बुधवार, दिसंबर 27, 2006

मध्यान्हचर्चा दिनांक 27/12/2006

संजय एक लम्बे अंतराल के बाद कक्ष में कदम रख रहे थे. धृतराष्ट्र का नाराज होना स्वभाविक था. धृतराष्ट्र कोफी का घूँट लेते लेते रूके.
धृतराष्ट्र : तुम लम्बी-लम्बी छुट्टियाँ मारने लगे हो.
संजय : क्या फर्क पड़ता है, महाराज? आपने देखा होगा मैं आँखे फाड़ फाड़ कर हाल सुनाता हूँ, पर कोई टिप(णी) नहीं देता. वे अगर कह दे की आज नहीं फिर कभी लिखेंगे तब भी वाह-वाह करते हुए टिप(णी) दी जाती है.
धृतराष्ट्र : पर तुम्हारा जो काम है, वह तो करना ही है.
संजय : सही है. पर जब कोई यह लाँछन लगा कर की सारा काम तो इसने निपटा दिया, हम क्या करते. इसलिए नहीं लिखा. और टिप(णी) पर टिप(णी).....
धृतराष्ट्र : देखो संजय, अभी अपना स्तर ठीक करने पर ध्यान दो.... जब तुम अनुप, समीर, जीतु, खंडेलवाल.... इनके आस-पास भी पहुँच गए सबसे पहले मैं टिप(णी) दुंगा. अभी मेहनत करो, सिखो...
संजय : आप शायद सही कह रहें है.
धृतराष्ट्र : तो अब राजी मन से चिट्ठा-दंगल का हाल सुनाओ.
संजय : महाराज यहाँ आकर सब नत-मस्तक हो रहे हैं. पण्डितजी याद दिला रहें है शहीद उधमसिंह की. अफ्लातुनजी भी अपने शैशवकाल को याद करते हुए महानायक की प्रयोगशाला को याद कर रहे हैं.
धृतराष्ट्र : राष्ट्र-नायको को नमन.
संजय : महाराज, चाहे कुछ भी हो जाए हम क्रिकेट को नहीं भूल सकते. एक मैच हुआ अधिवक्ताओं का, और हाल सुना रहें हैं महाशक्तिजी.
इधर वर्तमान घटनाक्रम पर बड़ी उम्मीदों से कार्टून बनाया है, रविजी ने और भविष्य की सम्भावनाओं पर कार्टून पेश किया है राजेशजी ने.
बात भविष्य की है तो, हिन्दी का भविष्य बाजार के हाथो उज्जवल दिख रहा है जोगलिखी पर.
धृतराष्ट्र : अच्छी बात है, अब जरा कवियों को टंटोलो.
संजय : महाराज नए साल का स्वागत हाईकु से कर रही हैं पूनमजी. तापसजी आत्म-संवाद में लीन मन को रणभूमि बनाये हुए हैं तो, राजेशजी जिन्दगी की वेदना से जूझ रहे हैं.
धृतराष्ट्र ने कोफ़ी का घूँट भरा. संजय ने आँखे उठाकर देखा फिर अपना ध्यान लैपटोप की स्क्रीन पर लगा दिया.
संजय : महाराज सुख सागर में आज द्रोपदी का स्वयंवर हो रहा है.
वर्षांत में फिल्म देखने का कोई कार्यक्रम हो तो काबुल एक्सप्रेस तथा भागम-भाग की समीक्षा पढ़ कर जाना श्रेयकर रहेगा. रोचक विज्ञापन देखने की इच्छा हो रही हो तो यहाँ आपका स्वागत है.

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4 टिप्‍पणियां:

  1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  2. गीता सार पढ़ें, मन हल्का होगा!! :)

    कल टिप्पणी नहीं मिली थी, बुरा हुआ.
    आज भी कम मिली, बुरा हो रहा है.
    कल भी शायद न ही मिले, वो भी बुरा होगा.

    व्यस्तता का दौर चल रहा है...


    आगे--


    तुम अपने आपको चिट्ठाचर्चा को समर्पित करो
    यही एक मात्र सर्वसिद्ध नियम है

    और जो इस नियम को जानता है
    वो इन टिप्पणियों, तारीफों और प्रतिपोस्ट की टेंशन से सर्वदा मुक्त है.



    --काहे परेशान हो, भाई. सब मौज मस्ती में हैं और आप तो सिरियस टाईप कुछ दिख रहे हैं.

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  3. संजय जी, यह सत्य है कि चिट्ठा-चर्चा पर टिप्पणियाँ कम ही होती हैं। लेकिन मैं इसे बहुत ही चाव से पढ़ता हूँ, खासकर संजय/धृतराष्ट्र वाले एपिसोड के दिन। ये दो डायलॉग मुझे बहुत पसंद हैं - "धृतराष्ट्र ने कॉफी का घूंट भरा", "और मैं होता हूँ लॉग-आउट"। कुछ समय पहले मैंने कुछ टिप्पणियाँ की भी तो उनका कुछ प्रत्युतर नहीं मिला तो मैंने सोचा शायद चिट्ठा-चर्चा करने वालों को टिप्पणियों को पढ़ने का समय नहीं मिलता होगा। खैर अब से ध्यान रखेंगे जी। :)

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  4. संजय बेंगाणीदिसंबर 28, 2006 9:44 am

    समय समय पर नेताजी शक्ति-प्रदर्शन द्वारा जनसमर्थन को परखते हैं, बाबाजी विभिन्न प्रकार के पूजन कार्यक्रमो द्वारा अपने भक्तो का समर्पण परखते हैं, वैसे ही मैने पाठको की रूची परखने की कोशिश कि है. दो लोगो का समर्थन मिला इतना ही बहुत है.

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