बुधवार, दिसंबर 13, 2006

शीर्षक.. बिना शीर्षक

अभी अभी हम आये हैं, ऑफिस से वापस आज
रात सरीखी हो रही, फिर भी करना है कुछ काज.
करना है कुछ काज कि पहले सब चिट्ठे पढ़ लें
फिर चर्चा करने के वास्ते, कोई कहानी गढ़ लें
कहत समीर कि आज बस थोड़ा सा लिख दें
बाकी चर्चा संजय भाई, कल सुबह ही कर लें.

--समीर लाल 'समीर'

अच्छा, पहले आप यह जान लें कि अपने के सी दुबे जी 'प्रमोदन' पर कुछ लिखे जरुर हैं, मगर शीर्षक के आभाव में उनकी लेखनी तक पहुँच पाना जरा संभव नहीं हो पा रहा है. एक तो नारद की तबीयत में जबसे झटका लगा है, वैसे ही कई पोस्टों को दिखने में जद्दो जेहाद करनी पड़ रही है. उस पर जब आये और खुले न, तो कितना खराब लगता है. इसलिये हम सबको इस बात पर ध्यान देने की जरुरत है कि अपनी पोस्ट में शीर्षक जरुर डालें.

खैर, लक्ष्मी जी न जाने कौन कौन से समाचार पढ़ रहे है और फिर उस पर गाने की तर्ज मे कविता जड़ रहे हैं. अब आप ही जा कर पढ़ें कि महाराज क्या कह रहे हैं, परदेसवा न जाव.

अवधिया जी ने सुखसागर पर पाण्डवों और कौरवों का जन्म कैसे हुआ, कैसे सौ कुण्ड बना कर दो साल में कौरव पैदा हुये आदि आदि. है हमेशा की तरह बड़े ज्ञान की बात.

तब तक मेरे कवि मित्र राजीव रंजन प्रसाद एक दो नहीं, पूरी सात जुल्फी क्षणिकायें लेकर आ गये तो हमारे शिष्य गिरिराज क्यों पीछे रह जाते, वो भी ज्ञान भरी कविता इस जग में जग भर-भर लेकर आ गये.

आँखे देखेगी, कान सुनेंगे, बोलेंगे कण्ठे-द्वार
सच दिखे ना, सच सुने ना, ना ही बोले यार
कैसे पता लगेगा फिर सच का “गिरि” कैसे होगा ज्ञान
इस जग में जग भर-भर के मिलेगा तुझको ज्ञान


हमारे राकेश खंडेलवाल जी के गीतों की तो छटा ही निराली होती है. आज दो दो गीत सुना रहे हैं:
आप और नव वर्ष की मंगलकामना अपने नये नवेले ब्लाग गीतकार की कलम पर:

फिर नया वर्ष आकर खड़ा द्वार पर,
फिर अपेक्षित है शुभकामना मैं करूँ
मांग कर ईश से रंग आशीष के
आपके पंथ की अल्पना मेम भरूँ
फिर दिवास्वप्न के फूल गुलदान में
भर रखूँ, आपकी भोर की मेज पर
न हो बाती, नहीं हो भले तेल भी,
कक्ष में दीप पर आपके मैं धरूँ......



विकास जी भी एक मुलाकात पर दो दो कविता सुना गये, बेरंग और ऐ हवा.

जिन गलियारो मे, झिलमिल करती रंगबिरंगी, टिम-टिम करती,
कितनी है रोशनी, उन बत्तियोँ की
फिर भी जो रंग सुबह था चेहरे पे
वो दिखा नही इन रंगीन उजियारो मे


वाह वाह भाई, बहुत अच्छे.

आज खुशी बहुत दिनों बाद फिर से दिखीं मगर अबकी बार जरा कुछ पृथ्वीराज सिरियल पर नाराज सी.

देबाशीष जी ने दैनिक भास्कर के अहा जिंदगी के ईअंक के बारे में जानकारी दी और मिडिया युग लेकर आये आये पिछला हफ्ता टीवी पर.

रचना बजाज जी अपनी दादी को याद करते हुये कह रही हैं:

अभी जब मैने ये पोस्ट टाईप करनी खतम की तब मुझे याद आया कि १७ दिस. को मेरी दादी की पुण्यतिथी है..शायद वो भी मुझे कहीं दूसरी दुनिया मे याद कर रही है… तो ये पोस्ट मेरी प्यारी दादी के लिये…..

मनीषा जी चोरी का मोबाईल पकड़ने वाली वेबसाईट के बारे मे बता रहीं है और साथ ही साथ हिन्दी के सर्च इंजन गुरुजी के बारे में भी जानकारी दी.

प्रभाकर भाई फिर चले गांव की ओर और देवरिया जनपद पर एक प्रशासनिक दृष्टि डाल रहे हैं.

बस आज हड़बड़ी में इतना ही, बकिया तो कल संजय भाई आयेंगे ही न!!

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2 टिप्‍पणियां:

  1. पहले तो आप यह बताइए कि आप गायब किधर हो जाते हो? आपकी तनख्वाह क्यों ना काटी जाए? :)

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  2. भैय्या पंकज ,उड़नतश्तरी वाशिंगटन में आ उतरी थी
    रजधानी में कुंडलियों की खूब पताकायें फ़हरी थीं
    तुमने शायद पढ़ा नहीं था, पूर्व सूचना भेज चुके थे
    पता नहीं ये नजर तुम्हारी और कहाम जाकर ठहरी थी :-)

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