बुधवार, दिसंबर 20, 2006

चुनाव आ गये

अस्वीकरण (Disclaimer): पहले तो यह बता दूँ कि शाम को पूरी चर्चा लिखी, सेव भी करी और फिर देखता हूँ कि सारी गुम. कुंडली भी. पूरा मूड खराब हो गया और उसी खराबी में फिर से लिख रहा हूँ और मूड की खराबी के दर्शन आपको लेखनी में जगह जगह हो सकते हैं, कृप्या कोई अन्यथा न ले. हालांकि मै संयम बरतने की पूरी कोशिश करुँगा.

क्या विडंबना है भाई. एक तरफ तो हमारे मनीष भाई को कुछ दिख नहीं रहा. कहते हैं चराग दिल में जलाओ, बहुत अँधेरा है तो मेरे कवि मित्र राजीव रंजन जी कहते हैं उजालों ने डसा. अब किसकी सुनें? यूँ तो दोनों की ही न सुनें तो बेहतर. एक तो बाहर ही दिन दिन भर बिजली गायब रहती है और न ही मिट्टी का तेल मिल रहा है, और इन्हें दिल में चराग जलाने है. और जब जला दिये तो राजीव जी को बच कर चलना चाहिये थी. अब डस लिया न!! साँप के डसे का तो मंतर हमें मालूम है, अब ये उजाला डसे तो कैसे उतारते हैं, किसी को मालूम तो उनका बताये दो, भईया!! इन्हीं सब चक्करों में शैलेश भारतवासी भी फंसे और लिखते लिखते उनके शब्द भी पहुँच गये अंतहीन अभीष्ट तक. पक्का, यह अंधेरों उजालों के चक्कर में आँखें चौंधिया गई होंगी. इनकी भी और रन्जु जी की भी-उनके तो ख्वाब ही बिखर गये. इतना सब लफड़ा करवा कर मनीष जी कट लिये और फिर आये तो पूरा हफ्ता चाँद चाँदनी के नाम करने. यार पहले से डिसाइड किया करो. कभी कहते हो अंधेरा है, फिर चांदनी है. अब क्या सही मानें?

अब अंधेरा हो कि उजाला- हमारे फुरसतिया जी को इससे कोई फरक नहीं पड़ता. वो तो बस सायकिल उठाये और चल पडे कलकत्ता से खड़कपुर. सुने उनकी उनकी यायावरी की कहानी उन्हीं की जुबानी-देश का पहला भारतीय नकनीकी संस्थान

अब इतने सारे कवि तो चिट्ठाजगत में ही बैठे बैठे रोज कविता सुनाते हैं , आज भी जिनका जिक्र उपर किया है उनके अलावा राकेश भाई भी सुना रहे हैं और अभिजीत शक और प्यार का गीत सुना रहे हैं. सब तो सुना रहे हैं,कभी लिख कर, कभी गाकर, कभी हंसकर, फिर भी संजय भाई को कवि सम्मेलन का इंतजार लगा है, तो हम क्या कर सकते हैं. अब यहाँ से टेलिफोन पर तो सुनाने से रहे. कभी गुगल चैट पर सुना देंगे, मौका लगा तो. वैसे मै आपको बता दूँ कि कविता से ज्ञानार्जन अपनी जगह है बाकि भी तो ज्ञान की नदियां बह रही हैं, वहाँ भी डुबकी लगाईये न!! देखिये, सुखसागर जी द्रुपद द्रोण का बंदी और लाल्टू जी राम गरुण का छौना के द्वारा ज्ञानवर्षा कर रहे हैं तो मिडिया युग वाले “पापुलर न्यूज इन्ट्रेस्ट” के विषय में. तरुण भाई भी एक प्लगईन बनायें है, थोड़ा तकनिकी ज्ञान भी अर्जित किजिये.

जब सब अपनी अपनी बिसात बिछायें तो पंकज काहे पीछे रह जायें. तुरंत आये भागते हुये और पहले तो २००६ की बेहतरीन तस्वीरें दिखाये और फिर लगे चुनाव करवाने “२००६ का हिन्दी चिट्ठाकार”. अब भरो सब नामिनेशन. चुनाव अधिकारी कौन है, यह नहीं बताया गया है, तो जुगाड़ कहाँ लगायें. सब ऑन लाईन होना है, नहीं तो बूथ कब्जा वगैरह करते, सो वो भी गया हाथ से. अब तो सिर्फ़ निवेदन से ही काम बनेगा. सो, उड़न तश्तरी का निवेदन भी प्रस्तुत है, उड़न तश्तरी और छोटू की चर्चा के माध्यम से. हमारा तो उड़न तश्तरी के अंदर कुट कुट कर भरी समाज सेवा की भावना को देखकर सर श्रृध्दा से झुक गया. क्या समाज सेवा की भावना है कि पूरे चिट्ठाजगत के खुद ही नामिनेशन फार्म बनाकर अपने चिट्ठे पर उपलब्ध करायें हैं. नमन करता हूँ.

अब इन सब चुनावी हलचलों से दूर शशी भाई कहे कि काबुल एक्सप्रेस देखो तो जगदीश भाई पहुँच गये, देखने. अब देखा है, पैसे लगाये हैं तो विचारेंगे भी और जब विचारेंगे तो लिखेंगे भी और जब लिखेंगे तो हम पढ़ेंगे भी और जब पढेंगे तो पढ़ने का ठिठोना, टिप्पणी भी जरुर बिठायेंगे कि पढ़ लिये भाई और बस लिखना सफल. मगर शशी भाई फिर से आ गये, अबकी बार हाई टेक कल्चर की हँसी का फव्वारा लेकर और रवि भाई कहे कि अक्खा इंडियाइच दुकान बन गयेला है.

अच्छा हँसाये मगर प्रतीक तो किसी और ही मूड में है और पुराने गीत सुने चले जा रहे हैं और लिंक भी दे दिये कि आपको सुनना हो तो आप भी सुनें. वो तो गीत में गुम हैं और उनको प्रमेन्द्र जी राधा और कृष्ण के संबंधों की पवित्रता का संपूर्ण पुराण पढ़ाने के लिये लेकर हाजिर खड़े हैं.

हम तो खैर गीत में रम गये मगर पटना से दिव्याभ आर्यान जी को इंतजार लगा है “प्रतिक्षा”-वो भी ऐसी वैसी नहीं, बात इतनी बढ़ गई है कि कह रहे हैं कि कहीं उस तस्वीर की लकीर मिल जाए जिसपर मैं अपनी आध्यात्मिक उन्नति को लुटा सकूँ और अपनी आवरगी को जाम दे सकूँ...। वाह भाई, लुटाओ तो कुछ ऐसे!! यहाँ लुटाया जा रहा है, तो वहाँ बासमती चावल के पेटेंट का झगड़ा निपटाने में उन्मुक्त जी लगे है और सबको बिजी देखकर रचना जी भी एक गरीब नौजवान से खास मुलाकात और साक्षात्कार में लग गयीं.






जरुरी सूचना

तरकश.कॉम पर एक पोल रख रहे हैं "2006 का हिन्दी चिट्ठाकार", इसमें हमारा परिवार यानि कि आप और हम चुनेंगे 2006 के श्रेष्ठ हिन्दी चिट्ठाकार को जिसने 2006 से लिखना शुरू किया हो।
अब आपको नोमिनेशन देने हैं। कम से कम दो ब्लोगर का नोमिनेशन दिजीए... आप खुद अपने आपको नोमिनेट नही कर सकते हैं। :)
ध्यान रखिए उसी ब्लोगर को नोमिनेट करना है जिन्होने 2006 से लिखना शुरू किया हो।
नोमिनेशन 22-12-2006 तक भेजा जा सकता है।

नोमिनेशन सिर्फ इमेल (contact@tarakash.com) के द्वारा दिया जा सकता है।



चलते चलते जीतू भाई की नजर से दुबई देखें.

आज की तस्वीर:
पंकज बेंगानी के चिट्ठे से :



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2 टिप्‍पणियां:

  1. हा हा हा हा ! समीर जी, अच्छा मौका दे दिया मैंने आपकों खिंचाई का। बहुत अच्छी तरह लपेटा है आपने हम सबको अपनी मजेदार शैली में ।

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