वर्णमाला में अक्षरों की कहीं ज्यादा संख्या(१०० के करीब) का होना अंग्रेजी के कुंजी-पटल से टंकण को कितना दुर्गम बना देता होगा,कल्पना कीजिए.लेकिन यूनिकोड में भारतीय लिपियों के आगमन के बाद हमारे देश के सर्वाधिक साक्षर राज्य में चिट्ठाकारी ने सचमुच वैकल्पिक मीडिया का रूप धारण कर लिया है.केरल की तरह ही मलयालम का चिट्ठा-संसार भी बेहद खूबसूरत है.साक्षरता और कम्प्यूटर-साक्षरता के सम्बन्ध अहसास लोकप्रिय चिट्ठों की हर प्रविष्टी पर भारी संख्या में की गयीं टिप्पणियों से हो जाता है. चिट्ठों के सूची वाले जालस्थल पर हजारों चिट्ठे दर्ज़ हैं लेकिन सक्रिय चिट्ठे व्यापक विषयों पर हैं. खेती , तकनीकी , स्वास्थ्य , साहित्य-शोध , मीडिया-आलोचना , कहानी ,उपन्यास , कार्टून , पुस्तक-चर्चा आदि पर चिट्ठे मौजूद हैं . लोकप्रिय चिट्ठों में ८०७५५ हिट्स वाले जेबेल अली के चिट्ठे की ताजा प्रविष्टि पर ५१ टिप्पणियां हैं,इनके परिचय पृष्ट को १२८१५ बार देखा गया है .१७८१२ हिट्स वाले अरविन्द के चिट्ठे की अंतिम तीन प्रविष्टियों पर क्रमश:३८,५५ और ५९ टिप्पणियां हैं,खगोलविद्या आदि उल्लेखनीय हैं.
मलयालम के लोकप्रिय दैनिक 'मातृभूमि' के समाचार सम्पादक एन.पी. राजेन्द्रन और मित्र सुधीर देवदास के सम्पर्क से मुझे इसी अखबार के वरिष्ट उप-सम्पादक बीजू से साक्षात्कार का अवसर मिला जो चिट्ठा चर्चा के लिए प्रस्तुत है ;
प्रश्न : मलयालम में चिट्ठाकारी की शुरुआत और मौजूदा स्थिति पर रोशनी डालें
बीजू : मलयालम चिट्ठाकारी की शुरुआत खाडी के देशों तथा अमेरिका में रहने वाले अनिवासी मलयाली कम्प्यूटर-विशेषग्यों ने की .अनिवासियों में कम्प्यूटर विशेषग्यों की अच्छी तादाद है .शुरुआत में अक्षरश्लोकम (अन्त्याक्षरी) खेलने के लिए याहू-समूह बना .२००५ के मध्य से सी.जे. सीबू,उमेश,संजीव,एवूरन,पेरिंगो टैन(कुछ तखल्लुस) आदि ने चिट्ठे बना लिए.शुरुआती दौर में चिट्ठेकारी मित्र-मंडलियों के दायरे में ही थी लेकिन यूनिकॊड आधारित सरल विधियों के आने के बाद चिट्ठेकारों की बाढ-सी आ गयी. थानी मलयालम नामक चिट्ठा-सूची-चिट्ठे के दो हजार से ऊपर सदस्य हो गये हैं लेकिन इनमें कई चिट्ठे दर्ज हो कर सो गये हैं .चिट्ठों की सूची वाले स्थलों पर २० हजार से ज्यादा लोग पधारते हैं .
प्रश्न: क्या क्या ज्यादातर चिट्ठे व्यक्तिगत और साहित्यिक हैं,यानि अपनी कविता,कहानी,ललित निबन्ध छपने वाले?क्या राजनीति ,सामयिक घटनाक्रम ,पर्यावरण आदि पर चिट्ठे हैं?
उत्तर : हां ज्यादातर चिट्ठे व्यक्तिगत हैं लेकिन उन्हे पढने वाले भी कम ही हैं.कुछ व्यक्तीगत चिट्ठे काफ़ी लोकप्रिय हुए हैं जिनमें कोडकरपुराणम ,मोथम चिल्लरा , करुमंक कथाकाल उल्लेखनीय हैं.कुछ राजनैतिक चिट्ठे काफी चर्चित हुए हैं जिनमें जनशक्ति ,इडथुपक्षम और नक्सल प्रमुख हैं.चिट्ठा-जगत में सूबे और देश के प्रमुख मसलों पर जोरदार बहस अब आम हो गयी है .
गणित,खगोल,पर्यावरण और सांस्कृतिक धरोहरों पर केन्द्रित कुछ चिट्ठे भी लोकप्रिय हैं .मुख्यधारा के समाचार पत्रों से खबरों का उल्लेख कर उनपर परिचर्चा भी आम है .वक्करिमश्ता और इन्जिपेन्नु नाम से दो शोध छात्र अपने काम की जानकारी देते हैं.
बडे आश्चर्य की बात है कि 'बूलोकम' (चिट्ठा जगत) में फिल्मी चिट्ठे लोकप्रिय नही हुए हैं ।
मलयालम चिट्ठो की चर्चा चिट्ठाचर्चा की उपलब्धि मानी जाएगी.
जवाब देंहटाएंमलयालम भाषा सिखने में कठीन है इसलिए उन चिट्ठो से सिधा सम्पर्क तो असम्भव है.
आज पता चला हिन्दी चिट्ठाकारी से मलयालम चिट्ठाकारी बहुत आगे है. इसका साक्षरता एक कारण हो सकती है.
മലയാളം ബ്ലോഗുകളെ പറ്റി പരാമര്ശിച്ചതിന് അനൂപ് ശുക്ലയ്ക്ക് നന്ദി. ഇന്ത്യന് ഭാഷകള്ക്ക് ഇന്റര്നെറ്റില് ഇനിയും പ്രചാരം വര്ദ്ധിയ്ക്കട്ടെ. ജയ് ഹിന്ദ്!
जवाब देंहटाएंDear Anoop,
Thanks for mentioning malayalam blogging and bloggers here. Let all indian languages spread over the internet. Jai Hind.
-Dilbaasuran
यह तो बहुत 'अडिपोळि' हो गया शुक्लाजी ! शुक्रिया.
जवाब देंहटाएंഅരേ ദില്ബാസുരാ കീമാനില് ഹിന്ദി ഒട്ടിക്കല് കര്ക്കേ ഹിന്ദി മേ ബാത് കരോനാ.