िलहाल इतना ही निवेदन है कि हमारे चश्में इत्ते महीन नहीं हैं कि हम हर पोस्ट को मर्द और औरत के नजरिये से देखें। मेरी नजर में किसी पोस्ट का कोई लिंग(जेंडर) नहीं होता। आपकी अपनी नजर है हमारी अपनी। दुनिया में सब कुछ औरत-मर्द ही नहीं होता। बहुत कुछ बस होता है। कभी-कभी सहज भी रहा करें।


  • फ़िलहाल इत्ता ही। आप सबकी प्रतिक्रियाओं का शुक्रिया। तमाम पोस्टें रह गयीं। अगर हो सका तो शाम तक उनका जिक्र करूंगा। कल तरुण आपके साथ होंगे।
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    23 टिप्‍पणियां:

    1. मुझे बहुत खेद है की स्त्री विषय को कुछ महिला लेखकों ने अपना पेटेंट ही नही बना लिया बल्कि उस पर किसी और को लिखने की इजाज़त ही नही देतीं ! मैंने यह भी महसूस किया है कि अच्छे अच्छे लेखक भी इसी भय के कारण महिला विषयों पर लिखने से परहेज करते हैं ! रचना जी को इस पर बिना पक्षपात के सोचना चाहिए ....
      महिलाओं के बिना हमारा क्या अस्तित्व है ?? क्या यह भी अब बताने की आवश्यकता है....मगर महिला विषय हम सिर्फ़ आपकी आंख से देखें यह हमें मंजूर नही न आपका एकाधिकार ...
      .....उक्त कविता एक सामान्य भाषा में लिखा हास्य और व्यंग्य है इसके अतिरिक्त कुछ नही ! हर समय गंभीर चिंतन करने के अलावा जब भी समय मिलता है , मैं ताऊ रामपुरिया जी के साथ बैठता हूँ , उनकी ताई के खिलाफ क्यों सवाल नही उठाते जिसके डर से ताऊ भागते ही रहते हैं ... ??? लाइट ले यार ...थोड़ा हंसने भी दो ...

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    2. एक कहावत हैं " निंदक नियरे राखिये " मुझे वाही समझ ले . और लिंग { जेंडर } पोस्ट मे तो क्या ब्लॉग मे भी देखने का चश्मा हैं आप के पास अन्यथा पिछली चर्चा मे एक लाइन मे आप ये ना लिखते

      हम बुलबुल मस्त बहारों की, हम बात तुम्हारी क्यों मानें ? : हम धूल उड़ा दें दुनिया की हम बात तुम्हारी क्यों मानें ?

      क्युकी चोखेर बाली की टैग लाइन हैं

      धूल तब तक स्तुत्य है जब तक पैरों तले दबी है ...उडने लगे ..आँधी बन जाए ..तो आँख की किरकिरी है ..चोखेर बाली है

      जिस मासूमियत और बारीकी से आप देखते हैं मे भी उसी बारीकी से पढ़ती हूँ बस मासूमियत नहीं रखती . स्पष्ट लिखती हूँ ताकि लोग वही पढे और समझे जो हैं ना की वो जो हैं तो पर दिखता नहीं हैं .

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    3. सतीश जी आप से मेने नहीं अनूप जी स्पष्टीकरण माँगा हैं . मेने कमेन्ट उनके चर्चा पर किया था .

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    4. भाँति भाँति व भ्रान्ति
      निवारण और उपाय
      चर्चा चालू राखिए
      कल पढ़ते हैं आय

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    5. हम तो कहे है अनूप जी आप तो बस लिखते जाइए जो मन में आए... और सतीश जी नारी विषय किसी की बपौती तो है नही.. आप भी बेधड़क लिखिए.. जो आपको लिखना हो.. भैया अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का माध्यम ही तो ब्लॉग है.. वहा भी अंकुश लग गया तो कैसन चलेगा..

      भई हम तो हमारे ब्लॉग "नेसबी" पर खूब लिखते है और लिखवाते भी है.. क्योंकि हमारा मानना है की नारी नेसबी है.. यानी की आँखो को सुकून देने वाली.. क्या करे अब तक हमारा पाला ऐसी ही नारियो से पड़ा है..

      एक और बात मैं यहा सतीश जी और अनूप जी से मुखातिब हू.. कोई और इस टिप्पणी पर रिप्लाइ ना करे.. ही ही ही

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    6. १.रचनाजी, निंदा करें, करती रहें। हमें निंदा से कोई कष्ट नहीं है। अच्छा ही लगता है, हमें भी कुछ मौके मिलते हैं अपनी बात कहने के।

      २. अनुरोध है कि निंदा करते समय मन और आंखे खुली रखें।

      ३. यह आपका भ्रम है , पूर्वाग्रह है और आपकी अपनी एकांगिक सोच है कि "हम धूल उड़ा दें दुनिया की हम बात तुम्हारी क्यों मानें ?" लिखते समय मेरे मन में कहीं से भी चोख्रेरबाली की टैग लाइन रही होगी। सच तो यह है कि आपके दूसरे कमेंट के बाद मैंने चोखेरबाली देखा और उसकी टैग लाइन।

      ४. मुझे इस बात का अफ़सोस है कि हम बुलबुल मस्त बहारों की, हम बात तुम्हारी क्यों मानें ? : हम धूल उड़ा दें दुनिया की हम बात तुम्हारी क्यों मानें ? पढ़कर आपको चोखेरबाली की टैग लाइन याद आई लेकिन सतीश सक्सेना की कविता देखने की जहमत आपने नहीं उठाई जिसकी दोनों लाइनें मैंने यहां उपयोग की और्
      केवल ’धूल’ और ’उड़ना’ जो कि चोखेरबाली में दिया है उसी से यह निष्कर्ष निकाल लिया आपने कि मैंने शब्दों की जोड़-तोड़ करके मैंने चोखेरबाली का मजाक उड़ाया है। आपको टुकड़ों में किया मजाक दिखा लेकिन सतीश सक्सेना की पूरी लाइन नहीं दिखी। जिसका कि वहां पर लिंक भी दिया है।

      ५.यह कहने के लिये माफ़ करें या न करें लेकिन मैं यह कहना चाहता हूं कि अपने उद्देशय में ईमानदारी के बावजूद आप अपनी बहुत ऊर्जा बेकार की शंका करने में लगा देती हैं। आपकी बातों को पेश करने का अंदाज ऐसा होता है जैसे कि यहां सारे के सारे नारी विरोधी भरे पड़े हैं। आपके पास इस बात को नकारने के लिये तमाम तर्क होंगे लेकिन यह मैं कहना चाहता हूं कि अपनी बात कहने के अंदाज से आप जो संवेदनाओं का पुरुष और नारी में ऐसा बंटवारा करती हैं कि सहज सहानुभूति रखने वाला भी घबरा जाता है।

      ६. चिट्ठाचर्चा केवल चिट्ठों के बारे में जानकारी देने का हल्का-फ़ुल्का प्रयास है। उसमें नारी विरोध की कोई जानबूझ कर प्रयास सच में नहीं करते हम।
      अगर ऐसा होता तो सुजाता, नीलिमा और मसिजीवी को दुबारा शामिल न करते हम। उनसे अनुरोध करके हमने कहा कि वे लिखे यहां। बल्कि हम तो आपसे भी कहते हैं कि आइये एक दिन चर्चा करिये और बताइये हमें कि कैसे चर्चा की जाती है जिसमें किसी का विरोध न हो न नारी विरोध और न पुरुष विरोध।

      ७.आप मासूमियत नहीं रखती हैं स्पष्टवक्ता हैं अच्छी बात है लेकिन मासूमियत इत्ती बुरी चीज भी नहीं। उसका भी अपना महत्व है। लोग वही पढे और समझे जो हैं ना की वो जो हैं तो पर दिखता नहीं हैं यह चाहत जब आप रखती हैं तब इसे अपने ऊपर भी लागू करने का प्रयास किया करें। यहां आपने जो साफ़ दिया है उसे न पढ़कर जो आपके अपने मन में है वह पढ़ा, समझा और सबको बताया।

      ८. टिप्पणी जरा लम्बी हो गयी और थोड़ी तल्ख भी। आपको शायद कुछ बुरा भी लगे। बुरा मानने की कोई बात नहीं लेकिन अपनी कही बात याद रखिये -निंदक नियरे राखिये। यह भी अनुरोध है कि इसे आप अपनी टिप्पणी के संदर्भ में ही लें अपने और नारी जगत के खिलाफ़ नहीं।

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    7. आपको टुकड़ों में किया मजाक दिखा लेकिन सतीश सक्सेना की पूरी लाइन नहीं दिखी। जिसका कि वहां पर लिंक भी दिया है।
      unki kavita kaa jwaab kal hi diya thaa naari blog par kavita sae aur uska link bhi pichli charcha mae chodaa thaa , ab aap nae nahin padhaa to kyaa karu unhoney padh bhi liyaa aur jwaaba bhi diyaa haen
      charcha ki pichli kadii par link haen satish ji ko jwaab kaa
      baaki maeri urja kae prati aap chinta naa karey maene to kabhi kahin nahi kehaa ki koi blogger apni urja kyun varth kar raahaa haen bloging hae haee urja raknehy aur niyamit padhney vaalo kae liyae
      aap ne jwaab diya thanks par pichli post par diyaa hua link jarur padhey jis mae jwaab haen satish ji ki kavita ka

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    8. यह जेण्डर निरपेक्ष चिच पसन्द है।

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    9. भाई satiish सक्सेना जी आपका धन्यवाद की आपने ताऊ की समस्या उठाई ! पर यहाँ तो लोग ताई की तरफ़
      ध्यान ही नही दे रहे हैं जो दो दो जर्मन मेड लट्ठ लिए जब चाहे ताऊ पर फटकारती ही रहती है :) और भाई जब तक अपने को एक दो लट्ठ नाश्ते में नही मिल जाते तब तक लंच की इच्छा नही होती ! :) और मजेदार बात ये की लट्ठ ताई को दिलवाया जर्मनी आले भाटिया जी नै ! तो भाईयो और बहणो , मेरी बात सुनो , नारी पुरूष दोनों से ही कोरम पूरा होता है ! इब ताऊ की आज की पोस्ट पढ़ कर ज़रा हंस के फ्रेश हो जावो और फ़िर भाटिया जी के मेड इन जर्मन लट्ठ लेकै शुरू हो जावो ! भाई इस नोंक झोंक म्ह भी घणा मजा आरया सै! लगे रहो धंधे पानी तैं !

      शुक्ल जी आप जो नए नए शब्द गढ़ते हैं वो तो कमाल हैं ! आज आपने "छोटा माउस बड़ी पोस्ट" क्या कमाल का मुहावरा रचा है ? मजा आ गया ! चिठ्ठा चर्चा अपने रंग पर आता जा रहा है ! आप सभी चर्चाकारों को
      इसका श्रेय जाता है ! बहुत धन्यवाद आपको ! आपने मेरे ब्लॉग पोस्ट की फोटो को यहाँ स्थान दिया इसके लिए
      भी आपको धन्यवाद ! लगता है आज नोंक झोक का रिजल्ट देखने फ़िर से आना पडेगा ! :)

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    10. @कुश एक खुबसूरत ख्याल !
      जब मैं लिखने आया तो अभियक्ति की स्वतंत्रता के साथ साथ वरिष्ठ लेखकों से प्यार की भी उम्मीद थी ! नेस्बी को मैंने अपने पसंद के लेखन में (लाइट ले यार ) में लिंक किया हुआ है ! बहुत अच्छा प्रयास है !

      @अनूप भाई,
      जब यह कविता लिखी तो मजाकिया मूड में ही लिखी गयी, किसी भी ब्लाग के बारे में सोच कर लिखने का सवाल ही नही आया था ! यह सच है कि मैं हर भावना का पूरा सम्मान करता हूँ उसमे चोखेरवाली और नारी ब्लाग शामिल हैं !

      मनाने का प्रयास मेरी इस कविता में है जिसकी किसी ने तारीफ़ नही की .....

      "क्या शिकवा है क्या हुआ तुम्हे
      क्यों आँख पे पट्टी बाँध रखी,
      क्यों नफरत लेकर, तुम दिल में
      रिश्ते, परिभाषित करती हो,
      हम पुरूष ह्रदय, सम्मान सहित, कुछ याद दिलाने बैठे हैं!"

      और अगर आपने नाराज ही रहना है तो श्री राकेश खंडेलवाल ने इन्ही शब्दों में अपनी बात कही है ....

      "जब भी कुछ फ़ूटा अधरों से
      तब तब ही उंगली उठी यहाँ
      जो भाव शब्द के परे रहे
      वे कभी किसी को दिखे कहाँ
      यह वाद नहीं प्रतिवाद नहीं
      मन की उठती धारायें हैं,
      ले जाये नाव दूसरे तट, हम पाल चढ़ाये बैठे हैं !"

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    11. इतनी बढ़िया तो चर्चा है-आज और कल वाली दोनों ही!!!

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    12. क्या चाहते हो आप लोग,
      एक दो दिन को भी बाहर न जाऊँ
      सब काम छोड़ कर बैठा रहूँ, यहीं ...

      मतांतर पर तो बहस हो सकती है, ताल ठोक कर !
      पर अब फिर से लिंगातर पर क्यों सिर धुना रहा है ?
      क्रोध आशले आमि शाप देबो..'अल्लाह, इन सबको तालिबान बुला ले ।'

      स्त्री आख़िर सदैव अपने को पुरुषों के नीचे पड़े होने का ही गुमान क्यों रखा करती है ?
      इसके आगे और भी जहाँ हैं.,.. इस कायनात में ?
      पत्नी होने की विलासिता तो अपनी जगह पर है ही !

      देवर-भाभी, जीजा-साली, पिता-पुत्री, भाई-बहन... गुरु-शिष्या अनगिनत रिश्ते हैं,
      या कि सिर्फ़ बर्र-ततैया बच गये हैं ?

      ब्लाग को ब्लाग ही रहने दो, अंगवस्त्रों का नाम मत दो !

      यदि मेरे शब्द तीखे लग रहें हों,
      तो अपनी सोच के मिठास से इसे हल्का कर लो.. बड़ा मज़ा आयेगा, वह कहते हैं ना.. 50:50 !

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    13. जय हो गुरुदेव ! कहाँ भ्रमण कर आए आप ? दर्शन दुर्लभ और एखाने शोब किछू गन्डोगोल होए गाछे ! आपनि बाईरे जाछेन केनु ? बोलून तो !

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    14. अनूप जी हंस भी रही हूं और लिख भी रही हूं। मेरी रचना की लाइन पर आपने जो वन लाइना लिखा है पढ़कर हंसी थम ही नही रही क्या करुं। मजा आ गया।

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    15. आज की कुछ गुफ्तगू भेज रहा हूँ......कुछ ब्लोगों के दरमियाँ की .....

      कम अपना छोड़ के टिपियाने की क्या जरुरत थी =मेरी मर्जी
      मै मन्दिर क्यों नही जाता =अरे दगाबाज थारी बतिया कह दूँगी
      एक दिन का मौन व्रत = ओर अधिक मौन न रहा जाये
      इस देश के हालात से बापू उदास है =अब हर फ़िक्र को धुंए में कैसे उडायेगे
      क्या तुम्हे इस धरती पर अब भी खोजा जा सकता है -मिला वो भी नही करते
      तुम बहुत मोटे हो गए हो ..व्हाट ईस वरोंग विद यू =क्यूंकि मै अकेला था

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    16. आज की चर्चा तो वाकई जबर्दश्‍त है :)

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    17. "आपका क्या कहना है?"

      हमारा कहना यह है कि आप कहना जारी रखें. आप कहते हैं तो चिट्ठों के वे कोण नजर आ जाते हैं जो छुपे रहते हैं.

      हां एकलाईना तो एकदम गजब है.

      लिखते रहें!!

      -- शास्त्री

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    18. अब क्या कहें, हम कुछ कह देंगे तो बुझती आग भड़क उठेगी और हम शान्ति के पक्षधर हैं. महाभारत करना और कराना पुरुषों का काम नहीं.
      हम तो वो धूल हैं जिसे कोई ठोकर भी मार दे तो उससे यही पूछते हैं - आप को कहीं चोट तो नहीं न लगी.

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    19. आदरणीय अनूप जी,

      आज ४ अक्टूबर को `हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नही’ पढ़कर उसपर शुरुआती टिप्पणी ठेलकर मैं ऑफ़िस चला गया। शाम को दुबारा लौटा तो आगे की टिप्पणियों से यह पता चला कि एक दिन पहले की चर्चा पर बवाल कट रहा है।

      मैने झटपट चूहे को इधर दौड़ा दिया। यहाँ आकर मुझे जो आनन्द आया है, उसके लिए मैं आपको तहे दिल से शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ। आप कहाँ और किस पते पर मिलेंगे गुरू जी...? आपसे तो बात करने का मन हो रहा है। सच्ची...।

      शुक्रिया के कारण अनेक हैं...। एक-दो गिना देता हूँ-

      १. आज मुझे पहली बार पता चला कि, ...सीरियसली स्पीकिंग, मैं ग़जल की रचना करता हूँ। थैंक्स टू यू...फॉर टेलिंग मी दिस अमेज़िंग ट्रुथ, इफ दैट बी सो...(अंग्रेजी में कहने का मजा ही कुछ और है)। मुझे सच में पता नहीं था कि ऑफिस जाने से ऐन पहले मैने किसी नसीरुद्दीन साहब की पोस्ट पर टिप्पणी करते हुए सीधे उनके कमेण्ट बॉक्स में जाकर जो चार-छः लाइनें टाइप कर दी थी, उसे ग़जल समझ लिया जाएगा। अलबत्ता, मुझे अपनी कविताई, या कहें तुकबन्दी पर रश्क हुआ था तो उसे पत्नी को पढ़ाने के लिए फॉलोअप कमेण्ट का विकल्प सेलेक्ट कर लिया था। उसके बाद गान्धी जी और ओसामा बिन लादेन के शिष्यों की कृपा से अन्य अनेक पोस्टें उसी थीम पर दिखती गयीं और मैं कॉपी-पेस्ट करता गया। चिच के हाथ में भी मैने मूड के बहाने से इस मंजन के पर्चे को थमा दिया था। ...हा,हा,हा,।

      वैसे आपके हाथ यदि एक ही पर्चा बार-बार आता रहा तो गलती आपकी भी है। मेले में बहुत घूमते हैं आप। इसलिए आपके झेलने पर हम मौज ही लेंगे, सॉरी नहीं बोलेंगे। हाँ अपनी पहली ग़जल को नयी डायरी खरीदकर उसमें उतारने जा रहा हूँ। ग़जल लिखने (कहने) का तरीका बताने वाली कोई साइट हो तो बताकर मेरी इज्जत बचा लें।

      आपने मेरी एक और योग्यता का याद दिलाया तो भविष्य में एक स्वरोजगार का चान्स देखकर मैं प्रमुदित हूँ। ...वही हकीम का पर्चा बाँटने वाला। शुक्रिया।

      २.पुनः बधाई और धन्यवाद- यहाँ इस गरमागर्म भिड़न्त में लोहा लेने के लिए। हाँलाकि मैं जानता हूँ कि इस तर्क-वितर्क की श्रृंखला में जब एक पक्ष कुतर्क शुरू करेगा तो आप चुप लगा जाएंगे, फिर आपको पलायित घॊषित करते हुए एक पोस्ट लिखी जाएगी, आप जैसे नारीविरोधियों को जवाब के रूप में। ऐसा मेरा व्यक्तिगत अनुभव है, तथा शास्त्री जी भी इसके साक्षी हैं।

      नारीवाद का ठेका आपलोग क्यों नहीं सर्वसम्मति से उस एक ऊर्जावान व्यक्ति को दे ही दे रहे हैं जो सबकुछ करने में सक्षम है? विधिवत घोषणा करके...! सबको इस विषय पर बात करने की छूट देना तो वाकई नारीवाद के साथ धोखा और ज्यादती है।

      ३. शुक्रिया इस लिए भी कि आपके सौजन्य से चिठ्ठाचर्चा की विषय-वस्तु को लेकर भी एक सार्थक बहस चल पड़ी है। इसमें भी एक सींग घुसी दिख रही है। मैं तो वहाँ टिपिया कर पहले ही निकल आया था। जान बची लाखो पाये।

      बस अब इतना ही...। मैने सायास कभी कोई ग़जल नहीं लिखी फिर भी आपने एक अनायास कथन को शानदार ग़जल बताया तो मैं खुशी से फूलकर कुप्पा हो गया हूँ। तभी तो इत्ती सी टिप्पणी से आपको झिला रहा हूँ।

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