मंगलवार, दिसंबर 05, 2006

वाशिंगटन में उड़नतश्तरी

चिट्ठों की चर्चा से पहले एक सूचना देनी मुझको
उड़नतश्तरी वाले अपने लाल साहब जी के बारे में
इन्हें अतिथिवर चुना गया है इस शनि के कवि सम्मेलन में
कविता पढ़न वाले हैं यह, वाशिंगटन के रजवाड़े में

वैसे इनके साथ निमंत्रण गया भार्गव जी को भी था
लेकिन अपनी ऊहापोह में फ़ँसकर वे आ न पायेंगे
इसीलिये अब कुंडलियों के एकछत्र धारी नरेश जी
सर्वमान्य औ' सर्वपूज्य होकर अपनी कविता गायेंगे

चलिये अब बातें करते हैं अब चिट्ठों वाली दुनिया की
किस गुलशन में द्खें आओ कैसे कैसे फूल खिले हैं
दिल के घाव दिखाने आये जो न कह सके हैं सुनीलजी
नारी मन -बच्चन की नजरें लेकर के उन्मुक्त मिले हैं

बालीवुड की किम शर्मा के चित्र दिखाते हैं पाँडे जी
अमित असोला की सुन्दरती चित्र लेख में सुना रहे हैं
और मीडिया युग वाले हैं लेकर करूण कथायें आये
टीवी की हालत ब्लाग से बदतर है ये बता रहे हैं

पूछ रहे आकर शुएब ये क्या ये विदित तुम्हें बतलाओ
प्रतिबन्धों को कैसे कैसे सुविधा में बदला जाता है
जो कुछ भी दुर्लभ होता है, और कहा जाता नाजायज
कैसे पल में दरवाजे पर दस्तक देने को आता है

लगे जोड़ने हैं अशोक के साथ जुगलबन्दी विज अपनी
और सदा की भाँति रविजी नव-तकनीकी सिखा रहे हैं
गीतकार की कलम सुनाती किसी प्रवासी मन की पीड़ा

टिप्पणी और प्रति टिप्पणी


मुश्किल था टिप्पणी और प्रतिक्रिया साथ में चुन पाना जब
तब शुएब ने और अमित ने मिल कर इसका हल कर डाला
जितने प्रश्न उठाये सबकी एक एक कर, औ' चुन चुन कर
लिखने वाले ने उन सबका सहज भाव उत्तर लिख डाला


SHUAIB // Dec 4th 2006 at 4:50 pm
आपने बाक़ी
मित्रों के नाम लिखे मगर उनका परिचय नही करवाया,और ये तितली का फोटो और थोडा ज़ूम
करके लेते तो बढिया था - शायद उसके फुर से उडजाने का डर था आपको अगर घूमने फिरने की
जगह कोई मुझ से बोले कि “भस अब वापस चलें थक चुके हैं” कसम से तब मुझे बहुत गुस्सा
आता है और लानत भेजता हूं अपने आप पर जो ऐसे थके हुए नाज़ुक यारों के साथ आया
हूं,मेरे साथ भी अकसर ऐसा ही होता है - कहीं जाने का प्लान है तो सबसे पहले सुबह
सुबह मैं पहुंचता हूं और बाकी दोस्त मेरे आने और बहुत देर तक इन्तेज़ार करवाने के
बाद तैयार होकर दोपहर बारह बजे निकलते हैं।बैठे बैठे मुफ्त मे असोला घुमाने के लिए
आपका धन्यवाद

Amit // Dec 4th 2006 at 11:30 pm
आपने बाक़ी मित्रों के नाम लिखे मगर उनका परिचय नही करवाया
दिल्ली आओ फ़िर
परिचय के साथ मुलाकात भी करवाएँगे।
ये तितली का फोटो और थोडा ज़ूम करके लेते तो
बढिया था - शायद उसके फुर से उडजाने का डर था आपको
तितली की फ़ोटो 3x के जूम पर
ही ली है, इससे अधिक optical zoom मेरे कैमरे में नहीं है और digital zoom पर फ़ोटो
फ़ट जाती। उड़ने का वाकई डर था, तीन बार पहले उड़ चुकी थी इसलिए थोड़ा पीछे से बिना
झुके फुल जूम पर फ़ोटो ली।
अगर घूमने फिरने की जगह कोई मुझ से बोले कि “भस अब
वापस चलें थक चुके हैं” कसम से तब मुझे बहुत गुस्सा आता है और लानत भेजता हूं अपने
आप पर जो ऐसे थके हुए नाज़ुक यारों के साथ आया हूं
अरे भई हर किसी का अपना अपना
stamina होता है। वैसे तुग़लकाबाद किले में जाने का प्रोग्राम तो खाना खाते समय बना
था और बाकी लोग इसलिए भी कट लिए क्योंकि शाम को डिस्को जाने का प्रोग्राम था इसलिए
वे थोड़ा आराम करना चाहते थे!
बैठे बैठे मुफ्त मे असोला घुमाने के लिए आपका
धन्यवाद
अरे सिर्फ़ असोला कहाँ घुमाया, तुग़लकाबाद का किला भी तो घुमाया!!

और चित्र की अब बारी है तो ढूँढ़ा परेड में जाकर

मोती एक हाथ में देकर मुझे गया उसका रत्नाकर



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1 टिप्पणी:

  1. वाह वाह, स्वागत है चिट्ठाचर्चा में वापसी पर. अब जल्द ही मुलाकात होती है!!

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