सोमवार, दिसंबर 04, 2006

दिवस के पल की उम्र सिकुड़ी


पगडंडी पढ़ते हुए अहसास हुआ कि अचानक सर्दी बढ़ गई है और लगा कि -

कोहरा घना

ठंड में सूरज का

कंबल बना

तभी मनीषा ने बताया कि कम पढ़े लिखों को नौकरी लायक बनाएगी सरकार, तो माहौल कुछ गरमाया. उन्मुक्त, बच्चन के हवाले से नारी मन के बारे में नई बात बता रहे हैं, और तुलसीदास के राम-मय होने के बारे में भी नए विचारों को बता रहे हैं. इन विचारों को पढ़कर अहसास हुआ कि मेरा अपना पुरुष मन भी कितना विचित्र है!

यूँ तो अपना भारत भी विचित्र है. इस बात को एक बार और सिद्ध करने की कुछ यों कोशिश की है अनुराग ने -

"...मेरा भारत महान

तरनतारन में तलवारबाजी, आगरा में पत्थरबाजी, सूरत में आगजनी ये सब हुआ एक दिन में। पूरे हफ्ते को जोड़ लें तो ट्रेनें फुकीं, महाराष्ट्र में सो अलग। सासाराम में एक दंपत्ति को जिंदा फूँक दिया। गैरजिम्मेदारी, लापरवाही, और निकम्मेपन का उदाहरण बना भागलपुर का पुल।..."

मैं अभी तक अपने आप को विचित्र ही नहीं, बहुत बड़ा बली भी मानता था. परंतु मेरी इस धारणा को भागलपुर के पुल की तरह ढहना पड़ गया. क्यों? रागदरबारी का 7 वां अध्याय - पुरुष बली नहिं होत है... जो बाँच लिया -

"भैया, लठैती का काम कोई असेम्बली का काम तो नहीं। असेम्बली में जितने ही बूढ़े होते जाओ, जितने अकल सठियाती जाये, उनकी ही तरक्की होती है। यही

हरनामसिंह को देखो। चलने को उठते है तो लगता है कि गिरकर मर जायेंगे। पर दिन-पर-दिन वहां उनकी पूछ बड़ रही है। यहां लठैती में कल्ले के जोर की बात

है। जब तक चले,तब तक चले। जब नहीं चले, तब हलाल हो गये। लठैती का काम कोई असेम्बली का काम तो नहीं। असेम्बली में जितने ही बूढ़े होते जाओ, जितने अकल सठियाती जाये, उनकी ही तरक्की होती है।

"अभी पांच-छ: साल हुए होगें, मैं कातिक के नहान के लिए गंगा घाट गया था लौटते-लौटते रात हो गयी। यही भोलूपुर के पास रात हुई। बढ़िया चटक चांदनी। बाग के भीतर हम मौज मे आ गये तो एक चौबोला गाने लगे। तभी किसी ने पीछे से पीठ पर दायें से लाठी मारी। न राम-राम,न दुआ-सलाम, एक दम से लाठी मार दी। अब भैया, चौबोला तो जहां का तहां छूटा, झोला बीस हाथ पर जाकर गिरा। डण्डा अलग छिटक गया। मैं चिल्लाने को हुआ कि तीन-चार आदमी ऊपर आ गये। एक ने मुहं दबाकर कहां,'चुप बे साले! गर्दन ऐंठ दूंगा!' मैने तड़पड़ाकर उठने की कोशिश की, पर भैया, अचकचे में कोई गामा पहलवान पर लाठी छोड़ दे तो वहीं लोट जायेगा, हमारी क्या बिसात? वहीं मुंह बन्द किये पड़े रहे। थोड़ी देर मैं हाथ-पांव जोड़ता रहा। इशारा करके मुझसे कहा कि मैं चिल्लाऊंगा नहीं। तब कहीं उन्होंने मुंह से कपड़ा निकाला। एक ने मूझसे पूछा, रुपया कहां हैं?

"मैने कहा, बापू, जो कुछ है, इसी झोले में है।'

"झोले में डेढ़ रुपये की रेजगारी थी। एक लुटेरे ने उसे हाथ में खनखनाकर कहा, लंगोट खोलकर दिखाओगे?'

लंगोट हो या गहना, पहनने से क्या होता है? जब आत्मा ही बिलख रही है? वह भी सदियों से! रमा द्विवेदी की अनुभूतियाँ मेरी बंदी आत्मा को मुक्त करने का प्रयास करती रहीं -

सदियों से नारी विलख रही,

चाहे पहना हो कितना ही गहना?

आत्मा जब उसकी बनी है बंदी,

तब गहने पहन के क्या करना?

और पता नहीं कैसे, मेरे अपने घर के बारे में रमा को भी अनुभूतियाँ हो गईं या फिर सभी का घर ऐसा ही होता है-

घर में है बगीचा या बग़ीचे में है घर,

होता है मुझे भ्रम यह अकसर।

पर मेरे मन में है पतझड़,

यहां आदमी कम ही होता है दृष्टिगोचर॥

अपने पतझड़ी घर से बाहर निकल, मैं बड़े दिनों से रेल यात्रा करने की सोच रहा था. परंतु जब रचना ने बताया कि हे भगवान!! ये भारतीय रेल है! तो यात्रा का विचार त्याग कर मैथिलीशरण गुप्त की भारत भारती पढ़ने लगा जिसे लक्ष्मी गुप्त अपनी यादों के सहारे लाए हैं -

हम कौन थे क्या हो गए हैं

और क्या होंगे अभी

आओ बिचारें आज मिल कर

ये समस्याएं सभी।

जाहिर है, इन पंक्तियों से मेरी भ्रांतियाँ बढ़ गईं. इन भ्रांतियों को दूर करने के लिए मैंने पहाड़ी शब्दकोश से एक नई शुरूआत करनी चाही. शुरूआत बढ़िया रही क्योंकि एक और भ्रांति तब दूर हुई जब संजय ने भारत की आजादी में हिटलरीया योगदान के बारे में बताया.

आज का दिन भ्रांतियों को दूर करने वाला ही प्रतीत होता है. मानसी की यह ग़ज़ल बहुतों की भ्रांतियाँ दूर कर देगी -

ढूँढता है दर बदर क्यों मारा मारा

प्यार ही तो ज़िन्दगी में सब नहीं है

मेरी एक और भ्रांति गिरिराज जोशी ने दूर कर दी -

रोज-रोज की इन मुलाक़ातों से

बदनामी के सिवा और क्या पाओगे

पर, शुक्र है, कुछ कवि मित्र समाधान की बातें भी तो बता रहे हैं -

अपयश मिला मगर

सब खत्म नहीं हुआ है

सफलता ने अभी भी

ना नहीं कहा है

आँधी तूफ़ान आये फिर भी

तुम भिड़ जाओगे

परिस्थिति को निडर होकर

शह दे पाओगे...

और, बड़े दिनों बाद रजनी के मार्फत दूज का चाँद नजर आया -

बिखरे हुए रंग हैं पानी के कैन्वस पर,

भावों की तूलिका को पकड़े तम्हारा नाम लिख रही हूँ,

हर पल की भेंट को कैन्वस पर उतार रही हूँ,

जीवन की इस गहरी सतह पर

दूज के चाँद को उतार रही हूँ,

चाँदी की लकीर है या

मन से लिपटी अम्बर की परी कथा है कोई ?

तो इसे पढ़कर समीर की कुण्डलियाँ भी कुछ इस तरह जागृत हो गईं -

झील में उतरा है

दूज का चाँद ,

चाँदी की लकीर है

नीर में लिपटी हुई ।

--बहुत सुंदर और भावपूर्ण अभिव्यक्ति है, बधाई।

इन पंक्तियों को पढ़कर मेरे मन में व्यंज़ल तो नहीं, आतिशबाजियाँ फूटने लगीं - कुछ यूँ:



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2 टिप्‍पणियां:

  1. व्यंजल बिना चर्चा ऐसी ही है जैसे बिना मख्खन रोटी.
    पर रोटी है स्वादिष्ट. :)

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  2. 'तुलसीदास के राम-मय होने के बारे में भी नए विचारों को बता रहे हैं.' पोस्ट पर तुलसीदास के राममय होने के विचार मेरे नहीं हैं। यह विचार हरिवंश राय बच्चन के हैं। जैसा कि मैंने पोस्ट पर लिखा है, मै इन विचारों से मैं सहमत नहीं हूं।

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