सोमवार, दिसंबर 11, 2006

व्यस्तताओं के दौर में समाचारों पर सरसरी निगाह...

व्यस्तताओं का दौर जारी है. धृतराष्ट्र के साथ-साथ मिर्जा भी पूरे रविवार खर्राटे भरते रहे. लिहाजा चिट्ठों का भार सोमवारी चर्चा पर आ गया. इधर भी कोई कम व्यस्तता नहीं है. भई, सुबह का अख़बार बांचना भी खासा बड़ा काम है. इसे निपटाए बगैर सुबह का नित्य कर्म जो नहीं निपटता. ऊपर से यहाँ पर रविवार का अख़बार लालू की ट्रेन के जरिए सोमवार को पहुँचता है. रविवार के अख़बार की मोटाई रविवार के दिन इस्तेमाल के लिए होती है, सोमवार के लिए नहीं. परंतु यहाँ मजबूरी है. इसलिए समाचारों पर रेंडम निगाह डाली जा रही है.

सबसे पहले दिल को धक धक करती खबर:

धक धक गर्ल मुंबई पहुँची

'धक धक गर्ल' माधुरी दीक्षित बॉलीवुड में अपनी दूसरी पारी खेलने मुंबई पहुंच चुकी है। माधुरी बुधवार को अपने पति डा. नेने और दो पुत्रों अरिन व रियान के साथ यहां पहुंची।

उन्होंने यश चोपड़ा की फिल्म में काम करने के लिये अपनी मंजूरी पिछले दिनों दी थी।

वाह! क्या दिल धड़काने वाली खबर है. माधुरी के बॉलीवुड से जाने के बाद से तो अपने दिल ने धड़कना ही बंद कर दिया था.

दिल धड़काने वाली खबर के बाद निगार दूसरे समाचार पर पड़ी. यह तो दिल बैठाने वाली थी. मूर्तियाँ तोड़ने का सरेआम निमंत्रण! पर जरा ध्यान से पढ़ा तो व्यंग्य भाव जानकर दिल को तसल्ली मिली :

आओ मूर्तियाँ तोड़ें

"...सो वह डंडा उठाए के हमारे मुहल्ले में पहुँचा और बनवारी के घर के सामने लगी उसके के दादाजी की मूर्ति पर पिल पड़ा - दादाजी रईस ज़मींदार थे, सो मूर्ति-उर्ति लगवाने का पैसा रहा होगा। वैसे तो हमें भीखू की अक़्ल पर हमेशा से शक था, लेकिन यह बात तो बिल्कुल ही समझ में नहीं आ रही थी कि भीखू के भेजे में मूर्ति तोड़ने का इतना सॉलिड आइडिया कैसे आया। पता किया तो मालूम पड़ा कि मंथरा के आधुनिक संस्करण ख़बरिया चैनलों को देखने से उसे अम्बेडकर-मूर्ति प्रकरण वाली बात पता चली थी, वहीं से ये आइडिया उड़ाया था।..."

आगे बॉक्स में खबर थी - वह भी तीसरी किश्त. इस खबर में सिर बहुत खपाया फिर भी समझ नहीं आया. विज्ञान और पुराण का घालमेल समझने के लिए गुरु, अपुन को जरा ज्यादा ही दिमाग खपाना मांगता है. इसीलिए इस खबर को चिह्नित कर छोड़ रखा है - जैसे ही फुर्सत मिलेगी, दुबारा गंभीरता से पढ़ा-समझा जाएगा. पर, आजकल किसी के पास फुर्सत के पल निकल पाते भी हैं क्या? बहरहाल, अगर आप समझना चाहते हैं तो बॉक्स की खबर यह रही:

भौतिक जगत और मानव-3

ज्वालामुखी ने अग्नि तथा लावा बरसाया। भूकंप और अन्य भीम दबाव ने बड़े-बड़े भूखंडों को खिलौने की तरह तोड़ डाला, इनसे पहाड़ों का निर्माण हुआ। ये तलछटी शैल पुन: अग्नि में पिघलकर बालुकाश्म (sandstone) या आग्नेय शैल (igneous rocks ) बने। इस तरह अनेक प्रकार की पर्वतमालाओं का जन्म हुआ। यह प्रक्रिया वाराह अवतार के रूप में वर्णित है।

यूँ तो समाचार लूट पाट की घटनाओं से भरे पड़े रहते हैं. किसे पढ़ें व किसे छोड़ें. पर सेब की लूट की यह खबर मजेदार रही :

सेब की लूट

भारत में साड़ी की दुकान की याद आ गई. वैसे पुरुष "जी जी मैडम यह बनारसी देखिऍ" कह कर जब पल्लु खुद पर लगा कर दिखाते हैं तो बहुत गुड़ लगते हैं. खैर गुड़ छोड़ कर वापस सेब पर लौटा जाऍ. तो हमने आई पोड लिया २४९ में. पर नही जनाब साथ में ऍक केस भी लेना होगा. केस की कीमत ३५ ! खैर वह भी लिया. पर अडापटर तो चाहिऍ ना की सिर्फ कम्पयुटर से ही चार्ज करेंगे. अडापटर तो साथ में देना था. वेरी चीप! वह भी मिला १५-२० में. हमने पूछा की भाई बैटरी मिलेगी दूसरी. बोले नही दादा. वह तो आपको हर ४०० चार्ज के बाद ऍप्पल के पास भेजना पड़ेगा. वह दुसरा आई पाड भेजेंगे. हायँ !! मलतब ! जै का बात हुई ! तो पोस्ट का खर्चा. वह भी हम ही. चलो फ्री में तो बदल दोगे ना. नही ! कितने क्या पूरे ६२ !! मार दिया दद्दा !! हर साल दो साल में ७० का चूना लगाना पड़ेगा.

इस समाचार को पढ़कर तो आप भी वाह! वाह! कर देंगे:

हाइकु दिवस समारोह में कवियों ने लूटी श्रोताओं की वाहवाही

गाजियाबाद, जागरण संवाद केंद्र : हाइकु दिवस पर हुए समारोह में कवियों ने चंद लम्हों में कुछ पंक्तियां लिख श्रोताओं की वाहवाही लूटी। हाइकु के नामी कवि कमलेश भट्ट ने इस विधा के इतिहास व विशेषताओं पर प्रकाश डाला। कवयित्री कुसुम अग्रवाल ने हाइकु की शुरुआत इस तरह से की-

मत खोलना

कभी किसी के राज,

(तुम्हारे भी होंगे)

किसको पता।

कुछ समाचार बहुत दिन तक मन की भावनाओं में पैठ जाते हैं. भागलपुर का पुल और बोगी नं 8 - अकर्मण्यता और चलताऊ एटीट्यूड का बेहतरीन नमूना - कौन भूल पाएगा? इसी समाचार की एक और कड़ी :

बोगी नंबर S-8....

छुट्टियाँ खत्म हो गई हैं

अब मुझे जाना होगा माँ

मेंने S-8 में रिजर्वेशन करा लिया है...

समाचारों के बीच अचानक चिन्तन कण पर निगाह गई. गंभीर चिंतन से अपना दूर का वास्ता रहा है. अतः निगाह तुरंत दूसरे समाचार पर जाने को हुई. परंतु शीर्षक आकर्षक लगा. सोचा, चलो आज थोड़ा चिंतन कर लेते हैं. चिंतन तो बड़ा मूल्यवान लगा. और लहजा आकर्षक. ऐसे चिंतनों की तो भाया बहुत आवश्यकता है, बहुत आवश्यकता है:

मार्केटिंग ग्लोबलाइज़ेशन

हुआ यों कि मैं सडक मार्ग से पैदल अपने मित्र के घर जा रहा था. आप पूछेंगे कि सडक मार्ग से ही क्यों जा रहा था? आपका प्रश्न उचित है, परन्तु हवाई मार्ग से न जा पाने के तीन कारण थे. पहला तो यह कि मेरे पास कोई वायुयान न था. दूसरा मैं हनुमान भी नहीं था जो कि श्री राम का स्विच दबाकर खुद को स्टार्ट कर लेता. और तीसरा और प्रमुख कारण यह कि अगर मेरे पास प्लेन होता भी तो मैं उसे लैण्ड कहाँ करवाता. मित्र के घर को वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर में थोडे ही रूपान्तरित कर डालता. मुझे विषय से भटकने में उतना ही आनन्द आता है, जितना आपको अपने ब्लॉग पर टिपण्णियाँ देख कर आता होगा.

कुछ समाचार आनंददायी होते हैं तो कुछ से मन में अवसाद आ जाता है. छः दिसम्बर से जुड़े समाचार जब-जब भी दुहराए जाते हैं, सभी के मन में अवसाद उठता ही है. पर, इन समाचारों से आप दूर भी तो नहीं भाग सकते:

ख़ुदाई की कहानी, खुदाई की ज़बानी

छ: दिसम्बर की चौदहवीं बरसी पर शुऐब भाई के विचार जान बहुत अच्छा लगा और इस विषय पर लिखी अपनी एक कविता मुझे याद आ गई। हृदय के यह उदगार उस समय पन्नों पर बिखर गए थे जब विवादित स्थल पर खुदाई का आदेश दिया गया था।....

मन्दिर भी गया टूट

मस्जिद भी गई ढाई

पिता की खोज में वहाँ

फिर होने लगी खुदाई

कभी आपकी सरे बाजार फ़ज़ीहत हुई है? ईश्वर न करे कभी ऐसा हो. परंतु तथाकथित ईश्वर के बंदे लोगों की सरेराह, सरेआम फ़ज़ीहतें करते फिरते हैं. विस्तृत समाचार खुद पढ़ें:

कृष्णों की फजीहत

गनीमत है कि द्वारिका मोदी के गुजरात में है, मथुरा या बृन्दावन नहीं . मोदी का राज यदि मथुरा-वृन्दावन में होता तब राधा-कृष्ण का क्या हाल होता ? वह भी भारतीय संस्कृति के कथित रक्षकों के हाथों . विडम्बना है कि ‘रक्षकों' में कुछ गोपियां भी पीछे नही हैं .

काश इन ‘संस्कृति रक्षकों' का भीम और हिडिम्बा जैसे युगल से कभी सामना हो जाता ,तब समझ में आता.

अगला समाचार ‘मेरे अपने अधिकार' यानी मानव अधिकार के बारे में था. मैं स्वयं अपने बहुत से अधिकारों के बारे में अनभिज्ञ हूं. बहुत से अधिकारों को जानता भी हूँ, परंतु अपने यहाँ की व्यवस्था उसे लेने नहीं देती. ऐसी परिस्थितियों में ‘दिवस' इत्यादि का समारोह मनाकर उस गम को गलत कर लेते हैं. जी हाँ, आज मानव अधिकार दिवस है. उस से संबंधित समाचार :

मानवाधिकार दिवस

10 दिसंबर यानी मानवाधिकार दिवस। "मानवाधिकारों" को लेकर अक्सर विवाद बना रहता है। ये समझ पाना मुश्किल हो जाता है कि क्या वाकई में मानवाधिकारों की सार्थकता है। अबू गरीब जेल जैसे कांड जब सुनने में आते हैं तो मानवाधिकारों की बात करना सही प्रतीत होता है। जेल में कैदियों के साथ जिस तरह का अमानवीय व्यवहार किया जाता है या किसी भी वजह से मनुष्य के हितों की अनदेखी होती है तो यकीनन उसे सही नहीं ठहराया जा सकता। ऐसे में मानव अधिकारों की बात करना सही लगता है, लेकिन वहीं दूसरी और जब मानवाधिकारों की दुहाई देकर अफजल गुरु जैसे आतंकवादियों को माफ करने की बात कही जाती है तो मानवाधिकार जैसी बाते निरर्थक लगती है। विरोधाभास तो है ही लेकिन कहीं न कहीं मानव का हित साधना ही परम उद्देश्य है।

और ये अपील करने वाला समाचार मैंने पहले क्यों नहीं पढ़ा? दो महिलाओं के समाचार की दूसरी किश्त आम भारतीय महिला के घर से निकल कर डार्विन के विकासवाद तक जा पहुँचती है-

दो महिलाएं-2

मुझे दोनों महिलाओं ने खूब अपील किया। लेकिन मल्लिका का अंदाज बेबाक और बिंदास लगा। जब भी मैं इन दोनों महिलाओं की तुलना कभी अपने घर की महिलाओं से करता हूं तो सोचता हूं कि क्या फर्क है इनमे और मेरे आसपास की महिलाओं में। गौर से देखिए तो आज अस्सी के बाद पैदा हुई ज्यादातर लड़कियों में आप वो सब कॉमन पाएंगे जो उसके पहले की महिलाओं में नहीं है। मसलन अब ज्यादातर शहरी महिलाएं पतली होती हैं, और उनका शरीर उतना मांसल नहीं होता जितना पहले की लड़कियों में होता था।...

आगे न्यायिक सक्रियता के स्वागत सत्कार का समाचार था. परंतु लोग बाग़ न्यायिक सक्रियता का स्वागत करने के बजाए उसे अति सक्रिय करार देने पर तुले हैं, विधायिका के कार्यों में हस्तक्षेप बताने पर तुले हैं. न्यायिक सक्रियता ने भ्रष्टों की चमड़ियों पर रिएक्शन नुमा खुजली पैदा कर दिया है. वे तो विरोध करेंगे ही! मुझे खुजली नहीं मच रही है, अतः मैं तो स्वागत करूंगा ही-

आइये, न्यायिक सक्रियता का स्वागत करें

किन्तु भ्रष्ट तत्व न्यायालयों के इन निर्णयों को पचा नहीं पा रहे हैं। इन तत्वों द्वारा, या इनके चमचों द्वारा, तरह-तरह के छद्म तरीकों से (अप्रत्यक्ष रूप से) इन निर्णयों का विरोध किया जा रहा है। इधर राजनीतिज्ञ दबे मुँह न्यायालय की अति-सक्रियता की बात कहने लगे हैं, तो उधर बालीवुड हस्ताक्षर अभियान और बहिस्कार की बात कर रहा है। बालीवुड और मुम्बई के अन्डर्वर्ड से सांठगांठ जगजाहिर है। भारत में राजनीतिबाजों का भ्रष्ट और आपराधिक चरित्र सर्वविदित है।

आगे का सुखद समाचार:

अब ग्रामीण इलाकों मे आयेगी मोबाइल क्रांति

नई दिल्ली। देश के ग्रामीण और दूरवर्ती इलाकों तक मोबाइल सेवाएं पहुंचाने के लिये लोकसभा ने शुक्रवार (8/12/06) को एक विधेयक पारित कर दिया जिसके तहत सार्वभौम सेवा दायित्व (USO) कोष से इन सेवाओं के लिये धनराशि उपलब्ध कराई जा सकेगी।

लोकसभा ने इस संबंध में दो सौ साल से भी पुराने भारतीय तार कानून में संशोधन संबंधी विधेयक को मंजूरी दे दी। इस विधेयक के तहत कानून में से संचार सेवाओं में बुनियादी शब्द हटा दिया गया है। अभी तक बुनियादी सेवाओं मे सिर्फ लैंड लाइन और फिक्स्ड वायरलेस सेवा ही आती थी। लेकिन इस संशोधन से इन सेवाओं मॆं सभी किस्म की टेलीफोन सेवाएं आ सकेंगी और उनके ग्रामीण तथा दूरवर्ती इलाकों में विस्तार के लिये भी यूएसओ कोष से धनराशि मिल सकेगी।

इस समाचार को पढ़ कर रत्ना की प्रतिक्रिया थी -

साफ पानी की आवश्यकता ज्यादा है बजाए मोबाइलों के, परंतु किसे चिंता है?

सचमुच किसे चिंता है? हम भी गांव गंवई के समाचारों से निकल कर वैश्विक समाचारों पर निकल लेते हैं:

वैश्विकरण या विश्व अमरीका की जेब में?

"बेसिक फ़ंडे" की बात करें. आइडिया ये है की अमरीकी प्रभुत्व को जितना हो सके आसानी से स्थापित किया जाए. इसके लिये जरूरी है की दुनिया भर की अमरीका विरोधी तानाशाहियों को जनतंत्रों में बदल दिया जाए और कठपुतलियां बिठा दी जाएं. रिश्वत दो, लूट में से कुछ हड्डियां बांट दो और किसी भी देश की पूरी अर्थव्यवस्था पर परोक्ष पकड स्थापित कर लो.

जो तानाशाह सहयोग ना करे उसका तख्ता पलट कर उसे मरवा दो. अगर मरवाना संभव ना हो तो अंतत: सेना भेज कर हाथ गंदे करो. इसलिए अमरीका की सेना को इतना सुसज्जित करो की एकसाथ एक से अधिक युद्ध लडे जा सकें. युद्ध जो सच या झूठ पर आधारित हों. हालांकी ये सब इतना स्पष्ट नहीं लिखा है लेकिन ये समझना कोई कठिन कार्य भी नहीं है. अमरीका का लंबा इतिहास रहा है ये सब करने का.

अमरीकी समाचार ने अपना असर दिखाना प्रारंभ कर दिया लगता है. अब तो पेट की गुड़गुड़ाहट बाहर भी सुनाई देने लग गई है. लगता है, बुढ़ापा दस्तक देने लगा है. ऐसे में ऐसी खबर को कोई कैसे छोड़ सकता है भला?

क्या आप युवा रहना चाहते हैं?

अगर आप लंबे समय तक युवा रहना चाहते हैं तो नीचे लिखी बातों पर अमल कर के देखिये। शायद आपको फर्क महसूस हो। ये बातें बहुत छोटी हैं मगर इनसे होने वाला फायदा काफी बड़ा है। ...

फिर तमाम सूची दी गई है. यह करें वह करें यह न करें वह न करें इत्यादि इत्यादि. परंतु, जो बात मैं कर सकता हूँ, और जो बात मुझे जंची वह यह है:

और अन्त में, इस ब्लॉग को नियमित पढ़िये क्योंकि यह है अच्छी चीजों का ब्लॉग।

ठीक है, नए साल का मेरा रेजोल्यूशन है - मैं इस समाचार स्रोत को नियमित पढ़ूंगा. सदा जवान रहने के लिए इतना तो कर ही सकता हूँ!

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1 टिप्पणी:

  1. अच्छी कसरत हो गई आपकी. काफी लम्म्म्म्बा लिखा है. :)
    हमारे धृतराष्ट्र शाही इंसान हैं आप उनसे रविवार को काम की अपेक्षा न करें. इधर संजय है कर्मचारी जो कम से कम छुट्टी के मामले में मजदूर कानुन का पालन कड़ाई से करते हैं.

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